श्रीमद्वाल्मीकियरामायणे अयोध्याकाण्डे षोडशः सर्गः ॥२-१६॥

रामायणम्/अयोध्याकाण्डे षोडशः सर्गः ॥२-१६॥

श्रीरामायण पाठ — अयोध्याकाण्डे षोडशः सर्गः ॥२-१६॥

 श्रीमद्वाल्मीकियरामायणे अयोध्याकाण्डे षोडशः सर्गः ॥२-१६॥

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के अयोध्याकाण्ड के षोडश सर्ग (२-१६) का हिंदी एवं अंग्रेजी अनुवाद तथा व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:

श्लोक १-३

स तदन्तःपुरद्वारं समतीत्य जनाकुलम्। प्रविविक्तां ततः कक्ष्यामाससाद पुराणवित्॥ १॥ प्रासकार्मुकबिभ्रद्भिर्युवभिर्मृष्टकुण्डलैः। अप्रमादिभिरेकाग्रैः स्वानुरक्तैरधिष्ठिताम्॥ २॥ तत्र काषायिणो वृद्धान् वेत्रपाणीन् स्वलंकृतान्। ददर्श विष्ठितान् द्वारि स्त्र्यध्यक्षान् समाहितान्॥ ३॥

  • हिंदी व्याख्या: पुराणों के ज्ञाता सुमंत्र अंतःपुर के भीड़भाड़ वाले द्वार को पार करके एकांत कक्ष्या (प्रांगण) में पहुँचे। वह कक्ष भाला और धनुष धारण किए हुए, सुंदर कुंडलों से सुशोभित, सावधान, एकाग्रचित्त तथा राम के प्रति अनुरक्त युवा रक्षकों द्वारा संरक्षित था। वहाँ द्वार पर उन्होंने काषाय (भगवा) वस्त्र धारण किए हुए, हाथों में बेत लिए, अलंकृत और सावधान वृद्ध स्त्र्यध्यक्षों (अंतःपुर के रक्षकों) को तैनात देखा।
  • English Translation: Crossing the crowded outer gateway of the inner palace, the knowledgeable Sumantra reached a quiet, secluded courtyard. That chamber was guarded by alert, focused, and devoted young warriors holding spears and bows, adorned with polished earrings. There at the doorway, he saw well-adorned, attentive elderly overseers of the inner apartments wearing saffron robes and holding canes in their hands.

श्लोक ४-७

ते समीक्ष्य समायान्तं रामप्रियचिकीर्षवः। सहसोत्पतिताः सर्वे ह्यासनेभ्यः ससम्भ्रमाः॥ ४॥ तानुवाच विनीतात्मा सूतपुत्रः प्रदक्षिणः। क्षिप्रमाख्यात रामाय सुमन्त्रो द्वारि तिष्ठति॥ ५॥ ते राममुपसङ्गम्य भर्तुः प्रियचिकीर्षवः। सहभार्याय रामाय क्षिप्रमेवाचचक्षिरे॥ ६॥ प्रतिवेदितमाज्ञाय सूतमभ्यन्तरं पितुः। तत्रैवानाययामास राघवः प्रियकाम्यया॥ ७॥

  • हिंदी व्याख्या: सुमंत्र को आते देखकर राम का प्रिय चाहने वाले वे सभी रक्षक आदरपूर्वक अपने आसनों से तुरंत खड़े हो गए। विनम्र स्वभाव वाले सूतपुत्र सुमंत्र ने उनसे कहा—"आप शीघ्र जाकर श्रीराम से कहिए कि सुमंत्र द्वार पर खड़े हैं।" स्वामी का प्रिय चाहने वाले उन सेवकों ने तुरंत जाकर जानकी जी के साथ बैठे हुए श्रीराम को सुमंत्र के आगमन की सूचना दी। अपने पिता के अत्यंत विश्वसनीय सुमंत्र का आगमन जानकर श्रीराम ने उन्हें सादर भीतर बुलवा लिया।
  • English Translation: Beholding Sumantra approach, all those guards, eager to please Rama, quickly rose from their seats with deep respect. The humble charioteer Sumantra said to them: "Inform Rama immediately that Sumantra stands at the gate." Eager to do their master's bidding, the attendants hastened to inform Rama, who was seated with his wife. Learning of the arrival of his father's trusted minister, Raghava warmly had him brought inside.

श्लोक ८-१२

तं वैश्रवणसंकाशमुपविष्टं स्वलंकृतम्। ददर्श सूतः पर्यङ्के सौवर्णे सोत्तरच्छदे॥ ८॥ वराहरुधिराभेण शुचिना च सुगन्धिना। अनुलिप्तं परार्घ्येन चन्दनेन परंतपम्॥ ९॥ स्थितया पार्श्वतश्चापि वालव्यजनहस्तया। उपेतं सीतया भूयश्चित्रया शशिनं यथा॥ १०॥ तं तपन्तमिवादित्यमुपपन्नं स्वतेजसा। ववन्दे वरदं वन्दी विनयज्ञो विनीतवत्॥ ११॥ प्राञ्जलिः सुमुखं दृष्ट्वा विहारशयनासने। राजपुत्रमुवाचेदं सुमन्त्रो राजसत्कृतः॥ १२॥

  • हिंदी व्याख्या: सूत सुमंत्र ने देखा कि शत्रुओं को संताप देने वाले श्रीराम सुंदर वस्त्र-आभूषणों से सुसज्जित होकर बिछौने से ढके स्वर्ण सिंहासन पर कुबेर के समान विराजमान थे। उनके शरीर पर वराह के रक्त के समान लाल, पवित्र और सुवासित बहुमूल्य चंदन का अनुलेप लगा हुआ था। उनके पास में हाथ में चँवर लिए खड़ी सीता जी ऐसी लग रही थीं जैसे चित्रा नक्षत्र के साथ चंद्रमा सुशोभित होता है। अपने तेज से सूर्य के समान चमकते हुए और वर देने में समर्थ श्रीराम को देखकर विनयज्ञ सुमंत्र ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और कहा—
  • English Translation: The charioteer saw the tormentor of foes, Rama, splendidly adorned, seated like Kubera upon a golden couch covered with fine drapery. His body was anointed with pure, fragrant, and costly red sandalwood paste resembling the hue of a wild boar's blood. Beside him stood Sita with a chowrie in her hand, appearing like the moon accompanied by the Chitra constellation. Beholding Rama blazing with his own radiance like the sun, the humble Sumantra folded his hands, bowed with deep reverence, and spoke:

श्लोक १३-१६

कौसल्या सुप्रजा राम पिता त्वां द्रष्टुमिच्छति। महिष्यापि हि कैकेय्या गम्यतां तत्र मा चिरम्॥ १३॥ एवमुक्तस्तु संहृष्टो नरसिंहो महाद्युतिः। ततः सम्मानयामास सीतामिदमुवाच ह॥ १४॥ देवि देवश्च देवी च समागम्य मदन्तरे। मन्त्रयेते ध्रुवं किंचिदभिषेचनसंहितम्॥ १५॥ लक्षयित्वा ह्यभिप्रायं प्रियकामा सुदक्षिणा। संचोदयति राजानं मदर्थमसितेक्षणा॥ १६॥

  • हिंदी व्याख्या: "हे कौसल्यानंदन श्रीराम! आपके पिता महाराज आपको देखना चाहते हैं। महारानी कैकेयी भी वहाँ उपस्थित हैं, अतः आप बिना किसी विलंब के वहाँ पधारें।" सुमंत्र के यह कहने पर महातेजस्वी पुरुषों में सिंह के समान श्रीराम अत्यंत प्रसन्न हुए और सीता जी का सम्मान करते हुए बोले—"हे देवि! निश्चित ही महाराज और देवी कैकेयी एक साथ मिलकर मेरे राज्याभिषेक के संबंध में ही कोई परामर्श कर रहे हैं। चतुर और मेरे प्रति प्रेम रखने वाली सुंदर नेत्रों वाली माता कैकेयी महाराज के मन को जानकर मेरे ही हित के लिए उन्हें प्रेरित कर रही होंगी।"
  • English Translation: "O Rama, gladdener of Kausalya, your father wishes to see you. Queen Kaikeyi is also present there, so do not delay in going." Thus addressed, the highly radiant tiger among men, Rama, felt deeply rejoiced, and honoring Sita, said to her: "O Queen, surely the King and Queen Kaikeyi have met together to deliberate upon something concerning my coronation. Perceiving the King's intent, the clever and affectionate black-eyed mother Kaikeyi must be prompting him for my welfare."

श्लोक १७-२०

सा प्रहृष्टा महाराजं हितकामानुवर्तिनी। जननी चार्थकामा मे केकयाधिपतेः सुता॥ १७॥ दिष्ट्या खलु महाराजो महिष्या प्रियया सह। सुमन्त्रं प्राहिणोद् दूतमर्थकामकरं मम॥ १८॥ यादृशी परिषत् तत्र तादृशो दूत आगतः। ध्रुवमद्यैव मां राजा यौवराज्येऽभिषेक्ष्यति॥ १९॥ हन्त शीघ्रमितो गत्वा द्रक्ष्यामि च महीपतिम्। सह त्वं परिवारेण सुखमास्स्व रमस्व च॥ २०॥

  • हिंदी व्याख्या: "केकयराज की पुत्री मेरी माता कैकेयी महाराज के हित का अनुसरण करने वाली तथा मेरा भला चाहने वाली हैं। यह सौभाग्य की बात है कि महाराज ने अपनी प्रिय महारानी के साथ मिलकर मेरे सभी मनोरथों को सिद्ध करने वाले सुमंत्र को दूत बनाकर भेजा है। जैसी वहाँ सभा है, वैसा ही दूत आया है। निश्चित ही आज महाराज मुझे युवराज पद पर अभिषिक्त करेंगे। अतः मैं शीघ्र जाकर महाराज के दर्शन करता हूँ, तुम तब तक अपने परिचारकों के साथ यहाँ सुखपूर्वक रहो।"
  • English Translation: "The daughter of the king of Kekaya, my mother, is ever devoted to the King's welfare and desires my prosperity. Fortunate indeed it is that the King, along with his beloved Queen, has dispatched Sumantra as a messenger to fulfill my desires. Just as the assembly is noble, so is the envoy sent. Surely today the King will consecrate me to the crown princedom. Therefore, I shall go quickly to behold the Monarch; meanwhile, stay here comfortably with your attendants."

श्लोक २१-२४

पतिसम्मानिता सीता भर्तारमसितेक्षणा। आ द्वारमनुवव्राज मङ्गलान्यभिदध्युषी॥ २१॥ राज्यं द्विजातिभिर्जुष्टं राजसूयाभिषेचनम्। कर्तुमर्हति ते राजा वासवस्येव लोककृत्॥ २२॥ दीक्षितं व्रतसम्पन्नं वराजिनधरं शुचिम्। कुरङ्गशृङ्गपाणिं च पश्यन्ती त्वां भजाम्यहम्॥ २३॥ पूर्वां दिशं वज्रधरो दक्षिणां पातु ते यमः। वरुणः पश्चिमामाशां धनेशस्तूत्तरां दिशम्॥ २४॥

  • हिंदी व्याख्या: पति द्वारा सम्मानित सुंदर नेत्रों वाली सीता जी मंगल कामनाएँ करती हुई श्रीराम को द्वार तक छोड़ने आईं। वे बोलीं—"सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी जिस प्रकार इंद्र का अभिषेक करते हैं, उसी प्रकार महाराज ब्राह्मणों द्वारा पूजित राजसूय यज्ञ के समान आपका अभिषेक करें। जब आप दीक्षा लेकर, उत्तम मृगछाला धारण कर, हाथ में मृगश्रृंग लिए पवित्र रूप में लौटेंगे, तब मैं आपके उस रूप के दर्शन करूँगा। पूर्व दिशा में इंद्र, दक्षिण में यमराज, पश्चिम में वरुण और उत्तर दिशा में कुबेर आपकी रक्षा करें।"
  • English Translation: Honored by her husband, the dark-eyed Sita accompanied Him to the doorway, chanting auspicious blessings: "May the King perform your consecration, revered by Brahmins, just as Brahma performed the consecration of Indra. I eagerly look forward to beholding you returning pure, initiated, clad in prime deerskin, holding a stag's horn in your hand. May Indra protect you in the east, Yama in the south, Varuna in the west, and Kubera in the north."

श्लोक २५-२८

अथ सीतामनुज्ञाप्य कृतकौतुकमङ्गलः। निश्चक्राम सुमन्त्रेण सह रामो निवेशनात्॥ २५॥ पर्वतादिव निष्क्रम्य सिंहो गिरिगुहाशयः। लक्ष्मणं द्वारि सोऽपश्यत् प्रह्वाञ्जलिपुटं स्थितम्॥ २६॥ अथ मध्यमकक्ष्यायां समागच्छत् सुहृज्जनैः। स सर्वानर्थिनो दृष्ट्वा समेत्य प्रतिनन्द्य च॥ २७॥ ततः पावकसंकाशमारुरोह रथोत्तमम्। वैयाघ्रं पुरुषव्याघ्रो राजितं राजनन्दनः॥ २८॥

  • हिंदी व्याख्या: सीता जी से विदा लेकर, सभी मङ्गल कृत्यों को संपन्न कर श्रीराम सुमंत्र के साथ भवन से बाहर निकले। जैसे पर्वत की गुफा से सिंह बाहर निकलता है, वैसे ही बाहर आकर उन्होंने द्वार पर हाथ जोड़े खड़े लक्ष्मण को देखा। मध्य कक्ष्या में पहुँचकर श्रीराम अपने मित्रों और आए हुए याचकों से मिले तथा उनका यथायोग्य सत्कार किया। इसके बाद पुरुषों में श्रेष्ठ राजपुत्र श्रीराम अग्नि के समान दीप्तिमान, बाघ की छाल से मढ़े हुए और चाँदी से सुशोभित उत्तम रथ पर सवार हुए।
  • English Translation: Taking leave of Sita and having performed all auspicious rites, Rama stepped out of his mansion alongside Sumantra. Like a lion emerging from a mountain cave, he saw Lakshmana standing at the gate with joined palms. Proceeding to the central courtyard, Rama met his friends and all applicants, greeting them appropriately. Then, that tiger among men, Prince Rama, mounted a magnificent chariot that blazed like fire, covered with tiger-skin and adorned with silver.

श्लोक २९-३३

मेघनादमसम्बाधं मणिहेमविभूषितम्। मुष्णन्तमिव चक्षूंषि प्रभया मेरुवर्चसम्॥ २९॥ करेणुशिशुकल्पैश्च युक्तं परमवाजिभिः। हरियुक्तं सहस्राक्षो रथमिन्द्र इवाशुगम्॥ ३०॥ प्रययौ तूर्णमास्थाय राघवो ज्वलितः श्रिया। स पर्जन्य इवाकाशे स्वनवानभिनादयन्॥ ३१॥ निकेतान्निर्ययौ श्रीमान् महाभ्रादिव चन्द्रमाः। चित्रचामरपाणिस्तु लक्ष्मणो राघवानुजः॥ ३२॥ जुगोप भ्रातरं भ्राता रथमास्थाय पृष्ठतः। ततो हलहलाशब्दस्तुमुलः समजायत॥ ३३॥

  • हिंदी व्याख्या: वह रथ मेघ के समान गंभीर शब्द करने वाला, विशाल, मणियों और सुवर्ण से जड़ा हुआ, मेरु पर्वत के समान कांतिमान और देखने वालों के नेत्रों को चौंधियाने वाला था। उसमें छोटे हाथियों के समान बलवान उत्तम घोड़े जुते हुए थे। जैसे इंद्र अपने हरी घोड़ों वाले रथ पर सवार होते हैं, वैसे ही श्रीराम उस रथ पर बैठकर अपनी लक्ष्मी से सुशोभित होकर शीघ्रता से चल पड़े। बादलों की गड़गड़ाहट के समान शब्द करते हुए श्रीमान् राम अपने भवन से ऐसे निकले जैसे काले बादलों से चंद्रमा बाहर निकलता है। लक्ष्मण हाथ में सुंदर चँवर लेकर रथ के पीछे खड़े होकर अपने भ्राता की रक्षा करने लगे। उस समय चारों ओर प्रजा का महान कोलाहल और हर्षध्वनि गूँज उठी।
  • English Translation: That chariot resounded deep as thunder, was spacious, inlaid with gold and gems, radiant like Mount Meru, and dazzling to the eyes. It was yoked to swift, excellent horses strong as young elephants. Just as Indra ascends his chariot yoked with green horses, Raghava mounted that swift vehicle and rode forth glowing with splendor. Resounding like rain-clouds in the sky, the glorious Rama emerged from his mansion like the moon from dark clouds. Holding a wondrous chowrie, Lakshmana stood behind his brother on the chariot to guard Him. Thereupon, a tumultuous sound of joyous acclamation arose from the crowd.

श्लोक ३४-३८

तस्य निष्क्रममाणस्य जनौघस्य समन्ततः। ततो हयवरा मुख्या नागाश्च गिरिसंनिभाः॥ ३४॥ अनुजग्मुस्तथा रामं शतशोऽथ सहस्रशः। अग्रतश्चास्य संनद्धाश्चन्दनागुरुभूषिताः॥ ३५॥ खड्गचापधराः शूरा जग्मुराशंसवो जनाः। ततो वादित्रशब्दाश्च स्तुतिशब्दाश्च वन्दिनाम्॥ ३६॥ सिंहनादाश्च शूराणां ततः शुश्रुविरे पथि। हर्म्यवातायनस्थाभिर्भूषिताभिः समन्ततः॥ ३७॥ कीर्यमाणः सुपुष्पौघैर्ययौ स्त्रीभिररिंदमः। रामं सर्वानवद्याङ्ग् यो रामपिप्रीषया ततः॥ ३८॥

  • हिंदी व्याख्या: श्रीराम के बाहर निकलते ही चारों ओर जनसमूह एकत्र हो गया। सैकड़ों-हजारों उत्तम घोड़े और पर्वत के समान विशाल हाथी उनके पीछे-पीछे चलने लगे। आगे-आगे चंदन और अगुरु से सुवासित, कवच पहने, हाथ में तलवार और धनुष लिए शूरवीर और मङ्गल चाहने वाले योद्धा चल रहे थे। मार्ग में वाद्ययंत्रों की मधुर ध्वनि, वंदिजनों की स्तुतियाँ और शूरवीरों के सिंहनाद सुनाई दे रहे थे। महलों के झरोखों में खड़ी आभूषणों से सजी सुंदर स्त्रियाँ श्रीराम को प्रसन्न करने के लिए उन पर पुष्पों की वर्षा कर रही थीं।
  • English Translation: As Rama proceeded, vast crowds gathered around Him from all sides. Hundreds and thousands of prime horses and mountain-like elephants followed Him. In front marched brave warriors clad in armor, scented with sandalwood and aloe, carrying swords and bows, invoking blessings. Along the way resounded the music of instruments, the eulogies of bards, and the lion-like roars of valiant soldiers. From the balconies of mansions, beautifully adorned women showered streams of flowers upon Him to express their affection for Rama.

श्लोक ३९-४२

वचोभिरग्र्यैर्हर्म्यस्थाः क्षितिस्थाश्च ववन्दिरे। नूनं नन्दति ते माता कौसल्या मातृनन्दन॥ ३९॥ पश्यन्ती सिद्धयात्रं त्वां पित्र्यं राज्यमुपस्थितम्। सर्वसीमन्तिनीभ्यश्च सीतां सीमन्तिनीं वराम्॥ ४०॥ अमन्यन्त हि ता नार्यो रामस्य हृदयप्रियाम्। तया सुचरितं देव्या पुरा नूनं महत् तपः॥ ४१॥ रोहिणीव शशाङ्केन रामसंयोगमाप या। इति प्रासादशृङ्गेषु प्रमदाभिर्नरोत्तमः। शुश्राव राजमार्गस्थः प्रिया वाच उदाहृताः॥ ४२॥

  • हिंदी व्याख्या: महलों और सड़कों पर खड़े लोग उत्तम वचनों से श्रीराम की वंदना कर रहे थे—"हे मातृनंदन! अपने पुत्र की यात्रा को सफल होते और पैतृक राज्य प्राप्त करते देखकर आपकी माता कौसल्या निश्चित रूप से अत्यंत आनंदित हो रही होंगी। श्रीराम की प्रियतमा सीता सभी स्त्रियों में श्रेष्ठ और भाग्यशाली हैं, जिन्होंने पूर्वजन्म में अवश्य ही महान तपस्या की होगी, जिसके फलस्वरूप वे रोहिणी और चंद्रमा के समान राम का साथ पा सकी हैं।" राजमार्ग से जाते हुए पुरुषों में श्रेष्ठ श्रीराम ने अट्टालिकाओं के शिखरों से स्त्रियों द्वारा कहे गए इन प्रिय वचनों को सुना।
  • English Translation: People from the rooftops and streets praised Rama with noble words: "O gladdener of your mother, seeing your journey successful and the ancestral kingdom attained, your mother Kausalya must surely be overjoyed! Sita, the beloved of Rama's heart, is the most fortunate among all women. Surely she performed great penance in past lives, owing to which she obtained union with Rama just as Rohini is united with the moon." Passing through the highway, the best of men, Rama, heard these sweet words uttered by ladies from the balcony tops.

श्लोक ४३-४५

स राघवस्तत्र तदा प्रलापान् शुश्राव लोकस्य समागतस्य। आत्माधिकारा विविधाश्च वाचः प्रहृष्टरूपस्य पुरे जनस्य॥ ४३॥ एष श्रियं गच्छति राघवोऽद्य राजप्रसादाद् विपुलां गमिष्यन्। एते वयं सर्वसमृद्धकामा येषामयं नो भविता प्रशास्ता॥ ४४॥ लाभो जनस्यास्य यदेष सर्वं प्रपत्स्यते राष्ट्रमिदं चिराय। न ह्यप्रियं किंचन जातु कश्चित् पश्येन्न दुःखं मनुजाधिपेऽस्मिन्॥ ४५॥

  • हिंदी व्याख्या: वहाँ श्रीराम ने एकत्र हुए प्रसन्नचित्त नगरवासियों की भाँति-भाँति की बातें सुनीं। लोग कह रहे थे—"आज ये राघव महाराज की कृपा से अतुलनीय राजलक्ष्मी प्राप्त करने जा रहे हैं। जब ये हमारे शासक बन जाएँगे, तब हमारी समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण हो जाएँगी। इस संपूर्ण राष्ट्र के लिए यह महान लाभ की बात है कि श्रीराम लंबे समय तक शासन करेंगे। इनके राजा रहते हुए कभी किसी को कोई दुख या अप्रिय बात देखने को नहीं मिलेगी।"
  • English Translation: There Raghava heard various conversations among the assembled, overjoyed citizens. People were saying: "Today this Raghava is going to attain vast royal prosperity by the King's grace. When He becomes our ruler, all our desires shall be fully accomplished. It is a immense gain for this entire nation that He will govern this realm for a long time. Under this lord of men, no one shall ever witness any sorrow or anything unpleasant."

श्लोक ४६-४७

स घोषवद्भिश्च हयैः सनागैः पुरःसरैः स्वस्तिकसूतमागधैः। महीयमानः प्रवरैश्च वादकै- रभिष्टुतो वैश्रवणो यथा ययौ॥ ४६॥ करेणुमातङ्गरथाश्वसंकुलं महाजनौघैः परिपूर्णचत्वरम्। प्रभूतरत्नं बहुपण्यसंचयं ददर्श रामो विमलं महापथम्॥ ४७॥

  • हिंदी व्याख्या: टापों की ध्वनि करते घोड़ों, हाथियों, आगे चलने वाले रक्षकों, स्वस्तिवाचक ब्राह्मणों, सूत-मागधों और श्रेष्ठ वादकों द्वारा स्तुति किए जाते हुए श्रीराम कुबेर के समान शोभा पाते हुए आगे बढ़े। हथनियों, हाथियों, रथों और घोड़ों से भरे हुए, अपार जनसमूह से युक्त चौराहों वाले, प्रचुर रत्नों और भाँति-भांति की व्यापारिक सामग्रियों से सजे हुए स्वच्छ एवं विशाल राजमार्ग को श्रीराम ने देखा।
  • English Translation: Honored and praised by clattering horses, elephants, heralds walking ahead, bards chanting auspicious verses, and eminent musicians, Rama proceeded like Kubera. He looked upon the spotless main highway, crowded with female and male elephants, chariots, and horses, its squares packed with vast crowds, abounding in rich gems and diverse merchandise.

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे षोडशः सर्गः ॥२-१६॥ (इस प्रकार महर्षि वाल्मीकि रचित आदिकाव्य श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के अयोध्याकाण्ड का सोहवाँ सर्ग पूर्ण हुआ।)

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे षोडशः सर्गः ॥२-१६॥