श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि द्विषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः

महाभारत के आदिपर्व (अध्याय 162) के इन सभी श्लोकों (श्लोक 1 से 40) का क्रमवार संस्कृत मूल, हिंदी अनुवाद और विस्तृत व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:

श्लोक 1-3

मूल: अथ रात्र्यां व्यतीतायामशेषो नागरो जनः। तत्राजगाम त्वरितो दिदृक्षुः पाण्डुनन्दनान्।। (1-162-1) निर्वापयन्तो ज्वलनं ते जना ददृशुस्ततः। जातुषं तद्गृहं दग्धममात्यं च पुरोचनम्।। (1-162-2) नूनं दुर्योधनेनेदं विहितं पापकर्मणा। पाण्डवानां विनाशायेत्येवं ते चुक्रुशुर्जनाः।। (1-162-3) हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—तदनन्तर रात बीतने पर वारणावत का समस्त नगरवासी समाज पाण्डुपुत्रों को देखने की इच्छा से तेजी से वहाँ आ पहुँचा। आग को बुझाते हुए उन लोगों ने देखा कि लाक्षागृह जलकर खाक हो गया है और मंत्री पुरोचन भी जल मरा है। नगरवासी आक्रोश में आकर चिल्लाने लगे—निश्चय ही यह पापकर्म दुर्योधन द्वारा पांडवों के विनाश के लिए ही रचा गया है! व्याख्या: सुबह होते ही जब नगर के लोग लाक्षागृह पहुँचे, तो उन्होंने राख और जले हुए अवशेष देखे। वे तुरंत समझ गए कि यह दुर्योधन और पुरोचन का एक कुटिल षड्यंत्र था जिसके तहत पांडवों को खत्म किया गया।

श्लोक 4-5

मूल: विदिते धृतराष्ट्रस्य धार्तराष्ट्रो न संशयः। दग्धवान्पाण्डुदायादान्न HymetPratisidhvan।। (1-162-4) नूनं शान्तनवोऽपीह न धर्मनुवर्तते। द्रोणश्च विदुरश्चैव कृपश्चान्ये च कौरवाः।। (1-162-5) हिंदी अनुवाद: (लोग कहने लगे)—धृतराष्ट्र की जानकारी में ही इसमें कोई संशय नहीं है कि धृतराष्ट्र के पुत्र (दुर्योधन) ने पांडुपुत्रों को जलवा दिया है, क्योंकि धृतराष्ट्र ने इसे रोका नहीं। निश्चय ही इस बात से यह प्रतीत होता है कि अब शांतनुपुत्र भीष्म, द्रोणाचार्य, विदुर, कृपाचार्य और अन्य कौरव भी धर्म का पालन नहीं कर रहे हैं (या इस अन्यायी कृत्य को रोक पाने में असमर्थ रहे हैं)। व्याख्या: नगरवासी इस घटना से अत्यधिक क्षुब्ध थे और वे राजा धृतराष्ट्र के साथ-साथ हस्तिनापुर के बड़े-बड़े बुजुर्गों और आचार्यों (भीष्म, द्रोण आदि) पर भी इस अन्याय को न रोक पाने का मौन समर्थन करने का आरोप लगा रहे थे।

श्लोक 6-8

मूल: `नावेक्षन्ते ह तं धर्मं धर्मात्मानोऽप्यहो विधेः। श्रुतवन्तोऽपि विद्वांसो धनवद्वशगा अहो।। (1-162-6) साधूननाथान्धर्मिष्ठात्सत्यव्रतपरायणान्। नावेक्षन्ते महान्तोऽपि दैवं तेषां परायणम्।। (1-162-7) ते वयं धृतराष्ट्राय प्रेषयामो दुरात्मने। संवृत्तस्ते परः कामः पाण्डवान्दग्धवानसि।। (1-162-8) हिंदी अनुवाद: अहो विधाता का खेल है कि बड़े-बड़े धर्मात्मा, शास्त्रज्ञ और विद्वान लोग भी धन के वशीभूत होकर उस धर्म की उपेक्षा कर रहे हैं। सत्यव्रतपरायण, अनाथ और धर्मिष्ठ साधु पुरुषों की रक्षा बड़े लोग भी नहीं कर रहे हैं, अब तो केवल दैव (भाग्य) ही उनका आश्रय है। इसलिए हम सब मिलकर इस दुरात्मा धृतराष्ट्र के पास संदेश भेजते हैं—लो, तुम्हारी इच्छा पूरी हो गई और तुमने पांडवों को जलवा दिया! व्याख्या: जनता में हस्तिनापुर के राजदरबार के प्रति घोर रोष था। उन्हें इस बात का गहरा दुःख था कि पांडवों जैसे सत्पुरुषों और अनाथों की रक्षा के लिए कोई आगे नहीं आया।

श्लोक 10-12

मूल: ततो व्यपोहमानास्ते पाण्डवार्थे हुताशनम्। निषादीं ददृशुर्दग्धां पञ्चपुत्रामनागसम्।। (1-162-9) इतः पश्यत कुन्तीयं दग्धा शेते तपस्विनी। पुत्रैः सहैव वार्ष्णेयी हन्तेत्याहुः स्म नागराः।। (1-162-10) खनकेन तु तेनैव वेश्म शोधयता बिलम्। पांसुभिः पिहितं तच्च पुरुषैस्तैर्न लक्षितम्।। (1-162-11) ततस्ते प्रेषयामासुर्धृतराष्ट्राय नागराः। पाण्डवानग्निना दग्धानमात्यं च पुरोचनम्।। (1-162-12) हिंदी अनुवाद: इसके बाद आग के मलबे को हटाते हुए लोगों ने एक निषाद स्त्री को उसके पाँच निर्दोष पुत्रों के साथ जला हुआ देखा। नगरवासी कहने लगे—इधर देखो, यह तपस्विनी कुंती (वार्ष्णेयी) अपने पुत्रों के साथ जलकर मर गई है! सुरंग खोदने वाले खनक (मजदूर) द्वारा वह सुरंग पहले ही मिट्टी से ढँक दी गई थी, इसलिए वहाँ आए पुरुषों को वह सुरंग नजर नहीं आई। तब वारणावत के नागरिकों ने धृतराष्ट्र के पास यह समाचार भेज दिया कि पांडव और मंत्री पुरोचन अग्नि में जलकर भस्म हो गए हैं। व्याख्या: चूंकि निषाद स्त्री और उसके पाँच पुत्र उसी रात शराब के नशे में वहाँ सोए थे और जल गए थे, तथा सुरंग का मुहाना मिट्टी से ढँक जाने के कारण किसी को पांडवों के निकलने का पता नहीं चला, इसलिए सबको यही भ्रम हो गया कि कुंती और पांडव जलकर मर चुके हैं।

श्लोक 13-14

मूल: श्रुत्वा तु धृतराष्ट्रस्तद्राजा सुमहदप्रियम्। विनाशं पाण्डुपुत्राणां विललाप सुदुःखितः।। (1-162-13) अन्तर्हृष्टमनाश्चासौ बहिर्दुःखसमन्वितः। अन्तःशीतो बहिश्चोष्णो ग्रीष्मेऽगाधह्वदोयथा।। (1-162-14) हिंदी अनुवाद: राजा धृतराष्ट्र ने पाण्डुपुत्रों के इस अत्यंत अप्रिय विनाश का समाचार सुनकर बहुत विलाप किया और वे अत्यधिक दुःखी हुए। किंतु भीतर से उनका मन बहुत प्रसन्न था और बाहर से वे दुःख का दिखावा कर रहे थे। उनकी स्थिति ग्रीष्म ऋतु में भीतर से ठंडे और बाहर से गर्म रहने वाले अगाध जलाशय (तालाब) जैसी हो रही थी। व्याख्या: धृतराष्ट्र का चरित्र यहाँ द्विविधा से ग्रसित और कपटपूर्ण दिखाया गया है। ऊपरी तौर पर वे शोक मना रहे थे ताकि दुनिया की नजरों में अच्छे बने रहें, लेकिन अंदर ही अंदर राज्य से पांडवों के हटने से उन्हें गहरी संतुष्टि (प्रसन्नता) मिल रही थी।

श्लोक 15-19

मूल: धृतराष्ट्र उवाच। अद्य पाण्डुर्मृतो राजा मम भ्राता महायशाः। तेषु वीरेषु दग्धेषु मात्रा सह विशेषतः।। (1-162-15) गच्छन्तु पुरुषाः शीघ्रं नगरं वारणावतम्। सत्कारयन्तु तान्वीरान्कुन्तीं राजसुतां च ताम्।। (1-162-16) ये च तत्र मृतास्तेषां सुहृदः सन्ति तानपि। कारयन्तु च कुल्याणि शुभ्राणि च बृहन्ति च।। (1-162-17) मम दग्धा महात्मानः कुलवंशविवर्धनाः।। (1-162-18) एवं गते मया शक्यं यद्यत्कारयितुं हितम्। पाण्डवानां च कुन्त्याश्च तत्सर्वं क्रियतां धनैः।। (1-162-19) हिंदी अनुवाद: धृतराष्ट्र ने कहा—आज माता कुंती सहित उन वीर पांडवों के जल जाने से मेरे महायशस्वी भाई राजा पांडु सचमुच पुनः मर गए! मेरे पुरुष (सेवक) शीघ्र वारणावत नगर जाएँ और राजपुत्री कुंती तथा उन वीर पांडवों का यथोचित सत्कार (अंतिम संस्कार आदि) करें। जो अन्य लोग भी वहाँ मरे हैं, उनके स्वजनों के लिए भव्य और सुंदर कुल्य (शवदाह या स्मारक कार्य) करवाएँ। वे महात्मा मेरे कुल और वंश को बढ़ाने वाले थे, जो अब जल चुके हैं। इस स्थिति में पांडवों और कुंती के हित के लिए जो कुछ भी करना संभव हो, वह सब धन खर्च करके किया जाए। व्याख्या: धृतराष्ट्र अपने इस वक्तव्य के माध्यम से दुनिया को यह जताना चाहते थे कि वे पांडवों की मृत्यु से कितने मर्माहत हैं, ताकि किसी को उनके या उनके पुत्रों के षड्यंत्र पर शक न हो।

श्लोक 20-22

मूल: `वैशंपायन उवाच। समताश्च ततः सर्वे भीष्म्मेण सह कौरवाः। धृतराष्ट्रः सपुत्रश्च गङ्गामभिमुखा ययुः।। (1-162-20) एकवस्त्रा निरानन्दा निराभरणवेष्टनः। उदकं कर्तुकामा वै पाण्डवानां महात्मनाम्।।' (1-162-21) एवं गत्वा ततश्चक्रे ज्ञातिभिः परिवारितः। उदकं पाण्डुपुत्राणां धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः।। (1-162-22) हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—इसके बाद पितामह भीष्म के साथ सभी कौरव और पुत्रों सहित धृतराष्ट्र गंगा नदी की ओर प्रस्थान कर गए। वे सब एकवस्त्र पहने हुए, आनंदहीन और आभूषण-रहित होकर महात्मना पांडवों को श्रद्धांजलि स्वरूप जल देने (उदक कर्म करने) की इच्छा से गए थे। वहाँ जाकर अंबिकासुतः धृतराष्ट्र ने अपने संबंधियों से घिरे हुए पाण्डुपुत्रों के लिए तर्पण (उदक कर्म) किया। व्याख्या: हस्तिनापुर के राजपरिवार ने पांडवों की मृत्यु के शोकाकुल माहौल में आधिकारिक रूप से गंगा तट पर जाकर उनका तर्पण और अंतिम क्रियाकर्म किया।

श्लोक 23-25

मूल: रुरुदुः सहिताः सर्वे भृशं शोकपरायणाः। हा युधिष्ठिर कौरव्य हा भीम इति चापरे।। (1-162-23) हा फल्गुनेति चाप्यन्ये हा यमाविति चापरे। कुन्तीमार्ताश्च शोचन्त उदकं चक्रिरे जनाः।। (1-162-24) अन्ये पौरजनाश्चैवमन्वशोचन्त पाण्डवान्। विदुरस्त्वल्पशश्चक्रे शोकं वेद परं हि सः।। (1-162-25) हिंदी अनुवाद: वे सब शोक के वशीभूत होकर जोर-जोर से रोने लगे। कोई "हा युधिष्ठिर कौरव्य!", कोई "हा भीम!", कोई "हा फल्गुनी (अर्जुन)!" और अन्य लोग "हा यम (नकुल-सहदेव)!" तथा दुःखी होकर "हा कुंती!" पुकारते हुए तर्पण करने लगे। अन्य नगरवासी भी इसी प्रकार पांडवों का शोक मनाने लगे। किंतु विदुर जी ने बहुत कम शोक किया, क्योंकि वे यथार्थ सत्य (कि पांडव जीवित हैं) भली-भांति जानते थे। व्याख्या: जहाँ पूरा राजपरिवार और नगरवासी पांडवों के मरने पर फफक-फफक कर रो रहे थे, वहीं विदुर जी अंदर से शांत थे क्योंकि गुप्तचरों के माध्यम से उन्हें पता था कि पांडव सुरक्षित निकल चुके हैं।

श्लोक 26-28

मूल: विदुरो धृतराष्ट्रस्य जानन्सर्वं मनोगतम्। तेनायं विधिना सृष्टः कुटिलः कपटाशयः।। (1-162-26) इत्येवं चिन्तयन्राजन्विदुरो विदुषां वरः। लोकानां दर्शयन्दुःखं दुःखितैः सह बान्धवैः।। (1-162-27) मनसाऽचिन्तयत्पार्थान्कियद्दूरं गता इति। सहिताः पाण्डवाः पुत्रा इति चिन्तापरोऽभवत्।। (1-162-28) हिंदी अनुवाद: हे राजन्! विदुर जी धृतराष्ट्र के मन की सारी बात जानते थे कि इसी कपटी और कुटिल मानसिकता के कारण यह सब षड्यंत्र रचा गया है। विद्वानों में श्रेष्ठ विदुर जी ने ऐसा सोचते हुए भी दुनिया को दिखाने के लिए अपने दुःखी रिश्तेदारों के साथ दुःख का प्रदर्शन किया। किंतु मन ही मन वे यही सोच रहे होंगे कि पांडव अपनी माता के साथ सुरक्षित कितनी दूर निकल गए होंगे और अब वे कहाँ तक पहुँचे होंगे—इसी चिंता में वे डूबे हुए थे। व्याख्या: विदुर जी अपनी भूमिका बेहद बुद्धिमत्ता और संयम से निभा रहे थे। वे दुनिया के सामने शोकाकुल होने का नाटक कर रहे थे ताकि किसी को संदेह न हो, लेकिन उनकी असली चिंता पांडवों की सुरक्षित यात्रा को लेकर थी।

श्लोक 29-32

मूल: ततः प्रव्यथितो भीष्मः पाण्डुराजसुतान्मृतान्। सह मात्रेति तच्छ्रुत्वा विललाप रुरोद च।। (1-162-29) भीष्म उवाच। 1-162-30x हा युधिष्ठिर हा भीम हा धनञ्जय हा यमौ। हा पृथे सह पुत्रैस्त्वमेकरात्रेण स्वर्गता।। (1-162-30) मात्रा सह कुमारास्ते सर्वे तत्रैव संस्थिताः। न हि तौ नोत्सहेयातां भीमसेनधनञ्जयौ।। (1-162-31) तरसा वेगितात्मानौ निर्भेत्तुमपि मन्दरम्। परासुत्वं न पश्यामि पृथायाः सह पाण्डवैः।। (1-162-32) हिंदी अनुवाद: इसके बाद पितामह भीष्म पाण्डुराज के पुत्रों और माता कुंती के मृत होने का समाचार सुनकर अत्यंत व्यथित हुए और विलाप करके रोने लगे। भीष्म जी ने कहा—हा युधिष्ठिर! हा भीम! हा धनंजय! हा नकुल-सहदेव! हा पृथे (कुंती)! तुम अपने पुत्रों सहित एक ही रात में स्वर्ग सिधार गईं! माता के साथ वे सभी कुमार वहीं भस्म हो गए। (फिर वे सोचते हैं—) क्या भीमसेन और धनंजय ऐसे थे जो अपनी रक्षा न कर पाते? वे तो अपने वेग और पराक्रम से मन्दराचल पर्वत को भी चीर सकते थे! मैं तो पृथा और पांडवों की इस प्रकार मृत्यु को सहज रूप से मान ही नहीं पा रहा हूँ! व्याख्या: पितामह भीष्म के हृदय में पांडवों के प्रति अथाह स्नेह था। उनकी बुद्धि यह मानने को तैयार नहीं थी कि भीम और अर्जुन जैसे पराक्रमी साधारण आग में मारे जा सकते हैं, फिर भी परिस्थितियाँ ऐसी थीं कि उन्हें भी विलाप करना पड़ा।

श्लोक 33-35

मूल: सर्वथा विकृतं तत्तु यदि ते निधनं गताः। धर्मराजः स निर्दिष्टो ननु विप्रैर्युधिष्ठिरः।। (1-162-33) पृथिव्यां च रथिश्रेष्ठो भविता स धनञ्जयः। सत्यव्रतो धर्मदत्तः सत्यवाक्छुभलक्षणः।। (1-162-34) कथं कालवशं प्राप्तः पाण्डवेयो युधिष्ठिरः। आत्मानमुपमां कृत्वा परेषां वर्तते तु यः।। (1-162-35) हिंदी अनुवाद: यदि वे सचमुच मृत्यु को प्राप्त हो गए हैं, तो यह सब कुछ पूर्णतः विपरीत (दैवी विधान या अनर्थ) हुआ है। ब्राह्मणों ने जिन्हें 'धर्मराज' के रूप में युधिष्ठिर नाम दिया था, जो पृथ्वी पर रथियों में श्रेष्ठ, सत्यव्रती, धर्मपरायण, सत्यवादी और शुभ लक्षणों वाले अर्जुन थे, वे पांडुपुत्र युधिष्ठिर कैसे काल के ग्रास बन गए? जो हमेशा स्वयं को दूसरों की उपमा देकर सबके हित में आचरण करता था... व्याख्या:भीष्म पांडवों के महान गुणों (विशेषकर युधिष्ठिर के धर्मपरायण स्वभाव) का स्मरण करते हुए अविश्वास व्यक्त कर रहे हैं कि इतने सुयोग्य राजकुमार इस प्रकार कैसे नष्ट हो सकते हैं।

श्लोक 36-40

मूल: मात्रा सहैव कौरव्यः कथं कालवशं गतः। पालितः सुचिरं कालं फलकाले यथा द्रुमः।। (1-162-36) भग्नः स्याद्वायुवेगेन तथा राजा युधिष्ठिरः। यौवराज्येऽभिषिक्तेन पितुर्येनाहृतं यशः।। (1-162-37) आत्मनश्च पितुश्चैव सत्यधर्मप्रवृत्तिभिः। यच्च सा वनवासेन तन्माता दुःखभागिनी।। (1-162-38) कालेन सह संमग्नो धिक्कृतान्तमनर्थकम्। यच्च सा वनवासेन तन्माता दुःखभागिनी।। (1-162-39) पुत्रगृध्नुतया कुन्ती न भर्तारं मृतात्वनु। अल्पकालं कुले जाता भर्तुः प्रीतिमवाप या।। (1-162-40) हिंदी अनुवाद: ...वह कौरवश्रेष्ठ अपनी माता के साथ कैसे काल के वश में हो गया? जिस प्रकार कोई वृक्ष बहुत लंबे समय तक पाला-पोसा जाए और जब उसके फल खाने का समय आए, तब वह तेज आंधी के झोंके से टूट जाए, उसी प्रकार राजा युधिष्ठिर भी नष्ट हो गए! जिन्होंने अपने पिता के यौवराज्य पर अभिषेक से लेकर अपने सत्य और धर्म के आचरण से यश प्राप्त किया था, वे और उनकी माता वनवास के कष्टों की भागी बनीं। काल के साथ मिलकर सब कुछ नष्ट हो गया, उस अनर्थकारी विधाता को धिक्कार है! पुत्रों के मोह के कारण कुंती ने (पांडु की मृत्यु के बाद) सती होकर अपने पति का अनुगमन नहीं किया और वे अल्पकाल तक ही अपने कुल में पति का सुख प्राप्त कर पाई थीं (और अब इस तरह अंत हो गया)। व्याख्या: भीष्म का यह विलाप कुरुवंश के उस tragical turn को दर्शाता है जहाँ एक तरफ धृतराष्ट्र और दुर्योधन का पापकर्म छिपा हुआ है, और दूसरी तरफ पूरा राजपरिवार पांडवों के असमय निधन मानकर अत्यंत शोकाकुल और हताश है।

 महाभारत के आदिपर्व (अध्याय 162 के शेष श्लोक 41 से 80) का क्रमवार संस्कृत मूल, हिंदी अनुवाद और विस्तृत व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:

श्लोक 41-43

मूल: दग्धाऽद्य सह पुत्रैः सा असंपूर्णमनोरा। मृतो भीम इति श्रुत्वा मनो न श्रद्दधाति मे।। (1-162-41) एतच्च चिन्तयानस्य व्यथितं बहुधा मनः। अवधूय च मे देहं हृदयेन विदीर्यते।। (1-162-42) पीनस्कन्धश्चारुबाहुर्मेरुकूटसमो युवा। मृतो भीम इति श्रुत्वा मनो न श्रद्दधाति मे।। (1-162-43) हिंदी अनुवाद: पितामह भीष्म विलाप करते हुए आगे कहते हैं—अपनी मनोकामनाओं को पूरी किए बिना ही वह कुंती पुत्रों के साथ आज जलकर मर गई—यह सुनकर मेरा मन इस बात पर विश्वास ही नहीं कर पा रहा है कि भीम की मृत्यु हो चुकी है! इस बात को सोचते-सोचते मेरा मन अनेक प्रकार से व्यथित हो रहा है और मेरा शरीर काँप रहा है तथा हृदय फटा जा रहा है। जिसके कंधे पुष्ट और चौड़े हैं, भुजाएँ सुंदर हैं, जो सुमेरु पर्वत के शिखर के समान भव्य और युवा है—वह भीम मर गया है, यह बात मेरा मन मानने को तैयार ही नहीं होता। व्याख्या: भीष्म का हृदय पांडवों, विशेषकर भीम के असमय निधन के विचार से विचलित हो रहा है। उनकी शारीरिक शक्ति और भव्यता को याद करके भीष्म को विश्वास ही नहीं होता कि वे समाप्त हो चुके हैं।

श्लोक 44-47

मूल: अतित्यागी च योधी च क्षिप्रहस्तो दृढायुधः। प्रपत्तिमाँल्लब्धलक्षो रथयानविशारदः।। (1-162-44) दूरपाती त्वसंभ्रान्तो महावीर्यो महास्त्रवान्। अदीनात्मा नरश्रेष्ठः श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम्।। (1-162-45) येन प्राच्याश्च सौवीरा दाक्षिणात्याश्च निर्जिताः। ख्यापितं येन शूरेण त्रिषु लोकेषु पौरुषम्।। (1-162-46) यस्मिञ्जाते विशोकाऽभूत्कुन्ती पाण्डुश्च वीरवान्। पुरन्दरसमो जिष्णुः कथं कालवशं गतः।। (1-162-47) हिंदी अनुवाद: जो अत्यंत दानी, योद्धा, फुर्तीले हाथों वाले, मजबूत हथियारों से लैस, शरण में आने वालों की रक्षा करने वाले, अपने लक्ष्य को साधने में माहिर और रथ संचालन में चतुर थे; जो दूर तक बाण चलाने वाले, निडर, महापराक्रमी, महान अस्त्रों के ज्ञाता, कभी न हार मानने वाले (अदीनात्मा), नरोत्तम और सभी धनुर्धारियों में श्रेष्ठ थे; जिनके द्वारा प्राच्य, सौवीर और दक्षिण देश के लोग जीते गए थे, और जिस शूरवीर ने तीनों लोकों में अपना पौरुष विख्यात किया था; जिनके जन्म लेते ही वीर पांडु और कुंती शोकमुक्त हो गए थे, वे इंद्र (पुरन्दर) के समान पराक्रमी जिष्णु (अर्जुन) कैसे काल के वश में हो सकते हैं? व्याख्या: भीष्म अर्जुन के महान पराक्रम, युद्ध कौशल और विजयों का स्मरण करते हुए विलाप कर रहे हैं कि इतने महान योद्धा का इस प्रकार अंत असंभव प्रतीत होता है।

श्लोक 48-51

मूल: कथं तावृषभष्कन्धौ सिंहविक्रान्तगामिनौ। मर्त्यधर्ममनुप्राप्तौ यमावरिनिवर्हणौ।। (1-162-48) वत्सा गताः क्व मां वृद्धं विहाय भृशमातुरम्। हा स्नुषे मम वार्ष्णेयि निधाय हृदि मे शुचम्।। (1-162-49) वारणावतयात्रायां के Ssyurvai Shakunah Pathi। एवमल्पायुषो लोके भविष्यन्ति पृथासुताः।। (1-162-50) संशप्ता इति कैर्यूयं वत्सान्दर्शय मे पृथे। ममैव नाथा मन्नाथा मम नेत्राणि पाण्डवाः।। (1-162-51) हिंदी अनुवाद: बैल के समान पुष्ट कंधों वाले और सिंह के समान पराक्रमी चाल चलने वाले वे दोनों शत्रुनाशक नकुल-सहदेव (यम) कैसे मृत्यु को प्राप्त हो गए? मेरे इस वृद्ध और अत्यंत व्याकुल छोड़कर मेरे वत्सा! तुम सब कहाँ चले गए? हा मेरी पुत्रवधू वार्ष्णेयि (कुंती)! तुम मेरे हृदय में गहरा शोक छोड़कर चली गई हो। वारणावत की यात्रा में रास्ते में कैसे शकुन (अपशकुन) हुए होंगे? क्या पृथा के ये पुत्र संसार में इतने अल्पायु ही होने वाले थे? हे पृथा! तुम अपने इन पुत्रों को मुझे दिखाकर यह बताओ कि ये सुरक्षित हैं। पांडव ही मेरे एकमात्र नाथ, मेरे अपने और मेरी आँखें थे! व्याख्या: भीष्म की यह विलाप गाथा उनके आंतरिक प्रेम, वात्सल्य और उस गहरे आघात को दर्शाती है जो उन्हें पांडवों के कथित निधन के समाचार से मिला था।

श्लोक 52-55

मूल: हा पाण्डवा मे हे वत्सा हा सिंहशिशवो मम। मातङ्गा हा ममोत्तुङ्गा हा ममानन्दवर्धनाः।। (1-162-52) मम हीनस्य युष्माभिः सर्वलोकास्तमोवृताः। कदा द्रष्टाऽस्मि कौन्तेयांस्तरुणादित्यवर्चसः।। (1-162-53) अदृष्ट्वा वो महाबाहून्पुत्रवन्मम नन्दनाः। क्व गतिर्मे क्व गच्छामि कुतो द्रक्ष्यामि मे शिशून्।। (1-162-54) हा युधिष्ठिर हा भीम हा हा फल्गुन हा यमौ। मा गच्छत निवर्तध्वं मयि कोपं विमुञ्चत।। (1-162-55) हिंदी अनुवाद: हा मेरे पांडव वत्स! हा मेरे सिंह के बच्चों! हा मेरे ऊँचे हाथियों जैसे विशाल और मेरे आनंद को बढ़ाने वाले बालकों! तुम्हारे बिना मेरा यह संपूर्ण संसार अंधकारमय हो गया है। प्रातःकाल के सूर्य के समान कांति वाले उन कौन्तेयों को मैं फिर कब देखूँगा? हे महाबाहु मेरे पुत्रों! तुमको देखे बिना मेरी क्या गति होगी? मैं कहाँ जाऊँगा और अपने इन शिशुओं को अब कहाँ देखूँगा? हा युधिष्ठिर! हा भीम! हा अर्जुन (फल्गुन)! हा नकुल-सहदेव! तुम इस प्रकार मत जाओ, लौट आओ और मुझ पर से अपना क्रोध छोड़ दो! व्याख्या: भीष्म का यह विलाप करुण रस से परिपूर्ण है, जहाँ वे पूरी तरह सुधि-बुधि खोकर बच्चों की तरह पांडवों को पुकार रहे हैं।

श्लोक 56-59

मूल: वैशंपायन उवाच। श्रुत्वा तत्क्रन्दितं तस्य तिलोदं च प्रसिञ्चतः। देशं कालं समाज्ञाय विदुरः प्रत्यभाषत।। (1-162-56) मा शोचीस्त्वं नरव्याघ्र जहि शोकं महाधृते। न तेषां विद्यते मृत्युः प्राप्तकालं कृतं मया।। (1-162-57) एतच्च तेभ्य उदकं विप्रसिञ्च न भारत। क्षत्तेदमब्रवीद्भीष्मं कौरवाणामशृण्वताम्।। (1-162-58) क्षत्तारमुपसंगम्य बाष्पोत्पीडकलस्वरः। मन्दंमन्दमुवाचेदं विदुरं संगमे नृप।। (1-162-59) हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—भीष्म के उस क्रंदन और तर्पण (तिलोदक) करते समय उनके शोक को देखकर, तथा देश और काल (अवसर) को उचित समझकर विदुर जी ने उनसे एकांत में कहा—हे नरव्याघ्र! आप शोक मत कीजिए, अपनी महान धैर्याधारिता से इस शोक को त्याग दीजिए। उनकी मृत्यु नहीं हुई है, मैंने समय रहते उचित उपाय कर दिया है। इसलिए हे भारत (भीष्म)! इन मृत समझे गए पांडवों के लिए अब और जल (तर्पण) मत गिराइए। अन्य कौरवों के न सुनने योग्य गुप्त रूप से क्षत्ता (विदुर) ने भीष्म से यह बात कही। तब गदगद कंठ और आँखों में आँसुओं के वेग से भरे स्वर वाले भीष्म ने विदुर के पास जाकर अत्यंत धीरे से उनसे यह पूछा... व्याख्या: विदुर जी ने जब भीष्म की गहरी वेदना देखी, तो उनसे रहा नहीं गया और उन्होंने धीमे से यह राज खोल दिया कि पांडव मरे नहीं हैं, बल्कि सुरक्षित हैं। यह सुनकर भीष्म तुरंत विदुर के पास सत्य जानने के लिए पहुँचे।

श्लोक 60-61

मूल: भीष्म उवाच। कथं ते तात जीवन्ति पाण्डोः पुत्रा महाबलाः। कथमस्मत्कृते पक्षः पाण्डोर्न हि निपातितः।। (1-162-60) कथं मत्प्रमुखाः सर्वे प्रमुक्ता महतो भयात्। जननी गरुडेनेव कुरवस्ते समुद्धृताः।। (1-162-61) हिंदी अनुवाद: भीष्म ने कहा—हे तात! पांडु के वे महाबली पुत्र किस प्रकार जीवित हैं? और हमारे पक्ष (या कुरुवंश) पर यह महासंकट क्यों नहीं आया (अर्थात यह अनर्थ टल कैसे गया)? हम सब के देखते-देखते उस महान भय से वे कैसे मुक्त हो गए? जैसे गरुड़ अपनी माता (विनता) को छुड़ा लेते हैं, वैसे ही आपने उन कौरवों (पांडवों) का किस प्रकार उद्धार किया है? व्याख्या: भीष्म यह जानने के लिए अत्यंत उत्सुक हो उठे कि विदुर ने किस चतुराई से पांडवों और कुंती को लाक्षागृह की आग से बचाया है।

श्लोक 62-68

मूल: वैशंपायन उवाच। एवमुक्तस्तु कौरव्य कौरवाणामशृण्वताम्। आचचक्षे स धर्मात्मा भीष्मायाद्भुतकर्मणे।। (1-162-62) विदुर उवाच। धृतराष्ट्रस्य शकुने राज्ञो दुर्योधनस्य च। विनाशे पाण्डुपुत्राणां कृतो मतिविनिश्चयः।। (1-162-63) तत्राहमपि च ज्ञात्वा तस्य पापस्य निश्चयम्। तमिघांसुरहं चापि तेषामनुमते स्थितः।। (1-162-64) ततो जतुगृहं गत्वा दहनेऽस्मिन्नियोजिते। पृथायाश्च सपुत्राया धार्तराष्ट्रस्य शासनात्।। (1-162-65) ततः खनकमाहूय सुरङ्गं वै बिलं तदा। सुगूढं कारयित्वा ते कुन्त्या पाण्डुसुतास्तदा।। (1-162-66) निष्क्रामिता मया पूर्वं मा स्म शोके मनः कृथाः। ततस्तु नावमारोप्य सहपुत्रां पृथामहम्।। (1-162-67) दत्त्वाऽभयं सपुत्रायै कुन्त्यै गृहमदाहयम्। तस्मात्ते मा स्म भूद्दुःखं मुक्ताः पापात्तु पाण्डवाः।। (1-162-68) हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—भीष्म द्वारा इस प्रकार पूछने पर, अन्य कौरवों के न सुनने की स्थिति में, उन धर्मात्मा विदुर ने अद्भुत कर्म करने वाले भीष्म से सब हाल कह सुनाया। विदुर जी ने कहा—धृतराष्ट्र, शकुनि और राजा दुर्योधन ने पांडुपुत्रों के विनाश का पक्का निश्चय कर लिया था। उनके इस पापी निश्चय को जानकर और उनके उस षड्यंत्र को विफल करने के उद्देश्य से मैं भी पांडवों की सहायता के पक्ष में हो गया था। धृतराष्ट्र के आदेश से जब लाक्षागृह में आग लगाने का प्रबंध किया गया, तब मैंने पहले ही एक कुशल खनक (सुरंग खोदने वाले) को बुलाकर कुंती और पांडवों के लिए एक अत्यंत गुप्त सुरंग (बिल) तैयार करवा दी थी। मैंने पहले ही उस सुरंग के माध्यम से उन्हें वहाँ से सुरक्षित निकाल लिया था, इसलिए आप अपने मन में शोक मत कीजिए। इसके बाद मैंने माता कुंती और उनके पुत्रों को उस विशेष नाव पर बैठाकर अभय दान दिया और फिर (योजना के तहत) उस घर में आग लगवा दी। इसलिए आप अब कोई दुःख न करें, पांडव उस पापी षड्यंत्र से पूरी तरह सुरक्षित बचकर निकल चुके हैं! व्याख्या: विदुर जी ने भीष्म को विस्तार से बता दिया कि कैसे उन्होंने समय रहते सुरंग और नाव की व्यवस्था करके पांडवों और कुंती की जान बचा ली थी।

श्लोक 69-72

मूल: निर्गताः पाण्डवा राजन्मात्रा सह परन्तपाः। अग्निहादान्महाघोरान्मया तस्मादुपायतः।। (1-162-69) मा स्म शोकमिमं कार्षीर्जीवन्त्येव च पाण्डवाः। प्रच्छन्ना विचिरिष्यन्ति यावत्कालस्य पर्ययः।। (1-162-70) तस्मिन्युधिष्ठिरं काले द्रक्ष्यन्ति भुवि मानवाः। विमलं कृष्णपक्षान्ते जगच्चन्द्रमिवोदितम्।। (1-162-71) न तस्य नाशं पश्यामि यस्य भ्राता धनञ्जयः। भीमसेनश्च दुर्धर्षौ माद्रीपुत्रौ च तौ यमौ।। (1-162-72) हिंदी अनुवाद: हे राजन् (भीष्म)! वे परंतप पांडव अपनी माता के साथ उस अति घोर अग्निदाह के संकट से मेरी युक्ति से सुरक्षित बाहर निकल गए हैं। अतः आप इस प्रकार का शोक बिल्कुल न करें। पांडव जीवित ही हैं और जब तक अनुकूल समय नहीं आ जाता, वे छिपकर विचरण करेंगे। उचित समय आने पर इस पृथ्वी के लोग युधिष्ठिर को ठीक वैसे ही देखेंगे जैसे कृष्णपक्ष की समाप्ति पर आकाश में निर्मल चंद्रमा उदित होता है। जिसके भाई दुर्धर्ष (जिसे कोई न जीत सके) अर्जुन (धनंजय), भीमसेन और माद्री के दोनों पुत्र (नकुल-सहदेव) हैं, उसका कभी नाश हो सकता है—ऐसा मैं बिल्कुल नहीं देखता। व्याख्या: विदुर जी ने भीष्म को पूरी तरह आश्वस्त किया कि पांडव अमर और अजय वीरों से घिरे हैं और वे सही समय पर दुनिया के सामने पुनर्जीवित होकर लौटेंगे।

श्लोक 73-75

मूल: वैशंपायन उवाच। ततः संहृष्टसर्वाङ्गो भीष्मो विदुरमब्रवीत। दिष्ट्यादिष्ट्येति संहृष्टः पूजयानो महामतिम्।। (1-162-73) भीष्म उवाच। युक्तं चैवानुरूपं च कृतं तात शुभं त्वया। वयं विमोक्षिता दुःखात्पाण्डुपक्षो न नाशितः।। (1-162-74) वैशंपायन उवाच। एवं मुक्त्वा विवेशाथ पुरं जनशताकुलम्। कुरुभिः सहितो राजन्नागरैश्च पितामहः।। (1-162-75) हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—यह सुनकर पितामह भीष्म का अंग-अंग आनंद से भर गया और उन्होंने महामति विदुर की प्रशंसा करते हुए बार-बार 'दिष्ट्या! दिष्ट्या!' (सौभाग्य की बात है!) कहा। भीष्म जी बोले—हे तात! आपने जो किया है, वह बिल्कुल उचित, आपके अनुकूल और अत्यंत कल्याणकारी है। आपने हम सबको बहुत बड़े दुःख से मुक्त कर दिया है और पांडवों का पक्ष (वंश) नष्ट होने से बच गया है! वैशंपायन जी कहते हैं—ऐसा कहकर पितामह भीष्म कुरुवंशियों और सैकड़ों नागरिकों के साथ उस नगर (हस्तिनापुर) में वापस प्रवेश कर गए। व्याख्या: विदुर की यह गुप्त बात जानकर भीष्म का भारी बोझ हल्का हो गया और उनका शोक आनंद में बदल गया। उन्होंने विदुर की इस दूरदर्शिता की भरपूर सराहना की।

श्लोक 76-80

मूल: अथाम्बिकेयः सामात्यः सकर्णः सहसौबलः। सात्मजः पार्थनाशस्य स्मरंस्तथ्यं जर्ष च।। (1-162-76) भीष्मश्च राजन्दुर्धर्षो विदुरश्च महामतिः। जहृषाते स्मरन्तौ तौ जातुषाग्नेर्विमोचनम्।। (1-162-77) सत्यशीलगुणाचारै रागैर्जानपदोद्भवैः। द्रोणादयश्च धर्मैस्तु तेषां तान्मोचितान्विदुः।। (1-162-78) शौर्यलावण्यमाहात्म्यै रूपैः प्राणबलैरपि। स्वस्थान्पार्थानमन्यन्त पौरजानपदास्तथा।। (1-162-79) अन्ये जनाः प्राकृताश्च स्त्रियश्च बहुलास्तदा। शङ्कमाना वदन्ति स्म दग्धा जीवन्ति वा न वा।। (1-162-80) हिंदी अनुवाद: इधर अंबिका के पुत्र (धृतराष्ट्र), मंत्रियों सहित, कर्ण, शकुनि (सौबल) और अपने पुत्रों (दुर्योधन आदि) के साथ पांडवों के विनाश के सत्य (मानकर) मन ही मन आनंदित हो रहे थे। किंतु हे राजन्! उधर दुर्धर्ष पितामह भीष्म और महामति विदुर मन ही मन यह स्मरण करके हर्षित हो रहे थे कि लाक्षागृह की अग्नि से पांडव किस प्रकार सुरक्षित बचा लिए गए थे। द्रोणाचार्य आदि महानुभाव भी उनके सत्यशील गुणों, आचार-विचार और लोक-व्यवहार के कारण यह भली-भांति जानते थे कि पांडव सुरक्षित निकल चुके हैं। नगर और जनपद के बहुत से समझदार लोग भी उनके शौर्य, कांति, माहात्म्य और प्राणबल को देखकर यही मानते थे कि पांडव सही सलामत हैं। फिर भी, बहुत से सामान्य लोग और बहुसंख्यक स्त्रियाँ संदेह करती हुई आपस में यही चर्चा करती थीं कि वे सचमुच जल गए हैं या जीवित हैं! व्याख्या: इस प्रकार लाक्षागृह पर्व का यह अध्याय इस दोहरे वातावरण को चित्रित करता है—जहाँ एक तरफ धृतराष्ट्र और दुर्योधन का कुटिल दल पांडवों के खात्मे की गलतफहमी में खुश है, वहीं भीष्म, विदुर और द्रोण जैसे ज्ञानीजन और कुछ प्रबुद्ध नागरिक सच्चाई से वाकिफ हैं, जबकि सामान्य जनता संशय और असमंजस में डूबी हुई है।

अंतिम श्लोक के साथ महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत 'जतुगृह पर्व' (लाक्षागृह प्रसंग) पूर्ण होता है। यदि आपको इस प्रसंग के किसी अन्य भाग या श्लोक पर भी चर्चा करनी हो, तो कृपया निःसंकोच बताएं!

।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि
जतुगृहपर्वणि द्विषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः।। 162 ।।

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