क़ुर्आन का प्रारम्भ ही मिथ्या से

पण्डित चमूपति जी के आलेख — चौदहवीं का चाँद
[‘चौदहवीं का चाँद’ भाग-१]

क़ुर्आन का प्रारम्भ ही मिथ्या से

लेखक: पण्डित चमूपति एम॰ए॰
[मौलाना सनाउल्ला खाँ कृत पुस्तक ‘हक़ प्रकाश’ का प्रतिउत्तर]

वर्तमान कुरान का प्रारम्भ बिस्मिल्ला से होता है। सूरते तौबा के अतिरिक्त और सभी सूरतों के प्रारम्भ में यह मंगलाचरण के रूप में पाया जाता है। यही नहीं, इस पवित्र वाक्य का पाठ मुसलमानों के अन्य कार्यों के प्रारम्भ में करना अनिवार्य माना गया है।

ऋषि दयानन्द को इस कल्मे (वाक्य) पर दो आपत्तियाँ हैं। प्रथम यह कि कुरान के प्रारम्भ में यह कल्मा परमात्मा की ओर से प्रेषित (इल्हाम) नहीं हुआ है। दूसरा यह कि मुसलमान लोग कुछ ऐसे कार्यों में भी इसका पाठ करते हैं जो इस पवित्र वाक्य के गौरव के अधिकार क्षेत्र में नहीं।

पहली शंका कुरान की वर्णन शैली और ईश्वरी सन्देश के उतरने से सम्बन्ध रखती है। हदीसों (इस्लाम के प्रामाणिक श्रुति ग्रन्थ) में वर्णन है कि सर्वप्रथम सूरत ‘अलक’ की प्रथम पाँच आयतें परमात्मा की ओर से उतरीं। हज़रत जिबरील (ईश्वरीय दूत) ने हज़रत मुहम्मद से कहा –

’इकरअ बिइस्मे रब्बिका अल्लज़ी ख़लका’
अर्थ: पढ़! अपने परमात्मा के नाम सहित जिसने उत्पन्न किया।

इन आयतों के पश्चात् सूरते मुज़म्मिल के उतरने की साक्षी है। इसका प्रारम्भ इस प्रकार हुआ –

या अय्युहल मुज़म्मिलो
(अर्थात्: ऐ वस्त्रों में लिपटे हुए!)

ये दोनों आयतें हज़रत मुहम्मद को सम्बोधित की गई हैं। मुसलमान ऐसे सम्बोधन को या हज़रत मुहम्मद के लिए विशेष या उनके भक्तों के लिए सामान्यतया नियत करते हैं। जब किसी आयत का मुसलमानों से पाठ (किरअत) कराना हो तो वहाँ ‘इकरअ’ (पढ़) या 'कुल' (कह) की भूमिका इस आयत के प्रारम्भ में ईश्वरीय सन्देश के एक भाग के रूप में वर्णन की जाती है। यह है इल्हाम (ईश्वरीय सन्देश) कुरान की वर्णनशैली, जिससे इल्हाम प्रारम्भ ही हुआ था।

अब यदि अल्लाह को कुरान के इल्हाम का आरम्भ बिस्मिल्लाह से करना होता तो सूरते अलक के प्रारम्भ में हज़रत जिबरील ने बिस्मिल्ला पढ़ी होती या 'इकरअ' के पश्चात् 'बिइस्मेरब्बिका' के स्थान पर 'बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम' कहा होता।

मुज़िहुल कुरान में सूरत फ़ातिहा की टिप्पणी पर, जो वर्तमान कुरान की पहली सूरत है, लिखा है –

"यह सूरत अल्लाह साहब ने भक्तों की वाणी से कहलवाई है कि इस प्रकार कहा करें।"

यदि यह स्वतः ईश्वरीय सूरत होती तो इसके पूर्व 'कुल' (कह) या 'इकरअ' (पढ़) ज़रूर पढ़ा जाता।

कुरान की कई सूरतों का प्रारम्भ स्वयं कुरान की विशेषता से हुआ है। अतएव सूरते बकर के प्रारम्भ में, जो कुरान की दूसरी सूरत है, प्रारम्भ में ही कहा –

’ज़ालिकल किताबोला रैबाफ़ीहे, हुदन लिलमुत्तकीन’
अर्थ: यह पुस्तक है इसमें कुछ सन्देह (की सम्भावना) नहीं। आदेश करती है परहेज़गारों (बुराइयों से बचने वालों) को।

तफ़सीरे इत्तिकान (कुरान भाष्य) में वर्णन है कि इब्ने मसूद अपने कुरान में सूरते फ़ातिहा को सम्मिलित नहीं करते थे। उनकी कुरान की प्रति का प्रारम्भ सूरते बकर से होता था। वे हज़रत मुहम्मद के विश्वस्त मित्रों (सहाबा) में से थे। कुरान की भूमिका के रूप में यह आयत जिसका हमने ऊपर उल्लेख किया है, समुचित है। ऋषि दयानन्द ने कुरान के प्रारम्भ के लिए यदि इसे इल्हामी (ईश्वरीय रचना) माना जाए, तो यही वाक्य प्रस्तावित किये हैं। यह प्रस्ताव कुरान की अपनी वर्णनशैली के सर्वथा अनुकूल है और इब्ने मसूद इस शैली को स्वीकार करते थे। मौलाना मुहम्मद अली अपने अंग्रेज़ी कुरान अनुवाद में पृष्ठ ८२ पर लिखते हैं –

"कुछ लोगों का विचार था कि बिस्मिल्ला जिससे कुरान की प्रत्येक सूरत प्रारम्भ हुई है, प्रारम्भिक वाक्य (कल्मा) के रूप में बढ़ाया गया है, यह इस सूरत का मूल भाग नहीं।"

एक और बात जो बिस्मिल्ला के कुरान शरीफ़ में बाहर से बढ़ाने का समर्थन करती है, वह है सूरते तौबा के प्रारम्भ में कल्माए तस्मिआ (बिस्मिल्ला) का वर्णन न करना। वहाँ लिखने वालों की भूल है या कोई और कारण है जिससे बिस्मिल्ला लिखने से छूट गया है? यह न लिखा जाना पढ़ने वालों (कारियों) में इस विवाद का भी विषय बना है कि सूरते अनफ़ाल और सूरते तौबा, जिनके मध्य बिस्मिल्ला निरस्त है, दो पृथक् सूरते हैं या एक ही सूरत के दो भाग। अनुमान यह होता है कि बिस्मिल्ला मूल कुरान का भाग नहीं है। लेखकों की ओर से पुण्य के रूप में (शुभ वचन) भूमिका के रूप में जोड़ दिया गया है और बाद में उसे भी ईश्वरीय सन्देश (इल्हाम) का ही भाग समझ लिया गया है।

यही दशा सूरते फ़ातिहा की है; यह है तो मुसलमानों के पाठ के लिए, परन्तु इसके प्रारम्भ में 'कुल' (कह) या 'इकरअ' (पढ़) अंकित नहीं है। और इसे भी इब्ने मसूद ने अपनी पाण्डुलिपि में निरस्त कर दिया था। स्वामी दयानन्द की शंका एक ऐतिहासिक शंका है; यदि बिस्मिल्ला और सूरते फ़ातिहा पीछे से जोड़े गए हैं तो शेष पुस्तक की शुद्धता का क्या विश्वास? यदि बिस्मिल्ला ही अशुद्ध तो इन्शा व इम्ला (अन्य लिखने-पढ़ने) का तो फिर विश्वास ही कैसे किया जाए?

कुछ उत्तर देने वालों ने इस शंका का इल्ज़ामी (प्रतिपक्षी) उत्तर वेद की शैली से दिया है कि वहाँ भी मन्त्रों के मन्त्र और सूक्तों के सूक्त परमात्मा की स्तुति में आए हैं और उनके प्रारम्भ में कोई भूमिका रूप में ईश्वरीय सन्देश नहीं आया।

वेद ज्ञान मौखिक नहीं

वेद का ईश्वरीय सन्देश आध्यात्मिक और मानसिक है, मौखिक नहीं। ऋषियों के हृदय की दशा उस ईश्वरीय ज्ञान के समय प्रार्थी की दशा थी। उन्हें 'कुल' (कह) कहने की क्या आवश्यकता थी? वेद में तो सर्वत्र यही शैली बरती गई है। बाद के वेदपाठी वर्णनशैली से भूमिकागत भाव ग्रहण करते हैं। यही नहीं, इस शैली के परिपालन में संस्कृत साहित्य में अब तक यह नियम बरता जाता है कि बोलने वाले व सुनने वाले का नाम लिखते नहीं; पाठक भाषा के अर्थों से अनुमान लगाता है।

इसके विपरीत, कुरान में भूमिका रूप में ऐसे शब्द स्पष्टतया लिखे गए हैं, क्योंकि कुरान का ईश्वरीय सन्देश मौखिक है; जिबरईल पाठ कराते हैं और हज़रत मुहम्मद करते हैं। इसमें ‘कह’ कहना आवश्यक होता है। सम्भव है कोई मौलाना इस बाह्य प्रवेश को उदाहरण मानकर यह कहें कि अन्य स्थानों पर इस उदाहरण की भाँति ऐसी ही भूमिका स्वयं कल्पित करनी चाहिए। निवेदन यह है कि उदाहरण पुस्तक के प्रारम्भ में देना चाहिए था न कि आगे चलकर। उदाहरण का बाद में लिखा जाना पुस्तक लेखन के नियमों के सर्वथा विपरीत है।

बिस्मिल्ला के प्रयोग पर दूसरी शंका

ऋषि दयानन्द की दूसरी शंका बिस्मिल्ला के सामान्य व्यावहारिक प्रयोग पर है। ऋषि ने ऐसे तीन कामों का नाम लिया है जो प्रत्येक जाति व प्रत्येक मत में निन्दनीय हैं:

१. पशुवध और बलि पर बिस्मिल्ला पढ़ना

कुरान में मांसादि का विधान है और बलि का आदेश है। इस पर हम अपनी सम्मति न देकर शेख ख़ुदा बख्श साहब एम० ए० (प्रोफ़ेसर कलकत्ता विश्वविद्यालय) के एक लेख से, जो उन्होंने ईदुज्ज़हा के अवसर पर कलकत्ता के स्थानीय समाचार पत्रों में प्रकाशित कराई थी, निम्नलिखित उदाहरण प्रस्तुत किए देते हैं –

ख़ुदा बख्श जी का मत: "सचमुच-सचमुच बड़ा ख़ुदा जो दयालु व दया करने वाला है, वह ख़ुदा आज खून की नदियों का, चीखते हुए जानवरों की असह्य व अवर्णनीय पीड़ा का इच्छुक नहीं। वास्तविक प्रायश्चित वह है जो मनुष्य के अपने हृदय में होता है। सभी प्राणियों की ओर अपनी भावना परिवर्तित कर दी जाए। भविष्य का काल धर्म प्रायश्चित के इस कठोर व निर्दयी प्रकार को त्याग देगा, ताकि वह इन दोनों पर भी दयापूर्ण घृणा से दृष्टिपात करे। जब बलि का अर्थ अपने मन के अतिरिक्त किसी अन्य वस्तु या अन्य सत्ता का बलिदान है।" [- ‘माडर्न रिव्यू’ से अनुवादित]

दयालु व दया करने वाले परमात्मा का नाम लेने का स्वाभाविक परिणाम यह होना चाहिए था कि हम वाणीहीन जीवों पर दया का व्यवहार करते, परन्तु किया हमने इसके सर्वथा विरोधी कार्य। यह बात प्रत्येक सद्बुद्धि वाले मनुष्य को खटकती है। मुज़िहुल कुरान में लिखा है –

"जब किसी जानवर का वध करें उस पर बिस्मिल्ला व अल्लाहो अकबर पढ़ लिया करें।"

कुरान में जहाँ कहीं हलाल (वैध) व हराम (अवैध) का वर्णन आया है, वहाँ हलाल उस वध को निश्चित किया है जिस पर अल्लाह का नाम पढ़ा गया हो। कल्मा पवित्र है, दयापूर्ण है, परन्तु उसका प्रयोग उसके मूल आशय के सर्वथा विपरीत है।

२. बहुपत्नी प्रथा, दासियों (रखैलों) व काम-वासना में प्रयोग

इस्लाम में बहु-विवाह की आज्ञा तो है ही, पत्नियों के अतिरिक्त रखैलों की भी परम्परा है। लिखा है –

वल्लज़ीन लिफ़रूजिहिम हाफ़िजून इल्ला अललअज़वाजुहुम औ मामलकत ईमानु हुम। [सूरतुल मोमिनून]
अर्थ: और जो रक्षा करते हैं अपने गुप्त अंगों की, परन्तु नहीं अपनी पत्नियों व रखैलों से।
निसाउकुम हर सुल्लकुम फ़आतू हरसकुम अन्ना शिअतुम। [सूरते बकर आयत २२३]
अर्थ: तुम्हारी पत्नियाँ तुम्हारी खेतियाँ हैं, जाओ अपनी खेती की ओर जिस प्रकार चाहो।

तफ़सीरे जलालैन में इसकी व्याख्या करते हुए लिखा है –

"बिस्मिल्ला कहकर सम्भोग करो जिस प्रकार चाहो—उठकर, बैठकर, लेटकर, उल्टे-सीधे जिस प्रकार चाहो... सम्भोग के समय बिस्मिल्ला कह लिया करो।"

बिस्मिल्ला का सम्बन्ध बहु-विवाह से हो, रखैलों की वैधता से हो और इस प्रकार के शारीरिक सम्भोग से हो—यह स्वामी दयानन्द को नैतिक दृष्टिकोण से अनुचित लगता है।

३. अविश्वासियों (काफ़िरों) के साथ कपटपूर्ण व्यवहार

ला यत्तख़िजु मौमिनूनलकाफ़िरीना औलियाया मिनदूनिल मौमिनीना………इल्ला अन तत्तकू मिनहुम तुकतुन। [सूरते आल इमरान आयत २८]
अर्थ: न बनायें मुसलमान काफ़िरों को अपना मित्र, केवल मुसलमानों को ही अपना मित्र बनावें।

इसकी व्याख्या में लिखा है –

"यदि किसी भय के कारण सहूलियत के रूप में (काफ़िरों के साथ) वाणी से मित्रता का वचन कर लिया जाए और हृदय में उनसे ईर्ष्या व वैर भाव रहे तो इसमें कोई हानि नहीं... जिस स्थान पर इस्लाम पूरा शक्तिशाली नहीं बना है, वहाँ अब भी यही आदेश प्रचलित है।"

स्वामी दयानन्द इस मिथ्यावाद (कपट नीति) की आज्ञा किसी ईश्वरीय पुस्तक में स्वीकार नहीं कर सकते। ऐसे संकीर्ण आदेशों या कामों का प्रारम्भ दयालु, दयाकर्ता, पवित्र और सच्चे परमात्मा के नाम से हो, यह बुद्धि और धर्म के विरुद्ध है। [१]

लेखक – पण्डित चमूपति एम॰ए॰
[‘चौदहवीं का चाँद’ पुस्तक से संकलित]
प्रस्तुति: अवत्सार
टिप्पणी:
[१] इस्लामी साहित्य व कुर्आन के मर्मज्ञ विद्वान् श्री अनवर शेख़ को भी करनी-कथनी के इस दोहरे व्यवहार पर घोर आपत्ति है। — ‘जिज्ञासु’
[‘चौदहवीं का चाँद’ भाग-२]

अल्लाह-ताला एक सीमित व्यक्ति है

लेखक: पण्डित चमूपति एम॰ए॰
[मौलाना सनाउल्ला खाँ कृत पुस्तक ‘हक़ प्रकाश’ का प्रतिउत्तर]

प्रत्येक धर्म में सर्वोच्च कोटि की कल्पना परमात्मा के सम्बन्ध में है। कुरान शरीफ़ में उसे 'अल्लाहताला' कहा गया है। कुरान के कुछ वर्णनों पर सूक्ष्म विचार करने से विदित होता है कि इस्लाम में परमात्मा की कल्पना किसी असीम, सर्वव्यापी शक्ति की नहीं है, अपितु स्थान, समय व शक्ति के रूप में एक सीमित व्यक्ति जैसी है। स्थानीयता की सीमा के साक्षी निम्नलिखित उद्धरण हैं।

इन्ना रब्बुकुमुल्लाहोल्लज़ी ख़लकस्समावात् वलअरज़ाफ़ि सित्तते अय्यामिन सुम्मस्तवा अलल अरशे। [सूरते यूनिस आयत ३]
अर्थ: वास्तव में पालनहार तुम्हारा अल्लाह है, जिसने उत्पन्न किया आकाशों को और भूमि को छह दिन में, फिर स्थिरता धारण की ऊपर अर्श (सिंहासन) पर।

तफ़सीरे हुसैनी में इस पर लिखा है –

मा बदो ईमान दारेम व तावीले आं बहक गुज़ारेम
(अर्थात्: हम इस पर ईमान रखते हैं और इसकी व्याख्या अल्लाह मियाँ पर छोड़ते हैं)

पुनः सूरते हूद में आया है –

व हुव ल्लज़ी ख़लकस्ममावाते वलअरज़े फ़ीसित्तते अय्यमिन व काना अरशहू अललमाए। [सूरते हूद आयत ७]
अर्थ: और जिसने उत्पन्न किया आकाशों को और भूमि को छह दिन में और है उसका अर्श (सिंहासन) पानी पर।

इस पर तफ़सीरे हुसैनी में लिखा है –

"कुछ कुरान के भाष्यों में वर्णन है कि अल्लाहताला ने सृष्टि उत्पत्ति के प्रारम्भ में एक हरे रंग का याकूत (कीमती पत्थर) बनाया और उसे आतंकपूर्ण दृष्टि से देखा। वह जौहर पानी हो गया, फिर अल्लाहताला ने वायु बनाई और पानी को उस पर रखा, और अपने अर्श (सिंहासन) को पानी के ऊपर स्थान दिया।"

इन उद्धरणों से सिद्ध हुआ कि अर्श कोई साकार वस्तु है और अल्लाताला उस पर स्थित होने से साकार प्रतीत होता है। वायु के ऊपर जल है, जल के ऊपर अर्श है और अर्श के ऊपर अल्लामियाँ। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि निचला भाग अल्ला की सत्ता से रिक्त है।

अर्श को उठाने वाले आठ बकरे?

सूरते हाका में इस स्थानीय सीमितता को स्वयं कुरान शरीफ़ के शब्दों में स्पष्ट किया गया है –

व यहमिलु अरशा rब्बुका फ़ौकहुम योमइज़िन समानियतन। [सूरते हाका आयत १७]
अर्थ: और उठाएँगे तेरे रब (पालनहार) के सिंहासन को अपने ऊपर उस दिन आठ व्यक्ति।

जिसे आठ व्यक्ति (या देवदूत) उठाएँगे, उसके साकार और सीमित होने में क्या सन्देह रहा? यह आठ कौन हैं? तफ़सीरे हुसैनी में लिखा है –

"मआलिम (कुरान भाष्य) में लिखा है कि उस दिन तख़्त के उठाने वाले आठ होंगे, जिनकी आकृति पहाड़ी बकरे जैसी होगी। उनके सुम्मों (खुरों) से घुटनों तक इतनी दूरी होगी जितनी एक आकाश से दूसरे आकाश तक होती है।"

अल्लाह की दूरी और समय की सीमा

सूरते सिजदा में लिखा है –

युदब्बिरुल अमरा मिनस्समाए इललअरजे सुम्मा यअरुजो, फ़ीयीमिन काना मिकदारहू अलफ़ा सिनतिन मिम्मा तउद्दून। [सूरते सिजदा आयत ५]
अर्थ: व्यवस्था करता है हर बात की भूमि की ओर, फिर चढ़ जाता है आसमान की ओर एक दिन में, जिसका अनुमान तुम्हारी गणना में एक हजार वर्ष है।

आसमान से भूमि की समस्याओं की देखभाल करने वाला, फिर एक दिन में ऊपर चढ़ने वाला (जिसकी अवधि मनुष्यों के १००० वर्ष के बराबर है) शरीररहित कैसे हो सकता है? यदि यह चढ़ना फ़रिश्तों का भी माना जाए, तो भी अल्लाहताला भूमि से इतना दूर तो है ही कि फ़रिश्तों को उसके पास जाते हज़ारों वर्ष लगते हैं।

सूरते मआरिज में पुनः कहा है –

तअरजुल मलाइकतो वर्रुहोइलैहि फ़ीयोमिन काना मिकदारहू ख़मसीना अलफ़ा सिनतुन। [सूरते मआरिज आयत ४]
अर्थ: चढ़ते हैं फ़रिश्ते और रूह उसकी ओर उस दिन में जिसकी सीमा पचास हजार वर्ष है।

एक हजार और पचास हजार के इस गणितीय अन्तर को यदि छोड़ भी दें, तो भी अल्लाहताला की दूरी और भौतिक सीमितता का वर्णन यहाँ स्पष्ट है।

अर्श का दायाँ और बायाँ भाग

सूरते वाकिया की प्रारम्भिक आयतों में स्वर्ग (बहिश्त) व नरक (दोज़ख़) में रहने वालों का वर्गीकरण है। स्वर्ग में रहने वालों को 'असहाबुल मैमना' (ख़ुदा के दाहिनी ओर रहने वाले) और दोज़ख़ में रहने वालों को 'असहाबुल मशीमता' (ख़ुदा के बाएँ तरफ़ रहने वाले) कहा गया है।

तफ़सीरे हुसैनी में इसकी व्याख्या करते हुए लिखा है –

"वे बहिश्त में जाएँगे और बहिश्त अर्श के दाईं ओर है; और उन्हें दोज़ख़ ले जाएँगे और दोज़ख़ अर्श के बाईं ओर है।"

जब अर्श के दाएँ और बाएँ दो भौतिक दिशाएँ हैं, तो अर्श को असीम कौन कह सकता है? सीमित स्थान का निवासी होने से अल्लाहमियाँ भी स्वतः सीमित ही सिद्ध होते हैं।

भौतिक ज्योति और मूसा का बेहोश होना

सूरते ऐराफ़ में आया है –

फलम्मा तजल्ला रब्बुहूलिलजबलेजअलहूदक्कन व ख़र्रामूसा सअकन। [सूरते आराफ़ आयत १४३]
अर्थ: फिर जब दर्शन किया उसके स्वामी ने पहाड़ की ओर, तो किया उसे टुकड़े-टुकड़े और गिर पड़ा मूसा बेहोश होकर।

यहाँ किसी ऐसी भौतिक ज्योति का वर्णन है जिससे प्रकट होने से पहाड़ टूट गया। यह प्रभाव आध्यात्मिक नहीं बल्कि बिजली की भाँति शारीरिक है, जिसका प्रकटीकरण एक स्थान विशेष तक सीमित है। मूज़िहुलकुरान में इसी आयत पर लिखा है – “इससे ज्ञात हुआ कि हकताला (परमात्मा) को आँखों से देखना सम्भव है।” इस ज्योति को सीमित न कहें तो क्या कहें?

सूरते नूर में फ़र्माया है –

अल्लाहो नूरु स्समावाते वल अरजे मस्सल नूरिही कमिश्कातिन फ़ीहा मिस्ब्बाहुन अलमिस्बाहे फ़जुजाजतिजुजाते... [सूरत नूर आयत ३५]
अर्थ: अल्लाह ज्योति है आसमानों की व ज़मीन की, उस ताक (आले) की भाँति जिसमें दीपक हो और वह दीपक शीशे के भीतर हो...

अनेक भाष्य देखने पर भी स्पष्ट नहीं होता कि इस उपमा-पर-उपमा का मूल दार्शनिक आशय क्या है, परन्तु इतना स्पष्ट है कि अल्लाह का वर्णन यहाँ भौतिक और शारीरिकता से ऊपर नहीं उठ सका है।

पर्दे के पीछे से बात करना

सूरते शूरा में लिखा है –

व मा कान लिबशरिन अन युकल्लिमहुल्लाहो इल्ला वहयन औ मिन वराए हिजाबिन और युरसिलो रसूलन। [सूरते शूरा आयत ५१]
अर्थ: और किसी मनुष्य के लिए यह सम्भव नहीं कि अल्लाह उससे सीधे बात करे, परन्तु संकेत से या पर्दे के पीछे से या सन्देशवाहक (फ़रिश्ता) भेजकर।

यदि परमात्मा सर्वव्यापक है, तो उसे बात करने के लिए भौतिक माध्यमों, पर्दों या सन्देशवाहकों की क्या आवश्यकता? तफ़सीरे हुसैनी में लिखा है –

"ख़ुदा ने रसूलिल्लाह के साथ दो पर्दों के पीछे से कलाम किया। एक पर्दा सुर्ख जरी का था और दूसरा पर्दा सफ़ेद मोतियों का था, और उन दोनों पर्दों के बीच की दूरी सत्तर साल के सफ़र जितनी थी।"

यह पर्दा भगवान और जीव के बीच भौतिक दूरी की सीमा के अतिरिक्त और क्या दर्शाता है?

कयामत के दिन लाइन बाँधकर आना

सूरते फ़जर में ज़िक्र है –

व जाआ रब्बुका वलमलको सफ़्फ़न सफ़्फ़न, व जाआ योमइज़िन बिजहन्नमा। [सूरते फ़जर आयत २२-२३]
अर्थ: और आएगा रब तेरा और फ़रिश्ते सफ़ (लाइन) बाँधकर, और लाया जाएगा उस दिन दोज़ख़।

कयामत के दिन गुनहगारों और बेगुनाहों के सामने स्वयं रब का इस प्रकार चलकर आना अल्लाह के सीमित और शरीरी होने का स्पष्ट प्रमाण है।

निष्कर्ष

सृष्टि की रचना कर अर्श पर बैठना, अर्श का पानी पर टिकना, आठ दैत्यनुमा फरिश्तों द्वारा उसे उठाना, हजारों वर्षों की दूरी तय करना, अर्श के दाएँ स्वर्ग और बाएँ नरक का होना, आग की भाँति चमककर पहाड़ तोड़ना, दो हाथों से पुतला तैयार करना और पर्दे के पीछे से बात करना—ये सभी चिह्न ईश्वर को सर्वव्यापक व असीम मानने के विपरीत उसे एक देशबद्ध, साकार और सीमित सत्ता के रूप में सिद्ध करते हैं।

लेखक – पण्डित चमूपति एम॰ए॰
[‘चौदहवीं का चाँद’ पुस्तक से संकलित]
प्रस्तुति: अवत्सार
तकदीर चौदहवीं का चांद

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