न तस्य प्रतिमा अस्ति — प्रतिरूप से रहस्य तक

 


न तस्य प्रतिमा अस्ति — प्रतिरूप से रहस्य तक

न तस्य प्रतिमास्ति यस्य नाम महद्यशः।
हिरण्यगर्भ इत्येष मा मा हिंसीदित्येषा यस्मान्न जात इत्येषः॥

इस मंत्र की गति को समझने के लिए इसे अलग-अलग शब्दों में तोड़कर देखने के बजाय उसकी क्रमिक विचार-धारा को पकड़ना आवश्यक है। मंत्र पहले उस मूल सत्ता की सीमा बताता है, फिर उसके लिए एक नाम देता है, फिर उसके स्वरूप और कार्य की ओर संकेत करता है, फिर मनुष्य को चेतावनी देता है और अंत में उस सत्ता तथा मनुष्य द्वारा निर्मित जगत के बीच की सीमा को स्पष्ट करता है। इसलिए इसकी गति इस प्रकार है—

प्रतिमा का निषेध → अस्तित्व की स्वीकृति → नाम की स्थापना → हिरण्यगर्भ का संकेत → संरक्षण की चेतावनी → मानव-सृजन की सीमा।

१. न तस्य प्रतिमा अस्ति

“न तस्य प्रतिमा अस्ति।”

अर्थात्—उसकी कोई निश्चित प्रतिमा नहीं है।

यहाँ “प्रतिमा” को केवल किसी मूर्ति के अर्थ में सीमित करना इस मंत्र की व्यापकता को कम कर देता है। यहाँ प्रतिमा का अर्थ उस निश्चित प्रतिरूप, गणना, संरचना, पैटर्न या एल्गोरिद्मिक व्यवस्था से लिया जा सकता है जिसके भीतर किसी सत्ता को पूरी तरह पकड़कर यह कहा जा सके कि अब उसका स्वरूप पूर्णतः समझ लिया गया है।

मनुष्य जिस वस्तु का निश्चित पैटर्न पहचान लेता है, उसकी गणना कर सकता है। जिसकी गणना कर सकता है, उसका मॉडल बना सकता है। जिसका मॉडल बना सकता है, उसकी पुनरावृत्ति कर सकता है। फिर उसके घटकों का विश्लेषण करके उन्हें नए संबंधों में जोड़ सकता है और नई वस्तुएँ, नए पदार्थ, नए यंत्र तथा नई व्यवस्थाएँ निर्मित कर सकता है।

यही मनुष्य के वैज्ञानिक ज्ञान की शक्ति है।

लेकिन मंत्र कहता है—

“न तस्य प्रतिमा अस्ति।”

अर्थात् जिस मूल सत्ता की खोज यहाँ की जा रही है, उसे किसी एक निश्चित पैटर्न, किसी एक गणना, किसी एक मॉडल या किसी एक एल्गोरिद्म में पूर्णतः बंद नहीं किया जा सकता।

और यहीं से सबसे स्वाभाविक प्रश्न उठता है—

यदि उसकी निश्चित प्रतिमा नहीं है, तो फिर वह क्या है?

यहीं मंत्र हमें उस क्षेत्र में ले जाता है जहाँ अज्ञात और रहस्य के बीच अंतर दिखाई देने लगता है।

अज्ञात वह है जिसे अभी नहीं जाना गया है, लेकिन जिसे किसी निश्चित पद्धति से जाना जा सकता है। रहस्य वह है जहाँ सत्ता का होना स्वीकार है, लेकिन उसकी पूर्ण प्रतिमा किसी एक सीमित ज्ञान-पद्धति में समाप्त नहीं होती।

इसलिए यहाँ दो बातें एक साथ निश्चित होती हैं—

वह है।

लेकिन वह किसी निश्चित प्रतिमा में समाप्त नहीं होता।

यही इस मंत्र का पहला रहस्य है।

मनुष्य उसे पूर्णतः अस्वीकार नहीं कर सकता, क्योंकि उसकी सत्ता को मंत्र स्वीकार करता है। लेकिन मनुष्य उसे किसी एक निश्चित रूप में बाँध भी नहीं सकता, क्योंकि मंत्र उसी क्षण कह देता है—

“न तस्य प्रतिमा अस्ति।”

अर्थात्—

अस्तित्व निश्चित है, प्रतिरूप अनिश्चित है।

यहीं से खोज प्रारंभ होती है।


२. यस्य नाम महद्यशः

अब मंत्र स्वयं उस रहस्य की ओर संकेत करते हुए कहता है—

“यस्य नाम महद्यशः।”

जिसका नाम महान् द्यौ के समान व्यापक है, जिसकी महिमा विशाल है, जिसकी सत्ता किसी एक सीमित स्थान में समाप्त नहीं होती।

यहाँ “द्यौ” को उस व्यापक अंतरिक्षीय क्षेत्र के रूप में देखा जा सकता है जो पृथ्वी और सूर्य जैसे अलग-अलग दिखाई देने वाले पिंडों के बीच संबंध का क्षेत्र बनाता है। पृथ्वी एक वस्तु है, सूर्य दूसरी वस्तु है। दोनों के बीच विशाल भौतिक दूरी है। लेकिन उस दूरी के भीतर एक अदृश्य व्यवस्था कार्य करती है जो दोनों को एक ही ब्रह्मांडीय संबंध में बाँधती है।

इसलिए यहाँ मूल भाव केवल दूरी का नहीं, दूरी के भीतर संबंध का है।

दो वस्तुएँ अलग हो सकती हैं, लेकिन उनके बीच संबंध हो सकता है।

दो पदार्थ अलग हो सकते हैं, लेकिन एक ही नियम से बँधे हो सकते हैं।

दो जीव अलग शरीरों में हो सकते हैं, लेकिन एक ही जीवन-व्यवस्था का भाग हो सकते हैं।

दो ज्ञान-क्षेत्र अलग दिखाई दे सकते हैं, लेकिन किसी एक मूल सिद्धांत से जुड़े हो सकते हैं।

यही वह अदृश्य धागा है जो अलग-अलग दिखाई देने वाली वस्तुओं को एक व्यापक व्यवस्था में जोड़ता है।

इस दृष्टि से—

महद्यशः वह व्यापकता है जिसमें पृथक दिखाई देने वाली वस्तुएँ अपने संबंध के कारण एक व्यवस्था का रूप ग्रहण करती हैं।

और यही पिछले मंत्र के “तत्” से जुड़ता है।

अग्नि अलग है।

आदित्य अलग है।

वायु अलग है।

चन्द्रमा अलग है।

शुक्र अलग है।

आपः अलग हैं।

लेकिन हर रूप के पीछे मंत्र ने कहा—

तत्।

नाम अलग हैं।

रूप अलग हैं।

कार्य अलग हैं।

लेकिन मूल तत्त्व एक है।


३. हिरण्यगर्भ इत्येषः

अब मंत्र उस रहस्य को एक और नाम देता है—

“हिरण्यगर्भ इत्येषः।”

यहीं से रहस्य का अगला पर्दा उठता है।

हिरण्य—स्वर्णिम, चमकीला, प्रकाशमान, मूल्यवान।

गर्भ—वह जो अपने भीतर किसी भावी अभिव्यक्ति को धारण करता है; वह केंद्र जिसमें किसी संरचना, जीवन या सृजन की संभावना सुरक्षित रहती है।

इस प्रकार हिरण्यगर्भ को उस प्रकाशमान मूल-गर्भ के रूप में देखा जा सकता है जिसमें सृजन की संभावना धारण रहती है और जहाँ विभिन्न घटक किसी गहरे संगठन के भीतर अपनी एकता बनाए रखते हैं।

बीज के भीतर वृक्ष की संभावना है।

कोशिका के भीतर जीव की संरचना का संगठन है।

केंद्रक के भीतर आनुवंशिक सूचना सुरक्षित रहती है।

जीवित शरीर के भीतर असंख्य सूक्ष्म इकाइयाँ होते हुए भी एक समग्र व्यवस्था बनी रहती है।

अलग-अलग घटक अपने आप में स्वतंत्र दिखाई दे सकते हैं, लेकिन किसी गहरे संगठन के कारण वे एक जीवित इकाई का निर्माण करते हैं।

यही गर्भ की मूल धारणा है—

विभिन्नताओं को नष्ट किए बिना उन्हें एक व्यवस्था में धारण करना।

और “हिरण्य” उस व्यवस्था के प्रकाशमान, ऊर्जामय और सृजनशील पक्ष को प्रकट करता है।

इसलिए यहाँ एक क्रम दिखाई देता है—

प्रकाश → ऊर्जा → संरचना → गर्भ → संगठन → जीवन।

अब रहस्य केवल अज्ञात नहीं रह जाता। उसकी अभिव्यक्तियाँ दिखाई देने लगती हैं।


४. इत्येष

“इत्येषः”—यह उसी की पहचान का संकेत है।

अर्थात् मंत्र उस रहस्य को किसी अंतिम प्रतिमा में बंद नहीं करता, बल्कि उसके नाम और कार्य के माध्यम से उसकी ओर संकेत करता है।

यही ज्ञान की महत्वपूर्ण पद्धति है।

जिसकी पूर्ण प्रतिमा नहीं बनाई जा सकती, उसकी अभिव्यक्तियों को देखा जा सकता है।

उसके प्रभावों को देखा जा सकता है।

उसकी व्यवस्था को समझा जा सकता है।

उसके कार्यों का अध्ययन किया जा सकता है।

उसके नियमों को खोजा जा सकता है।

इस प्रकार मनुष्य रहस्य के ऊपर से धीरे-धीरे पर्दा उठाता है।

लेकिन पर्दा उठाने और रहस्य को समाप्त कर देने में अंतर है।

ज्ञान रहस्य को खोलता है; उसे अनिवार्य रूप से समाप्त नहीं करता।


५. मा मा हिंसीत्

अब मंत्र ज्ञान की चर्चा से मनुष्य के आचरण की ओर आता है—

“मा मा हिंसीत्।”

यहाँ दो बार “मा” का प्रयोग है।

पहला स्तर यह है कि मूल सत्ता को मनुष्य अपनी इच्छा से हिंसित या समाप्त नहीं कर सकता। वह अस्तित्व के मूल आधार को अपने हाथ में लेकर उसे नष्ट नहीं कर सकता। वह प्रकृति के मूल नियमों को समाप्त नहीं कर सकता। वह उस आधार को मिटाकर अपने लिए कोई नया अस्तित्व-तंत्र नहीं बना सकता।

लेकिन दूसरा “मा” मनुष्य की ओर लौटता है।

“तुम अपने भीतर उस मूल शक्ति की अभिव्यक्ति को हिंसित मत करो।”

यहीं मंत्र बाहरी जगत से मानव-अस्तित्व के भीतर प्रवेश करता है।

मनुष्य पदार्थ को बदल सकता है।

ऊर्जा का उपयोग कर सकता है।

पदार्थों का विश्लेषण कर सकता है।

उनका संश्लेषण कर सकता है।

नई संरचनाएँ बना सकता है।

यंत्र बना सकता है।

तंत्र बना सकता है।

एल्गोरिद्म बना सकता है।

लेकिन यदि इसी प्रक्रिया में वह अपने अस्तित्व के मूल केंद्र को ही नष्ट करने लगे, तो उसकी सारी बाहरी उपलब्धियाँ अंततः केवल पदार्थ की संरचना तक सीमित रह जाएँगी।

इसलिए दूसरी बार “मा” एक गहरी चेतावनी बन जाता है—

मूल शक्ति को नष्ट करने का प्रयास मत करो और अपने भीतर उसकी अभिव्यक्ति को भी नष्ट मत करो।

मनुष्य बाहरी जगत को बदल सकता है, लेकिन उसे अपने ही अस्तित्व के मूल से विमुख होकर उस परिवर्तन को पूर्ण विजय नहीं समझना चाहिए।


६. यस्मान्न जात इत्येषः

अब मंत्र का अंतिम खंड इस पूरे विचार को उसकी सीमा तक ले जाता है—

“यस्मान्न जात इत्येषः।”

जिससे वह स्वयं उत्पन्न नहीं हुआ।

यहाँ मनुष्य की सृजन-क्षमता और मूल सत्ता के बीच अंतर स्पष्ट होता है।

मनुष्य निर्माण करता है।

लेकिन वह उस सामग्री, ऊर्जा और नियमों के भीतर निर्माण करता है जो पहले से अस्तित्व में हैं।

वह पदार्थों का विश्लेषण करता है।

उनके घटकों को पहचानता है।

उन्हें नए संबंधों में जोड़ता है।

नए पदार्थ बनाता है।

नए उपकरण बनाता है।

नई तकनीक बनाता है।

नए तंत्र बनाता है।

नए एल्गोरिद्म बनाता है।

लेकिन यह सब उपलब्ध अस्तित्व के भीतर होता है।

इसलिए मनुष्य की सृजन-शक्ति महान है, लेकिन वह निराधार सृजन नहीं है।

वह पहले से उपलब्ध किसी न किसी तत्त्व, नियम, ऊर्जा, संरचना या संबंध को समझकर उसके नए संयोजन उत्पन्न करता है।

यहीं मंत्र मनुष्य के ज्ञान की सीमा को स्पष्ट करता है।

एक ओर है—

दृश्य जगत।

उसकी संरचना।

उसका पदार्थ।

उसकी ऊर्जा।

उसके नियम।

उसका गणित।

उसके पैटर्न।

उसके एल्गोरिद्म।

उसका विश्लेषण।

उसका संश्लेषण।

और उससे उत्पन्न होने वाली अनंत वैज्ञानिक संभावनाएँ।

दूसरी ओर है—

वह मूल सत्ता जिसके कारण यह सब संभव है।

मनुष्य दृश्य जगत का विश्लेषण कर सकता है, उसके रहस्यों को खोल सकता है, उसके भीतर छिपी संरचनाओं को समझ सकता है और उस ज्ञान से नई दुनिया बना सकता है।

लेकिन जहाँ प्रश्न यह हो जाता है कि अस्तित्व की मूल संभावना स्वयं कहाँ से आई, नियमों का मूल आधार क्या है और वह सत्ता क्या है जिससे ज्ञान, गणना, पदार्थ और चेतना की संभावना उत्पन्न होती है, वहाँ वैज्ञानिक अन्वेषण एक दूसरी सीमा पर पहुँचता है।

यहीं से—

विज्ञान का अंत नहीं, विज्ञान की सीमा दिखाई देती है।

और सीमा के उस पार—

रहस्य आरम्भ होता है।


मंत्र की संपूर्ण गति

इस प्रकार पूरे मंत्र को एक ही विचार-प्रवाह में पढ़ें तो उसकी गति अत्यंत स्पष्ट हो जाती है—

न तस्य प्रतिमा अस्ति
— उसकी कोई निश्चित प्रतिमा नहीं है।

यस्य नाम महद्यशः
— फिर भी उसकी व्यापक पहचान और महिमा है।

हिरण्यगर्भ इत्येषः
— वह प्रकाशमान सृजन-गर्भ के रूप में अपनी अभिव्यक्ति देता है।

मा मा हिंसीत्
— उस मूल शक्ति को हिंसित मत करो और अपने भीतर उसकी अभिव्यक्ति को भी नष्ट मत करो।

यस्मान्न जात इत्येषः
— क्योंकि वह स्वयं उस प्रकार की सीमित निर्मिति नहीं है जिसे मनुष्य किसी पूर्व निर्धारित पैटर्न में पकड़कर समाप्त कर दे।

इस प्रकार मंत्र हमें एक अत्यंत महत्वपूर्ण सीमा तक ले जाता है—

मनुष्य पदार्थ का प्रतिरूप बना सकता है,
पदार्थ का विश्लेषण कर सकता है,
पदार्थ का संश्लेषण कर सकता है,
पैटर्न खोज सकता है,
एल्गोरिद्म बना सकता है,
यंत्र बना सकता है,
नई संरचनाएँ बना सकता है;

लेकिन—

जिस मूल सत्ता से प्रतिरूप बनाने की मनुष्य की क्षमता स्वयं उत्पन्न हुई है, उसे उसी प्रकार के किसी एक प्रतिरूप में पूर्णतः बंद नहीं किया जा सकता।

यही कारण है कि इस मंत्र में “प्रतिमा” का निषेध और “अस्ति” की स्वीकृति साथ-साथ चलती है।

वह है।

लेकिन वह किसी एक निश्चित रूप में समाप्त नहीं होता।

और यही वह बिंदु है जहाँ पिछले मंत्र का “तत्” और इस मंत्र का “न तस्य प्रतिमा अस्ति” एक-दूसरे से जुड़ते हैं।

पहले मंत्र ने हमें दिखाया—

एक मूल तत्त्व अनेक रूपों में प्रकट होता है।

यह मंत्र हमें बताता है—

उन अनेक रूपों को जोड़ देने के बाद भी मूल तत्त्व को किसी एक अंतिम प्रतिमा में बंद मत कर देना।

यही अंतर ज्ञान और प्रभुत्व के बीच भी है।

ज्ञान कहता है—

“मैं खोज रहा हूँ।”

प्रभुत्व कहता है—

“मैंने अंतिम उत्तर पा लिया।”

ज्ञान नए प्रमाण के सामने अपनी अवधारणा को बदल सकता है।

प्रभुत्व अपनी अवधारणा की रक्षा के लिए प्रमाण को बदलना चाहता है।

और इसीलिए “न तस्य प्रतिमा अस्ति” हमारे “विश्वासघात-विज्ञान” के मूल को भी छूता है—क्योंकि प्रभुत्व का पहला कार्य किसी जीवित सत्य को एक निश्चित प्रतिमा में बदल देना है।

जिस क्षण कोई कहता है—

“यही अंतिम है।”

उसी क्षण खोज रुकने लगती है।

और जिस क्षण मनुष्य कहता है—

“यह मैंने समझा है, लेकिन अभी और समझना शेष है।”

उसी क्षण रहस्य का द्वार खुलता है।

यही इस मंत्र का वास्तविक प्रवेश-द्वार है—

प्रतिमा का निषेध नहीं, प्रतिमा को अंतिम सत्य मानने का निषेध।

रहस्य का अर्थ अज्ञान नहीं, बल्कि उस सत्य की व्यापकता है जिसे कोई एक निश्चित प्रतिरूप अपने भीतर समाप्त नहीं कर सकता।