कुन फ़यकून इंसान व शैतान
दर्शन व धर्म के सामने एक प्रश्न सदा से चला आया है वह यह कि संसार में वर्तमान पदार्थों की उत्पत्ति कैसे हुई? सभी धर्म जो परमात्मा की सत्ता मानने वाले हैं परमात्मा की सत्ता को नित्य मानते हैं उसका प्रारम्भ कभी नहीं हुआ। आर्यसमाज ईश्वरेत्तर तत्त्वों की सत्ता भी अनादि अर्थात् सदा से मानता है, परन्तु इस्लाम की मान्यता इसके विपरीत है। इस्लाम में प्राकृतिक वस्तुओं और चेतन पदार्थों को सदा रहने वाली तो माना है, परन्तु वे सदा से (अनादि) ही हैं ऐसा नहीं माना गया।[१]
इस्लाम की मान्यता है कि परमात्मा ने कहा- कुन (हो जा) और सब कुछ उत्पन्न हो गया। इसीलिए सूरते बकर में आया है –
आयत में लिखा है- ‘उस’ को कहता है हो जा। किसको कहता है? अनुपस्थित को? यह ‘हो जा’ भूतकाल में ही हो लिया, या अब भी यह आदेश दिया जाता है? वाक्य शैली से तो ज्ञात होता है कि यह आदेश सदा दिया जाता है। परन्तु क्या वर्तमान काल में कोई वस्तु इस आदेश को कारण बनाकर कार्यरूप में परिणित होती है? अब नहीं होती, तो पहले भी किस प्रकार होती होगी? आदेश अन्य कारण की उपस्थिति में दिया जाता तो कल्पना सम्भव थी, इसके विपरीत नहीं। अकारण कार्य के लिए प्रमाण चाहिए।
छह दिन में सृष्टि रचना का विरोधाभास
इसके विपरीत निम्नलिखित आयतों में कुछ और ही दशा है –
कोई प्रश्न कर सकता है कि उस समय सूरज तो था नहीं जो दिनों का हिसाब उससे हो जाता। फिर दिनों का अनुमान कैसे हुआ? तफ़सीरे जलालैन में इसका उत्तर दिया है कि छह दिन से आशय उतनी मात्रा है, क्योंकि उस समय सूरज न था जो उनका हिसाब उससे होता।
कोई पूछे ६ दिन क्यों लगा दिए? तो लिखा है कि इसका कारण छह दिन में बनाया (यद्यपि उसकी सामर्थ थी कि यदि चाहता तो एक क्षण में बना डालता) यह है कि धीरे-धीरे व जल्दी न करना सिखलाए। तफ़सीरे हुसैनी में कहा है:
खूए रहमानस्त सबरो हिसाब॥
(अर्थात्: शैतान का स्वभाव है शीघ्रता, दयालु प्रभु का स्वभाव है धीरज से व विधि से)
तो यह 'कुन' भी जल्दी न कहा जाता होगा। धैर्य व हिसाब से कहा जाता होगा, अर्थात् छह दिन में। सूरते हम सजदा में फ़रमाया है –
लीजिए अब तो दिनों की संख्या आठ हो गई। तफ़सीरे जलालैन में इस कठिनाई का समाधान किया है कि—ज़मीन दो दिन में रविवार व सोमवार को बनाई गई, उसमें सब वस्तुएँ मंगल व बुधवार में और आसमान जुमेरात (बृहस्पतिवार) व जुमा (शुक्रवार) की पिछली रात में काम पूरा हुआ और उसी समय बनाया गया आदम को। भोजन सामग्री जो चार दिनों में उत्पन्न की थी उनके दो दिन भूमि की उत्पत्ति में सम्मिलित कर लिए इस प्रकार कुल संख्या फिर छह की छह रही।
इंसान की उत्पत्ति और पराधीनता
यह हुई अचेतन सृष्टि की उत्पत्ति, अब मनुष्यों की भी सुन लीजिए। यह तो तफ़सीरे जलालैन ने ही बता दिया कि जुमा (शुक्रवार) की पिछली रात आदम का पुतला घड़ा गया था। घड़ा किससे गया? कैसे गया?
- ख़लकंतहु मिनतीन (स्वाद): उत्पन्न किया उसको मिट्टी से।
- ख़लकतो बियदय्या (स्वाद): बनाया मैंने दोनों हाथों से।
इन प्रमाणों से सिद्ध है कि इन्सान का उपादान कारण मिट्टी है। कुछ स्थानों पर गन्दी मिट्टी कहा है, उसे अल्लाहताला ने दोनों हाथों से ठीक किया है और उसमें अपनी रुह (आत्मा) फूँकी है। क्या वास्तव में मानव शरीर की रचना मिट्टी से ही हुई है? क्या उसको बनाने वाला दो हाथों वाला है? यह प्रश्न हमारे इस अध्याय के विषय से बाहर है। यहाँ केवल यह देखना अद्दिष्ट है कि मानव की अपनी स्वयं सत्ता कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं। मिट्टी वह है जो कुन के कहते ही ज़मीन के साथ पैदा हुई है चाहे वह कुन एक क्षण में कहा गया हो चाहे दो दिन में या छह दिन में।
रुह (आत्मा) अल्लाह मियाँ की अपनी है। इसके अर्थ चाहे यह करो कि अल्लाह ने अपने शरीर में से मानव के शरीर में जीवन का सांस फूंका जैसा इञ्जील में वर्णन किया गया है और चाहे स्वामी दयानन्द की शंका की सार्थकता के आगे नतमस्तक हो जाओ और रुही (मेरी आत्मा) का अर्थ करो ‘अल्लाह मियाँ की प्यारी रुह’। रुह (आत्मा) या तो अल्ला मियाँ के अन्दर से निकली है या अभाव से भाव की गई है। इस प्रकार की मिट्टी और आत्मा कर्म में स्वतन्त्र नहीं हो सकती।[२] जो गुण व स्वभाव स्वतन्त्र कर्ता ने इसमें केन्द्रित कर दिये, उसके अनुसार वह कर्म करती जाएँगी। फिर अल्लाह मियाँ की यह शिकायत कि –
यह असंगत है, क्योंकि यह अत्याचार वृत्ति व कुफ्र की प्रकृति को उसके स्वभाव में अल्लाह द्वारा प्रदान किया गया है। आश्चर्य तो यह है कि कुछ मनुष्य इस ईश्वरीय देन के विरुद्ध न्याय व ईमान का प्रदर्शन करते हैं, परन्तु वह भी तो उनका चमत्कार नहीं, बनाने वाले ने ऐसा बना दिया।
पाप का आदि स्रोत और शैतान की उत्पत्ति
उत्पत्ति के इस सिद्धान्त पर शंका यह होती है कि जब नित्य सत्ता ईश्वरीय सत्ता के अतिरिक्त और कोई अन्य नहीं और अल्लाह पूर्ण है, पवित्र है, नेक है तो उसकी रचना में दोष, पाप व कमजोरियाँ प्रवेश कैसे पा गईं? पाप का आदि स्रोत कौन है? कुरान में इस प्रश्न का यों समाधान किया गया है –
प्रश्न यह है कि जब शैतान भी अल्लाह ताला की ही रचना है और अल्लाह उसे जैसा चाहता बना सकता था तो उसे काफ़िर क्यों बनाया? लीजिए गुनाह (पाप) की कहानी आगे चलती है –
यहाँ से पाप का प्रारम्भ होता है। अल्लाह मियाँ ने तो आदम और उसकी पत्नी को स्वर्ग में डाल ही दिया था। कोई पूछे किन कर्मों के पुरस्कार स्वरूप? कहा जाएगा कर्मों के अभाव में। शैतान ने उनको बहकाया वह किसकी मेहरबानी से? बहिश्त कहाँ था? जहाँ से उतरने का आदेश हुआ। फिर परस्पर शत्रु भी बना दिया, यह वह गुण है जिसको ऊपर जुल्म और कुफ्र के नाम से वर्णन किया गया है। शैतान की उत्पत्ति प्रारम्भिक पाप है किसका? सूरते स्वाद में उपरोक्त वार्तालाप और भी विस्तार से वर्णन किया है –
शैतान को तो उत्पन्न किया ही था और वह भी अग्नि से, अब जब वह अपनी स्वाभाविक प्रकृति के चमत्कार को दिखाने लगा तो अल्ला मियाँ रुष्ट हुए। क्या जानते न थे कि है ही ऐसा? प्रश्न हो सकता है कि जब यह अल्लाह के अपने अधिकार क्षेत्र में था कि सबको अधीनस्य उत्पन्न करता तो शैतान को क्यों विद्रोही स्वभाव का उत्पन्न कर दिया या भूलचूक से ऐसा हो गया? यदि भूल नहीं हुई, अपितु इच्छा से उसे घमण्डी बनाया गया तो रुष्ट होने और डराने धमकाने से क्या तात्पर्य है? बेचारे को फटकारा तक गया है। फिर भी रहमानियत (कृपालुता) का गौरव है कि उसने मौहलत (अवसर) माँगा तो दे दिया गया। वह किस बात की? प्रलयकाल तक मनुष्यों को पथ-भ्रष्ट करने की। भला मनुष्य पर यह कृपा क्यों की? घमण्ड करे शैतान उसका दण्ड मिले मनुष्यों को। विचित्र कृपालुता है!
परन्तु नहीं, लगे हाथों मनुष्य को शिक्षा भी दे दी है –
या अल्ला! इसे पैदा ही नहीं करना था, किया था तो हमारा शत्रु न बनाना था। उसने आज्ञा का उल्लंघन किया उस पर लानत (फटकार) हुई। था बुद्धिमान् कि मुहलत (अवसर) माँगा ली, कृपालुता का सहारा ले लिया कि उसे अवसर दिया जाए इसमें हमें शंका आपत्ति नहीं। परन्तु हमें पथ-भ्रष्ट करने की सामर्थ्य क्यों प्रदान की गई? उसकी शैतानियत का कोई और उपयोग हो जाता।
इसी सूरते स्वाद का कथानक सूरते ऐराफ के प्रारम्भ में आया है। अवसर प्राप्त होने पर शैतान ने अपनी इस महत्वाकाँक्षा की महानता का, कि वह प्रलय के दिन तक लोगों को पथ-भ्रष्ट करेगा, कारण बताया है –
शैतान कहता ही तो है कि अल्लाह ने मुझे पथ-भ्रष्ट किया है। जब उसकी सत्ता अभाव से हुई है और जब वह अल्लाह के आदेश का सब प्रकार से पालक है तो उसमें शैतानियत का सामर्थ्य उत्पन्न ही किसने की है? फिर अल्लाताला हैं कि बजाए इसके कि कुन कहकर उसे शैतान से भला मानस बना दें, विपरीत इसके शैतान को प्रलयकाल तक खुली पथ-भ्रष्टता का अवसर देते हैं और इस पथ-भ्रष्टता का लक्ष्य किसे बनाते हैं? बेचारे मनुष्यों को। वह भी तो जैसे अल्लाह ने बना दिए बन गए। किसी के भाग्य में पथ-भ्रष्टता लिखी गई किसी के भाग्य में शैतान से बचा रहना लिखा गया, फिर यह झाड़-झपट (लानत-फटकार) क्यों कि दोज़ख़ को भर दूंगा? पहले ही आज्ञा हो गई कि दोज़ख़ भरा जाना है। इसलिए सबको सन्मार्ग नहीं दिखाया जाएगा। इस शाश्वत इच्छा के मार्ग में बाधा कौन उत्पन्न कर सकता है? अब कहिए भलाई बुराई की कल्पना भ्रम है या कुछ और?
इस पर अल्ला मियाँ फरमाते हैं –
शैतान के सम्बन्ध में तो न प्रौढ़ता का ही प्रमाण दिया और न कार्य कुशलता का। हाँ यह और बात है कि अपने आपको कुछ कह लें। ऐसे ही कुरान के सम्बन्ध में फ़रमाया है –
परहेज़गार पहले ही निर्मित हैं, मार्गदर्शन किसका हुआ? लेखक के कथन का तात्पर्य क्या हुआ? दूसरे भी ऐसा ही कहें तब कोई अर्थ हुआ। सूरते हजर में शैतान ने फिर यह कथन दुहराया –
यह सजाना (जीनत देना) क्या है? दोज़ख़ के लिए संवारना? अल्लाह मियाँ की शाश्वत वाणी की ही तो आज्ञा पालना हो रही है। लीजिए अल्लाह मियाँ स्वयं फ़रमाते हैं –
हम ऊपर निवेदन कर चुके हैं कि नित्य सत्ता अनादि केवल अल्लाताला की ही होने से वास्तविक कर्ता उसी को मानना पड़ेगा। कोई बुरा है तो इसलिए नहीं कि उसने जानबूझकर किसी कानून का उल्लंघन किया है, अपितु इसलिए कि उसे ऐसा बनाया गया है। और यहाँ तो आदम को पढ़ाया भी अल्ला ने स्वयं ही है, फ़रिश्तों को नतमस्तक भी स्वयं ही बना दिया है और फिर पथ-भ्रष्ट भी स्वयं ही करा दिया है। शैतान की यह स्वीकारोक्ति भी सत्यता पर आधारित है कि मैं अल्लाहताला द्वारा ही पथ-भ्रष्ट किया हूँ।
या तो उसे बनाने में अल्लाह मियाँ से भूल हो गई और समय पर उस भूल को सुधारा नहीं गया या फिर अल्लाह मियाँ की प्रारम्भ से इच्छा ही यही रही थी कि प्रायः मनुष्य अकृतज्ञ हों और उनसे दोज़ख़ भर जाए। सर्वशक्तिमान् ख़ुदा के सामने ननुनच करने की तो सामर्थ्य ही किसे है? बिना शैतान से पथ-भ्रष्ट हुए भी दोज़ख़ में जाने का आदेश हो तो आज्ञा पालन करना ही होगा। यह भी तो अल्लाह की ही चाहना है कि हम दोज़ख़ में जाएँ। परन्तु अपने कर्मों के फलस्वरूप। हम उन कर्मों को करने पर विवश हैं, कर लेंगे, परन्तु एक बात कहेंगे और अवश्य कहेंगे कि बलात् कराए गए कर्मों का फल दण्ड व पुरस्कार नहीं होता। दोज़ख़ को दण्ड और स्वर्ग को पुरस्कार कहना भूल है, हाँ अल्लाह की शक्ति और इच्छा के आगे नतमस्तक हैं।
एकाएक सृष्टि क्यों बना दी? (दार्शनिक मीमांसा)
दर्शन शास्त्र में आगे एक और प्रश्न वह यह कि उत्पन्न करना जब अल्लाह मियाँ के स्वभाव में नहीं तो एकाएक उससे यह सृष्टि उत्पन्न कैसे हो गई? अल्लाह का अपना इसमें कोई लाभ नहीं और हो भी तो एक असीमित समय तक मात्र एकत्व में रहने के पश्चात् सृष्टि के इतने पदार्थों की बहुलता की सामर्थ्य उसमें कहाँ से आ गई? यदि सृष्टि बनाने का ज्ञान अल्लाह मियाँ की बुद्धि में पहले से था तो उसका प्रयोग इससे पूर्व कभी क्यों नहीं हुआ? और इस सृष्टि रचना के पश्चात् फिर भी इसके प्रयोग की क्या कभी संभावना है?
कुरान के भाष्यकारों की सम्मति में प्रथम सृष्टि उत्पत्ति हो चुकी। दूसरी सृष्टि प्रलय (न्याय का दिन-कयामत) के दिन होगी और उसके पश्चात् उत्पत्ति का क्रम समाप्त हो जाएगा। तो इसके पश्चात् परमात्मा की सृष्टि उत्पत्ति की शक्ति किस काम आएगी? अल्लाह मियाँ की शक्ति में यह ह्रास व निरस्तीकरण क्या दोष नहीं कि उसकी अनादि व अनन्त सत्ता में केवल दो बार ही उसकी यह शक्ति काम में आई? जब गुण समाप्त हो गया तो गुणी भी समाप्त हो जाएगा।
मनोविज्ञान विशेषज्ञ जानते हैं कि चेतन सत्ताओं का ज्ञान अभ्यास व अनुभव के अनुसार होता है। अल्लाह मियाँ का वर्तमान सृष्टि से पूर्व का अनुभव तो बेकारी का है। फिर अनायास यह नूतन अभ्यास उसे कैसे प्राप्त हुआ कि सारे पदार्थ उसने उत्पन्न कर दिए? जैसे कि लिखा है –
क्या अल्लाह मियाँ ने इससे पहले कहीं पीली खेतियाँ बनाकर देखी थीं कि उनका वर्णन लोहे महफूज़ (परमात्मा के ज्ञान) की शाश्वत पुस्तक पर नित्य वाणी के रूप में लिखकर रख दिया? यदि यही सृष्टि पहली व अन्तिम है तो इससे पहले पीलापन विद्यमान नहीं था, इसका ज्ञान अल्लाह मियाँ को कैसे हुआ? कहा जा सकता है कि वर्तमान सृष्टि के पदार्थ ज्ञान का परिणाम हैं। यहाँ समस्या यह है कि अल्लाह मियाँ के ज्ञान और कर्म में से पहले कौन था और पीछे कौन? मनोविज्ञान ज्ञान तत्त्व के अनुसार यह दोनों ही एक दूसरे के पूर्ववर्ती भी हैं और पश्चात्वर्ती भी।
अल्लाह मियाँ का कौन-सा गुण पहले आता है? ज्ञान का गुण कि कर्म का गुण? दर्शन शास्त्र का यह गम्भीर प्रश्न है जिसका समाधान केवल नित्यकर्म के विश्वासुओं के पास ही है। मध्य में कार्य प्रारम्भ मानने से प्रश्न होता है इससे पूर्व तो यह कार्य हुआ नहीं फिर यह मस्तिष्क में (अल्लाह मियाँ के) कैसे आया और यदि उसके मस्तिष्क में था तो कर्म रूप में परिवर्तित होने में उसके क्या कारण बाधक था?[४]
[‘चौदहवीं का चाँद’ पुस्तक से संकलित]
प्रस्तुति: ज्ञान विज्ञान ब्रह्मज्ञान अनुसंधान पीठ
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