ऋग्वेद मण्डल १, सूक्त ३५ का यह पाँचवाँ मंत्र उस ब्रह्मांडीय गति, अंतरिक्ष के विज्ञान और चेतना के परम आधार को खोलता है, जिसे पिछले मंत्रों में आपने एक सूक्ष्म आणविक प्रयोगशाला और 'तविषीं दधानः' (प्रचंड तपिश और विज्ञान को धारण करने वाली शक्ति) के रूप में देखा था।
यहाँ ऋषि हिरण्यस्तूप आङ्गिरस उस ब्रह्मांडीय रथ को खींचने वाले अद्भुत 'अश्वों' (शक्तियों) और पूरी सृष्टि के अंतिम विश्राम-स्थल (The Ultimate Ground of Existence) का वर्णन कर रहे हैं। आइए, आपकी उसी ओजस्वी, वैज्ञानिक और आंतरिक शब्द-विच्छेद (Internal Decoding) की शैली में इसका विश्लेषण करते हैं।
मंत्र और उसका अन्वय
वि जनाञ्छ्यावाः शितिपादो अख्यन्रथं हिरण्यप्रउगं वहन्तः । शश्वद्विशः सवितुर्दैव्यस्योपस्थे विश्वा भुवनानि तस्थुः ॥५॥
अन्वय: हिरण्यप्रउगं रथं वहन्तः श्यावाः शितिपादः जनान् वि अख्यन्, दैव्यस्य सवितुः उपस्थे शश्वत् विशः विश्वा भुवनानि च तस्थुः।
शब्द-दर-शब्द आध्यात्मिक, वैज्ञानिक और व्यावहारिक व्याख्या
१. वि जनाञ्छ्यावाः शितिपादो अख्यन्
वि (Specially/Diversely): विशेष रूप से, विविध प्रकार से।
जनान् (To all people/Living beings): समस्त मनुष्यों और जीवों को।
श्यावाः (Dark brown/Shyam-colored Steeds): श्याव रंग (गहरे भूरे या काले रंग) के अश्व।
शितिपादः (White-footed/Having luminous bases): 'शिति' यानी श्वेत, 'पाद' यानी पैर। जिनके पैर सफेद या चमकदार हैं।
अख्यन् (Illuminated/Beheld/Revealed): प्रकाशित किया, साक्षात् देखा या प्रकट किया।
वैज्ञानिक व आध्यात्मिक विश्लेषण: यहाँ रथ को खींचने वाले घोड़ों को 'श्यावाः शितिपादः' (काले शरीर वाले लेकिन सफेद पैरों वाले) कहा गया है।
विज्ञान की दृष्टि से (Cosmic Light & Radiation): अंतरिक्ष का रंग काला (श्याव) है, लेकिन उसमें से निकलने वाली प्रकाश की किरणें, तरंगें (Photons) या सूर्य की रश्मियाँ चमकीली (शितिपाद) हैं। उनका 'पाद' (मूल/Base) प्रकाशमान है। ये किरणें पूरे ब्रह्मांड में फैलकर सभी जीवों (जनान्) को देखने की शक्ति देती हैं और उन्हें प्रकाशित (वि अख्यन्) करती हैं।
साधना की दृष्टि से: हमारे भीतर की सुप्त शक्तियाँ जब तक अज्ञान में हैं, वे अंधकारमय (श्यावाः) लगती हैं, लेकिन जैसे ही वे जागृत होकर कर्म में बदलती हैं, उनका आधार पवित्र और प्रकाशमान (शितिपाद) हो जाता है। वे साधक के अंतःकरण के हर कोने को 'वि अख्यन्' (विशेष रूप से आलोकित) कर देती हैं।
२. रथं हिरण्यप्रउगं वहन्तः-
रथम् (The Cosmic Vehicle/Body): उस ब्रह्मांडीय रथ या शरीर रूपी वाहन को।
हिरण्य-प्रउगम् (Having a golden shaft/Forepart): 'प्रउग' रथ के आगे के उस हिस्से या त्रिकोणीय ढांचे (Yoke/Pole) को कहते हैं जो घोड़ों को रथ की मुख्य धुरी से जोड़ता है। हिरण्यप्रउग का अर्थ हुआ जिसका अग्रभाग या मुख्य संचालक हिस्सा पूरी तरह स्वर्णिम (विशुद्ध ज्ञान से युक्त) है।
वहन्तः (Carrying/Sustaining): आगे खींचते हुए, वहन करते हुए।
व्यावहारिक विश्लेषण: चेतना के इस रथ का जो 'प्रउग' (Front/Leading Edge) है, वह 'हिरण्य' है। इसका अर्थ है कि जाग्रत पुरुष की बुद्धि का जो अग्रभाग (मस्तिष्क/विवेक) है, वह हमेशा परमात्मा के ज्ञान से जुड़ा रहता है। ये जाग्रत प्राण-शक्तियाँ (अश्व) इसी ज्ञान के ढांचे को थामकर रथ को आगे बढ़ाती हैं (वहन्तः)।
३. शश्वद्विशः सवितुर्दैव्यस्योपस्थे
शश्वत् (Perpetually/Eternally): अनादि काल से, निरंतर, सदा-सदा से।
विशः (The communities/Subjects/All creatures): समस्त प्रजाएँ, संसार के समस्त उत्पन्न हुए जीव।
सवितुः (Of the Stimulator/The Creator): उस सविता देव के।
दैव्यस्य (Divine/Splendid): दिव्य, अलौकिक।
उपस्थे (In the lap/In the presence/On the lap of): गोद में, सानिध्य में, या उसके परम आधार पर।
वैज्ञानिक व आध्यात्मिक विश्लेषण: यह पंक्ति पूरे अस्तित्व के रहस्य को उजागर करती है। 'दैव्यस्य सवितुः उपस्थे' का अर्थ है उस दिव्य सविता (परमात्मा) की गोद में। जैसे एक बच्चा अपनी माँ की गोद में सुरक्षित बैठता है, वैसे ही यह पूरी सृष्टि, इसके अरबों जीव (विशः) अनादि काल से (शश्वत्) उसी एक परमेश्वर की ऊर्जा की गोद में (In the cosmic field) अवस्थित हैं। विज्ञान कहता है कि ब्रह्मांड का हर कण 'कॉस्मिक फील्ड' (जैसे हिग्स फील्ड या ग्रेविटेशनल फील्ड) के भीतर ही अस्तित्व में रह सकता है; वह फील्ड ही उसकी गोद है।
४. विश्वा भुवनानि तस्थुः-
विश्वा (All): संपूर्ण, समस्त।
भुवनानि (Worlds/Dimensions of existence): चौदह भुवन, गैलेक्सीज़, या चेतना के सभी आयाम।
तस्थुः (Are situated/Firmly established): टिके हुए हैं, थमे हुए हैं, स्थित हैं।
अंतिम निष्कर्ष: चाहे वे दृश्य पिंड हों या अदृश्य लोक, सूक्ष्म परमाणु हों या विशाल आकाशगंगाएँ (विश्वा भुवनानि), वे सब के सब उसी सविता देव के दिव्य विधान और बल के आधार पर 'तस्थुः' (अचल भाव से टिके) हैं। उस महा-आधार के बिना कुछ भी अस्तित्व में नहीं रह सकता।
आपकी पिछली कड़ियों के अनुसार इस मंत्र का मर्म
पिछले मंत्र में आपने देखा कि कैसे वह जाग्रत गुरु अपनी 'तविषीं दधानः' (विशेष वैज्ञानिक तपिश) से संसार को नियंत्रित करता है। ऋषि यहाँ उसका अगला विस्तार कर रहे हैं:-
इस ब्रह्मांडीय व्यवस्था को चलाने वाले जो बल हैं, वे 'श्यावाः शितिपादः' हैं—यानी वे बाहर से असीम अंतरिक्ष की तरह शांत और गहरे हैं, लेकिन उनके पैर (मूल आधार) प्रकाश की तीव्र गति से गतिमान हैं। ये बल जिस रथ को खींच रहे हैं, उसका अग्रभाग (हिरण्यप्रउगं) विशुद्ध ज्ञान की धुरी है। और अंत में ऋषि साधक को परम विश्राम का आश्वासन देते हैं कि डरो मत, इस संसार के समस्त जीव (विशः) और ब्रह्मांड के सारे आयाम (विश्वा भुवनानि) अनादि काल से उसी एक परमपिता सविता की दिव्य गोद (दैव्यस्य उपस्थे) में सुरक्षित स्थित हैं।
यह मंत्र साधक को अपनी लघुता से निकालकर उस विराट 'कॉस्मिक लैप' (ब्रह्मांडीय गोद) का अहसास कराता है, जहाँ पहुँचकर सारे भय विलीन हो जाते हैं।