श्लोक 1
वैशंपायन उवाच। 1-126-1x अथ पारसवीं कन्यां देवकस्य महीपतेः। रूपयौवनसंपन्नां स सुश्रावापगासुतः।। 1-126-1a / 1-126-1b
- हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—तदनंतर अपगासुत (भीष्म जी) ने राजा देवक की पारसवी (दासी की) कन्या का वरण किया, जो रूप और यौवन से संपन्न थी।
- व्याख्या: भीष्म जी ने विदुर जी के विवाह के लिए देवक राजा की सुंदर कन्या को चुना और उसका वरण किया।
श्लोक 2
ततस्तु वरयित्वा तामानीय भरतर्षभः। विवाहं कारयामास विदुरस्य महामतेः।। 1-126-2a / 1-126-2b
- हिंदी अनुवाद: हे भरतर्षभ! तदनंतर उसे वरकर ले आए और महामति विदुर का विवाह संपन्न कराया।
- व्याख्या: भीष्म जी ने विधिपूर्वक उस कन्या को लाकर विदुर जी के साथ उनका विवाह कराया।
श्लोक 3
तस्यां चोत्पादयामास विदुरः कुरुनन्दन। पुत्रान्विनयसंपन्नानात्मनः सदृशान्गुणैः।। 1-126-3a / 1-126-3b
- हिंदी अनुवाद: हे कुरुनन्दन! विदुर जी ने उस पत्नी से अपने ही समान गुणों वाले और विनयसंपन्न पुत्र उत्पन्न किए।
- व्याख्या: विदुर जी की पत्नी से जो संतानें हुईं, वे विदुर जी की तरह ही गुणी और विनीत थीं।
श्लोक 4
ततः पुत्रशतं जज्ञे गान्धार्या जनमेजय। धृतराष्ट्रस्य वैश्यायामेकश्चापि शतात्परः।। 1-126-4a / 1-126-4b
- हिंदी अनुवाद: हे जनमेजय! तदनंतर गांधारी के गर्भ से धृतराष्ट्र के सौ पुत्र हुए और एक पुत्र वैश्य स्त्री से भी हुआ, जो उन सौ से अधिक (अर्थात एक सौ एक) था।
- व्याख्या: धृतराष्ट्र के कुल सौ पुत्र गांधारी से और एक पुत्र (युयुत्सु) वैश्य स्त्री से उत्पन्न हुआ।
श्लोक 5
पाण्डोः कृन्त्यां च माद्र्यां च पुत्राः पञ्च महारथाः। देवेभ्यः समपद्यन्त सन्तानाय कुलस्य वै।। 1-126-5a / 1-126-5b
- हिंदी अनुवाद: उधर कुल के विस्तार के लिए कुंती और माद्री के गर्भ से देवताओं के द्वारा पांडु के पाँच महारथी पुत्र उत्पन्न हुए।
- व्याख्या: कौरव वंश की वृद्धि के लिए पाण्डवों (पांडु के पाँचों पुत्रों) का जन्म देवताओं के अंश से कुंती और माद्री के द्वारा हुआ।
श्लोक 6
जनमेजय उवाच। 1-126-6x कथं पुत्रशतं जज्ञे गान्धार्यां द्विजसत्तम। कियता चैव कालेन तेषामायुश्च किं परम्।। 1-126-6a / 1-126-6b
- हिंदी अनुवाद: जनमेजय ने पूछा—हे द्विजसत्तम! गांधारी के सौ पुत्र कैसे उत्पन्न हुए? कितने समय में हुए और उनकी अधिकतम आयु क्या थी?
- व्याख्या: राजा जनमेजय ने व्यास जी/वैशंपायन जी से गांधारी के सौ पुत्रों के जन्म का काल और उनकी आयु के बारे में विस्तार से जानने की इच्छा व्यक्त की।
श्लोक 7
कथं चैकः स वैश्यायां धृतराष्ट्रसुतोऽभवत्। कथं च सदृशीं भार्यां गान्धारीं धर्मचारिणीम्।। 1-126-7a / 1-126-7b
- हिंदी अनुवाद: वैश्य स्त्री से धृतराष्ट्र का वह एक पुत्र कैसे हुआ? और अपने जैसी ही धर्मचारिणी तथा अनुकूल रहने वाली पत्नी गांधारी की उपेक्षा धृतराष्ट्र ने किस प्रकार की?
- व्याख्या: जनमेजय ने वैश्यपुत्र के जन्म और धृतराष्ट्र के व्यवहार से जुड़े प्रश्न पूछे।
श्लोक 8
आनुकूल्ये वर्तमानां धृतराष्ट्रोऽत्यवर्तत। कथं च शप्तस्य सतः पाण्डोस्तेन महात्मना।। 1-126-8a / 1-126-8b
- हिंदी अनुवाद: (तथा) किस प्रकार उस महात्मा शापित पांडु के द्वारा...
- व्याख्या: धृतराष्ट्र के आचरण और शापित पांडु से जुड़ी कथा को आगे स्पष्ट करने का प्रश्न है।
श्लोक 9
समुत्पन्ना दैवतेभ्यः पुत्राः पञ्च महारथाः। एतद्विद्वन्यथान्यायं विस्तरेण तपोधन।। 1-126-9a / 1-126-9b
- हिंदी अनुवाद: ...देवताओं से पाँच महारथी पुत्र उत्पन्न हुए? हे विद्वन्! हे तपोधन! इन सब बातों को न्यायसंगत तरीके से विस्तार से कहिए।
- व्याख्या: पाण्डवों के दैवीय जन्म का पूरा रहस्य विस्तार से बताने का अनुरोध किया गया है।
श्लोक 10
कथयस्व न मे तृप्तिः कथ्यमानेषु बन्धुषु। वैशंपायन उवाच। 1-126-10x ऋषिं बुभुक्षितं श्रान्तं द्वैपायनमुपस्थितम्।। 1-126-10a / 1-126-10b
- हिंदी अनुवाद: (जनमेजय ने कहा—) आप इन कथाओं को कहिए, हमारे बान्धवों के प्रसंग सुनते-सुनते मेरी तृप्ति नहीं हो रही है। वैशंपायन जी कहते हैं—भूखे और थके हुए उपस्थित ऋषि वेद व्यास जी की...
- व्याख्या: जनमेजय की जिज्ञासा शांत नहीं हो रही थी, इसलिए वैशंपायन जी आगे की कथा का आरंभ करते हैं।
श्लोक 11
तोषयामास गान्धारी व्यासस्तस्यै वरं ददौ। सा वव्रे सदृशं भर्तुः पुत्राणां शतमात्मनः।। 1-126-11a / 1-126-11b
- हिंदी अनुवाद: ...गांधारी ने सेवा करके संतुष्ट किया, जिससे प्रसन्न होकर व्यास जी ने उसे वरदान दिया। गांधारी ने पति के समान सौ पुत्रों का वर माँगा।
- व्याख्या: गांधारी ने व्यास जी की सेवा की, जिसके फलस्वरुप उन्हें सौ पुत्रों का वर प्राप्त हुआ।
श्लोक 12
ततः कालेन सा गर्भमगृह्णाज्ज्ञानचक्षुषः।। 1-126-12a गान्धार्यामाहिते गर्भे पाण्डुरम्बालिकासुतः। अगच्छत्परमं दुःखमपत्यार्थमरिन्दम।। 1-126-13a / 1-126-13b
- हिंदी अनुवाद: तदनंतर समय आने पर ज्ञानचक्षु व्यास जी के प्रभाव से उसने गर्भ धारण किया। हे अरिन्दम! गांधारी के गर्भ धारण करने पर अंबालिका पुत्र पांडु अपनी संतान न होने के कारण परम दुःख को प्राप्त हुए।
- व्याख्या: गांधारी के गर्भधारण की खबर सुनकर संतानहीन पांडु का मन अत्यधिक व्यथित हो उठा।
श्लोक 14
गर्भिण्यामथ गान्धार्यां पाण्डुः परमदुःखितः। मृगाभिशापादात्मानं शोचन्नुपरतक्रियः।। 1-126-14a / 1-126-14b
- हिंदी अनुवाद: गांधारी के गर्भवती होने पर मृग के शाप के कारण स्वयं को कोसते हुए और कर्महीन (सन्तानोत्पत्ति से वंचित) हुए पांडु बहुत दुखी हुए।
- व्याख्या: अपने शाप के कारण पांडु स्वयं को लाचार और अभाग्य मानकर भीतर ही भीतर जल रहे थे।
श्लोक 15
स गत्वा तपसा सिद्धिं विश्वामित्रो यथा भुवि। देहान्यासे कृतमना इदं वचनमब्रवीत्।। 1-126-15a / 1-126-15b
- हिंदी अनुवाद: जिस प्रकार विश्वामित्र ने पृथ्वी पर तपस्या से सिद्धि प्राप्त की थी, उसी प्रकार शरीर का त्याग करने का मन बनाकर पांडु ने यह वचन कहा—
- व्याख्या: पांडु ने अपने जीवन और तपस्या के उद्देश्य पर विचार करते हुए अपने मन की बात प्रकट की।
श्लोक 16
पाण्डुरुवाच। 1-126-16x चतुर्भिर्ऋणवानित्थं जायते मनुजो भुवि। पितृदेवमनुष्याणामृषीणामथ भामिनि।। 1-126-16a / 1-126-16b
- हिंदी अनुवाद: पांडु ने (कुंती से) कहा—हे भामिनि! मनुष्य इस पृथ्वी पर चार ऋणों के साथ जन्म लेता है—पितृऋण, देवऋण, मनुष्यऋण और ऋषिऋण।
- व्याख्या: पांडु ने मानव जीवन के चार मूल ऋणों का उल्लेख किया जो हर मनुष्य पर होते हैं।
श्लोक 17
एतेभ्यस्तु यथाकालं यो न मुच्येत धर्मवित्। न तस्य लोकाः सन्तीति तता लोकविदो विदुः।। 1-126-17a / 1-126-17b
- हिंदी अनुवाद: धर्म को जानने वाला जो मनुष्य समय पर इन ऋणों से मुक्त नहीं होता, लोक को जानने वाले विद्वान कहते हैं कि उसके लिए कोई लोक (सद्गति) नहीं है।
- व्याख्या: ऋणों से मुक्ति न पाने वाले व्यक्ति की परलोक में गति नहीं होती, यह शास्त्रों का मत है।
श्लोक 18
यज्ञेन देवान्प्रीणाति स्वाध्यायात्तपसा ऋषीन्। पुत्रैः श्राद्धैरपि पितॄनानृशंस्येन मानवान्।। 1-126-18a / 1-126-18b
- हिंदी अनुवाद: मनुष्य यज्ञ से देवताओं को, स्वाध्याय और तप से ऋषियों को, पुत्रों तथा श्राद्धों से पितरों को और दया (अनृशंस्य) से मनुष्यों को प्रसन्न करता है।
- व्याख्या: इन चार कर्मों के माध्यम से व्यक्ति अपने चारों ऋणों को चुकाता है।
श्लोक 19
ऋषिदेवमनुष्याणामृणान्मुक्तोऽस्मि धर्मतः। पितॄणां तु न मुक्तोऽस्मि तच्च तेभ्यो विशिष्यते।। 1-126-19a / 1-126-19b
- हिंदी अनुवाद: मैं धर्मतः ऋषि, देव और मनुष्य ऋणों से तो मुक्त हूँ, किंतु पितृऋण से मुक्त नहीं हूँ और वह पितृऋण उन सबसे बढ़कर (महत्वपूर्ण) है।
- व्याख्या: पांडु बताते हैं कि उन्होंने तपस्या आदि से तीन ऋण तो उतार लिए हैं, लेकिन संतान न होने के कारण पितृऋण बाकी है।
श्लोक 20
देहनाशे भवेन्नाशः पितॄणामेष निश्चयः। इतरेषां त्रयाणां तु नाशे ह्यात्मा विनश्यति।। 1-126-20a / 1-126-20b
- हिंदी अनुवाद: शरीर के नष्ट होने पर पितरों का (वंश) नाश हो जाता है, यह निश्चित है। अन्य तीन ऋणों के न चुकाने पर तो आत्मा ही नष्ट (पतित) होती है।
- व्याख्या: पितृवंश की निरंतरता और ऋणमुक्ति का महत्व यहाँ समझाया गया है।
श्लोक 21
इह तस्मात्प्रजालाभे प्रयतन्ते द्विजोत्तमाः। यथैवाहं पितुः क्षेत्रे सृष्टस्तेन महात्मना।। 1-126-21a / 1-126-21b
- हिंदी अनुवाद: इसीलिए इस संसार में द्विजोत्तम लोग प्रजा (संतान) की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करते हैं। जिस प्रकार महात्मन विचित्रवीर्य के क्षेत्र (पत्नी) में मुझसे उत्पन्न किया गया था...
- व्याख्या: पांडु अपने जन्म का उदाहरण देते हैं कि वे भी नियोग प्रथा के माध्यम से उत्पन्न हुए थे।
श्लोक 22
तथैवास्मिन्मम क्षेत्रे कथं सृज्येत वै प्रजा। वैशंपायन उवाच। 1-126-22x स समानीय कुन्तीं च माद्रीं च भरतर्षभः।। 1-126-22a / 1-126-22b
- हिंदी अनुवाद: ...उसी प्रकार मेरी इस क्षेत्र (पत्नी) में भी प्रजा कैसे उत्पन्न हो सकती है? वैशंपायन जी कहते हैं—भरतर्षभ पांडु ने कुंती और माद्री को पास बुलाया...
- व्याख्या: पांडु अपनी पत्नियों के समक्ष अपनी इस समस्या का समाधान प्रस्तुत करते हैं।
श्लोक 23
आचष्ट पुत्रलाभस्य व्युष्टिं सर्वक्रियाधिकाम्। उत्तामादवराः पुंसः काङ्क्षन्तो पुत्रमापदि।। 1-126-23a / 1-126-23b
- हिंदी अनुवाद: ...और पुत्र प्राप्ति के सभी कर्मों से बढ़कर उत्तम उपायों की चर्चा की। आपत्ति काल में नीच (अथवा अवर) पुरुष से भी उत्तम पुरुष की कामना की जाती है।
- व्याख्या: संकट के समय श्रेष्ठ संतान प्राप्ति के लिए धर्मसंगत मार्ग अपनाने की बात कही गई है।
श्लोक 24
अपत्यं धर्मफलदं श्रेष्ठादिच्छन्ति साधवः। अनुनीय तु ते सम्यङ्महाब्राह्मणसंसदि। ब्राह्मणं गुणवन्तं हि चिन्तयामास धर्मवित्।। 1-126-24a / 1-126-24c
- हिंदी अनुवाद: साधु पुरुष श्रेष्ठ से धर्मफल देने वाले अपत्य (संतान) की इच्छा रखते हैं। धर्म को जानने वाले पांडु ने कुंती और माद्री को भली-भांति समझा-बुझाकर एक गुणवान ब्राह्मण (देवता) के संबंध में विचार किया।
- व्याख्या: पांडु ने अपनी पत्नियों को राजी कर श्रेष्ठ संतान प्राप्ति की रूपरेखा बनाई।
श्लोक 25
सोऽब्रवीद्विजने कुन्तीं धर्मपत्नीं यशस्विनीम्। अपत्योत्पादने यत्नमापदि त्वं समर्थय।। 1-126-25a / 1-126-25b
- हिंदी अनुवाद: उन्होंने एकांत में अपनी यशस्विनी धर्मपत्नी कुंती से कहा—"हे कुंती! आपत्ति काल में संतान उत्पन्न करने के इस यत्न में तुम मेरी सहायता करो।"
- व्याख्या: पांडु ने कुंती से अनुरोध किया कि वे धर्मसंकट के इस समय में उनकी सहायता करें।
श्लोक 26
अपत्यं नाम लोकेषु प्रतिष्ठा धर्मसंहिता। इति कुन्ति विदुर्धीराः शाश्वतं धर्मवादिनः।। 1-26-26a / 1-126-26b
- हिंदी अनुवाद: "हे कुंती! संसार में संतान ही धर्मयुक्त प्रतिष्ठा है। धर्मवादी धीर पुरुष इसे शाश्वत सत्य मानते हैं।"
- व्याख्या: समाज और धर्म में संतान के महत्व को पांडु ने कुंती को समझाया।
श्लोक 27
इष्टं दत्तं तपस्तप्तं नियमश्च स्वनुष्ठितः। सर्वमेवानपत्यस्य न पावनमिहोच्यते।। 1-126-27a / 1-126-27b
- हिंदी अनुवाद: "यज्ञ करना, दान देना, तपस्या करना और नियमों का अच्छी तरह पालन करना—संतानहीन व्यक्ति के लिए ये सभी कर्म पवित्र करने वाले नहीं कहे जाते हैं।"
- व्याख्या: बिना संतान के किए गए बड़े-बड़े सत्कर्म भी पूर्ण फलदायी नहीं माने जाते।
श्लोक 28
सोऽहं विदित्वैतत्प्रपश्यामि शुचिस्मिते। अनपत्यः शुभाँल्लोकान्नप्राप्स्यामीति चिन्तयन्।। 1-126-28a / 1-126-28b
- हिंदी अनुवाद: "हे शुचिस्मिते (सुंदर मुसकान वाली)! यह सब जानकर मैं यह देख रहा हूँ कि संतानहीन होने के कारण मैं शुभ लोकों को नहीं प्राप्त कर सकूँगा, इसी चिंता में डूबा हूँ।"
- व्याख्या: पांडु अपनी परलोक गति को लेकर अत्यधिक चिंतित थे।
श्लोक 29
`अनपत्यो हि मरणं कामये नैव जीवितम्।' मृगाभिशापं जानासि विजने मम केवलम्। नृशंसकर्मणा कृत्स्नं यथा ह्युपहतं तथा।। 1-126-29a / 1-126-29c
- हिंदी अनुवाद: "संतानहीन होने के कारण मैं जीवन की नहीं, मरण की कामना करता हूँ। तुम अकेले में मेरे उस मृगाभिशाप को जानती हो, जिसके क्रूर कर्म से मेरी संपूर्ण संतानोत्पत्ति की शक्ति नष्ट हो चुकी है।"
- व्याख्या: पांडु ऋषि किंदम के शाप के कारण अपनी शारीरिक विवशता का स्मरण कराते हैं।
श्लोक 30
इमे वै बन्धुदायादाः षट् पुत्रा धर्मदर्शने। षडेवाबन्धुदायादाः पुत्रास्ताञ्छृणु मे पृथे।। 1-126-30a / 1-126-30b
- हिंदी अनुवाद: "हे पृथे! धर्मशास्त्रों में छह प्रकार के बन्धु-दायाद (संबंधी उत्तराधिकारी) पुत्र और छह प्रकार के अबन्धु-दायाद पुत्र बताए गए हैं, उन्हें मुझसे सुनो।"
- व्याख्या: पांडु शास्त्रसम्मत पुत्रों के प्रकारों का वर्णन करने जा रहे हैं।
श्लोक 31
स्वयंजातः प्रणीतश्च परिक्रीतश्च यः सुतः। पौनर्भवश्च कानीनः स्वैरिण्यां यश्च जायते।। 1-126-31a / 1-126-31b
- हिंदी अनुवाद: स्वयंजात, प्रणीत, परिक्रीत, पौनर्भव, कानीन और स्वैरिणी के गर्भ से उत्पन्न पुत्र—ये छह बन्धु-दायाद पुत्र हैं।
- व्याख्या: प्राचीन धर्मशास्त्रों में वर्णित विभिन्न प्रकार के पुत्रों की प्रथम श्रेणी बताई गई है।
श्लोक 32
दत्तः क्रीतः कृत्रिमश्च उपगच्छेत्स्वयं च यः। सहोढो ज्ञातिरेताश्च हीनयोनिधृतश्च यः।। 1-126-32a / 1-126-32b
- हिंदी अनुवाद: दत्त, क्रीत, कृत्रिम, स्वयमुपगत, सहोढ, ज्ञातिरेता और हीनयोनिधृत—ये दूसरे प्रकार के पुत्र हैं।
- व्याख्या: शास्त्रों में उल्लिखित कुल बारह प्रकार के पुत्रों की सूची यहाँ पूरी होती है।
श्लोक 33
पूर्वपूर्वतमभावं मत्त्वा लिप्सेत वै सुतम्। उत्तामाद्देवरात्पुंसः काङ्क्षन्ते पुत्रमापदि।। 1-126-33a / 1-126-33b
- हिंदी अनुवाद: इनमें पहले-पहले को श्रेष्ठ मानकर पुत्र की इच्छा करनी चाहिए। आपत्ति काल में उत्तम देवर आदि पुरुषों से संतान की कामना की जाती है।
- व्याख्या: पांडु समझाते हैं कि संकट के समय श्रेष्ठ माध्यम से धर्मानुसार संतान प्राप्त करना उचित है।
श्लोक 34
अपत्यं धर्मफलदं श्रेष्ठं विन्दन्ति मानवाः। आत्मशुक्रादपि पृथे मनुः स्वायंभुवोऽब्रवीत्।। 1-126-34a / 1-126-34b
- हिंदी अनुवाद: "हे पृथे! स्वायंभुव मनु ने कहा है कि मनुष्य अपने वीर्य के बिना भी धर्मफल देने वाली श्रेष्ठ संतान प्राप्त कर सकता है।"
- व्याख्या: मनुस्मृति के वचनों का हवाला देकर पांडु कुंती को इसके धर्मसम्मत होने का विश्वास दिलाते हैं।
श्लोक 35
तस्मात्प्रहेष्याम्यद्य त्वां हीनः प्रजननात्स्वयम्।। 1-126-35a
- हिंदी अनुवाद: "इसलिए, चूंकि मैं स्वयं प्रजनन् (संतानोत्पत्ति) से हीन हूँ, अतः आज मैं तुम्हें भेज रहा हूँ (प्रेरित करता हूँ)।"
- व्याख्या: पांडु अपनी असमर्थता के कारण कुंती को इस पवित्र कार्य के लिए आगे बढ़ने को कहते हैं।
श्लोक 36
सदृशाच्छ्रेयसो वा त्वं विद्ध्यपत्यं यशस्विनि। शृणु कुन्ति कथामेतां शारदण्डायिनीं प्रति।। 1-126-36a / 1-126-36b
- हिंदी अनुवाद: "हे यशस्विनि! तुम अपने समान या श्रेष्ठ पुरुष से संतान प्राप्त करो। हे कुन्ति! शारदाण्डायन (कैकेय राज) के संबंध में इस कथा को सुनो।"
- व्याख्या: पांडु इतिहास का एक प्रसिद्ध दृष्टांत कुंती को सुनाने जा रहे हैं।
श्लोक 37
`या हि ते भगिनी साध्वी श्रुतसेना यशस्विनी। अवाह तां तु कैकेयः शारदाण्डायनिर्महान्।' 1-126-37a / 1-126-37b
- हिंदी अनुवाद: "तुम्हारी जो साध्वी और यशस्विनी बहन श्रुतसेना है, उसे महान कैकेय शारदाण्डायन ब्याह कर ले गए थे।"
- व्याख्या: पांडु अपनी बात के समर्थन में कुंती की बहन का उदाहरण देते हैं।
श्लोक 38
सा वीरपत्नी गुरुणा नियुक्ता पुत्रजन्मनि। पुष्पेण प्रयता स्नाता निशि कुन्ति चतुष्पथे।। 1-126-38a / 1-126-38b
- हिंदी अनुवाद: "वह वीरपत्नी गुरु (पति) की आज्ञा से पुत्र जन्म के लिए पुष्य नक्षत्र में शुद्ध होकर स्नान करके रात्रि के समय चतुष्पथ (चौराहे) पर गई थी।"
- व्याख्या: प्राचीन परंपरा और नियोग के पवित्र अनुष्ठान का यहाँ वर्णन है।
श्लोक 39
वरयित्वा द्विजं सिद्धं हुत्वा पुंसवनेऽनलम्। कर्मण्यवसिते तस्मिन्सा तेनैव सहावसत्।। 1-126-39a / 1-126-39b
- हिंदी अनुवाद: "वहाँ सिद्ध द्विज का वरण करके और अग्नि में पुंसवन होम करके, उस कर्म के पूर्ण होने पर वह उन्हीं के साथ रही थी।"
- व्याख्या: विधि-विधान पूर्वक संपन्न हुए इस कृत्य से संतान प्राप्ति का प्रसंग बताया गया है।
श्लोक 40
तत्र त्रीञ्जनयामास दुर्जयादीन्महारथान्। तथैवापि कल्याणि ब्राह्मणात्तपसाधिकात्। मन्नियोगाद्यत क्षिप्रमपत्योत्पादनं प्रति।। 1-126-40a / 1-126-40c
- हिंदी अनुवाद: "उसने वहाँ दुर्जय आदि तीन महारथी पुत्र उत्पन्न किए थे। हे कल्याणि! उसी प्रकार तुम भी तपस्या में श्रेष्ठ ब्राह्मण (देवता) से मेरे नियोग द्वारा शीघ्र ही संतान उत्पन्न करने का यत्न करो।"
- व्याख्या: पांडु अपनी पत्नी कुंती को देवताओं के माध्यम से धर्मपूर्वक संतान उत्पन्न करने के लिए अंतिम रूप से प्रेरित करते हैं।
