तदा सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवलिप्तं मम मनः।
यदा किंचित्किञ्चिद्बुधजनसकाशादवगतं
तदा मूर्खोऽस्मीति ज्वर इव मदो मे व्यपगतः।। ३१ ।।
हम जानते थे, इल्म से कुछ जानेंगे ।
अतिक्रान्तः कालो लटभललनाभोगसुभगो
भ्रमन्तः श्रान्ताः स्मः सुचिरमिह संसारसरणौ।।
इदानीं स्वः सिन्धोस्तटभुवि समाक्रन्दनगिरः
सुतारैः फुत्कारैः शिवशिवशिवेति प्रतनुमः।। ३२ ।।
दोहा:-
माने म्लायिनि खण्डिते च वसुनि व्यर्थे प्रयातेऽर्थिनि
क्षीणे बन्धुजने गते परिजने नष्टे शनैर्यौवने ।
युक्तं केवलमेतदेव सुधियां यज्जह्नुकन्यापयः-
पूतग्रावगिरीन्द्रकन्दरतटीकुञ्जे निवासः क्वचित् ।। ३३ ।।
दोहा:-
प्रसादं किं नेतुं विशसि हृदयक्लेशकलितम् ।
प्रसन्ने त्वय्यन्तः स्वयमुदितचिन्तामणि गुणे
विमुक्तः संकल्पः किमभिलषितं पुष्यति न ते ।। ३४ ।।
मौने दैन्यभयं बले रिपुभयं रूपे जराया: भयम् ।
शास्त्रे वादिभयं गुणे खलभयं काये कृतान्ताद्भयं
सर्वं वस्तु भयान्वितं भुवि नृणां वैराग्यमेवाभयम्।। ३५ ।।
विषयों के भोगने में रोगों का डर है, कुल में दोष होने का डर है, धन में राज का भय है, चुप रहने में दीनता का भय है, बल में शत्रुओं का भय है, सौंदर्य में बुढ़ापे का भय है, शास्त्रों में विपक्षियों के वाद का भय है, गुणों में दुष्टों का भय है, शरीर में मौत का भय है; संसार की सभी चीज़ों में मनुष्यों को भय है। केवल "वैराग्य" में किसी प्रकार का भय नहीं है ।
बे दरो-दीवार सा, इक घर बनाना चाहिए।
पड़िये गर बीमार तो कोई न हो तीमारदार।
और अगर मर जाइये, तो नोहाखां कोई न हो।।
पासबाँ = साथ रहनेवाला
नोहाखां = शोक करने वाला, रोने वाला
महात्मा सुन्दरदास ने भी कहा है-
सर्प डसै, सु नहिं कछु तालक;
बीछु लगै, सु भलो करि मानौ।
सिंह हु खाय, तु नाहिं कछु डर ;
जो गज मारत, तौ नहिं हानौ।
आगि जरौ, जल बूढ़ि मरौ, गिरि
जाइ गिरौ; कछु भै मत मानो।
"सुन्दर" और भले सब ही यह;
दुर्जन संग भले जिन जानौ।।
संसार से दिल लगाना अच्छा नहीं; पर क्या करें, बिना दिल लगाए चलता भी तो नहीं ।
कृते किं नास्माभिर्विगलितविवेकैर्व्यवसितम्।
यदाढ्यानामग्रे द्रविणमदनिःसंज्ञमनसां
कृतं वीतव्रीडैर्निजगुणकथापातकमपि।। ३६ ।।
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ऐसे जियरा जाएगा, दिन दश ढीली लाय।।
तद्वज्जीवनमतिशय चपलम् ।।
कुण्डलिया
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तत्पाश्र्वे तस्य च साऽपि राजपरिषत्ताश्चन्द्रबिम्बाननाः।
उद्रिक्तः स च राजपुत्रनिवहस्ते बन्दिनस्ताः कथाः
सर्वं यस्य वशादगात्स्मृतिपदं कालाय तस्मै नमः।। ३७ ।।
जो पद्मिनी पहले परदे में रहती थी, उसी का आज, काल के आने से मैदान में डेरा हो गया है; यानी सबके सामने मरघट में पड़ी है ।
निश्चय ही संसार अनित्य और नाशमान है । इस जगत की कोई भी चीज़ सदा न रहेगी । एक दिन अपनी अपनी बारी आने से सभी का नाश होगा ।
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समं यैः संवृद्धाः स्मृतिविषयतां तेऽपि गमिताः।
इदानीमेते स्मः प्रतिदिवसमासन्नपतना-
ग्दतास्तुल्यावस्थां सिकतिलनदीतीरतरुभिः।। ३८ ।।
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यत्रानेके क्वचिदपि गृहे तत्र तिष्ठत्यथैको
यत्राप्येकस्तदनु बहवस्तत्र चान्ते न चैकः।।
इत्थं चेमौ रजनिदिवसौ दोलयन्द्वाविवाक्षौ
कालः काल्या सह बहुकलः क्रीडति प्राणिशारैः।। ३९ ।।
अर्थ:-
जिस घर में पहले अनेक लोग थे, उसमें अब एक ही रह गया है। जिस घर में एक था, उसमें अनेक हो गए, पर अन्त में एक भी न रहा । इससे मालूम होता है कि काल देवता, अपनी पत्नी काली के साथ, संसार रुपी चौपड़ में, दिन-रात रुपी पासों को लुढ़का लुढ़का कर और इस जगत के प्राणियों की गोटी बना बनाकर, खेल रहा है।
जिस घर में पहले पुत्र, पौत्र, पुत्र-वधु, पौत्र-वधु, पुत्री, दोहिते और दोहिती प्रभृति अनेक लोग थे, आज वह सूना सा हो गया है, उसमें आज एक ही आदमी नज़र आता है। जिस घर में पहले एक आदमी था, उसका कुटुम्ब इतना बढ़ा कि सैकड़ों हो गए; पर आज देखते हैं कि उसमें एक भी नहीं है । घर का ताला लगा है, भीतर लम्बी लम्बी घास उग आयी है, दीवारे गिर रही हैं, छतें चू रही हैं और ईंटे दांत दिखा रही हैं । अब स घर में चमगीदड, उल्लू, सांप और बिच्छू प्रभृति रहते हैं ।
महात्मा कबीर कहते हैं -
ऊँचा महल चिनाईया, सुबरन कली बुलाय ।
जिन्होंने ऊँचे ऊँचे महल चिनवाए थे और उनमें सुनहरी काम करवाए थे, वे आज शमशान में चले गए हैं और उनके बनवाये हुए महल सूने पड़े हैं । जो मलमल और खासा पहनते थे, नागर-पान चबाते थे, अकड़-अकड़ कर टेढ़े-टेढ़े चलते थे, अभिमान के नशे में चूर हुए जाते थे और बदन में इत्र, फुलेल और सेन्ट(scent )प्रभृति लगाकर महलों में सोते थे, वे स्वप्न में भी नहीं दीखते । देखते-देखते न जाने कहाँ गायब हो गए ।
छप्पय
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बहुत रहत जिहिं धाम, तहँ एकहि को राखत।
तपस्यन्तः सन्तः किमधिनिवसामः सुरनदीं
गुणोदारान्दारानुत परिचयामः सविनयम्।
पिबामः शास्त्रौघानुतविविधकाव्यामृतरसा
न्न विद्मः किं कुर्मः कतिपयनिमेषायुषि जने।। ४० ।।
अर्थ:-
हमारी समझ में नहीं आता, कि हम इस अल्प जीवन - इस छोटी सी ज़िन्दगी में क्या क्या करें अर्थात हम गंगा तट पर बस कर तप करें अथवा गुणवती स्त्रियों की प्रेम-सहित यथायोग्य सेवा करें अथवा वेदान्त शास्त्र का अमृत पिएं या काव्यरस-पान करें ।
कहने वाला कहता है और ठीक कहता है - यह जीवन क्षण भर का है । इस चन्दरोजा ज़िन्दगी में हम क्या क्या करें ? काम तो अनेक हैं, पर समय थोड़ा है । गंगा तट पर जाकर शिव-शिव की रट लगाना भी अच्छा है; गुणवती सुंदरियों के साथ मीठी-मीठी बातें बनाना, उनके संग रहना और उनके साथ रमण करना भी भला है । वेदान्त शास्त्र के मर्म को समझना और उसका अमृत रस पीना या काव्य-रस पीना भी अच्छा है । अच्छे सब हैं और सभी करने योग्य हैं; पर हमारी समझ में नहीं आता, कि क्षणभर कि ज़िन्दगी में हम क्या-क्या करें ? मतलब यह है, कि मनुष्य जीवन बहुत ही थोड़ा है । इसलिए मनुष्य को जब तक दम रहे, सब तज कर एकमात्र परमात्मा का भजन करना चाहिए । कबीरदास जी कहते हैं -
यह तन कांचा कुम्भ है, मांहि किया रहबास।
"कबिरा" जो दिन आज है, सो दिन नाहिं काल।
चेत सके तो चेतिये, मीच परी है ख्याल।।
जीव परा बहु लूट में, जागूँ तो लेन न देन।।
तुलसीदास जी कहते हैं -
"तुलसी" जग में आईके, कर लीजे दो काम।
देवेको टुकड़ा भलो, लेवेको हरिनाम।।
जैसे घटत न अंक नौ, नौ के लिखत पहार।।
यह शरीर मिटटी के कच्चे घड़े जैसा है। इसी के अंदर जीवात्मा रहता है । कबीरदास जी कहते हैं, आखों से देखा है, एक क्षण की भी आशा नहीं । खुलासा यह, कि जिस शरीर में जीवात्मा रहता है, वह कच्चे घड़े के समान क्षण-भंगुर है । जिस तरह कच्चे घड़े को फूटते देर नहीं; उसी तरह इस कच्चे घड़े जैसे शरीर को नाश होते देर नहीं । कौन जाने किस क्षण यह शरीर रुपी कच्चा घड़ा फुट जाय और इसमें से जीवात्मा निकल जाय ? इसकी आशा उतनी देर की भी नहीं, जितनी देर पलक झपकने में लगती है ।
कबीरदास जी कहते हैं, जो दिन आज है, वह कल न होगा। जीव ! चेत सके तो चेत । मौत सर पर सवार है ।
जो अज्ञानी बरसों का प्रबन्ध करते हैं, बरसों जीने की आशा करते हैं, वे इस वचन से शिक्षा ग्रहण करें । कबीरदास बरसों छोड़ - दो-चार दिन भी जीवन रहने की आशा नहीं करते । वे कहते हैं, आज हो, कल रहो या न रहो । आज तुम हंस-खेल रहे हो, आज तुम्हारा शरीर आरोग्य है; आश्चर्य नहीं, कल तुम बीमार हो कर मरण-शय्या पड़े हो अथवा मर ही जाओ । इसलिए चेत करो, होश सम्भालो और आगे की सफर का बदोबस्त करो । अगर संसार के जंजाल में फंसे हुए, जीवन की लम्बी आशा रखे हुए, शीघ्र ही, आज ही, अभी, इसी क्षण से अगली यात्रा का प्रबन्ध न करोगे; वहां मिलने के लिए - यहाँ के ईश्वरीय बैंक द्वारा - रूपए-पैसे, धन-दौलत, गाडी-घोड़े, महल-मकान और बाग़-बगीचों का बंदोबस्त न करोगे - इस दुनिया में पराया दुःख दूर न करोगे और मालिक का नाम न जपोगे; तो तुम्हें उस लम्बे सफर में बड़ी-बड़ी तकलीफो का सामना करना पड़ेगा। यहाँ बोओगे, तो वहां काटोगे । यहाँ अच्छा करोगे, तो वहां अच्छा पाओगे। यहाँ गरीब और मुहताजों को दोगे, तो वहां आपको मिलेगा ।
कबीरदास कहते हैं, यह जीवन सुपने के समान है । रात को सुपने में देखा कि जीव लूट में पड़ा है, तरह तरह के ऐश आराम कर रहा है, सुख भोग रहा है; लेकिन ज्योंही आँख खुली तो क्या देखता हूँ, कि कुछ भी नहीं है । जिस तरह सुपने में आदमी दिल को फरहत देने वाले बाग़-बगीचों की सैर करता है, माशूका के गले में हाथ डाले घूमता है, उससे सम्भोग करता है; अथवा राजा होता है, हुकूमत करता है, चन्द्रबदनियों का नाच-गान देखता है और मन ही मन बड़ा खुश होता है; पर ज्योंही आँख खुलती है, तो न बाग़-बगीचे दीखते है और न माशूका और राज-पाट। बस, ठीक यही हाल जाग्रत अवस्था का है । जिस तरह रात के सुपने को मिथ्या समझते हो, उसी तरह दिन के दृश्यों को भी मिथ्या समझो । वह सपना सोई हुई हालत में दीखता है और यह जागते हुए । देखते हैं, आज एक आदमी राजा है, हज़ारों तरह के भोग, भोग रहा है; पर कल ही वह राह का भिखारी बन जाता है । आज किसी के घर में सुन्दर पतिव्रता नारी है, आज्ञाकारी पुत्र-पौत्र, सुशीला पुत्र-वधुएं और कन्याएं हैं, सैकड़ों दास-दासी हैं, द्वार पर हाथी झूमता है, मोटर हर समय दरवाजे पर खड़ी रहती है; चंद रोज़ बार देखते हैं, कि वह आदमी गुदड़ी ओढ़े हुए सड़क पर भीख मांग रहा है । पूछते हैं, क्यों जी, तुम्हारा यह क्या हाल ? तुम्हारे कुटुम्बी और धन-दौलत का क्या हुआ? जवाब देता है - भाई ! प्लेग में सारे घर के लोग मर गए । कोई पानी देने वाला और नाम लेने वाला भी न रहा । धन-दौलत में से कुछ को चोर और शेष को डाकू, डाका डाल कर ले गए । जब खाने का भी ठिकाना न रहा, तब प्राणरक्षार्थ भीख माँगना आरम्भ किया है । कहिये, ऐसे जीवन और सुख भोगों को सुपने की माया न कहें तो क्या कहें ?
अभी कल की ही बात है, हमारी एक आँखों की पुतली के समान प्यारी पुत्री हमें छोड़कर चली गयी । वह ऐसी रूपवती थी, कि हम उसे देखकर कहा करते थे - विधाता ने खूब फुर्सत में गढ़ी है । उसके देखने से हमारी शोक सन्तप्तआत्मा को शांति मिलती थी । घोर शोक में गर्क होने पर भी उसे देखकर हम खिल पड़ते थे । हमारे दिनभर के रंजो-गम काफूर हो जाते थे । उसके दर्शनों से हमारे ह्रदय में सुख होता था, इसी से हम उसे 'दिलाराम' भी कहा करते थे । नाम उसका दिलाराम नहीं 'सूर्यकान्ता' था । जब हम घर में बैठे प्रूफ देखा करते थे, वह भोली सूरत घुटुअन चलकर हमारे पास आ जाती । कभी हमारी दवात उलट देती, कभी कलम उठा लेती और कभी प्रूफ के कागज़ों को मुँह में भर लेती । जब हम आनंद में मग्न हो जाते, कलम पटक कर उसे उठा लेते । उसको चूमते, प्यार करते और ह्रदय को शीतल करते थे । आज तीन दिन से वह नहीं है । कहीं नज़र नहीं आती । ऐसा जान पड़ता है, गोया उसे हमने सुपने में देखा था । सुपने में ही वह हमारे पास आयी थी । सुपने में ही अपने बचपन के खेलों से उसने हमें खुश किया था और सुपने में ही हमने उसे प्यार-दुलार किया था । पाठक ! आप ही विचारिये । क्या यह सब सुपना नहीं था ? क्या अब जो हमारे प्यारे हमारे साथ हैं, हमारे सामने फिरते-डोलते और काम-धंधा करते हैं, उनको भी हम सुपने की माया न समझें ? उस डेढ़ साल की बच्ची की तरह ही, हम भी सबको छोड़कर यमसदन के रही न होंगे ? हमारे पीछे जो रह जाएंगे, उन्हें हम सुपने में मिले हुए के समान न दिखेंगे? यद्यपि हमने अभी तक घर-गृहस्थी नहीं त्यागी है । अभी हम संसारी जंजालों में फंसे हुए हैं; तो भी हम अपने प्यारे से प्यारे के मरनेपर भी आँखों से आंसू नहीं डालते । बहुत लोग हमारे इस हाल को देखकर अचम्भा करते हैं । कोई कुछ और कोई कुछ कहता है । पर हमारे न रोने-कूकने का कारण यह है, कि हमने इस संसार में ऐसे ऐसे बहुत से दुःख देखे हैं । हम कई प्राण प्यारों की वियोगग्नि में जले हैं । इसी से अब हम समझ गए हैं कि यह सब सुपना है । एक न एक दिन हम भी सबको छोड़कर चल देंगे अथवा और सब जो हमारी आँखों के सामने मौजूद है - हमारे देखते देखते, सुपने में देखे हुओं की तरह, गायब हो जाएंगे।
कबीरदास कहते हैं - अरे भाई ! आज अथवा कल अथवा पांच दिन बाद तुम्हारा बसेरा जंगल में होगा । तुम्हारे ऊपर हल चलेंगे अथवा तुम्हारे ऊपर उगी हुई घास को गाय-भैंस आदि पशु चरेंगे । खुलासा यह है, कि तुम कदाचित आज ही मर जाओ; आज बच गए तो कल खैर नहीं । अगर सांस पूरे न हुए होंगे - चित्रगुप्त के खाते में तुम्हारे कुछ सांस बाकी होंगे, तो उनके पूरे होने पर पांच या दस दिन बाद तुम अवश्य मरोगे । तुम इस शरीर में सदा न रहोगे । तुम्हारे देह छोड़ते ही, लोग तुमसे घृणा करेंगे । ख़ास तुम्हारी हृदयेश्वरी ही तुम्हारी सूरत देखकर डरेगी । तुम्हारे बदन पर अगर एक चांदी का छल्ला भी होगा, तो उसे उतार लेगी । लोग तुम्हें लेजाकर जला या गाड़ आवेंगे । जिस जगह तुम जलाये या दफनाए जाओगे - जहाँ तुम्हारे शरीर की ख़ाक पड़ी होगी, उसी जगह किसान हल चलावेंगे । यदि तुम्हारी मिटटी पर घास उग आएगी, तो ढोर चौपे उसे चरेंगे । अतः होशियार हो जाओ ! गफलत की नींद त्यागो और अपनी अवश्यम्भावी यात्रा का प्रबन्ध करो, जिससे राह में तुम्हें किसी वास्तु का अभाव और किसी तरह की तकलीफ न हो ।
इस दुनिया में काम बहुत है और उम्र का यह हाल है, कि पलक मारने भर का भरोसा नहीं । इस क्षण-भर की ज़िन्दगी में कौन सा काम करना चाहिए, जिससे की आगे की यात्रा में सुख ही सुख मिले ? यही सवाल ऊपर उठाया गया है । इस सवाल को ईश्वर तक पहुंचे हुए, इसवहार के सच्चे और प्रथम श्रेणी के भक्तवर गोस्वामी तुलसीदास जी ने बहुत ही खूबसूरती से हल कर दिया है । उन्होंने मनुष्य के लिए दो ही काम चुन दिए हैं - "देवे को टुकड़ा भला, लेवे को हरनाम"। उनकी इन दो बातों पर जो अमल करेंगे, निश्चय ही उनको सुख ही सुख है । उन्हें नारको की भीषण यातनाएं न सहनी होंगी। वे स्वर्ग में नाना प्रकार के सुख भोगेंगे और अमृतपान करेंगे, कल्पतरु उनकी इच्छाओं को पूरी करेगा । अगर वे पराया भला करके, दुखियों के दुःख दूर करके, बदला या मुआवजा पाने की इच्छा न करेंगे; निष्काम कर्म करेंगे और और कृष्ण के प्रेम में गर्क हो जाएंगे, उसके सिवा किसी भी संसारी पदार्थ को न चाहेंगे; तो उन्हें वह चीज़ मिलेगी, जो हज़ारों लाखों स्वर्गों से भी बढ़-चढ़कर होगी; फिर उन्हें दुःख का नाम भी न सुनना पड़ेगा । यही बात महात्मा तुलसीदास जी ने अपने दोहों में कही है; उन्हें खाली पढ़िए ही नहीं, उन पर गौर भी कीजिये। बिचारने से उनकी बातें आपके दुःख और क्लेश नाश करने वाली महाऔषधियां जान पड़ेंगी । अगर आप उनकी बताई हुई दवा पिएंगे, तो आप अजर-अमर हो जाएंगे ।
तुलसीदास जी कहते हैं - संसार में आकर दो काम कर लो १) भूखों को भोजन दो और २) भगवान् का नाम लो ।
तुलसीदास जी कहते हैं - कर्म, ज्ञान और उपासना प्रभृति उपचारों को त्याग कर भगवान् की भक्ति करो; क्योंकि भक्ति से विषयी लोगों को भी मुक्ति मिल सकती है; किन्तु कर्म, ज्ञान और उपासना से नहीं । जैसे नौ(९) का पहाड़ा लिखने से नौ का अंक नहीं मिटता, वैसे ही कर्म, ज्ञान आदि से वासना नहीं मिटती और जब तक वासना बनी रहती है तब तक मुक्ति नहीं हो सकती । वासना ही तो जन्म मरण की जड़ है, वासना से ही जन्म लेना पड़ता है; वासना मिटी और मुक्ति हुई; पर विषयी लोगों की वासना नहीं मिटती । जी तरह नौ का पहाड़ा लिखने से नौ का अंक बना ही रहता है; उसी तरह उनके कर्म, ज्ञान और उपासना आदि उपचार करने पर भी वासना बनी ही रहती है ।
इस दोहे कर अर्थ हमने साधारणतया समझा दिया है । अगर हम और भी खुलासा समझावे तो ३।४ पेज खर्च होंगे । मतलब यह, मुक्ति-लाभ करने के लिए "भक्ति" सीधा और सरल उपाय है । नारद, वाल्मीकि और शबरी प्रभृति, भक्ति के प्रभाव से ही ऊँचे चढ़े हैं - कर्म, ज्ञान और उपासना आदि से नहीं।
जगत से ३६ की तरह और भगवान् के चरणों में - छह, तीन या तिरसठ की तरह रहो । तुलसीदास जी कहते हैं, मन में विचार करके देख लो, यह मत अत्युत्तम है ।
६ जगत है और ३ मनुष्य है । ३६ के अंक में ३ ने ६ को पीठ दे रखी है । बस, इसी तरह तुम इस जगत को पीठ देकर रहो; यानी संसार की ओर मत देखो, संसार में ममता मत रखो । दूसरी ओर भगवान् के पक्ष में ६३ की तरह रहो । इसमें ६ भगवान् की शरण है और ३ मनुष्य है । जिस तरह ३ का अंक ६ की ओर टकटकी लगाए देखता रहा है उसी तरह मनुष्य को हरदम जगदीश की शरण में टकटकी लगाए हुए रहना चाहिए ।
दोहा
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तप तीरथ तरुणी-रमण, विद्या बहुत प्रसंग ।
कहा-कहा मन रूचि करै, पायौ तन क्षणभंग ।।

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