श्रीरामायण पाठ — बालकाण्डम्/सर्गः २८
श्लोक 1
प्रतिगृह्य ततोऽस्त्राणि प्रहृष्टवदनः शुचिः । गच्छन्नेव च काकुत्स्थो विश्वामित्रमथाब्रवीत् ॥१-२८-१॥
हिन्दी व्याख्या: तत्पश्चात पवित्र हुए और प्रसन्न वदन वाले काकुत्स्थ (राम) उन अस्त्रों को ग्रहण करके, मार्ग में चलते हुए ही विश्वामित्र जी से बोले—
English Translation: Then, having received those weapons with a joyful face and purified, Kakutstha (Rama), while walking along, spoke to Vishwamitra:
श्लोक 2
गृहीतास्त्रोऽस्मि भगवन् दुराधर्षः सुरैरपि । अस्त्राणां त्वहमिच्छामि संहारान् मुनिपुङ्गव ॥१-२८-२॥
हिन्दी व्याख्या: "हे भगवन्! मैंने देवताओं के लिए भी अजेय (दुर्धर्ष) इन अस्त्रों को ग्रहण कर लिया है। हे मुनिपुङ्गव! अब मैं इन अस्त्रों के 'संहार' (उपसंहार या नियंत्रण की विद्या) को भी जानना चाहता हूँ।"
English Translation: "O Bhagavan, I have received the weapons, which are unassailable even by the gods. O foremost of sages, I now desire [to learn] the withdrawal (samhara) of these weapons."
श्लोक 3
एवं ब्रुवति काकुत्स्थे विश्वामित्रो महातपाः । संहारान् व्याजहाराथ धृतिमान् सुव्रतः शुचिः ॥१-२८-३॥
हिन्दी व्याख्या: काकुत्स्थ (राम) के ऐसा कहने पर, महातपस्वी, धृतिमान् (धैर्यवान्), सुव्रत और पवित्र मुनिवर विश्वामित्र ने उन अस्त्रों के संहारों (उपसंहार के मंत्रों) का वर्णन किया।
English Translation: When Kakutstha spoke thus, the great ascetic Vishwamitra—steadfast, of pure vows, and holy—then declared the withdrawal [mantras].
श्लोक 4
सत्यवन्तं सत्यकीर्तिं धृष्टं रभसमेव च । प्रतिहारतरं नाम पराङ्मुखमवाङ्मुखम् ॥१-२८-४॥
हिन्दी व्याख्या: सत्यवान्, सत्यकीर्ति, धृष्ट, रभस, प्रतिहारतर नामक, पराङ्मुख और अवाङ्मुख—
English Translation: Satyavanta, Satyakeerti, Dhrishta, Rabhasa, Pratiharatara by name, Parangmukha, and Avangmukha—
श्लोक 5
लक्ष्यालक्ष्याविमौ चैव दृढनाभसुनाभकौ । दशाक्षशतवक्त्रौ च दशशीर्षशतोदरौ ॥१-२८-५॥
हिन्दी व्याख्या: लक्ष्या और अलक्ष्य—ये दोनों, दृढनाभ, सुनाभक, दशाक्ष, शतवक्त्र, दशशीर्ष और शतोदर—
English Translation: Lakshya and Alakshya both, Dridhanabha, Sunabhaka, Dashaksha, ShataVaktra, Dashashirsha, and Shataudara—
श्लोक 6
पद्मनाभमहानाभौ दुन्दुनाभसुनाभकौ । ज्योतिषं शकुनं चैव नैरास्यविमलावुभौ ॥१-२८-६॥
हिन्दी व्याख्या: पद्मनाभ, महानाभ, दुन्दुनाभ, सुनाभक, ज्योतिष, शकुन तथा नैरास्य और विमल—ये दोनों—
English Translation: Padmanabha, Mahanabha, Dundunabha, Sunabhaka, Jyotisha, Shakuna, and both Nairasya and Vimala—
श्लोक 7
यौगन्धरविनिद्रौ च दैत्यप्रमथनौ तथा । शुचिबाहुर्महाबाहुर्निष्कलिर्विरुचस्तथा । सार्चिर्माली धृतिमाली वृत्तिमान् रुचिरस्तथा ॥१-२८-७॥
हिन्दी व्याख्या: यौगन्धर, विनिद्र, दैत्यप्रमथन, शुचिबाहु, महाबाहु, निष्कलि, विरुख, सार्चिर्माली, धृतिमाली, वृत्तिमान् और रुचिर—
English Translation: Yaugandhara and Vinidra, and Daityapramathana, Shuchibahu, Mahabahu, Nishkali, Virucha, Sarchirmali, Dhritimali, Vrittiman, and Ruchira—
श्लोक 8
पित्र्यः सौमनसश्चैव विधूतमकरावुभौ । परवीरं रतिं चैव धनधान्यौ च राघव ॥१-२८-८॥
हिन्दी व्याख्या: पित्र्य, सौमनस, विधूतमकर (दोनों), परवीर, रति तथा धन और धान्य (ये संहार-अस्त्र)—हे राघव!
English Translation: Pitrya, Saumanasa, both Vidhutamakaras, Paraveera, Rati, and Dhanadhanya, O Raghava—
श्लोक 9
कामरूपं कामरुचिं मोहमावरणं तथा । जृम्भकं सर्वनाभं च पन्थनवरुणौ तथा ॥१-२८-९॥
हिन्दी व्याख्या: कामरूप, कामरुचि, मोह, आवरण, जृम्भक, सर्वनाभ, पन्थन और वरुण—
English Translation: Kamarupa, Kamaruchi, Moha, Avarana, Jrimbhaka, Sarvanabha, Panthana, and Varuna—
श्लोक 10
कृशाश्वतनयान् राम भास्वरान् कामरूपिणः । प्रतीच्छ मम भद्रं ते पात्रभूतोऽसि राघव ॥१-२८-१०॥
हिन्दी व्याख्या: "हे राम! प्रजापति कृशाश्व के इन भास्वर और कामरूपी संहार-पुत्रों को ग्रहण करो। तुम्हारा कल्याण हो, तुम इसके पात्र हो, हे राघव!"
English Translation: "O Rama, receive these radiant and shape-shifting sons of Krishashwa. May you be blessed, you are a worthy vessel, O Raghava."
श्लोक 11
बाढमित्येव काकुत्स्थः प्रहृष्टेनान्तरात्मना । दिव्यभास्वरदेहाश्च मूर्तिमन्तः सुखप्रदाः ॥१-२८-११॥
हिन्दी व्याख्या: 'बहुत अच्छा' ऐसा कहकर प्रसन्न अंतःकरण वाले काकुत्स्थ (राम) ने उन्हें स्वीकार किया। वे सभी संहार-अस्त्र दिव्य और भास्वर शरीर वाले, मूर्तिमंत तथा सुख प्रदान करने वाले थे।
English Translation: Saying "So be it," Kakutstha with a joyful heart [accepted them]. They possessed divine, radiant bodies, were embodied, and bestowed happiness.
श्लोक 12
केचिदङ्गारसदृशाः केचिद् धूमोपमास्तथा । चन्द्रार्कसदृशाः केचित् प्रह्वाञ्जलिपुटास्तथा ॥१-२८-१२॥
हिन्दी व्याख्या: उनमें से कुछ अङ्गारे (अग्नि) के समान थे, कुछ धुएँ के समान, कुछ चंद्रमा और सूर्य के समान प्रकाशमान थे तथा कुछ हाथ जोड़े हुए विन्र्म खड़े थे।
English Translation: Some resembled glowing embers, some were like smoke, some resembled the moon and sun, and some stood with joined palms in humility.
श्लोक 13
रामं प्राञ्जलयो भूत्वाब्रुवन् मधुरभाषिणः । इमे स्म नरशार्दूल शाधि किं करवाम ते ॥१-२८-१३॥
हिन्दी व्याख्या: वे सब संहार-अस्त्र राम के सामने हाथ जोड़कर मधुर वाणी में बोले—"हे नरशार्दूल! हम उपस्थित हैं, आज्ञा दीजिए, हम आपके लिए क्या करें?"
English Translation: Joining their palms before Rama, they spoke in sweet words: "Here we are, O tiger among men, command us, what shall we do for you?"
श्लोक 14
गम्यतामिति तानाह यथेष्टं रघुनन्दनः । मानसाः कार्यकालेषु साहाय्यं मे करिष्यथ ॥१-२८-१४॥
हिन्दी व्याख्या: रघुनन्दन राम ने उनसे कहा—"तुम सब अपनी इच्छा के अनुसार जाओ। जब भी आवश्यकता का समय आएगा, तुम मेरे मन के संकल्प मात्र से मेरी सहायता करना।"
English Translation: The delight of the Raghu race told them, "Go as you please. At the times of need, you shall render assistance to me by mere thought."
श्लोक 15
अथ ते राममामन्त्र्य कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् । एवमस्त्विति काकुत्स्थमुक्त्वा जग्मुर्यथागतम् ॥१-२८-१५॥
हिन्दी व्याख्या: तब वे अस्त्र राम से आज्ञा लेकर, उनकी परिक्रमा करके और 'एवमस्तु' (ऐसा ही हो) कहकर जैसे आए थे, वैसे ही चले गए।
English Translation: Then those weapons, taking leave of Rama, circumambulating him, and saying "So be it" to Kakutstha, departed as they had come.
श्लोक 16
स च तान् राघवो ज्ञात्वा विश्वामित्रं महामुनिम् । गच्छन्नेवाथ मधुरं श्लक्ष्णं वचनमब्रवीत् ॥१-२८-१६॥
हिन्दी व्याख्या: उन अस्त्रों के प्रस्थान को जानकर राघवाने मार्ग में चलते हुए ही महामुनि विश्वामित्र से यह मधुर और कोमल वचन कहा—
English Translation: Knowing that they [had departed], Raghava, while walking along, spoke this sweet and gentle word to the great sage Vishwamitra:
श्लोक 17
किमेतन्मेघसंकाशं पर्वतस्याविदूरतः । वृक्षखण्डमितो भाति परं कौतूहलं हि मे ॥१-२८-१७॥
हिन्दी व्याख्या: "पर्वत के पास यह बादलों के समान दिखाई देने वाला वृक्षों का समूह (वन) सा क्या है? इसे देखकर मेरे मन में अत्यधिक कौतूहल हो रहा है।"
English Translation: "What is this cloud-like cluster of trees not far from the mountain, shining here? Indeed, my curiosity is extreme."
श्लोक 18
दर्शनीयं मृगाकीर्णं मनोहरमतीव च । नानाप्रकारैः शकुनैर्वल्गुभाषैरलङ्कृतम् ॥१-२८-१८॥
हिन्दी व्याख्या: "यह देखने में सुंदर, हिरनों से भरा हुआ, अत्यंत मनोहर तथा मीठी बोली बोलने वाले अनेक प्रकार के पक्षियों से अलंकृत है।"
English Translation: "It is delightful to behold, teeming with deer, exceedingly charming, and adorned with various kinds of sweet-speaking birds."
श्लोक 19
निःसृताःस्मो मुनिश्रेष्ठ कान्ताराद् रोमहर्षणात् । अनया त्ववगच्छामि देशस्य सुखवत्तया ॥१-२८-१९॥
हिन्दी व्याख्या: "हे मुनिश्रेष्ठ! हम उस भयानक (रोमाञ्चित कर देने वाले) जंगल से बाहर आ गए हैं। इस देश की सुखद स्थिति को देखकर मैं समझता हूँ कि..."
English Translation: "O best of sages, we have emerged from that hair-raising, terrible forest. By the pleasant nature of this region, I gather that..."
श्लोक 20
सर्वं मे शंस भगवन् कस्याश्रमपदं त्विदम् । संप्राप्ता यत्र ते पापा ब्रह्मघ्ना दुष्टचारिनः ॥१-२८-२०॥
हिन्दी व्याख्या: "...हे भगवन्! मुझे विस्तार से बताइए कि यह किसका आश्रम-पद है? जहाँ ब्रह्महत्या करने वाले और दुष्ट आचरण वाले वे पापी..."
English Translation: "...O Bhagavan, tell me all: whose hermitage precinct is this, where those sinful, brahmin-slaying, evil-behaving wretches..."
श्लोक 21 (प्रथमार्ध)
तव यज्ञस्य विघ्नाय दुरात्मानो महामुने । भगवंस्तस्य को देशः सा यत्र तव याज्ञिकी ॥१-२८-२१॥
हिन्दी व्याख्या: "...हे महामुने! आपके यज्ञ में विघ्न डालने के लिए आते हैं। हे भगवन्! वह कौन सा देश है, जहाँ आपका यज्ञीय अनुष्ठान हो रहा है?"
English Translation: "...O great sage, come to obstruct your sacrifice, you evil-souled ones. O Bhagavan, what region is this where your sacrificial activity takes place?"
श्लोक 21 (द्वितीयार्ध - पाठ भेद अनुसार 22)
रक्षितव्या क्रिया ब्रह्मन् मया वध्याश्च राक्षसाः । एतत् सर्वं मुनिश्रेष्ठ श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो ॥१-२८-२१॥
हिन्दी व्याख्या: "हे ब्रह्मन्! मुझे आपकी उस यज्ञीय क्रिया की रक्षा करनी है और राक्षसों का वध करना है। हे मुनिश्रेष्ठ प्रभो! मैं यह सब विस्तार से सुनना चाहता हूँ।"
English Translation: "O brahmin, your sacrificial rite is to be protected by me, and the demons are to be slain. O best of sages, O lord, I wish to hear all of this."
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे अष्टाविंशः सर्गः ॥१-२८॥
