अहिंसा परमो धर्म: हमारा इस सिद्धान्त से भी ब्रेनवोश हुआ।

 



 अहिंसा परमो धर्म: 

हमारा इस सिद्धान्त से भी ब्रेनवोश हुआ। वर्ना यह १२०० साल की पराधिनता ओर क्या थी ?

  हमारे देशवासी कभी भी हिंसक ना थे,  कोई भी वक्त ऐसा नहीं गुज़रा होगा जब उन्होंने किसी दुर्बल को, बिना किसी अपराध के अत्याचार किया हो।

  हमारे राजनेता विदेश जाकर कहते हैं कि सदियों से भारत ने किसी देश पर, उनकी जमीन हड़पने के लिए आक्रमण नहीं किया।

महावीर स्वामी से हमारा  ब्रेनवोश हुआ । हमारे दैनिक जीवन में जो हिंसा थी,  वह उसने रूकवाई गई थी । चलो यह बात तो अच्छी थी। लेकिन “अहिंसा ही परमो धर्म।”  लोगों ने जो कर्तव्य था हिंसा करने का, वही कर्तव्य भी छोड़ दीया। सब जानते हैं कि कभी-कभी हिंसा भी कर्तव्य होती है।  श्री कृष्ण ने गीता मैं अर्जुन को वही उपदेश दिया था । की जो पापी लोग मारने योग्य है, उनको ना मरना,  बचाना, उनको जिंदा रखना, उनको जिंदा छोड़ देना, वह सबके लिये भविष्य की विपत्ति हो सकती है... इसलिए है अर्जुन जो पापी है, उन सबको चुन चुन के तुझे मारना होगा। यहां हिंसा करना यह तेरा धर्म है।

  हमारे देश में जो बौधिझम और जैनिज्म आया। उसकी वजह से हमारा देश का उलटी दिशा में ब्रेनवाश हुआ।  इसलिए हम सब 'भगत'  हो गए।  ज्ञान और भक्ति बहुत विरोधाभासी चीज है! लेकिन आज तक हमारे विद्वानों ने दोनों एक ही है ऐसी साबित करने की व्यर्थ कोशिश की है!   विद्वानों ने क्या यह भक्ति और ज्ञान का मैल मिलाप सच नहीं है । यह सबसे बड़ा झूठ है।  भक्त और ज्ञानी एक दूसरे से मूलतः विपरीत है। भक्त ने काल्पनिक मूर्ति से प्रेम किया, इस प्रेम से इनके लिए कहा जाता है कि वह कभी हिंसा नहीं करेगा । क्योंकि श्रद्धालुओं अपने दिमाग से कभी स्वतंत्र रुप से कभी सोच ही नहीं सकते। लेकिन ज्ञानी का कोई भरोसा नहीं, ज्ञानी कभी भी तलवार उठा सकता है, स्वतंत्र रुप से सोच सकता हे। ज्ञानी ब्रेनवोश नहीं है ।

आक्रांताओं आते रहे। हमारा पूरा समाज भक्ति में लिंन था। आज भी सुबह से उठकर शामको सोने तक  हमारी दिनचर्या भक्ति मय ही है।  हम भक्ति में- मिकेनाईझ रोबोट हो गये है।  जिसके हाथ में तलवार होनी चाहिए उनके हाथ में हमने माला जपने के लिये थमा दिया। पूरे हिंदुस्तान मूर्ति पूजा में और नाम जप करने में व्यस्त था। हिंसा तो उसे जरा भी करने ही नहीं थी। हम चींटी को भी बचाकर चलनेवाले लोग थे। हमे सिखाया गया था की हिंसा करना पाप है। और इस जगत में जो हो रहा है वह परमात्मा की इच्छा से हो रहा है। इसलिए एक के बाद एक आक्रांता आए। इस देश जो सोने की चिड़िया था, उसको लूटने के लिए, उसको तबाह करने के लिए आते रहे, और वही सब हमारी नजर के सामने होता रहा। हम भक्तलोग स्रध्धालु थे । ब्रेनवोश थे। इसलिए हम कुछ ना बोले,  किसी का सामना नहीं किया, किसी को ललकारा नहीं, ललकारते तो हमारी तरफ से हिंसा हो जाती थी। आक्रांताओं के तरफ से जो भी हिंसा होगी, सहन करली।  वह हमेशा ही नहीं होगी, चले जाएंगे कुछ धन को लूट कर। धन तो हाथ का मैल है। वह हिंसा हमें कबूल मंजूर है। लेकिन हम इनकी विरुद्ध हिंसा नहीं करेंगे।  यह उल्टा ब्रेनवोश हमारा “भक्तिमार्गी” होने से हुआ। यही बात समझने योग्य है!

शंकराचार्य हमें अद्वैत की शिक्षा दे गये। चिदानंद रूपा शिवोहम शिवोहम। यह वेदांत का ज्ञान का स्थापना करके गए लेकिन इसके पीछे क्या हुआ? हमारे भक्ति मार्ग के बहुत से आचार्य पैदा हुए और सब ने अपना-अपना थोड़ा सा अलग-अलग मत व्यक्त किया। सब आचार्य की प्रतिभा देखकर हमें लगता है कि उसने जानबूझकर ऐसा किया है। बहुत से सिद्धांत रखे गए। द्वैत सिद्धांत, अद्वैत सिद्धांत, विशिष्टाद्वैत सिद्धांत, आदि.. और हम हिन्दु  इन सिद्धांतों के अलग-अलग धार्मिक संप्रदाय बनाकर अलग-अलग गुट में बिखर गए।

  इतना ही नहीं लेकिन एक दूसरे के गुट के दुश्मन भी बन गए। और हम ज्यादा से ज्यादा कमजोर भी होते गए क्योंकि एकजूट होकर आक्रांताओं का सामना नहि कर सके । 

ओ३म् शं नो अदितिर्भवतु व्रतेभि: शं नो भवन्तु मरूत: स्वर्का:।शं नो विष्णु: शमु पूषा नो अस्तु शं नो भवित्रं शम्वस्तु वायु:( ऋग्वेद ७|३५|९)

अर्थ  :- नियमो सहित अखण्ड धरती माता हमारे लिए सुखदायी हों, शुभ विचार वाले शूरवीर व बड़े विद्वान लोग हमें सुख देने वाले हो, व्यापक परमेश्वर हमें सुखदायक हो, पुष्टिकारक तत्व व ब्रह्मचर्यादि व्यवहार हमें शान्ति देने वाले हो, अन्तरिक्ष व जल हमें सुखकर हो और पवन सुख देने वाली हो। 

धर्म निरपेक्षता का अर्थ धर्म नपुसंकता नही।

    हमारी प्राचीन संस्कृति एवं मनुष्य धर्म पूर्णतया वेदों पर आधारित है। वेद सब सत्य विद्याओं का संकलन है। वेद ज्ञान सम्पूर्ण सृष्टि के लिए, सभी जाति वर्ग, समाज के लिए है, प्राणी मात्र के लिए सभी काल में समान रूप से उपयोगी, लाभकारी है। यह वेद ज्ञान केवल आर्यों या भारत वासियों को ही लाभ नहीं देता, वेद ज्ञान व्यक्तिगत, समाज और राष्ट्र हित और निर्माण की बात करता है। सर्वे भवन्तु सुखीन: और वसुधैव कुटुंबकम का उदघोष करता है। दुसरी तरफ अलगाववाद, ईसाइयत, इस्लामिक स्टेट की बातें होती हैं। जबरदस्ती धर्मांतरण के कृतय किये जाते हैं। पिछले आठ सौ वर्षों से भारत में यही कुछ हो रहा है। आज भी धर्म मज़हब के नाम पर जेहाद, लव जेहाद, और आतंक हावी हो रहा है। 

         ' सत्यं वृहदतयुग्रं दीक्षा तपोब्रहा यज्ञ: पृथिवीं धारयन्ति ' - अथर्ववेद। मै मानव धर्म में सत्य, ज्ञान,तप, दक्षता, ईश्वर और यज्ञ (परोपकार) की बात कही है। वेदों में कहीं जाति, व्यक्ति, स्थान, काल विशेष की बात नही है। फिर इन सिद्धान्तों के अनुरूप शासन व्यवस्था को बनाए रखने या चलाने वालों को साम्प्रदायिक ताकतें कह देना या भगवाकरण कह कर विरोध करना आज के अर्द्धशिक्षित और अल्प ज्ञानी तथाकथित नेताओं की बचकानी बातें नहीं तो और क्या है। 

        वोटों की राजनीति में कट्टरपंथी और अलगाववादियों को बेचारे अल्पसंख्यक कसकर धर्मनिरपेक्षता का झूठा ढिंढोरा पीटना क्या सच्ची राष्ट्र भक्ति है।यदि सब को साथ लेकर चलने वाली वैदिक संस्कृति पर राजनीति और विरोध होता है तो इसे धर्म नपुसंकता ही कहेंगे।धर्म निरपेक्षता का मतलब तो सभी धर्मों के अच्छे विचारों का आदर करना होता है। सत्य सनातन वैदिक विचारों का विरोध नहीं। 

ओ३म् येभ्यो होत्रां प्रथमामायेजे मनु: समिद्धाग्निर्मनसा सप्त होतृभि:।त आदित्या अभयं शर्म यच्छत सुगा न: कर्त्त सुपथा स्वस्तये। (१०|६३|७)

अर्थ :- जिन विद्वानों के लिए अग्नि, सूर्य आदि तेज के प्रकाशक ज्ञानवान परमेश्वर ने मन के साथ तथा सात यज्ञों को करने वाले, वरने योग्य वेदवाणी को यथविधि यथाविधि दिया था, उस भजनीय परमैश्वर्यवान् परमात्मा का हम कल्याण के लिए आह्वान करते हैं। 



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