ऋग्वेद के 10वें मंडल का 190वाँ सूक्त 'अघमर्षण सूक्त' कहलाता है। इसके द्रष्टा ऋषि 'अघमर्षण' हैं और देवता 'भाववृत्त' (सृष्टि की उत्पत्ति का भाव) हैं। इस सूक्त में कुल तीन मंत्र हैं।
ये तीन मंत्र पूरे ब्रह्मांड की उत्पत्ति के महाविज्ञान को समेटे हुए हैं। जब साधक जल में रहकर इसका पाठ करता है, तो वह मानता है कि जैसे ईश्वर ने प्रलय के बाद अपनी परम चेतना से पुनः स्वच्छ सृष्टि का निर्माण किया, वैसे ही मेरे भीतर के विकारों का प्रलय हो और मेरी चेतना पुनः पवित्र हो जाए।
आइए इन तीनों मंत्रों और उनके विस्तृत अर्थ को समझते हैं:
प्रथम मंत्र
ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत।
ततो रात्र्यजायत ततः समुद्रो अर्णवः॥१॥
शब्दार्थ:
ऋतम्: ब्रह्मांड का शाश्वत, प्राकृतिक और नैतिक नियम (Cosmic Order)।
सत्यम्: अपरिवर्तनीय परम सत्य, अस्तित्व (Absolute Truth)।
अभिद्धात् तपसः: परमेश्वर के संकल्प रूपी महान, प्रदीप्त तप से।
अध्यजायत: प्रकट हुए या उत्पन्न हुए।
ततः: उसके बाद।
रात्रिः: अंधकार, प्रलय काल या अप्रकट अवस्था (महाकाली रूप)।
समुद्रो अर्णवः: अंतरिक्ष रूपी महाशून्य या तरंगायमान जल (Cosmic Ocean)।
विस्तृत हिंदी अर्थ:
सृष्टि के प्रारंभ में जब कुछ नहीं था, तब परमेश्वर के प्रदीप्त संकल्प-रूपी तप (Divine Energy) से सबसे पहले 'ऋत' (ब्रह्मांडीय नियम/Cosmos Laws) और 'सत्य' (अस्तित्व का मूल तत्व) प्रकट हुए। उसके बाद (प्रलय कालीन) रात्रि या सघन अंधकार उत्पन्न हुआ, और फिर तरंगों से युक्त, असीम अंतरिक्ष रूपी महान कारण-समुद्र (Cosmic Ocean) उत्पन्न हुआ।
द्वितीय मंत्र
समुद्रादर्णवादधि संवत्सरो अजायत।
अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी॥२॥
शब्दार्थ:
समुद्रात् अर्णवात् अधि: उस तरंगायमान कारण-समुद्र के उत्पन्न होने के बाद।
संवत्सरः: काल, समय का चक्र या वर्ष (Time Wheel)।
अजायत: उत्पन्न हुआ।
अहोरात्राणि: दिन और रातों को।
विदधत्: व्यवस्थित या धारण करता हुआ।
विश्वस्य: इस समस्त संसार के।
मिषतः: पलक झपकाने वाले (सभी सजीव प्राणियों) पर।
वशी: नियंत्रण रखने वाला सर्वेश्वर।
विस्तृत हिंदी अर्थ:
उस असीम अंतरिक्ष रूपी कारण-समुद्र के प्रकट होने के बाद, संपूर्ण ब्रह्मांड को अपने वश में रखने वाले और पलक झपकाने वाले (सभी चेतन प्राणियों) के नियंता परमेश्वर ने 'संवत्सर' यानी 'काल' (Time) को पैदा किया। वही सर्वशक्तिमान ईश्वर दिन और रात के चक्र को निरंतर व्यवस्थित और संचालित करता है।
तृतीय मंत्र
सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्।
दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः॥३॥
शब्दार्थ:
सूर्याचन्द्रमसौ: सूर्य और चंद्रमा को।
धाता: विधाता, सृष्टि की रचना करने वाले परमेश्वर ने।
यथापूर्वम्: बिल्कुल पहले कल्पों (सृष्टियों) की तरह ही।
अकल्पयत्: निर्मित किया या रचा।
दिवम् च: द्युलोक (स्वर्ग/ऊपरी लोकों) को।
पृथिवीम् च: पृथ्वी लोक को।
अन्तरिक्षम्: दोनों के बीच के अंतरिक्ष लोक को।
अथो: और साथ ही।
स्वः: सुखमय या आनंदमय लोकों को।
विस्तृत हिंदी अर्थ:
सबके धारण-पोषण करने वाले उसी विधाता (परमेश्वर) ने इस कल्प में भी सूर्य और चंद्रमा को बिल्कुल वैसे ही रचा, जैसे उन्होंने पिछले कल्पों (पूर्व की सृष्टियों) में रचा था। इसके साथ ही उन्होंने द्युलोक (प्रकाशमान लोकों), पृथ्वी लोक, अंतरिक्ष लोक और उनके बीच के समस्त सुख-साधनों व अन्य उच्च लोकों का निर्माण किया।
सूक्त का गहरा आध्यात्मिक संदेश (Conclusion)
यह सूक्त हमें सिखाता है कि यह सृष्टि कोई दुर्घटना नहीं है, बल्कि एक अत्यंत सुव्यवस्थित व्यवस्था (ऋत) का परिणाम है। ईश्वर हर प्रलय के बाद पुरानी गंदगी और अंधकार को मिटाकर 'यथापूर्वम्' (वैसी ही दिव्य और नई) सृष्टि का निर्माण करते हैं।
जब हम स्नान करते समय इस सूक्त का पाठ करते हैं, तो हम ईश्वर से प्रार्थना कर रहे होते हैं:
"हे विधाता! जैसे आप हर कल्प में पुरानी सृष्टि के अंत के बाद एक नई, पावन सृष्टि रचते हैं, वैसे ही मेरे भीतर के पुराने पापों, बुरे विचारों और विकारों का अंत करके मेरी आत्मा को भी एक नई, शुद्ध और पवित्र चेतना से भर दीजिए।"
अघमर्षण ( अघ = पाप, मर्षण = निवृत्ति) अर्थात पाप का नाश, यानी समूचे पाप आचारण से पूर्णतया छूटना ।।
श्रेष्ठ आचार ही शिष्टाचार है और जो भी उत्तम आचरण वाला होता जायेगा वही अघमर्षण को सिद्ध करता जायेगा अर्थात शिष्टाचार ही वह तप है जिससे समस्त मल भस्म हो जाते हैं ।*
परमशक्ति की न्याय-व्यवस्था में जब पाप आदि कर्मों का फल मिलने पर जो रुदन अर्थात दुःख मिलता है....."यथा पूर्वमकल्पयत्"*
इस का बारम्बार चिन्तन करते हुए ईश्वर के गुणों का स्तवन अर्थात सामर्थ्यों का चिन्तन करते हुए साधक पाता है कि मेरे नाथ के अनन्त गुण हैं,अनन्त सामर्थ्य है और वह सब दूसरों के लिए ही है स्वयं के लिए किञ्चिन्मात्र भी नहीं.....
ऐसा जानकर वह प्रार्थना अर्थात जगदीश्वर की सन्निधि में प्रतिज्ञा करता है कि मैं भी अपने परमपिता की सदृश परोपकारी हो रहा हूं....
और तब डूब जाता है उस परम दिव्य आनन्द में, निमग्न हो जाता है प्रेम में और स्वयं को आज्ञाकारी पुत्र की भांति समर्पित कर देता है...यहाँ से उपासना घटित होने लगती है.....
सृष्टि सृजन का हेतु अथवा कारण जीवों के पाप पुण्य आदि कर्म हैं ना कि केवल मात्र ब्रह्मेच्छा....यह मुख्य कारण है सभी के शुद्ध आचरण का शिष्टाचार का ।
केवल मात्र दिखावे के लिए मन्त्र, श्लोक, स्तोत्र आदि का पाठ नहीं अपितु भीतर धारण करते हुए उस विशिष्ट स्पन्दन को जी भरकर जीने वाला वास्तव में भक्त है ।
अघमर्षण: पाप से मुक्ति और अंतरात्मा की शुद्धि का वैज्ञानिक व आध्यात्मिक मार्ग।
हमारे सनातन दर्शन में हर उस कृत्य को 'पाप' कहा गया है जो हमारी चेतना को भारी करता है, जो प्रकृति के नियमों के विरुद्ध है और जो हमें हमारे वास्तविक स्वरूप से दूर ले जाता है। लेकिन भारतीय संस्कृति केवल पाप की बात नहीं करती, वह उससे पूरी तरह मुक्त होने का मार्ग भी दिखाती है। इसी परम मुक्ति का नाम है—अघमर्षण।
अघमर्षण का सीधा अर्थ है:
अघ = पाप (मानसिक, वाचिक और शारीरिक अशुद्धियाँ)
मर्षण = निवृत्ति, घिसना या पूरी तरह से नष्ट कर देना।
अर्थात, अपने भीतर के विकारों और पुराने अनैतिक आचरणों के प्रभावों को समूल नष्ट करके पूरी तरह शुद्ध हो जाना ही अघमर्षण है।
अघमर्षण सूक्त: वेदों का 'डिटॉक्स' मंत्र
ऋग्वेद के दसवें मंडल में 'अघमर्षण सूक्त' (ऋग्वेद 10.190) आता है। जब कोई साधक या गृहस्थ स्नान करता है, तो जल में खड़े होकर इस सूक्त का पाठ करने का विधान है।
इस सूक्त में कोई डरावनी बात नहीं है, बल्कि इसमें सृष्टि की उत्पत्ति का अद्भुत विज्ञान छुपा हुआ है। इसमें बताया गया है कि कैसे परम सत्य और तप से यह पूरी ब्रह्मांडीय व्यवस्था (ऋत) पैदा हुई, कैसे सूर्य, चंद्रमा, पृथ्वी और अंतरिक्ष बने।
इसके पीछे का मनोविज्ञान क्या है?
जब हम ब्रह्मांड की इस विशालता और उसकी दिव्य व्यवस्था का ध्यान करते हैं, तो हमारा 'अहंकार' (Ego) बहुत छोटा हो जाता है। जब अहंकार मिटता है, तो उसके साथ जुड़े हुए पाप, ग्लानि और बुरे विचार स्वतः ही बह जाते हैं।
समूचे पाप आचरण से पूर्णतया छूटना कैसे संभव है?
अघमर्षण केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं है, यह जीवन को पूरी तरह बदलने की एक आंतरिक प्रक्रिया (Transformative Process) है। इससे पूरी तरह छूटने के तीन मुख्य चरण हैं:
1. सजगता और स्वीकारोक्ति (Awareness)
पाप आचरण से छूटने का पहला नियम है यह स्वीकार करना कि हमसे कहाँ गलती हुई। जब तक हम अपने बुरे व्यवहार को सही ठहराते रहेंगे, तब तक उससे मुक्त नहीं हो सकते।
2. विचार की शुद्धि (Mental Alignment)
जैसे पानी में गंदगी होने पर हम उसे छानते हैं, वैसे ही अघमर्षण सूक्त के माध्यम से हम अपने मन को ब्रह्मांड की परम ऊर्जा (Cosmic Energy) से जोड़ते हैं। जब मन में 'ऋत' (Universal Order) का विचार बैठ जाता है, तो गलत काम करने की इच्छा ही समाप्त हो जाती है।
3. आदतों का पुनर्जन्म (Habit Reformation)
अघमर्षण का वास्तविक फल तब दिखता है जब व्यक्ति पुराने ढर्रे को छोड़कर एक नए, धर्मसंगत और वैज्ञानिक जीवनशैली को अपनाता है। यह केवल अतीत के पापों को धोना नहीं है, बल्कि भविष्य में पाप न करने का संकल्प है।
निष्कर्ष:
जल शरीर को धोता है, लेकिन 'अघमर्षण' अंतरात्मा को धो देता है। यह इस बात का प्रतीक है कि चाहे अतीत में हमसे कितनी भी गलतियाँ क्यों न हुई हों, प्रकृति हमें हर क्षण एक नई शुरुआत करने का, पूरी तरह शुद्ध होने का अवसर देती है।
आइए, हम सब अपने दैनिक जीवन में आत्म-निरीक्षण करें और अघमर्षण के भाव को उतारकर एक हल्के, आनंदित और पवित्र जीवन की ओर कदम बढ़ाएं।
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