श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे बालकाण्डे प्रथमः सर्गः (मूल रामायण)
एक परिचय और संपूर्ण १०० श्लोकों का सारांश
"महाकाव्य रामायण का बीजारोपण इसी प्रथम सर्ग में हुआ है। इसे 'मूल रामायण' या 'संक्षेप रामायण' भी कहा जाता है, क्योंकि इसमें महर्षि नारद ने संपूर्ण रामायण की पावन कथा को संक्षेप में भगवान वाल्मीकि के सम्मुख प्रकट किया था।"
1. भूमिका (Introduction)
वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड का पहला सर्ग सनातन संस्कृति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण दस्तावेज है। इस सर्ग की शुरुआत महर्षि वाल्मीकि के एक बड़े ही व्यावहारिक और जिज्ञासु प्रश्न से होती है। उन्होंने देवर्षि नारद से पूछा कि "इस संसार में इस समय सर्वगुण संपन्न, पराक्रमी, धर्मज्ञ, सत्यवादी और सभी जीवों का हित करने वाला आदर्श पुरुष कौन है?"
इसके उत्तर में देवर्षि नारद ने इक्ष्वाकु वंश के शिरोमणि भगवान श्रीराम का नाम लिया। नारद जी द्वारा संक्षेप में सुनाई गई यही गाथा आगे चलकर २४,००0 श्लोकों के विशाल महाकाव्य 'रामायण' का आधार बनी। इन १०० श्लोकों को मुख्य रूप से चार प्रमुख खंडों में विभाजित कर समझा जा सकता है।
2. संपूर्ण १०० श्लोकों का कथा सार (Section-wise Summary)
शुरुआती श्लोकों में देवर्षि नारद श्रीराम के अलौकिक शारीरिक सौन्दर्य, उनकी शारीरिक बनावट और उनके अद्वितीय चरित्र का विस्तृत खाका खींचते हैं। वे बताते हैं कि श्रीराम गंभीर, धैर्यवान, सत्यवादी, जितेंद्रिय और बुद्धिमान हैं। नारद जी के अनुसार श्रीराम गंभीरता में समुद्र के समान, धैर्य में हिमालय के समान, शौर्य में साक्षात् भगवान विष्णु के समान और क्षमा में पृथ्वी के समान हैं।
यहाँ से रामायण की मुख्य कथा गति पकड़ती है। राजा दशरथ द्वारा श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारी की जाती है, परंतु माता कैकेयी अपने पुराने वरदानों के बल पर भरत के लिए राज्य और राम के लिए १४ वर्ष का वनवास माँग लेती हैं। श्रीराम पिता के वचनों को निभाते हुए सहर्ष वन को चल देते हैं, जहाँ उनके पीछे भाई लक्ष्मण और छाया की तरह पत्नी सीता भी चल देती हैं। मार्ग में श्रृंगवेरपुर में निषादराज गुह से भेंट, गंगा पार करना और महर्षि भरद्वाज की आज्ञा से चित्रकूट में सुंदर कुटिया बनाकर रहने का प्रसंग आता है। राजा दशरथ के प्राण त्यागने के बाद भरत जी का आना, श्रीराम को मनाने का प्रयास करना और अंत में चरण-पादुका लेकर वापस लौटना तथा श्रीराम का घने दण्डकारण्य वन में प्रवेश करना इसमें वर्णित है।
इस खंड में वनवास के संघर्ष और किष्किंधा की घटनाओं का ताना-बाना है। विराध वध, महर्षि अगस्त्य से अमोघ दिव्यास्त्रों की प्राप्ति और ऋषियों की रक्षा की प्रतिज्ञा के बाद शूर्पणखा का प्रसंग आता है। शूर्पणखा को विरूपित किए जाने के बाद श्रीराम अकेले ही खर-दूषण सहित १४,००० राक्षसों का संहार करते हैं। इसके बाद क्रोधित रावण द्वारा मारीच की सहायता से स्वर्ण-मृग का जाल बुनना और माता सीता का बलपूर्वक हरण करना वर्णित है। सीता खोज में व्याकुल श्रीराम द्वारा जटायु का अंतिम संस्कार, कबन्ध का उद्धार, शबरी पर कृपा और पम्पा सरोवर के तट पर हनुमान जी के माध्यम से सुग्रीव से मित्रता का प्रसंग आता है। श्रीराम बाली का वध कर सुग्रीव का राज्याभिषेक करते हैं। अंत में हनुमान जी द्वारा समुद्र लाँघकर लंका जाना, सीता जी को मुद्रिका देना, लंका दहन करना और लौटकर श्रीराम को "दृष्टा सीता" (सीता जी देख ली गईं) का मंगल समाचार देना शामिल है।
यह अंतिम खंड असत्य पर सत्य की विजय और इस काव्य के महात्म्य को दर्शाता है। नल द्वारा समुद्र पर सेतु निर्माण, लंका पर चढ़ाई और भीषण युद्ध में रावण का वध मुख्य घटनाएँ हैं। रावण वध के बाद विभीषण का राज्याभिषेक और सीता जी की पावन अग्निपरीक्षा होती है। इसके बाद पुष्पक विमान से सानंद अयोध्या वापसी, नन्दिग्राम में भाइयों का मिलन और श्रीराम का भव्य राज्याभिषेक होता है। अंत में रामराज्य की अलौकिक महिमा का वर्णन है—जहाँ कोई अकाल मृत्यु नहीं है, कोई बीमारी नहीं है, स्त्रियाँ अखंड सौभाग्यवती हैं, और न चोर का भय है न भुखमरी का। अंतिम श्लोकों में बताया गया है कि जो भी मनुष्य इस पवित्र, पापनाशक रामचरित का पाठ करता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर दीर्घायु और सुख प्राप्त करता है।
3. इस सर्ग का महत्व (Significance)
यह १०० श्लोकों का संग्रह वास्तव में "पूरी रामायण का इंडेक्स (Index)" है। यदि किसी के पास संपूर्ण रामायण पढ़ने का समय न हो, तो केवल इन १०० श्लोकों (मूल रामायण) का नित्य पाठ करने से भी संपूर्ण रामायण के पाठ का पुण्य और मानसिक शांति प्राप्त होती है। यह मनुष्य को कर्तव्यपथ पर चलने, मर्यादा बनाए रखने और विपरीत परिस्थितियों में भी विचलित न होने की प्रेरणा देता है।
📜 सभी श्लोकों का हिन्दी-अंग्रेजी अनुवाद नीचे पढ़ें
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे बालकाण्डे प्रथमः सर्गः ॥१-१॥
तपः स्वाध्यायनिरतं तपस्वी वाग्विदां वरम् ।
नारदं परिपप्रच्छ वाल्मीकिर्मुनिपुङ्गवम् ॥१-१-१॥
को न्वस्मिन्साम्प्रतं लोके गुणवान्कश्च वीर्यवान् ।
धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च सत्यवाक्यो दृढव्रतः ॥१-१-२॥
चारित्रेण च को युक्तः सर्वभूतेषु को हितः ।
विद्वान्कः कः समर्थश्च कश्चैकप्रियदर्शनः ॥१-१-३॥
आत्मवान्को जितक्रोधो द्युतिमान्कोऽनसूयकः ।
कस्य बिभ्यति देवाश्च जातरोषस्य संयुगे ॥१-१-४॥
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं परं कौतूहलं हि मे ।
महर्षे त्वं समर्थोऽसि ज्ञातुमेवंविधं नरम् ॥१-१-५॥
श्रुत्वा चैतत्त्रिलोकज्ञो वाल्मीकेर्नारदो वचः ।
श्रूयतामिति चामन्त्र्य प्रहृष्टो वाक्यमब्रवीत् ॥१-१-६॥
बहवो दुर्लभाश्चैव ये त्वया कीर्तिता गुणाः ।
मुने वक्ष्याम्यहं बुद्ध्वा तैर्युक्तः श्रूयतां नरः ॥१-१-७॥
इक्ष्वाकुवंशप्रभवो रामो नाम जनैः श्रुतः ।
नियतात्मा महावीर्यो द्युतिमान्धृतिमान्वशी ॥१-१-८॥
बुद्धिमान्नीतिमान्वाग्मी श्रीमाञ्छ्त्रुनिबर्हणः ।
विपुलांसो महाबाहुः कम्बुग्रीवो महाहनुः ॥१-१-९॥
महोरस्को महेष्वासो गूढजत्रुररिन्दमः ।
आजानुबाहुः सुशिराः सुललाटः सुविक्रमः ॥१-१-१०॥
समः समविभक्ताङ्गः स्निग्धवर्णः प्रतापवान् ।
पीनवक्षा विशालाक्षो लक्ष्मीवाञ्छुभलक्षणः ॥१-१-११॥
धर्मज्ञः सत्यसन्धश्च प्रजानां च हिते रतः ।
यशस्वी ज्ञानसम्पन्नः शुचिर्वश्यः समाधिमान् ॥१-१-१२॥
प्रजापतिसमः श्रीमान् धाता रिपुनिषूदनः ।
रक्षिता जीवलोकस्य धर्मस्य परिरक्षिता॥१-१-१३॥
रक्षिता स्वस्य धर्मस्य स्वजनस्य च रक्षिता ।
वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञो धनुर्वेदे च निष्ठितः ॥१-१-१४॥
सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञो स्मृतिमान् प्रतिभानवान् ।
सर्वलोकप्रियः साधुरदीनात्मा विचक्षणः ॥१-१-१५॥
सर्वदाभिगतः सद्भिः समुद्र इव सिन्धुभिः ।
आर्यः सर्वसमश्चैव सदैव प्रियदर्शनः ॥१-१-१६॥
स च सर्व गुणोपेतः कौसल्यानन्दवर्धनः ।
समुद्र इव गाम्भीर्ये धैर्येण हिमवानिव ॥१-१-१७॥
विष्णुना सदृशो वीर्ये सोमवत्प्रियदर्शनः ।
कालाग्निसदृशः क्रोधे क्षमया पृथिवीसमः ॥१-१-१८॥
धनदेन समस्त्यागे सत्ये धर्म इवापरः ।
तमेवंगुणसम्पन्नं रामं सत्यपराक्रमम् ॥१-१-१९॥
ज्येष्ठं ज्येष्ठगुणैर्युक्तं प्रियं दशरथस्सुतम् ।
प्रकृतीनां हितैर्युक्तं प्रकृतिप्रियकाम्यया ॥१-१-२०॥
यौवराज्येन संयोक्तुम् ऐच्छत्प्रीत्या महीपतिः ।
तस्याभिषेकसम्भारान् दृष्ट्वा भार्याथ कैकयी ॥१-१-२१॥
पूर्वं दत्तवरा देवी वरमेनमयाचत ।
विवासनञ्च रामस्य भरतस्याभिषेचनम् ॥१-१-२२॥
स सत्यवचनाद्राजा धर्मपाशेन संयतः ।
विवासयामास सुतं रामं दशरथः प्रियम् ॥१-१-२३॥
स जगाम वनं वीरः प्रतिज्ञामनुपालयन् ।
पितुर्वचननिर्देशात् कैकेय्याः प्रियकारणात् ॥१-१-२४॥
तं व्रजन्तं प्रियो भ्राता लक्ष्मणोऽनुजगाम ह ।
स्नेहाद् विनयसम्पन्नः सुमित्रानन्दवर्धनः ॥१-१-२५॥
भ्रातरं दयितो भ्रातुः सौभ्रात्रमनुदर्शयन् ।
रामस्य दयिता भार्या नित्यं प्राणसमा हिता ॥१-१-२६॥
जनकस्य कुले जाता देवमायेव निर्मिता ।
सर्वलक्षणसम्पन्ना नारीणामुत्तमा वधूः ॥१-१-२७॥
सीताप्यनुगता रामं शशिनं रोहिणी यथा ।
पौरैरनुगतो दूरं पित्रा दशरथेन च ॥१-१-२८॥
शृङ्गवीरपुरे सूतं गङ्गाकूले व्यसर्जयत् ।
गुहमासाद्य धर्मात्मा निषादाधिपतिं प्रियम् ॥१-१-२९॥
गुहेन सहितो रामो लक्ष्मणेन च सीतया ।
ते वनेन वनङ्गत्वा नदीस्तीर्त्वा बहूदकाः ॥१-१-३०॥
चित्रकूटमनुप्राप्य भरद्वाजस्य शासनात् ।
रम्यमावसथं कृत्वा रममाणा वने त्रयः ॥१-१-३१॥
देवगन्धर्वसंकाशाः तत्र ते न्यवसन् सुखम् ।
चित्रकूटङ्गते रामे पुत्रशोकातुरस्तथा ॥१-१-३२॥
राजा दशरथस्स्वर्गं जगाम विलपन् सुतम् ।
गते तु तस्मिन् भरतो वसिष्ठप्रमुखैर्द्विजैः ॥१-१-३३॥
नियुज्यमानो राज्याय नैच्छत् राज्यं महाबलः ।
स जगाम वनं वीरो रामपादप्रसादकः ॥१-१-३४॥
गत्वा तु स महात्मानं रामं सत्यपराक्रमम् ।
अयाचद्भ्रातरं रामम् आर्यभावपुरस्कृतः ॥१-१-३५॥
त्वमेव राजा धर्मज्ञ इति रामं वचोऽब्रवीत् ।
रामोऽपि परमोदारः सुमुखस्सुमहायशाः ॥१-१-३६॥
न चैच्छत् पितुरादेशात् राज्यं रामो महाबलः ।
पादुके चास्य राज्याय न्यासं दत्त्वा पुनः पुनः ॥१-१-३७॥
निवर्तयामास ततो भरतं भरताग्रजः ।
स काममनवाप्यैव रामपादावुपस्पृशन् ॥१-१-३८॥
नन्दिग्रामेऽकरोद् राज्यं रामागमनकाङ्क्षया ।
गते तु भरते श्रीमान् सत्यसन्धो जितेन्द्रियः ॥१-१-३९॥
रामस्तु पुनरालक्ष्य नागरस्य जनस्य च ।
तत्रागमनमेकाग्रो दण्डकान् प्रविवेश ह ॥१-१-४०॥
प्रविश्य तु महारण्यं रामो राजीवलोचनः ।
विराधं राक्षसं हत्वा शरभङ्गं ददर्श ह ॥१-१-४१॥
सुतीक्ष्णं चाप्यगस्त्यं च अगस्त्यभ्रातरं तथा ।
अगस्त्यवचनाच्चैव जग्राहैन्द्रं शरासनम् ॥१-१-४२॥
खड्गञ्च परम प्रीतस्तूणी चाक्षयसायकौ ।
वसतस्तस्य रामस्य वने वनचरैः सह ॥१-१-४३॥
ऋषयोऽभ्यागमन् सर्वे वधायासुररक्षसाम् ।
स तेषां प्रतिशुश्राव राक्षसानां तदा वने ॥१-१-४४॥
प्रतिज्ञातश्च रामेण वधः संयति रक्षसाम् ।
ऋषीणामग्निकल्पानां दण्डकारण्यवासीनाम् ॥१-१-४५॥
तेन तत्रैव वसता जनस्थाननिवासिनी ।
विरूपिता शूर्पणखा राक्षसी कामरूपिणी ॥१-१-४६॥
ततः शूर्पणखावाक्यादुद्युक्तान् सर्वराक्षसान् ।
खरं त्रिशिरसं चैव दूषणं चैव राक्षसम् ॥१-१-४७॥
निजघान रणे रामस्तेषां चैव पदानुगान् ।
वने तस्मिन् निवसता जनस्थाननिवासिनाम् ॥१-१-४८॥
रक्षसां निहतान्यासन् सहस्राणि चतुर्दश ।
ततो ज्ञातिवधं श्रुत्वा रावणः क्रोधमूर्छितः ॥१-१-४९॥
सहायं वरयामास मारीचं नाम राक्षसम् ।
वार्यमाणः सुबहुशो मारीचेन स रावणः ॥१-१-५०॥
न विरोधो बलवता क्षमो रावण तेन ते ।
अनादृत्य तु तद्वाक्यं रावणः कालचोदितः ॥१-१-५१॥
जगाम सहमारीचस्तस्याश्रमपदं तदा ।
तेन मायाविना दूरमपवाह्य नृपात्मजौ ॥१-१-५२॥
जहार भार्यां रामस्य गृध्रं हत्वा जटायुषम् ।
गृध्रञ्च निहतं दृष्ट्वा हृतां श्रुत्वा च मैथिलीम् ॥१-१-५३॥
राघवः शोकसंतप्तो विललापाकुलेन्द्रियः ।
ततस्तेनैव शोकेन गृध्रं दग्ध्वा जटायुषम् ॥१-१-५४॥
मार्गमाणो वने सीतां राक्षसं सन्ददर्श ह ।
कबन्धं नाम रूपेण विकृतं घोरदर्शनम् ॥१-१-५५॥
तन्निहत्य महाबाहुर्ददाह स्वर्गतश्च सः ।
स चास्य कथयामास शबरीं धर्मचारिणीम् ॥१-१-५६॥
श्रमणां धर्मनिपुणामभिगच्छेति राघव ।
सोऽभ्य गच्छन्महातेजाः शबरीं शत्रुसूदनः ॥१-१-५७॥
शबर्या पूजितः सम्यग् रामो दशरथात्मजः ।
पम्पातीरे हनुमता सङ्गतो वानरेण ह ॥१-१-५८॥
हनुमद्वचनाच्चैव सुग्रीवेण समागतः ।
सुग्रीवाय च तत्सर्वं शंसद्रामो महाबलः ॥१-१-५९॥
आदितस्तद् यथावृत्तं सीतायाश्च विशेषतः ।
सुग्रीवश्चापि तत्सर्वं श्रुत्वा रामस्य वानरः ॥१-१-६०॥
चकार सख्यं रामेण प्रीतश्चैवाग्निसाक्षिकम् ।
ततो वानरराजेन वैरानुकथनं प्रति ॥१-१-६१॥
रामायावेदितं सर्वं प्रणयात् दुःखितेन च ।
प्रतिज्ञातञ्च रामेण तदा वालिवधं प्रति ॥१-१-६२॥
वालिनश्च बलं तत्र कथयामास वानरः ।
सुग्रीवः शङ्कितश्चासीन्नित्यं वीर्येण राघवे ॥१-१-६३॥
राघवप्रत्ययार्थं तु दुन्दुभेः कायमुत्तमम् ।
दर्शयामास सुग्रीवः महापर्वतसन्निभम् ॥१-१-६४॥
उत्स्मयित्वा महाबाहुः प्रेक्ष्य चास्ति महाबलः ।
पादाङ्गुष्ठेन चिक्षेप संपूर्णं दशयोजनम् ॥१-१-६५॥
बिभेद च पुनस्सालान् सप्तैकेन महेषुणा ।
गिरिं रसातलञ्चैव जनयन् प्रत्ययं तथा ॥१-१-६६॥
ततः प्रीतमनास्तेन विश्वस्तस्स महाकपिः ।
किष्किन्धां रामसहितो जगाम च गुहां तदा ॥१-१-६७॥
ततोऽगर्जद्धरिवरः सुग्रीवो हेमपिङ्गलः ।
तेन नादेन महता निर्जगाम हरीश्वरः ॥१-१-६८॥
अनुमान्य तदा तारां सुग्रीवेण समागतः ।
निजघान च तत्रैनं शरेणैकेन राघवः ॥१-१-६९॥
ततः सुग्रीववचनात् हत्वा वालिनमाहवे ।
सुग्रीवमेव तद्राज्ये राघवः प्रत्यपादयत् ॥१-१-७०॥
स च सर्वान् समानीय वानरान् वानरर्षभः ।
दिशः प्रस्थापयामास दिदृक्षुर्जनकात्मजाम् ॥१-१-७१॥
ततो गृध्रस्य वचनात् संपातेर्हनुमान् बली ।
शतयोजनविस्तीर्णं पुप्लुवे लवणार्णवम् ॥१-१-७२॥
तत्र लङ्कां समासाद्य पुरीं रावणपालिताम् ।
ददर्श सीतां ध्यायन्तीम् अशोकवनिकां गताम् ॥१-१-७३॥
निवेदयित्वाभिज्ञानं प्रवृत्तिं विनिवेद्य च ।
समाश्वास्य च वैदेहीं मर्दयामास तोरणम् ॥१-१-७४॥
पञ्च सेनाग्रगान् हत्वा सप्त मन्त्रिसुतानपि ।
शूरमक्षं च निष्पिष्य ग्रहणं समुपागमत् ॥१-१-७५॥
अस्त्रेणोन्मुक्तमात्मानं ज्ञात्वा पैतामहाद् वरात् ।
मर्षयन् राक्षसान् वीरो यन्त्रिणस्तान् यदृच्छया ॥१-१-७६॥
ततो दग्ध्वा पुरीं लङ्काम् ऋते सीताञ्च मैथिलीम् ।
रामाय प्रियमाख्यातुं पुनरायान्महाकपिः ॥१-१-७७॥
सोऽभिगम्य महात्मानं कृत्वा रामं प्रदक्षिणम् ।
न्यवेदयदमेयात्मा दृष्टा सीतेति तत्त्वतः ॥१-१-७८॥
ततः सुग्रीवसहितो गत्वा तीरं महोदधेः ।
समुद्रं क्षोभयामास शरैरादित्यसन्निभैः ॥१-१-७९॥
दर्शयामास चात्मानं समुद्रः सरितां पतिः ।
समुद्रवचनाच्चैव नलं सेतुमकारयत् ॥१-१-८०॥
तेन गत्वा पुरीं लङ्कां हत्वा रावणमाहवे ।
रामः सीतामनुप्राप्य परां व्रीडामुपागमत् ॥१-१-८१॥
तामुवाच ततो रामः परुषं जनसंसदि ।
अमृष्यमाणा सा सीता विवेश ज्वलनं सती ॥१-१-८२॥
ततोऽग्निवचनात् सीतां ज्ञात्वा विगतकल्मषाम् ।
कर्मणा तेन महता त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥१-१-८३॥
सदेवर्षिगणं तुष्टं राघवस्य महात्मनः ॥
बभौ रामः सम्प्रहृष्टः पूजितः सर्वदेवतैः ॥१-१-८४॥
अभ्यषिच्य च लङ्कायां राक्षसेन्द्रं विभीषणम् ।
कृतकृत्यस्तदा रामो विज्वरः प्रमुमोद ह ॥१-१-८५॥
देवताभ्यो वरं प्राप्य समुत्थाप्य च वानरान् ।
अयोध्यां प्रस्थितो रामः पुष्पकेण सुहृद्वृतः ॥१-१-८६॥
भरद्वाजाश्रमं गत्वा रामः सत्यपराक्रमः ।
भरतस्यान्तिके रामो हनूमन्तं व्यसर्जयत् ॥१-१-८७॥
पुनराख्यायिकां जल्पन् सुग्रीवसहितस्तदा ।
पुष्पकं तत् समारुह्य नन्दिग्रामं ययौ तदा ॥१-१-८८॥
नन्दिग्रामे जटां हित्वा भ्रातृभिः सहितोऽनघः ।
रामः सीतामनुप्राप्य राज्यं पुनरवाप्तवान् ॥१-१-८९॥
प्रहृष्टमुदितो लोकस्तुष्टः पुष्टः सुधार्मिकः ।
निरामयो ह्यरोगश्च दुर्भिक्षभयवर्जितः ॥१-१-९०॥
न पुत्रमरणं केचित् द्रक्ष्यन्ति पुरुषाः क्वचित् ।
नार्यश्चाविधवा नित्यं भविष्यन्ति पतिव्रताः ॥१-१-९१॥
न चाग्निजं भयं किञ्चिन्नाप्सु मज्जन्ति जन्तवः ।
न वातजं भयं किञ्चित् नापि ज्वरकृतं तथा ॥१-१-९२॥
न चापि क्षुद्भयं तत्र न तस्करभयं तथा ।
नगराणि च राष्ट्राणि धनधान्ययुतानि च ॥१-१-९३॥
नित्यं प्रमुदिताः सर्वे यथा कृतयुगे तथा ।
अश्वमेधशतैरिष्ट्वा तथा बहुसुवर्णकैः ॥१-१-९४॥
गवां कोट्ययुतं दत्त्वा विद्वद्भ्यो विधिपूर्वकम् ।
असंख्येयं धनं दत्त्वा ब्राह्मणेभ्यो महायशाः ॥१-१-९५॥
राजवंशान् शतगुणान् स्थापयिष्यति राघवः ।
चातुर्वर्ण्यं च लोकेऽस्मिन् स्वे स्वे धर्मे नियोक्ष्यति ॥१-१-९६॥
दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च ।
रामो राज्यमुपासित्वा ब्रह्मलोकं प्रयास्यति ॥१-१-९७॥
इदं पवित्रं पापघ्नं पुण्यं वेदैश्च सम्मितम् ।
यः पठेद् रामचरितं सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥१-१-९८॥
एतदाख्यानमायुष्यं पठन् रामायणं नरः ।
सपुत्रपौत्रः सगणः प्रेत्य स्वर्गे महीयते ॥१-१-९९॥
पठन् द्विजो वागृषभत्वमीयात् ।
त् क्षत्रियो भूमिपतित्वमीयात् ॥
वणिक् जनः पण्यफलत्वमीयात् ।
जनश्च शूद्रोऽपि महत्त्वमीयात् ॥१-१-१००॥
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे बालकाण्डे प्रथमः सर्गः (श्लोक १ से १०)
श्लोक १: वाल्मीकि जी का नारद जी से प्रश्न
नारदं परिपप्रच्छ वाल्मीकिर्मुनिपुङ्गवम् ॥१-१-१॥
तपस्या और वेदों के स्वाध्याय में सदा लीन रहने वाले तपस्वी महर्षि वाल्मीकि ने, वाणी के जानकारों में श्रेष्ठ और मुनियों में प्रधान देवर्षि नारद से (उत्तम पुरुष के विषय में) पूछा।
The ascetic Sage Valmiki, who is constantly engaged in penance and self-study of scriptures, questioned Sage Narada, the foremost among the masters of speech and the best among sages.
श्लोक २: आदर्श मानव के गुण (भाग १)
धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च सत्यवाक्यो दृढव्रतः ॥१-१-२॥
इस समय इस संसार में ऐसा कौन व्यक्ति है जो सर्वगुण सम्पन्न, अत्यंत पराक्रमी, धर्म को जानने वाला, उपकारों को मानने वाला (कृतज्ञ), सदा सत्य बोलने वाला और अपने संकल्प पर दृढ़ रहने वाला हो?
Who in this world today is endowed with excellent virtues, possessed of great prowess, righteous, grateful, truthful in speech, and firm in his vows?
श्लोक ३: आदर्श मानव के गुण (भाग २)
विद्वान्कः कः समर्थश्च कश्चैकप्रियदर्शनः ॥१-१-३॥
वह कौन है जो उत्तम चरित्र से युक्त हो, सभी जीवों का कल्याण करने वाला हो, सब विद्याओं का विद्वान हो, हर कार्य को करने में समर्थ हो, और जिसका दर्शन सबके लिए अत्यंत प्रिय (सुंदर) हो?
Who is blended with good conduct, deeply interested in the welfare of all living beings, learned in all branches of knowledge, highly competent, and uniquely pleasing to look at?
श्लोक ४: आदर्श मानव के गुण (भाग ३)
कस्य बिभ्यति देवाश्च जातरोषस्य संयुगे ॥१-१-४॥
वह कौन है जिसने अपने मन और आत्मा पर विजय प्राप्त कर ली हो, जिसने क्रोध को जीत लिया हो, जो कांतिमान (तेजस्वी) हो, जो किसी से ईर्ष्या न करता हो, और जब युद्ध में उसे क्रोध आए तो देवता भी जिससे कांपने लगें?
Who is self-controlled, has conquered anger, is resplendent, free from envy, and when excited to wrath in battle, even the gods are afraid of him?
श्लोक ५: वाल्मीकि जी की जानने की उत्कंठा
महर्षे त्वं समर्थोऽसि ज्ञातुमेवंविधं नरम् ॥१-१-५॥
हे महर्षि! मैं ऐसे महापुरुष के बारे में सुनने की इच्छा रखता हूँ, क्योंकि मेरे मन में इसके लिए बहुत बड़ा कौतूहल (जिज्ञासा) है। आप त्रिकालदर्शी हैं, इसलिए ऐसे अद्वितीय मनुष्य को जानने में पूरी तरह समर्थ हैं।
O Great Sage! I desire to hear about such a man, for my curiosity is immense. You are indeed capable of knowing such an extraordinary human being.
श्लोक ६: नारद मुनि का हर्षित होना
श्रूयतामिति चामन्त्र्य प्रहृष्टो वाक्यमब्रवीत् ॥१-१-६॥
तीनों लोकों की बात जानने वाले देवर्षि नारद ने महर्षि वाल्मीकि के इन वचनों को सुनकर अत्यंत प्रसन्न होकर कहा—"हे मुने! आप ध्यानपूर्वक सुनिए", और फिर वे आगे इस प्रकार बोले।
Hearing these words of Valmiki, Sage Narada, who is the knower of all three worlds, felt extremely delighted and replied, "Please listen attentively," and spoke these words.
श्लोक ७: गुणों की दुर्लभता का वर्णन
मुने वक्ष्याम्यहं बुद्ध्वा तैर्युक्तः श्रूयतां नरः ॥१-१-७॥
हे मुने! जिन बहुत से और दुर्लभ गुणों का आपने वर्णन किया है, वे एक ही मनुष्य में मिलना बहुत कठिन हैं। फिर भी, अपनी बुद्धि से विचार करके मैं आपको ऐसे गुणों से युक्त पुरुष के बारे में बताता हूँ, आप सुनिए।
O Sage! The many and rare virtues that you have mentioned are indeed hard to find in a single person. However, after due deliberation, I will tell you about a man endowed with all these qualities; please listen.
श्लोक ८: भगवान श्रीराम का परिचय
नियतात्मा महावीर्यो द्युतिमान्धृतिमान्वशी ॥१-१-८॥
वे इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न हुए हैं, संसार में लोग उन्हें 'राम' नाम से जानते हैं। वे वश में की हुई आत्मा वाले (जितेन्द्रिय), परम पराक्रमी, कांतिमान, धैर्यवान और अपनी इंद्रियों को नियंत्रण में रखने वाले हैं।
Born in the Ikshvaku dynasty, he is known to the world by the name of 'Rama'. He is self-restrained, possessed of great valor, illustrious, patient, and a master of his senses.
श्लोक ९: श्रीराम के मानसिक और शारीरिक लक्षण (भाग १)
विपुलांसो महाबाहुः कम्बुग्रीवो महाहनुः ॥१-१-९॥
वे बुद्धिमान, नीतिज्ञ (नीति पर चलने वाले), कुशल वक्ता, परम शोभा संपन्न और शत्रुओं का नाश करने वाले हैं। उनके कंधे चौड़े हैं, भुजाएँ बड़ी (घुटनों तक लंबी) हैं, शंख जैसी सुंदर गर्दन है और उनकी ठुड्डी अत्यंत सुदृढ़ और सुंदर है।
He is wise, moral, eloquent, full of divine splendor, and the destroyer of his enemies. He has broad shoulders, long arms, a conch-shaped beautiful neck, and a strong chin.
श्लोक १०: श्रीराम के शारीरिक लक्षण (भाग २)
आजानुबाहुः सुशिराः सुललाटः सुविक्रमः ॥१-१-१०॥
उनका वक्षस्थल विशाल है, वे बड़े धनुष को धारण करने वाले हैं, उनकी हंसली (गले की हड्डी) मांस से ढकी हुई (गूढ) है, वे शत्रुओं का दमन करने वाले हैं। उनकी भुजाएँ घुटनों तक लंबी हैं, सिर सुंदर है, मस्तक विशाल और भव्य है तथा उनका पराक्रम अत्यंत श्रेष्ठ है।
He has a broad chest, wields a mighty bow, has well-concealed collarbones, and subdues his foes. His arms extend down to his knees, his head is well-shaped, his forehead is noble, and his stride is full of great prowess.
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे बालकाण्डे प्रथमः सर्गः (श्लोक ११ से २०)
श्लोक ११: श्रीराम का शारीरिक सौंदर्य और लक्षण
पीनवक्षा विशालाक्षो लक्ष्मीवाञ्छुभलक्षणः ॥१-१-११॥
वे (पक्षपात से रहित होने के कारण) सबके लिए समान हैं। उनके शरीर के सभी अंग सुडौल और आनुपातिक (समान रूप से विभक्त) हैं। उनका रंग अत्यंत स्निग्ध (आकर्षक) है, वे प्रतापी हैं। उनका वक्षस्थल चौड़ा, नेत्र बड़े-बड़े हैं और वे शुभ लक्षणों से युक्त तथा परम शोभायमान हैं।
He is unbiased and possesses perfectly proportionate bodily limbs. He has a pleasing complexion, is full of prowess, has a broad chest, large eyes, and is endowed with auspicious body signs and divine opulence.
श्लोक १२: श्रीराम के नैतिक और आध्यात्मिक गुण
यशस्वी ज्ञानसम्पन्नः शुचिर्वश्यः समाधिमान् ॥१-१-१२॥
वे धर्म के ज्ञाता हैं, अपनी प्रतिज्ञा के पक्के (सत्यप्रतिज्ञ) हैं और सदा प्रजा के कल्याण में लगे रहते हैं। वे अत्यंत यशस्वी, तत्वज्ञान से संपन्न, भीतर-बाहर से पवित्र, बड़ों के वश में रहने वाले (जितेन्द्रिय) और एकाग्र बुद्धि वाले हैं।
He is the knower of righteousness, true to his promises, and constantly engaged in the welfare of his subjects. He is renowned, full of wisdom, pure, self-controlled, and meditative.
श्लोक १३: जीवलोक और धर्म के रक्षक
रक्षिता जीवलोकस्य धर्मस्य परिरक्षिता ॥१-१-१३॥
वे प्रजा का पालन करने में ब्रह्मा जी (प्रजापति) के समान हैं, शोभा से संपन्न हैं, सबका भरण-पोषण करने वाले और शत्रुओं का नाश करने वाले हैं। वे इस संपूर्ण जीवलोक के रक्षक और सनातन धर्म की रक्षा करने वाले हैं।
He is equal to Prajapati (the lord of creation) in sustaining people, illustrious, the supporter of all, and the destroyer of enemies. He is the protector of the living world and the defender of righteousness (Dharma).
श्लोक १४: वेदों और धनुर्वेद के ज्ञाता
वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञो धनुर्वेदे च निष्ठितः ॥१-१-१४॥
वे अपने क्षत्रिय धर्म की रक्षा करने वाले और अपने आश्रित जनों के रक्षक हैं। वे वेदों और वेदांगों (शिक्षा, कल्प आदि) के वास्तविक तत्व को जानने वाले हैं तथा धनुर्वेद (युद्ध कला) में अत्यंत निपुण हैं।
He is the protector of his own duties (Kshatriya Dharma) and the savior of his own people. He is well-versed in the essence of the Vedas and Vedangas, and deeply proficient in Dhanurveda (the science of archery).
श्लोक १५: शास्त्रों के ज्ञाता और बुद्धिमान
सर्वलोकप्रियः साधुरदीनात्मा विचक्षणः ॥१-१-१५॥
वे संपूर्ण शास्त्रों के अर्थ और तत्व को जानने वाले हैं, उत्तम स्मरण शक्ति (स्मृति) से युक्त और विलक्षण प्रतिभा वाले हैं। वे संसार के सभी लोगों के प्रिय, सज्जन स्वभाव वाले, दीनता से रहित (स्वाभिमानी) और अत्यंत चतुर/कुशल हैं।
He knows the true meaning and essence of all scriptures, possesses an excellent memory, and is highly talented. He is beloved by the entire world, saintly, free from depression (magnanimous), and extremely wise.
श्लोक १६: समुद्र की भाँति पूजनीय और प्रियदर्शन
आर्यः सर्वसमश्चैव सदैव प्रियदर्शनः ॥१-१-१६॥
जैसे नदियाँ (सिन्धु) स्वतः समुद्र के पास जाती हैं, वैसे ही श्रेष्ठ और सज्जन पुरुष सदा श्रीराम के पास आश्रय के लिए आते हैं। वे श्रेष्ठ (आर्य) हैं, सबके प्रति समान भाव रखने वाले हैं और सदा ही प्रिय दिखने वाले हैं।
He is always approached by virtuous people, just as rivers flow naturally into the ocean. He is noble, treats everyone equally, and is ever pleasing to behold.
श्लोक १७: कौसल्या के आनंदवर्धन और धैर्यवान
समुद्र इव गाम्भीर्ये धैर्येण हिमवानिव ॥१-१-१७॥
वे समस्त कल्याणकारी गुणों से युक्त हैं और अपनी माता कौसल्या के आनंद को बढ़ाने वाले हैं। गंभीरता में वे अथाह समुद्र के समान हैं और धैर्य (स्थिरता) में साक्षात् हिमालय पर्वत के समान हैं।
He is endowed with all noble virtues and enhances the joy of his mother Kausalya. In profundity, he is like the deep ocean, and in fortitude, he is like the Himalayas.
श्लोक १८: विष्णु, चन्द्रमा और पृथ्वी से तुलना
कालाग्निसदृशः क्रोधे क्षमया पृथिवीसमः ॥१-१-१८॥
वे पराक्रम में भगवान विष्णु के समान हैं, मुख की सौम्यता और सुंदरता में चंद्रमा (सोम) के समान प्रिय हैं, क्रोध आने पर प्रलयकालीन अग्नि (कालाग्नि) के समान भयंकर हैं और क्षमाशीलता में साक्षात् पृथ्वी के समान हैं।
He is equal to Lord Vishnu in valor, as pleasing to look at as the moon; he is like the destructive cosmic fire in anger, and equal to the Earth in forgiveness.
श्लोक १९: कुबेर के समान दानी और सत्यवादी
तमेवंगुणसम्पन्नं रामं सत्यपराक्रमम् ॥१-१-१९॥
त्याग (दानशीलता) में वे धन के देवता कुबेर (धनद) के समान हैं और सत्य के मामले में वे दूसरे साक्षात् धर्मराज ही हैं। ऐसे दिव्य गुणों से संपन्न और सच्चे पराक्रम वाले श्रीराम को...
In liberality (charity), he is equal to Kubera (the god of wealth), and in truthfulness, he is like another personification of Dharma itself. To such a Rama, who is endowed with these virtues and possesses true valor...
श्लोक २०: राजा दशरथ की इच्छा
प्रकृतीनां हितैर्युक्तं प्रकृतिप्रियकाम्यया ॥१-१-२०॥
...राजा दशरथ के सबसे बड़े, ज्येष्ठ पुत्र होने के श्रेष्ठ गुणों से युक्त, राजा के अत्यंत प्रिय और प्रजा के कल्याण में सदा लगे रहने वाले श्रीराम को, प्रजा का प्रिय करने की इच्छा से (राजा दशरथ युवराज बनाना चाहते थे - अगले श्लोक से संबद्ध)।
...who was the eldest son of King Dasharatha, endowed with the best qualities of a first-born, deeply beloved, and always devoted to the welfare of the subjects, out of a desire to please the people (King Dasharatha wished to appoint him as the crown prince)...
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे बालकाण्डे प्रथमः सर्गः (श्लोक २१ से ३०)
श्लोक २१: राज्याभिषेक की तैयारी और कैकेयी का देखना
तस्याभिषेकसम्भारान् दृष्ट्वा भार्याथ कैकयी ॥१-१-२१॥
पृथ्वी के स्वामी राजा दशरथ ने अत्यंत प्रेमवश श्रीराम को युवराज पद पर नियुक्त करना चाहा। जब उनकी (दशरथ की) पत्नी कैकेयी ने राज्याभिषेक की सामग्रियों और तैयारियों को देखा, तब...
Out of deep affection, King Dasharatha wished to appoint Rama as the crown prince. However, upon seeing the preparations and arrangements for his coronation, his wife Kaikeyi...
श्लोक २२: कैकेयी द्वारा वरदान माँगना
विवासनञ्च रामस्य भरतस्याभिषेचनम् ॥१-१-२२॥
...तब उन देवी (कैकेयी) ने पूर्व में राजा द्वारा दिए गए वचनों (वरदानों) के आधार पर यह वरदान माँगा—राम को वनवास (१४ वर्ष के लिए देश-निकाला) दिया जाए और भरत का राज्याभिषेक किया जाए।
...demanded the boons that had been promised to her by the King in the past, which were: the exile of Rama into the forest and the coronation of Bharata.
श्लोक २३: राजा दशरथ का धर्मसंकट और निर्णय
विवासयामास सुतं रामं दशरथः प्रियम् ॥१-१-२३॥
अपने सत्य वचनों के कारण धर्म के बंधन में बंधे हुए राजा दशरथ ने अपने प्राणों से भी प्रिय पुत्र श्रीराम को वन भेज दिया (निर्वासित कर दिया)।
Bound by the shackles of righteousness and the absolute necessity of keeping his word, King Dasharatha exiled his deeply beloved son, Rama, to the forest.
श्लोक २४: श्रीराम का वन गमन
पितुर्वचननिर्देशात् कैकेय्याः प्रियकारणात् ॥१-१-२४॥
वे वीर श्रीराम अपने पिता की आज्ञा का पालन करने के लिए और अपनी माता कैकेयी को प्रिय लगने वाला कार्य करने (उनकी इच्छा पूरी करने) के लिए, अपनी प्रतिज्ञा निभाते हुए वन को चले गए।
To honor his father's command and to fulfill the desire of his mother Kaikeyi, the heroic Rama departed for the forest, keeping his solemn vow.
श्लोक २५: लक्ष्मण जी का अनुगमन
स्नेहाद् विनयसम्पन्नः सुमित्रानन्दवर्धनः ॥१-१-२५॥
उन (राम) के वन जाते समय, माता सुमित्रा के आनंद को बढ़ाने वाले, विनयशील और उनके प्रिय भाई लक्ष्मण भी अत्यंत स्नेहवश उनके पीछे-पीछे चल दिए।
As he departed, his beloved brother Lakshmana—the enhancer of mother Sumitra's joy, endowed with humility—followed him out of deep affection.
श्लोक २६: भ्रातृप्रेम और माता सीता का परिचय
रामस्य दयिता भार्या नित्यं प्राणसमा हिता ॥१-१-२६॥
अपने भाई के प्रति उत्तम भ्रातृप्रेम का आदर्श दिखाते हुए लक्ष्मण जी साथ गए। वहीं, श्रीराम की प्रिय पत्नी सीता, जो उन्हें सदा अपने प्राणों के समान प्रिय थीं और उनका कल्याण चाहने वाली थीं...
Thus, demonstrating exemplary brotherly devotion, the beloved Lakshmana accompanied him. Meanwhile, Rama's cherished wife, Sita, who was as dear to him as his own life and always devoted to his welfare...
श्लोक २७: सीता जी की दिव्यता
सर्वलक्षणसम्पन्ना नारीणामुत्तमा वधूः ॥१-१-२७॥
...जो राजा जनक के कुल में उत्पन्न हुई थीं, साक्षात् देवताओं की दिव्य माया की तरह निर्मित प्रतीत होती थीं, जो सभी उत्तम नारी-लक्षणों से संपन्न थीं और वधुओं में सबसे श्रेष्ठ थीं।
...who was born in the illustrious lineage of Janaka, looking as if created like a divine manifestation, endowed with all auspicious signs, and the most excellent among women.
श्लोक २८: रोहिणी की तरह सीता जी का साथ जाना
पौरैरनुगतो दूरं पित्रा दशरथेन च ॥१-१-२८॥
वे सीता जी भी श्रीराम के पीछे उसी प्रकार चल दीं जैसे चंद्रमा के पीछे रोहिणी नक्षत्र चलता है। नगरवासियों और स्वयं पिता दशरथ ने बहुत दूर तक श्रीराम का अनुगमन किया (उन्हें विदा करने पीछे-पीछे गए)।
Sita too followed Rama, just as the constellation Rohini follows the Moon. They were accompanied to a great distance by the citizens of Ayodhya and his father, King Dasharatha.
श्लोक २९: श्रृंगवेरपुर आगमन और सुमंत की विदाई
गुहमासाद्य धर्मात्मा निषादाधिपतिं प्रियम् ॥१-१-२९॥
गंगा जी के तट पर स्थित श्रृंगवेरपुर पहुँचकर, धर्मात्मा श्रीराम ने अपने प्रिय मित्र और निषादों के राजा गुह से भेंट की, तथा वहाँ अपने सारथि (सूत) सुमंत को रथ सहित वापस अयोध्या लौट जाने की आज्ञा दी।
Reaching Shringaverapura on the banks of the Ganges, the righteous Rama met his dear friend Guha, the king of the Nishadas, and sent back his charioteer, Sumantra, to Ayodhya.
श्लोक ३०: गंगा पार करना
ते वनेन वनङ्गत्वा नदीस्तीर्त्वा बहूदकाः ॥१-१-३०॥
निषादराज गुह, भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ मिलकर श्रीराम ने प्रचुर जल वाली नदियों (गंगा जी आदि) को पार किया और फिर वे एक वन से दूसरे वन की ओर आगे बढ़ते गए।
Accompanied by Guha, Lakshmana, and Sita, Rama crossed the deep and wide rivers, journeying from one forest to another.
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे बालकाण्डे प्रथमः सर्गः (श्लोक ३१ से ४०)
श्लोक ३१: चित्रकूट आगमन और कुटिया निर्माण
रम्यमावसथं कृत्वा रममाणा वने त्रयः ॥१-१-३१॥
महर्षि भरद्वाज की आज्ञा (निर्देश) से चित्रकूट पर्वत पर पहुँचकर, उन तीनों (राम, लक्ष्मण और सीता) ने एक सुंदर पर्णकुटी (आवास) बनाई और वे उस रमणीय वन में आनंदपूर्वक रहने लगे।
Arriving at Chitrakoot by the command of Sage Bharadwaja, the three of them (Rama, Lakshmana, and Sita) built a beautiful hermitage and lived happily in that lovely forest.
श्लोक ३२: सुखद निवास और राजा दशरथ का शोक
चित्रकूटङ्गते रामे पुत्रशोकातुरस्तथा ॥१-१-३२॥
वहाँ वे देव और गंधर्वों के समान दिव्य होकर सुखपूर्वक रहने लगे। इधर श्रीराम के चित्रकूट चले जाने पर, पुत्र के शोक से अत्यंत व्याकुल और पीड़ित होकर...
There, looking divine like gods and Gandharvas, they lived comfortably. Meanwhile, when Rama reached Chitrakoot, being deeply distressed by the grief of separation from his son...
श्लोक ३३: राजा दशरथ का प्राण त्यागना और भरत जी का इनकार
गते तु तस्मिन् भरतो वसिष्ठप्रमुखैर्द्विजैः ॥१-१-३३॥
...राजा दशरथ पुत्र 'राम-राम' विलाप करते हुए स्वर्ग सिधार गए। उनके परलोक गमन के बाद, महर्षि वसिष्ठ आदि प्रमुख ब्राह्मणों द्वारा राज्य सँभालने के लिए कहे जाने पर भी महाबली भरत ने राज्य स्वीकार नहीं किया।
...King Dasharatha passed away to heaven, lamenting for his son. After his demise, though urged by the eminent Brahmanas headed by Sage Vashistha to take the kingdom, the mighty Bharata did not desire the throne.
श्लोक ३४: भरत जी का वन गमन
स जगाम वनं वीरो रामपादप्रसादकः ॥१-१-३४॥
राज्य के लिए नियुक्त किए जाने पर भी महाबली भरत ने राज्य की इच्छा नहीं की। वे वीर भरत श्रीराम के चरणों को प्रसन्न करने (उन्हें वापस अयोध्या लौटाने) के लिए वन की ओर चल दिए।
Even when appointed to rule, the extremely powerful Bharata refused the kingdom. That heroic soul instead departed for the forest to propitiate Rama's feet (to persuade him to return).
श्लोक ३५: भरत जी की श्रीराम से प्रार्थना
अयाचद्भ्रातरं रामम् आर्यभावपुरस्कृतः ॥१-१-३५॥
वन में जाकर उन्होंने सत्य पराक्रमी महात्मा श्रीराम को देखा और अपने श्रेष्ठ भ्रातृभाव (आर्यभाव) को सामने रखते हुए अपने भाई राम से अयोध्या वापस चलने की प्रार्थना की।
Approaching the high-souled Rama of true prowess, Bharata, motivated by noble brotherly affection, entreated his brother Rama to return.
श्लोक ३६: "आप ही राजा हैं" और श्रीराम का स्वभाव
रामोऽपि परमोदारः सुमुखस्सुमहायशाः ॥१-१-३६॥
भरत ने श्रीराम से कहा—"हे धर्म के ज्ञाता! आप ही हमारे राजा हैं।" यह सुनकर परम उदार, प्रसन्न मुख वाले और महान यशस्वी श्रीराम ने...
Bharata said to Rama, "You alone are the king, O knower of righteousness!" Hearing this, the exceedingly generous, pleasant-faced, and highly illustrious Rama...
श्लोक ३७: पिता की आज्ञा सर्वोपरि और पादुका दान
पादुके चास्य राज्याय न्यासं दत्त्वा पुनः पुनः ॥१-१-३७॥
...महाबलवान श्रीराम ने पिता की आज्ञा के कारण राज्य स्वीकार करना नहीं चाहा। उन्होंने भरत को बार-बार समझाया और राज्य संचालन के लिए धरोहर (न्यास) के रूप में अपनी चरण-पादुकाएं दे दीं।
...did not wish for the kingdom, honoring his father's command. Instead, after consoling and convincing him repeatedly, Rama gave his wooden sandals to Bharata as a trust to rule the kingdom.
श्लोक ३८: भरत जी की विदाई
स काममनवाप्यैव रामपादावुपस्पृशन् ॥१-१-३८॥
इसके बाद भरत के अग्रज (बड़े भाई) श्रीराम ने भरत को वापस लौटा दिया। अपनी इच्छा (राम को वापस लाने की) पूरी न होने पर भी, श्रीराम के चरणों का स्पर्श करके भरत लौट आए।
Thereafter, Rama (the elder brother of Bharata) sent Bharata back. Though his desire remained unfulfilled, Bharata reverently touched Rama's feet and turned back.
श्लोक ३९: नन्दिग्राम में राज्य और श्रीराम का संकल्प
गते तु भरते श्रीमान् सत्यसन्धो जितेन्द्रियः ॥१-१-३९॥
भरत जी अयोध्या के बाहर नन्दिग्राम में रहकर, श्रीराम के आगमन की प्रतीक्षा करते हुए पादुकाओं के माध्यम से राज्य चलाने लगे। उधर भरत के चले जाने पर, सत्यप्रतिज्ञ और जितेन्द्रिय श्रीमान राम ने...
Bharata began ruling the kingdom from Nandigram, eagerly awaiting Rama's return. After Bharata had left, the glorious, truthful, and self-controlled Rama...
श्लोक ४०: दण्डकारण्य में प्रवेश
तत्रागमनमेकाग्रो दण्डकान् प्रविवेश ह ॥१-१-४०॥
...श्रीराम ने यह विचार करके कि अयोध्या के नागरिक और लोग फिर से उनसे मिलने वहाँ (चित्रकूट) आ सकते हैं, एकाग्रचित्त होकर सीता और लक्ष्मण के साथ घने दण्डकारण्य वन में प्रवेश किया।
...perceiving that the citizens and townspeople might visit him there again, Rama, focusing his mind, entered the deep Dandaka forest (to live in deeper seclusion).
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे बालकाण्डे प्रथमः सर्गः (श्लोक ४१ से ५०)
श्लोक ४१: विराध वध और शरभंग दर्शन
विराधं राक्षसं हत्वा शरभङ्गं ददर्श ह ॥१-१-४१॥
उस महान और घने वन (दण्डकारण्य) में प्रवेश करके कमल जैसे नेत्रों वाले श्रीराम ने विराध नामक भयानक राक्षस का वध किया और फिर वे परम तपस्वी महर्षि शरभंग के दर्शन करने गए।
Upon entering the great forest, the lotus-eyed Rama slew the demon Viradha and then paid a visit to the eminent Sage Sharabhanga.
श्लोक ४२: मुनियों से भेंट और इन्द्र का धनुष
अगस्त्यवचनाच्चैव जग्राहैन्द्रं शरासनम् ॥१-१-४२॥
इसके बाद उन्होंने ऋषि सुतीक्ष्ण, महर्षि अगस्त्य और अगस्त्य के भाई (इध्मवाह) से भेंट की। महर्षि अगस्त्य के कहे अनुसार श्रीराम ने इंद्र का दिव्य धनुष ग्रहण किया।
He then visited Sage Sutikshna, Sage Agastya, and Agastya's brother. Following the advice of Sage Agastya, Rama accepted the divine bow belonging to Indra.
श्लोक ४३: दिव्य अस्त्रों की प्राप्ति
वसतस्तस्य रामस्य वने वनचरैः सह ॥१-१-४३॥
धनुष के साथ ही उन्होंने एक उत्तम तलवार और कभी समाप्त न होने वाले बाणों से युक्त दो तरकश (तूणीर) परम प्रसन्नता के साथ स्वीकार किए। जब श्रीराम वनवासियों (ऋषियों-मुनियों) के साथ उस वन में रह रहे थे, तब...
Along with the bow, he delightfully accepted a magnificent sword and two quivers containing inexhaustible arrows. While Rama was residing in the forest with the forest-dwellers...
श्लोक ४४: ऋषियों की प्रार्थना और श्रीराम का वचन
स तेषां प्रतिशुश्राव राक्षसानां तदा वने ॥१-१-४४॥
...तब वहाँ के सभी ऋषि-मुनि राक्षसों और असुरों के वध की प्रार्थना लेकर श्रीराम के पास आए। श्रीराम ने उस वन में ऋषियों को आश्वस्त करते हुए राक्षसों के संहार की प्रतिज्ञा की।
...all the sages approached him, requesting the destruction of the demons and Asuras. Rama gave his solemn promise to them in the forest to destroy those demons.
श्लोक ४५: दण्डकारण्य के ऋषियों से प्रतिज्ञा
ऋषीणामग्निकल्पानां दण्डकारण्यवासीनाम् ॥१-१-४५॥
दण्डकारण्य वन में रहने वाले, अग्नि के समान तेजस्वी ऋषि-मुनियों के सामने श्रीराम ने प्रतिज्ञा की कि वे युद्ध में राक्षसों का पूर्ण विनाश करेंगे।
A pledge was taken by Rama before the fire-like effulgent sages residing in the Dandaka forest to slaughter the demons in battle.
श्लोक ४६: शूर्पणखा को विरूपित करना
विरूपिता शूर्पणखा राक्षसी कामरूपिणी ॥१-१-४६॥
वहाँ रहते हुए, जनस्थान (दण्डकारण्य का एक भाग) में घूमने वाली और इच्छानुसार रूप बदलने की शक्ति रखने वाली (कामरूपिणी) शूर्पणखा नामक राक्षसी को श्रीराम के आदेश से लक्ष्मण ने नाक-कान काटकर विरूपित (विकृत) कर दिया।
While he was residing there, the demoness named Surpanakha, who lived in Janasthana and could assume any form at will, was disfigured (on Rama's order by Lakshmana).
श्लोक ४७: खर, दूषण और त्रिशिरा का आक्रमण
खरं त्रिशिरसं चैव दूषणं चैव राक्षसम् ॥१-१-४७॥
इसके बाद, शूर्पणखा के भड़काने पर आक्रमण करने वाले सभी राक्षसों सहित उनके सेनापतियों—खर, त्रिशिरा और दूषण नामक राक्षसों को...
Thereupon, incited by the words of Surpanakha, all the charging demons, along with the fierce demons named Khara, Trishira, and Dushana...
श्लोक ४८: १४,००0 राक्षसों का विनाश
वने तस्मिन् निवसता जनस्थाननिवासिनाम् ॥१-१-४८॥
...श्रीराम ने अकेले ही युद्ध में उन सभी मुख्य राक्षसों और उनके पीछे चलने वाले अनुचरों (सैनिकों) को मार गिराया। उस वन के जनस्थान क्षेत्र में रहने वाले...
...were slain in battle by Rama, along with their followers. Of those demons residing in the Janasthana area of that forest...
श्लोक ४९: रावण का क्रोधित होना
ततो ज्ञातिवधं श्रुत्वा रावणः क्रोधमूर्छितः ॥१-१-४९॥
...कुल चौदह हजार (१४,०००) राक्षस मारे गए। जब रावण ने अपने भाइयों, सेनापतियों और सगे-संबंधियों के इस भयंकर विनाश की बात सुनी, तो वह क्रोध से अंधा (मूर्छित) हो उठा।
...fourteen thousand (14,000) were thoroughly annihilated. Hearing of the slaughter of his kinsmen, Ravana became blind with overwhelming rage.
श्लोक ५०: रावण द्वारा मारीच से सहायता माँगना
वार्यमाणः सुबहुशो मारीचेन स रावणः ॥१-१-५०॥
क्रोध में भरे रावण ने बदला लेने के लिए मारीच नामक मायावी राक्षस से सहायता माँगी, यद्यपि मारीच ने पहले ही रावण को श्रीराम की शक्ति के विषय में सचेत करते हुए बार-बार ऐसा करने से रोका था।
Seeking vengeance, Ravana sought the assistance of a demon named Maricha, even though Maricha had repeatedly warned and tried to dissuade Ravana (by highlighting Rama's power).
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे बालकाण्डे प्रथमः सर्गः (श्लोक ५१ से ६०)
श्लोक ५१: मारीच की चेतावनी और काल की प्रेरणा
अनादृत्य तु तद्वाक्यं रावणः कालचोदितः ॥१-१-५१॥
मारीच ने रावण से कहा था—"हे रावण! उस परम बलवान श्रीराम के साथ तुम्हारा विरोध करना किसी भी तरह उचित नहीं है।" परंतु मृत्यु के वश में होने के कारण (कालचोदित), रावण ने मारीच के उन वचनों का अनादर कर दिया।
Maricha had warned, "O Ravana, it is not proper for you to oppose that powerful Rama." However, driven by destiny (impelled by death), Ravana disregarded those wise words.
श्लोक ५२: आश्रम गमन और राजकुमारों को भटकाना
तेन यामाविना दूरमपवाह्य नृपात्मजौ ॥१-१-५२॥
फिर रावण मारीच को साथ लेकर श्रीराम के आश्रम पहुँचा। वहाँ उस मायावी मारीच (स्वर्ण मृग) ने चालाकी से दोनों राजकुमारों (राम और लक्ष्मण) को कुटिया से बहुत दूर भटका दिया।
Then, accompanied by Maricha, Ravana went to Rama's hermitage. There, that illusory demon (in the guise of a golden deer) lured both the princely brothers far away from the cottage.
श्लोक ५३: सीता हरण और जटायु वध
गृध्रञ्च निहतं दृष्ट्वा हृतां श्रुत्वा च मैथिलीम् ॥१-१-५३॥
पीछे से रावण ने रोकने वाले गिद्धराज जटायु का वध करके श्रीराम की पत्नी सीता का बलपूर्वक हरण कर लिया। जब श्रीराम ने लौटकर जटायु को घायल अवस्था में मरा हुआ देखा और मिथिलेश कुमारी (सीता) के हरण का समाचार सुना, तब...
Ravana then forcefully abducted Rama's wife after fatally wounding Jatayu, the king of vultures. Upon seeing the slain vulture and learning about the abduction of Mythili (Sita)...
श्लोक ५४: श्रीराम का विलाप और जटायु का दाह-संस्कार
ततस्तेनैव शोकेन गृध्रं दग्ध्वा जटायुषम् ॥१-१-५४॥
...तब रघुकुल के शिरोमणि श्रीराम शोक से तप्त होकर व्याकुल इंद्रियों के साथ विलाप करने लगे। फिर उन्होंने उसी गहरी शोक की अवस्था में गिद्धराज जटायु का (पिता के समान) अंतिम संस्कार (दाह) किया।
...Raghav (Rama), consumed by immense grief and with agitated senses, lamented deeply. Thereafter, despite his profound sorrow, he performed the funeral rites for the vulture Jatayu.
श्लोक ५५: कबन्ध राक्षस से भेंट
कबन्धं नाम रूपेण विकृतं घोरदर्शनम् ॥१-१-५५॥
वन में सीता जी की खोज करते हुए श्रीराम ने कबन्ध नाम के एक राक्षस को देखा, जो शरीर से अत्यंत विकृत (बिना सिर और पैर वाला) और देखने में बहुत ही भयानक था।
While searching for Sita in the forest, he encountered a demon named Kabandha, who was physically deformed and terrifying to behold.
श्लोक ५६: कबन्ध का उद्धार और शबरी का मार्ग
स चास्य कथयामास शबरीं धर्मचारिणीम् ॥१-१-५६॥
महाबाहु श्रीराम ने उसका वध करके उसके शव का दाह किया, जिससे वह शापमुक्त होकर स्वर्ग चला गया। स्वर्ग जाते हुए उस दिव्य पुरुष (कबन्ध) ने श्रीराम से धर्म का आचरण करने वाली शबरी के पास जाने को कहा।
The mighty-armed Rama slew him and cremated his body, enabling him to ascend to heaven. In turn, he (Kabandha) informed Rama about the righteous ascetic woman, Shabari.
श्लोक ५७: शबरी आश्रम गमन
सोऽभ्य गच्छन्महातेजाः शबरीं शत्रुसूदनः ॥१-१-५७॥
कबन्ध ने कहा था—"हे राघव! आप धर्म में निपुण उस श्रमणी (तपस्विनी शबरी) के पास जाइए।" तब शत्रुओं का नाश करने वाले महातेजस्वी श्रीराम शबरी के आश्रम पहुँचे।
Kabandha advised, "O Raghava, go to that highly pious ascetic woman." Following this, the glorious destroyer of enemies, Rama, approached Shabari.
श्लोक ५८: शबरी पूजा और हनुमान जी से भेंट
पम्पातीरे हनुमता सङ्गतो वानरेण ह ॥१-१-५८॥
दशरथ नंदन श्रीराम का शबरी ने भक्तिपूर्वक भली-भांति पूजन (आदर-सत्कार) किया। इसके बाद वे पम्पा सरोवर के तट पर पहुँचे, जहाँ उनकी भेंट वानर हनुमान जी से हुई।
The son of Dasharatha, Rama, was reverently worshipped and hospitably received by Shabari. Later, on the banks of Pampa lake, he met the vanara, Hanuman.
श्लोक ५९: सुग्रीव से मिलन
सुग्रीवाय च तत्सर्वं शंसद्रामो महाबलः ॥१-१-५९॥
हनुमान जी की बातों (और मध्यस्थता) के कारण ही श्रीराम की भेंट सुग्रीव से हुई। तब महाबलवान श्रीराम ने सुग्रीव को वह सब बातें विस्तार से बताईं, जो घटित हुई थीं।
Through the counsel and introduction of Hanuman, Rama met Sugriva. The immensely powerful Rama then narrated all the events that had occurred to Sugriva.
श्लोक ६०: सुग्रीव का कथा सुनना
सुग्रीवश्चापि तत्सर्वं श्रुत्वा रामस्य वानरः ॥१-१-६०॥
श्रीराम ने आदि से लेकर अंत तक की अपनी पूरी कहानी और विशेष रूप से सीता जी के अपहरण का पूरा प्रसंग सुनाया। वानर सुग्रीव ने भी श्रीराम की उन सभी बातों को ध्यानपूर्वक सुना।
He recounted everything right from the beginning, especially emphasizing the abduction of Sita. The vanara Sugriva listened to everything recounted by Rama with great attention.
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे बालकाण्डे प्रथमः सर्गः (श्लोक ६१ से ७०)
श्लोक ६१: अग्नि-साक्षी मित्रता
ततो वानरराजेन वैरानुकथनं प्रति ॥१-१-६१॥
पूरी कथा सुनने के बाद, वानर सुग्रीव ने अत्यंत प्रसन्न होकर पवित्र अग्नि को साक्षी मानकर श्रीराम के साथ मित्रता (सख्य) की। इसके बाद, उस वानरराज ने बाली के साथ अपने वैर (दुश्मनी) के विषय में...
Having heard everything, the delighted vanara Sugriva forged a firm bond of friendship with Rama, witnessing it before the sacred fire. Thereafter, the king of vanaras, regarding his enmity with Bali...
श्लोक ६२: सुग्रीव का दुःख और श्रीराम की प्रतिज्ञा
प्रतिज्ञातञ्च रामेण तदा वालिवधं प्रति ॥१-१-६२॥
...गहरे दुःख से पीड़ित सुग्रीव ने प्रेमपूर्वक सब कुछ श्रीराम को निवेदित कर दिया (बता दिया)। तब श्रीराम ने भी सुग्रीव को संबल देते हुए बाली के वध की प्रतिज्ञा की।
...disclosed everything to Rama out of affection and deep sorrow. Thereupon, Rama solemnly pledged to bring about the destruction of Bali.
श्लोक ६३: बाली का बल और सुग्रीव का संदेह
सुग्रीवः शङ्कितश्चासीन्नित्यं वीर्येण राघवे ॥१-१-६३॥
वहाँ वानर सुग्रीव ने बाली के असीम बल और पराक्रम का वर्णन किया। सुग्रीव वास्तव में रघुकुल नंदन श्रीराम के पराक्रम को लेकर मन ही मन आशंकित था (उसे संदेह था कि क्या राम बाली को हरा पाएंगे)।
The vanara Sugriva then described the immense strength of Bali, as he was constantly doubtful about Raghava's (Rama's) own prowess in comparison to Bali.
श्लोक ६४: दुन्दुभी का विशाल शरीर दिखाना
दर्शयामास सुग्रीवः महापर्वतसन्निभम् ॥१-१-६४॥
श्रीराम के मन में अपने प्रति विश्वास (प्रत्यय) जगाने के लिए सुग्रीव ने उन्हें दुन्दुभी नामक असुर का वह विशाल और भारी कंकाल दिखाया, जो किसी ऊंचे पर्वत के समान दिखाई देता था।
In order to test and convince Raghava of his strength, Sugriva showed him the massive skeleton of the demon Dundubhi, which resembled a huge mountain.
श्लोक ६५: पैर के अंगूठे से कंकाल को फेंकना
पादाङ्गुष्ठेन चिक्षेप संपूर्णं दशयोजनम् ॥१-१-६५॥
महाबलवान और विशाल भुजाओं वाले श्रीराम ने उस हड्डियों के ढेर को देखा और मंद-मंद मुस्कुराते हुए (बिना किसी प्रयास के) अपने पैर के अंगूठे की ठोकर से उसे पूरे दस योजन (लगभग ८० मील) दूर फेंक दिया।
The mighty-armed and powerful Rama looked at the skeleton, smiled gently, and with just the big toe of his foot, tossed it a full distance of ten yojanas away.
श्लोक ६६: सप्तताल वेधन
गिरिं रसातलञ्चैव जनयन् प्रत्ययं तथा ॥१-१-६६॥
सुग्रीव का पूर्ण विश्वास जीतने के लिए उन्होंने अपने एक ही महान बाण (महेषु) से ताड़ के सात वृक्षों (सप्तसाल), विशाल पर्वत और यहाँ तक कि पृथ्वी के नीचे रसातल को भी भेद कर दिखा दिया।
Furthermore, to inspire absolute confidence, he pierced seven heavy palm trees, a mountain, and the subterranean earth (Rasatala) with a single mighty arrow.
श्लोक ६७: सुग्रीव का विश्वास और किष्किंधा गमन
किष्किन्धां रामसहितो जगाम च गुहां तदा ॥१-१-७७॥
श्रीराम का यह अद्भुत चमत्कार देखकर वह महान कपि (सुग्रीव) भीतर से अत्यंत प्रसन्न और पूरी तरह आश्वस्त (विश्वस्त) हो गया। इसके बाद वह श्रीराम को साथ लेकर किष्किंधा की उस पर्वत-गुफा (साम्राज्य) की ओर चल दिया।
Witnessing this marvel, the great monkey Sugriva felt delighted and gained complete confidence. He then proceeded towards the mountain cave of Kishkindha along with Rama.
श्लोक ६८: सुग्रीव की गर्जना और बाली का निकलना
तेन नादेन महता निर्जगाम हरीश्वरः ॥१-१-६८॥
वहाँ पहुँचकर सोने के समान पीली आभा वाले वानरश्रेष्ठ सुग्रीव ने भयंकर गर्जना की। उस भयंकर सिंहनाद को सुनकर वानरों का वर्तमान स्वामी (हरीश्वर) बाली गुफा से बाहर निकल आया।
Then, the golden-complexioned best of monkeys, Sugriva, roared fiercely. Hearing that thunderous roar, the lord of monkeys, Bali, came out of his cave.
श्लोक ६९: तारा को समझाना और बाली वध
निजघान च तत्रैनं शरेणैकेन राघवः ॥१-१-६९॥
अपनी पत्नी तारा के रोकने पर भी उसे जैसे-तैसे समझाकर (या अनदेखा कर) बाली बाहर आया और सुग्रीव के साथ मल्ल युद्ध करने लगा। उसी समय रघुकुल नंदन श्रीराम ने वहाँ छिपे रहकर एक ही बाण से बाली का वध कर दिया।
After pacifying his wife Tara (who tried to stop him), Bali encountered Sugriva in combat. Right there, Raghava (Rama) slew him with a single arrow.
श्लोक ७०: सुग्रीव का राज्याभिषेक
सुग्रीवमेव तद्राज्ये राघवः प्रत्यपादयत् ॥१-१-७०॥
इस प्रकार युद्ध में बाली का वध करने के बाद, पूर्व में सुग्रीव को दिए गए वचनों के अनुसार, श्रीराम ने सुग्रीव को ही किष्किंधा के उस विशाल राज्य के सिंहासन पर प्रतिष्ठित (राज्याभिषिक्त) किया।
Thus, having killed Bali in battle, Raghava fulfilled his word and installed Sugriva upon the throne of that kingdom.
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे बालकाण्डे प्रथमः सर्गः (श्लोक ७१ से ८०)
श्लोक ७१: सुग्रीव द्वारा वानरों का आह्वान
दिशः प्रस्थापयामास दिदृक्षुर्जनकात्मजाम् ॥१-१-७१॥
राज्याभिषेक के बाद, वानरश्रेष्ठ सुग्रीव ने सभी मुख्य वानरों को एक स्थान पर एकत्रित किया और जनक नंदिनी सीता जी का पता लगाने (देखने की इच्छा से) के लिए उन्हें चारों दिशाओं में भेज दिया।
After being crowned, the foremost among vanaras, Sugriva, summoned all the monkeys together and dispatched them in all directions, desirous of discovering Janaka's daughter, Sita.
श्लोक ७२: संपाती द्वारा सीता जी का पता बताना
शतयोजनविस्तीर्णं पुप्लुवे लवणार्णवम् ॥१-१-७२॥
इसके बाद, जटायु के बड़े भाई गिद्धराज संपाती के वचनों (कि सीता लंका में हैं) से राह पाकर, परम बलशाली हनुमान जी ने सौ योजन चौड़े खारे समुद्र (लवणार्णव) को लाँघने के लिए छलांग लगाई।
Thereafter, guided by the words of the vulture Sampati, the mighty Hanuman leaped across the salt ocean, which was a hundred yojanas wide.
श्लोक ७३: लंका प्रवेश और अशोक वाटिका
ददर्श सीतां ध्यायन्तीं अशोकवनिकां गताम् ॥१-१-७३॥
वहाँ रावण द्वारा शासित लंकापुरी में पहुँचकर, हनुमान जी ने अशोक वाटिका में बैठी हुई और निरंतर भगवान श्रीराम का ध्यान करने वाली माता सीता के दर्शन किए।
Reaching the city of Lanka ruled by Ravana, he found Sita in the Ashoka grove, deeply immersed in the contemplation of Rama.
श्लोक ७४: मुद्रिका प्रदान करना और आश्वासन
समाश्वास्य च वैदेहीं मर्दयामास तोरणम् ॥१-१-७४॥
हनुमान जी ने श्रीराम द्वारा दी गई पहचान (अंगूठी/मुद्रिका) माता सीता को सौंपी, उन्हें सुग्रीव से मित्रता का सारा समाचार सुनाया, विलाप करती हुई विदेह कुमारी (सीता) को सांत्वना दी और फिर लौटते समय लंका के मुख्य द्वार (तोरण) व वाटिका को उजाड़ना शुरू कर दिया।
Handing over the token of recognition (the ring) and conveying the news of Rama, he consoled Vaidehi (Sita), and subsequently destroyed the ornamental archway and grove of Lanka.
श्लोक ७५: रक्षकों का वध और अक्ष कुमार का अंत
शूरमक्षं च सम्पिष्य ग्रहणं समुपलेभिवान् ॥१-१-७५॥
वाटिका की रक्षा करने आए रावण के पाँच सेनापतियों, सात मंत्रियों के पुत्रों और रावण के वीर पुत्र अक्ष कुमार को कुचलकर यमलोक भेजने के बाद, हनुमान जी ने जानबूझकर स्वयं को (ब्रह्मास्त्र के पाश में) बंधने दिया।
After slaying five army commanders, seven sons of ministers, and crushing the heroic Aksha Kumar (Ravana's son), Hanuman allowed himself to be captured.
श्लोक ७६: ब्रह्मास्त्र का सम्मान और लंका दहन
मर्षयन् राक्षसान् वीरो दग्ध्वा लङ्कां पुरीं त्विताम् ॥१-१-७६॥
पितामह ब्रह्मा जी के वरदान के कारण स्वयं को उस अस्त्र (ब्रह्मास्त्र) के बंधन से मुक्त जानते हुए भी, उन राक्षसों के दुर्व्यवहार को वीर हनुमान सहते रहे। अंत में, उन्होंने रावण की उस सोने की लंकापुरी को अपनी पूँछ की आग से जलाकर राख कर दिया।
Though knowing himself to be free from the weapon's power due to Lord Brahma's boon, the heroic Hanuman endured the demons and eventually set the entire city of Lanka on fire.
श्लोक ७७: माता सीता को प्रणाम और वापसी
रानयित्वा महातेजाः प्रतिजगाम सागरम् ॥१-१-७७॥
लंका दहन के बाद, महातेजस्वी हनुमान जी ने मैथिली (सीता जी) के पास जाकर उनके दुःखों को दूर किया, उन्हें आश्वस्त कर आनंदित किया और उनका चूड़ामणि (अभिज्ञान) लेकर वापस समुद्र पार लौट आए।
Assuring and gladdening Mythili (Sita) by mitigating her sorrow, the highly effulgent Hanuman took her leave and crossed back over the ocean.
श्लोक ७८: श्रीराम को शुभ समाचार देना
न्यवेदददमित्यात्मा दृष्टा सीतेति तत्त्वतः ॥१-१-७८॥
लौटकर उन उदार हृदय वाले हनुमान जी ने महात्मा श्रीराम के पास जाकर उनकी प्रदक्षिणा की और अत्यंत संक्षेप में सत्य समाचार देते हुए कहा—"मैंने माता सीता के साक्षात् दर्शन किए हैं।"
Approaching the high-souled Raghava and circumambulating him, the noble Hanuman reported the exact truth, saying, "Sita has been seen!"
श्लोक ७९: सुग्रीव के साथ समुद्र तट की ओर प्रस्थान
समुद्रं क्षोभयामास शरैरादित्यसन्निभैः ॥१-१-७९॥
सीता जी का पता मिलने के बाद, श्रीराम सुग्रीव और वानर सेना के साथ विशाल महासागर के तट पर पहुँचे। जब सागर ने मार्ग नहीं दिया, तो उन्होंने सूर्य के समान तेजस्वी बाणों की वर्षा करके समुद्र को आंदोलित (क्रोधित/क्षुब्ध) कर दिया।
Thereafter, along with Sugriva, Rama reached the shores of the great ocean. He agitated the sea with his sun-bright arrows when it refused to grant way.
श्लोक ८०: समुद्र देव का प्रकट होना और सेतु का मार्ग
समुद्रवचनाच्चैव नलं सेतुमकारयत् ॥१-१-८०॥
तब नदियों के स्वामी समुद्र देव ने स्वयं प्रकट होकर श्रीराम को दर्शन दिए और उनके भय से मुक्त होने के लिए समुद्र देव के कथनानुसार ही श्रीराम ने वानर नल के माध्यम से समुद्र पर विशाल पुल (सेतु) का निर्माण करवाया।
Then, the lord of rivers, Ocean God, manifested himself. Following the ocean's advice, Rama had a bridge built across the sea by the vanara Nala.
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे बालकाण्डे प्रथमः सर्गः (श्लोक ८१ से ९०)
श्लोक ८१: लंका में प्रवेश और रावण का वध
रामः सीतामनुप्राप्य परां व्रीडामुपागमत् ॥१-१-८१॥
उस निर्मित सेतु के द्वारा लंकापुरी पहुँचकर, भगवान श्रीराम ने भयंकर युद्ध में रावण का वध कर दिया। इसके बाद सीता जी को वापस पाकर (लोक-लाज और मर्यादा के कारण) वे अत्यंत संकोच (व्रीडा) को प्राप्त हुए।
Crossing over by that bridge, Rama reached the city of Lanka and slew Ravana in battle. Having recovered Sita, Rama experienced great hesitation (owing to public scrutiny).
श्लोक ८२: श्रीराम के कड़े वचन और सीता जी की अग्निपरीक्षा
अमृष्यमाणा सा सीता विवेश ज्वलनं सती ॥१-१-८२॥
तब श्रीराम ने जन-समुदाय के सामने सीता जी से कुछ कड़े (परुष) शब्द कहे। उन वचनों को सहन न कर पाने के कारण, पतिव्रता सती सीता जी ने अपनी पवित्रता सिद्ध करने के लिए जलती हुई अग्नि में प्रवेश किया।
Rama then spoke harsh words to her in the presence of the assembly. Unable to bear those words, the chaste Sita entered the blazing fire (to prove her purity).
श्लोक ८३: अग्नि देव द्वारा गवाही और श्रीराम की प्रसन्नता
बभौ रामः सम्प्रहृष्टः पूजितः सर्वदैवतैः ॥१-१-८३॥
इसके बाद स्वयं अग्निदेव के वचनों से जब यह प्रमाणित हो गया कि सीता जी सर्वथा निष्पाप और पवित्र हैं, तब सभी देवताओं द्वारा पूजे जाने वाले श्रीराम मन में अत्यंत प्रसन्न हुए और उनकी दिव्य आभा चमक उठी।
Thereupon, learning from the words of the Fire God that Sita was entirely stainless and pure, Rama felt immensely delighted, and was worshipped by all the deities.
श्लोक ८४: चराचर की प्रसन्नता और विभीषण का राज्याभिषेक
सदेवर्षिगणं तुष्टं राघवस्य महात्मनः ॥१-१-८४॥
अभिषिच्य च लङ्कायां राक्षसेन्द्रं विभीषणम् ।
महात्मा राघव के इस महान कार्य (रावण वध और धर्म स्थापना) से देवों और ऋषियों के समूहों सहित तीनों लोक और समस्त चराचर जगत संतुष्ट हो गया। इसके बाद श्रीराम ने लंका के राज्य पर राक्षसों के नए राजा के रूप में विभीषण का राज्याभिषेक किया।
By this great deed of the high-souled Raghava, the three worlds including all animate and inanimate beings, along with gods and sages, were deeply satisfied. He then consecrated Vibhishana as the king of demons in Lanka.
श्लोक ८५: देवों से वरदान और मृत वानरों का जीवित होना
देवताभ्यो वरं प्राप्य समुत्थाप्य च वानरान् ।
तब अपने उद्देश्य में सफल होकर श्रीराम मानसिक संताप से मुक्त (विज्वर) और परम आनंदित हुए। उन्होंने देवताओं से वरदान प्राप्त करके युद्ध में मारे गए सभी वानरों को पुनः जीवित करवा दिया।
Thus achieving his purpose, Rama became free from all anxiety and rejoiced. Obtaining boons from the gods, he brought back to life all the fallen vanaras.
श्लोक ८६: पुष्पक विमान से प्रस्थान
भरद्वाजाश्रमं गत्वा रामः सत्यपराक्रमः ।
तत्पश्चात्, परम प्रतापी और सत्य पराक्रमी श्रीराम अत्यंत तेजस्वी पुष्पक विमान में बैठकर अयोध्या के लिए प्रस्थान कर गए और मार्ग में महर्षि भरद्वाज के आश्रम पहुँचे।
Thereafter, Rama of true prowess departed for Ayodhya in the highly resplendent Pushpaka aerial chariot, visiting the hermitage of Sage Bharadwaja on his way.
श्लोक ८७: हनुमान जी को दूत बनाकर भेजना
प्रतिख्याय प्रियां वार्तां सुग्रीवसहितस्तदा ।
वहाँ से श्रीराम ने अपने आने का प्रिय समाचार देने के लिए हनुमान जी को दूत बनाकर भाई भरत के पास भेजा। फिर सुग्रीव और वानर सेना को साथ लेकर वे आगे बढ़े।
From there, Rama dispatched Hanuman as a messenger to Bharata to convey the joyful news of his return. He then proceeded forward along with Sugriva.
श्लोक ८८: नन्दिग्राम में मिलन और जटा-मुंडन
नन्दिग्रामे जटां हित्वा भ्रातृभिः सहितोऽनघः ।
उस पुष्पक विमान पर सवार होकर वे सीधे नन्दिग्राम पहुँचे। वहाँ पहुँचकर निष्पाप (अनघ) श्रीराम ने अपने भाइयों के साथ मिलकर वनवास काल की अपनी जटाओं का मुंडन करवाया।
Riding that Pushpaka chariot, they arrived at Nandigram. There, the sinless Rama, along with his brothers, shore his matted hair.
श्लोक ८९: सीता जी की प्राप्ति और राज्याभिषेक
इस प्रकार माता सीता को ससम्मान वापस पाकर और चौदह वर्ष की प्रतिज्ञा पूरी कर श्रीराम ने पुनः अपना पैतृक राज्य प्राप्त किया (वे अयोध्या के राजा बने)।
Thus, having safely recovered Sita and completing his vow, he regained his ancestral kingdom.
श्लोक ९०: रामराज्य की सुख-समृद्धि का प्रारंभ
निरामयो निरतङ्को दुर्भिक्षभयवर्जितः ॥१-१-९०॥
श्रीराम के राजा बनते ही समस्त संसार अत्यंत हर्षित और आनंदित हो उठा। प्रजा पूरी तरह संतुष्ट, पुष्ट (स्वस्थ) और परम धार्मिक हो गई। संपूर्ण राज्य रोगों (निरामय), भय (निरतंक) और अकाल या भुखमरी (दुर्भिक्ष) के संकट से सर्वथा मुक्त हो गया।
With Rama as king, the world became highly rejoiced and cheerful. The citizens became satisfied, healthy, and deeply righteous, completely free from diseases, fear, and the threat of famine.
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे बालकाण्डे प्रथमः सर्गः (श्लोक ९१ से १००)
श्लोक ९१: पुत्रशोक से मुक्ति और नारियों का अखंड सौभाग्य
नार्यश्चाविधवा नित्यं भविष्यन्ति पतिव्रताः ॥१-१-९१॥
रामराज्य में किसी भी पिता को अपने जीवनकाल में अपने पुत्र की मृत्यु नहीं देखनी पड़ती थी (अर्थात कोई अकाल मृत्यु नहीं होती थी)। सभी स्त्रियाँ सदा सौभाग्यवती (अविधवा) रहती थीं और अपने पतिव्रत धर्म का पालन करती थीं।
In Rama's kingdom, no man ever witnessed the death of his son (no premature deaths). Women remained ever-auspicious, never facing early widowhood, and were deeply devoted to their husbands.
श्लोक ९२: अग्नि और जल का भय न होना
न वातजं भयं किंचित् क्वचिदप्युपजायते ॥१-१-९२॥
उस समय प्रजा को न तो अग्नि से कोई भय था (घरों में आग लगना आदि), न कोई जीव जल में डूबकर मरता था, और न ही चक्रवात या भयंकर आंधी-तूफान (वातजं भयं) जैसी प्राकृतिक आपदाओं का कोई डर था।
There was no danger from fire, no living being ever drowned in water, and no fear whatsoever arose from destructive winds or storms.
श्लोक ९३: भुखमरी और चोर-भय का अभाव
नगरानि च राष्ट्राणि धनधान्ययुतानि च ॥१-१-९३॥
रामराज्य में न तो भूख (भुखमरी) का कोई कष्ट था और न ही चोर-डाकुओं का कोई भय। समस्त नगर और राष्ट्र धन, वैभव तथा अन्न-धान्य से पूरी तरह संपन्न और समृद्ध थे।
Neither the distress of hunger nor the fear of thieves existed. All the cities and provinces were abundantly filled with wealth and food grains.
श्लोक ९४: सतयुग जैसी सुख-शान्ति
अश्वमेधशतैरिष्ट्वा तथा बहुसुवर्णकैः ॥१-१-९४॥
रामराज्य में सभी लोग हमेशा वैसे ही प्रसन्न और आनंदित रहते थे जैसे सतयुग (कृतयुग) में रहते थे। राजा राम ने अपने कार्यकाल में सैकड़ों अश्वमेध यज्ञ और अत्यधिक स्वर्ण-दान वाले बड़े-बड़े यज्ञ किए।
Everyone lived in perennial happiness, just as in the golden age (Satya Yuga). Rama performed hundreds of Ashvamedha (horse) sacrifices and distributed immense gold in charity.
श्लोक ९५: गौ-दान, भूमि-दान और राजवंशों की स्थापना
असंख्येयं धनं दत्त्वा ब्राह्मणेभ्यो महायशाः ॥१-१-९५॥
उन महायशस्वी श्रीराम ने विद्वानों और ब्राह्मणों को शास्त्रोक्त विधि से करोड़ों-अरबों गाएँ और असंख्य धन-संपत्ति दान में दी।
The highly renowned Rama, following the prescribed rituals, gifted millions of cows and immeasurable wealth to learned scholars and Brahmins.
श्लोक ९६: राजवंशों की प्रतिष्ठा और दीर्घकालीन शासन
चातुर्वर्ण्यं च लोकेऽस्मिन् स्वे स्वे धर्मे नियोक्ष्यति ॥१-१-९६॥
राघव ने अनेक उत्तम राजवंशों को स्थापित व प्रतिष्ठित किया। उन्होंने इस संसार में चारों वर्णों के लोगों को अपने-अपने नियत कर्तव्य और लोक-मर्यादा (धर्म) में सुदृढ़ता से जोड़े रखा।
Raghava established and multiplied noble royal lineages. He kept the four orders of society firmly engaged in their respective righteous duties.
श्लोक ९७: ग्यारह हजार वर्षों का शासन
रामो राज्यमुपासित्वा ब्रह्मलोकं प्रयास्यति ॥१-१-९७॥
महर्षि नारद कहते हैं कि श्रीराम इस पृथ्वी पर ग्यारह हजार वर्षों (दस हजार और एक हजार वर्ष) तक न्यायपूर्वक शासन करेंगे और उसके बाद अपने दिव्य धाम (ब्रह्मलोक/वैकुंठ) को प्रस्थान करेंगे।
Having ruled the kingdom righteously for eleven thousand years (ten thousand plus one thousand), Rama will eventually depart for the divine abode of Brahma.
श्लोक ९८: फलश्रुति - रामायण पाठ का पावन फल
यः पठेद्रामचरितं सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥१-१-९८॥
यह रामचरित (रामायण) अत्यंत पवित्र, पापों का नाश करने वाला, पुण्यदायक और वेदों के समान प्रामाणिक है। जो कोई भी मनुष्य इस पावन चरित्र का पाठ करता है, वह अपने सभी पापों से मुक्त हो जाता है।
This narrative of Rama's life is sacred, destroyer of sins, merit-yielding, and on par with the Vedas. Anyone who reads this biography of Rama is liberated from all sins.
श्लोक ९९: फलश्रुति - दीर्घायु और मरणोपरांत उत्तम गति
सपुत्रपौत्रः सगणः प्रेत्य स्वर्गे महीयते ॥१-१-९९॥
आयु को बढ़ाने वाले इस रामायण महाकाव्य का जो मनुष्य पाठ करता है, वह इस संसार में अपने पुत्रों, पौत्रों और बंधु-बाँधवों सहित सभी सुख भोगता है और मृत्यु के बाद स्वर्गलोक में आदर प्राप्त करता है।
A person reading this epic of Ramayana, which enhances longevity, rejoices in this world with sons, grandsons, and kin, and is highly revered in heaven after death.
श्लोक १००: विभिन्न वर्णों को प्राप्त होने वाले फल
वणिग्जनः पण्यफलत्वमीयाज्जनश्च शूद्रोऽपि महत्त्वमीयात् ॥१-१-१००॥
इस मंगलकारी काव्य को पढ़ने से ब्राह्मण को वाणी की श्रेष्ठता (विद्वत्ता) प्राप्त होती है, क्षत्रिय को राज्य या भूमि का स्वामित्व मिलता है, वैश्य (व्यापारी) को अपने व्यापार में भारी लाभ होता है, और शूद्र (श्रमजीवी) को भी समाज में महानता और आदर की प्राप्ति होती है।
By reading this, a Brahmin attains mastery over speech, a Kshatriya gains sovereignty over the earth, a trader reaps rich profits in business, and a Shudra also achieves greatness and respect.

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