रामायणम्/बालकाण्डम्/सर्गः २ हिन्दी अंग्रेजी व्याख्या

📖 द्वितीय सर्ग: विस्तृत भूमिका एवं महत्व (Detailed Introduction) [क्लिक कर के बंद/खोलें]
🌟 सर्ग का आध्यात्मिक और साहित्यिक महत्व

वाल्मीकीय रामायण के बालकाण्ड का यह द्वितीय सर्ग (दूसरा अध्याय) संपूर्ण विश्व के साहित्यिक इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ है। इसे लौकिक संस्कृत साहित्य का उद्गम स्थल या 'गंगोत्री' कहा जाता है। इसी अध्याय में आदि-कवि महर्षि वाल्मीकि के मुख से अनायास ही संसार का प्रथम लौकिक छंद (श्लोक) फूटा था, जिसने आगे चलकर आदि-काव्य 'रामायण' का रूप लिया।

🎨 भूमिका की मुख्य घटनाएँ (Key Highlights)

इस सर्ग की पृष्ठभूमि को तीन अत्यंत दिव्य और मर्मस्पर्शी घटनाओं के माध्यम से समझा जा सकता है:

  • तमसा नदी का निर्मल तट: देवर्षि नारद से संक्षेप में रामकथा सुनने के बाद, वाल्मीकि जी अपने प्रिय शिष्य भरद्वाज के साथ स्नान के लिए तमसा नदी के तट पर जाते हैं। वहाँ का स्वच्छ जल देखकर वे उसकी तुलना एक सच्चे और पवित्र मनुष्य के मन से करते हैं।
  • क्रौञ्च वध और शोक बना श्लोक: वन में विचरण करते समय वाल्मीकि जी मधुर ध्वनि करने वाले क्रौञ्च (सारस) पक्षी के जोड़े को प्रेम-क्रीड़ा में मग्न देखते हैं। तभी एक क्रूर शिकारी (निषाद) बिना किसी कारण के नर पक्षी का वध कर देता है। मादा पक्षी के विलाप और नर पक्षी को तड़पता देख ऋषि का हृदय करुणा से त्राहि-त्राहि कर उठता है। इसी गहन 'शोक' (Grief) के आवेश में उनके मुख से एक श्राप निकलता है—"मा निषाद प्रतिष्ठां...", जो अक्षरों की गणना और गति-लय के कारण स्वतः ही संसार का प्रथम 'श्लोक' (Verse) बन जाता है।
  • ब्रह्मा जी का दिव्य संदेश: जब ऋषि इस अनपेक्षित श्राप और छंद की रचना पर असमंजस में होते हैं, तब साक्षात् सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा प्रकट होते हैं। वे मुस्कुराते हुए वाल्मीकि जी को बताते हैं कि यह सब माँ सरस्वती की इच्छा और उनकी (ब्रह्मा जी की) प्रेरणा से हुआ है। ब्रह्मा जी उन्हें वरदान देते हैं कि वे इसी छंद में भगवान श्रीराम के संपूर्ण प्रकट और गुप्त चरित्र को लिखें।
💡 इस सर्ग से हमें क्या सीख मिलती है?

यह सर्ग हमें सिखाता है कि साहित्य और कला की उत्पत्ति क्रूरता से नहीं, बल्कि करुणा से होती है। जब किसी निरपराध के दुःख को देखकर हृदय में गहरी संवेदना जागती है, तभी काव्य का जन्म होता है। इसके साथ ही, ब्रह्मा जी का यह वरदान कि "जब तक इस पृथ्वी पर पर्वत और नदियाँ रहेंगी, तब तक रामायण की कथा जीवित रहेगी", इस महाकाव्य की अमरता को प्रमाणित करता है।

श्रीमद्वाल्मीकियरामायणे बालकाण्डे द्वितीयः सर्गः ॥१-२॥

नारदस्य तु तद्वाक्यं श्रुत्वा वाक्यविशारदः ।
पूजयामास धर्मात्मा सहशिष्यो महामुनिम् ॥१-२-१॥

यथावत्पूजितस्तेन देवर्षिर्नारदस्तदा ।
आपृष्ट्वैवाभ्यनुज्ञातः स जगाम विहायसम् ॥१-२-२॥

स मुहूर्तं गते तस्मिन् देवलोकं मुनिस्तदा ।
जगाम तमसातीरं जाह्नव्यास्त्वविदूरतः ॥१-२-३॥

स तु तीरं समासाद्य तमसाया मुनिस्तदा ।
शिष्यमाह स्थितं पार्श्वे दृष्ट्वा तीर्थमकर्दमम् ॥१-२-४॥

अकर्दममिदं तीर्थं भरद्वाज निशामय ।
रमणीयं प्रसन्नाम्बु सन्मनुष्यमनो यथा ॥१-२-५॥

न्यस्यतां कलशस्तात दीयतां वल्कलं मम ।
इदमेवावगाहिष्ये तमसातीर्थमुत्तमम् ॥१-२-६॥

एवमुक्तो भरद्वाजो वाल्मीकेन महात्मना ।
प्रायच्छत मुनेस्तस्य वल्कलं नियतो गुरोः ॥१-२-७॥

स शिष्यहस्तादादाय वल्कलं नियतेन्द्रियः ।
विचचार ह पश्यंस्तत् सर्वतो विपुलं वनम् ॥१-२-८॥

तस्याभ्याशे तु मिथुनं चरन्तमनपायिनम् ।
ददर्श भगवांस्तत्र क्रौञ्चयोश्चारुनिःस्वनम् ॥१-२-९॥

तस्मात् तु मिथुनादेकं पुमांसं पापनिश्चयः ।
जघान वैरनिलयो निषादस्तस्य पश्यतः ॥१-२-१०॥

तं शोणितपरीताङ्गं चेष्टमानं महीतले ।
भार्या तु निहतं दृष्ट्वा रुराव करुणां गिरम् ॥१-२-११॥

वियुक्ता पतिना तेन द्विजेन सहचारिणा ।
ताम्रशीर्षेण मत्तेन पत्त्रिणा सहितेन वै ॥१-२-१२॥

तथाविधं द्विजं दृष्ट्वा निषादेन निपातितम् ।
ऋषेर्धर्मात्मनस्तस्य कारुण्यं समपद्यत ॥१-२-१३॥

ततः करुणवेदित्वादधर्मोऽयमिति द्विजः ।
निशाम्य रुदतीं क्रौञ्चीमिदं वचनमब्रवीत् ॥१-२-१४॥

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः ।
यत् क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम् ॥१-२-१५॥

तस्यैवं ब्रुवतश्चिन्ता बभूव हृदि वीक्षतः ।
शोकार्तेनास्य शकुनेः किमिदं व्याहृतं मया ॥१-२-१६॥

चिन्तयन् स महाप्राज्ञश्चकार मतिमान्मतिम् ।
शिष्यं चैवाब्रवीद् वाक्यमिदं स मुनिपुङ्गवः ॥१-२-१७॥

पादबद्धोऽक्षरसमस्तन्त्रीलयसमन्वितः ।
शोकार्तस्य प्रवृत्तो मे श्लोको भवतु नान्यथा ॥१-२-१८॥

शिष्यस्तु तस्य ब्रुवतो मुनेर्वाक्यमनुत्तमम् ।
प्रतिजग्राह संहृष्टस्तस्य तुष्टोऽभवद्गुरुः ॥१-२-१९॥

सोऽभिषेकं ततः कृत्वा तीर्थे तस्मिन् यथाविधि ।
तमेव चिन्तयन्नर्थमुपावर्तत वै मुनिः ॥१-२-२०॥

भरद्वाजस्ततः शिष्यो विनीतः श्रुतवान् गुरोः ।
कलशं पूर्णमादाय पृष्ठतोऽनुजगाम ह ॥१-२-२१॥

स प्रविश्याश्रमपदं शिष्येण सह धर्मवित् ।
उपविष्टः कथाश्चान्याश्चकार ध्यानमास्थितः ॥१-२-२२॥

आजगाम ततो ब्रह्मा लोककर्ता स्वयं प्रभुः ।
चतुर्मुखो महातेजा द्रष्टुं तं मुनिपुङ्गवम् ॥१-२-२३॥

वाल्मीकिरथ तं दृष्ट्वा सहसोत्थाय वाग्यतः ।
प्राञ्जलिः प्रयतो भूत्वा तस्थौ परमविस्मितः ॥१-२-२४॥

पूजयामास तं देवं पाद्यार्घ्यासनवन्दनैः ।
प्रणम्य विधिवच्चैनं पृष्ट्वा चैव निरामयम् ॥१-२-२५॥

अथोपविश्य भगवानासने परमार्चिते ।
वाल्मीकये च ऋषये संदिदेशासनं ततः ॥१-२-२६॥

ब्रह्मणा समनुज्ञातः सोऽप्युपाविशदासने ।
उपविष्टे तदा तस्मिन् साक्षाल्लोकपितामहे ।॥१-२-२७॥

तद्गतेनैव मनसा वाल्मीकिर्ध्यानमास्थितः ।
पापात्मना कृतं कष्टं वैरग्रहणबुद्धिना ।॥१-२-२८॥

यत् तादृशं चारुरवं क्रौञ्चं हन्यादकारणात् ।
शोचन्नेव पुनः क्रौञ्चीमुपश्लोकमिमं जगौ ॥१-२-२९॥

पुनरन्तर्गतमना भूत्वा शोकपरायणः ।
तमुवाच ततो ब्रह्मा प्रहसन् मुनिपुङ्गवम् ॥१-२-३०॥

श्लोक एवास्त्वयं बद्धो नात्र कार्या विचारणा ।
मच्छन्दादेव ते ब्रह्मन् प्रवृत्तेयं सरस्वती ॥१-२-३१॥

रामस्य चरितं कृत्स्नं कुरु त्वमृषिसत्तम ।
धर्मात्मनो भगवतो लोके रामस्य धीमतः ॥१-२-३२॥

वृत्तं कथय धीरस्य यथा ते नारदाच्छ्रुतम् ।
रहस्यं च प्रकाशं च यद् वृत्तं तस्य धीमतः ॥१-२-३३॥

रामस्य सहसौमित्रे राक्षसानां च सर्वशः ।
वैदेह्याश्चैव यद् वृत्तं प्रकाशं यदि वा रहः ॥१-२-३४॥

तच्चाप्यविदितं सर्वं विदितं ते भविष्यति ।
न ते वागनृता काव्ये काचिदत्र भविष्यति ॥१-२-३५॥

कुरु रामकथां पुण्यां श्लोकबद्धां मनोरमाम् ।
यावत् स्थास्यन्ति गिरयः सरितश्च महीतले ॥१-२-३६॥

तावद् रामायणकथा लोकेषु प्रचरिष्यति ।
यावद् रामस्य च कथा त्वत्कृता प्रचरिष्यति ॥१-२-३७॥

तावदूर्ध्वमधश्च त्वं मल्लोकेषु निवत्स्यसि ।
इत्युक्त्वा भगवान् ब्रह्मा तत्रैवान्तरधीयत ।
ततः सशिष्यो भगवान् र्मुनिर्विस्मयमाययौ ॥१-२-३८॥

तस्य शिष्यास्ततः सर्वे जगुः श्लोकमिमं पुनः ।
मुहुर्मुहुः प्रीयमाणाः प्राहुश्च भृशविस्मिताः ॥१-२-३९॥

समाक्षरैश्चतुर्भिर्यः पादैर्गीतो महर्षिणा ।
सोऽनुव्याहरणाद् भूयः शोकः श्लोकत्वमागतः ॥१-२-४०॥

तस्य बुद्धिरियं जाता वाल्मीकेर्भावितात्मनः ।
कृत्स्नं रामायणं काव्यमीदृशैः करवाण्यहम् ॥१-२-४१॥

उदारवृत्तार्थपदैर्मनोरमै-
स्तदास्य रामस्य चकार कीर्तिमान् ।
समाक्षरैः श्लोकशतैर्यशस्विनो
यशस्करं काव्यमुदारदर्शनः ॥१-२-४२॥

तदुपगतसमाससंधियोगं
सममधुरोपनतार्थवाक्यबद्धम् ।
रघुवरकरितं मुनिप्रणीतं
दशशिरसश्क वधं निशामयध्वम् ॥१-२-४३॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे द्वितीयः सर्गः ॥१-२॥

वाल्मीकि रामायण - बालकाण्ड द्वितीय सर्ग (श्लोक 1-43)

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे बालकाण्डे द्वितीयः सर्गः

क्रौञ्च-वध, प्रथम श्लोक की उत्पत्ति और ब्रह्मा जी का वरदान

सर्ग परिचय: इस द्वितीय सर्ग में महर्षि वाल्मीकि द्वारा नारद जी की विदाई के बाद तमसा नदी के तट पर जाना, वहाँ एक व्याध (शिकारी) द्वारा मैथुन-रत क्रौञ्च पक्षी के जोड़े में से नर पक्षी का वध देखना, और उस शोक से व्याकुल होकर उनके मुख से संसार के प्रथम 'श्लोक' का प्रकट होना वर्णित है। तदोपरांत साक्षात् सृष्टि रचयिता ब्रह्मा जी प्रकट होकर उन्हें इसी छंद में संपूर्ण रामायण रचने की दिव्य प्रेरणा और वरदान देते हैं।

भाग 1: तमसा तट गमन एवं क्रौञ्च वध (श्लोक १ से १५)
श्लोक १: नारद जी का पूजन और विदाई
नारदस्य तु तद्वाक्यं श्रुत्वा वाक्यविशारदः ।
पूजयामास धर्मात्मा सहशिष्यो महामुनिम् ॥१-२-१॥
हिन्दी व्याख्या:

वाणी के मर्मज्ञ और परम धर्मात्मा महर्षि वाल्मीकि ने देवर्षि नारद के उन (संक्षेप रामायण के) वचनों को सुनकर अपने शिष्यों सहित उन महामुनि नारद जी का विधिपूर्वक पूजन-सत्कार किया।

English Translation:

Hearing those words of Narada, the righteous Sage Valmiki, who was himself an expert in speech, worshipped the great sage along with his disciples.

श्लोक २: देवर्षि नारद का देवलोक प्रस्थान
यथावत्पूजितस्तेन देवर्षिर्नारदस्तदा ।
आपृष्ट्वैवाभ्यनुज्ञातः स जगाम विहायसम् ॥१-२-२॥
हिन्दी व्याख्या:

जब वाल्मीकि जी ने देवर्षि नारद की यथावत् पूजा कर ली, तब नारद जी ने उनसे जाने की आज्ञा ली और उनकी अनुमति पाकर वे आकाश मार्ग से देवलोक की ओर चले गए।

English Translation:

Having been duly worshipped by Valmiki, the divine sage Narada took his leave and, permitted by him, flew into the sky.

श्लोक ३: तमसा नदी के तट पर पहुँचना
स मुहूर्तं गते तस्मिन् देवलोकं मुनिस्तदा ।
जगाम तमसातीरं जाह्नव्यास्त्वविदूरतः ॥१-२-३॥
हिन्दी व्याख्या:

नारद जी के देवलोक जाने के कुछ ही समय (एक मुहूर्त) बाद, मुनि वाल्मीकि गंगा जी (जाह्नवी) से थोड़ी ही दूरी पर बहने वाली तमसा नदी के तट पर गए।

English Translation:

A short while after Narada had left for the celestial world, Sage Valmiki went to the banks of the Tamasa river, which was not very far from the Ganges.

श्लोक ४ व ५: निर्मल घाट के दर्शन
स तु तीरं समासाद्य तमसाया मुनिस्तदा ।
शिष्यमाह स्थितं पार्श्वे दृष्ट्वा तीर्थमकर्दमम् ॥१-२-४॥

अकर्दममिदं तीर्थं भरद्वाज निशामय ।
रमणीयं प्रसन्नाम्बु सन्मनुष्यमनो यथा ॥१-२-५॥
हिन्दी व्याख्या:

तमसा नदी के तट पर पहुँचकर, वहाँ के कीचड़ रहित स्वच्छ घाट (तीर्थ) को देखकर मुनि वाल्मीकि ने पास में खड़े अपने शिष्य भरद्वाज से कहा—"हे भरद्वाज! देखो, तमसा का यह घाट कितना कर्दमरहित (साफ) है। इसका जल कितना रमणीय और निर्मल है, ठीक वैसे ही जैसे किसी सज्जन मनुष्य का पवित्र मन होता है।"

English Translation:

Reaching the banks of Tamasa and seeing the mud-free, clean bank, the sage said to his disciple Bharadwaja: "Look Bharadwaja, this bathing place is free of mud, beautiful, and its water is clear like the mind of a good man."

श्लोक ६ व ७: वल्कल वस्त्र धारण करना
न्यस्यतां कलशस्तात दीयतां वल्कलं मम ।
इदमेवावगाहिष्ये तमसातीर्थमुत्तमम् ॥१-२-६॥

एवमुक्तो भरद्वाजो वाल्मीकेन महात्मना ।
प्रायच्छत मुनेस्तस्य वल्कलं नियतो गुरोः ॥१-२-७॥
हिन्दी व्याख्या:

"तात! तुम इस जल के कलश को यहाँ रख दो और मुझे मेरा वल्कल वस्त्र दे दो। मैं इसी तमसा के उत्तम घाट पर स्नान करूँगा।" महात्मा वाल्मीकि के ऐसा कहने पर जितेंद्रिय शिष्य भरद्वाज ने अपने गुरुदेव को तुरंत वल्कल वस्त्र सौंप दिया।

English Translation:

"Dear child, set down the water-jar and hand me my bark garments. I shall bathe in this excellent stream." Thus addressed by the high-souled Valmiki, the devoted Bharadwaja handed the garments to his master.

श्लोक ८ व ९: वन विहार और क्रौञ्च पक्षी का जोड़ा
स शिष्यहस्तादादाय वल्कलं नियतेन्द्रियः ।
विचचार ह पश्यंस्तत् सर्वतो विपुलं वनम् ॥१-२-८॥

तस्याभ्याशे तु मिथुनं चरन्तमनपायिनम् ।
ददर्श भगवांस्तत्र क्रौञ्चयोश्चारुनिःस्वनम् ॥१-२-९॥
हिन्दी व्याख्या:

शिष्य के हाथ से वस्त्र लेकर जितेंद्रिय वाल्मीकि जी उस विशाल वन की प्राकृतिक सुंदरता को देखते हुए घूमने लगे। उसी घाट के पास ही भगवान वाल्मीकि ने मधुर ध्वनि करने वाले क्रौञ्च (सारस) पक्षियों के एक जोड़े को बिना किसी भय के एक साथ विहार करते हुए देखा।

English Translation:

Taking the bark-garments, the self-controlled sage wandered about, admiring the vast forest. Near that spot, he saw a pair of sweet-voiced Krauncha birds closely together, moving without any fear.

श्लोक १० व ११: दुष्ट बहेलिए द्वारा नर पक्षी का वध
तस्मात् तु मिथुनादेकं पुमांसं पापनिश्चयः ।
जघान वैरनिलयो निषादस्तस्य पश्यतः ॥१-२-१०॥

तं शोणितपरीताङ्गं चेष्टमानं महीतले ।
भार्या तु निहतं दृष्ट्वा रुराव करुणां गिरम् ॥१-२-११॥
हिन्दी व्याख्या:

तभी मुनि के देखते-देखते, क्रूर कर्म करने वाले एक पापी निषाद (शिकारी) ने दुर्भावना वश उस जोड़े में से नर पक्षी को बाण से मार गिराया। खून से लथपथ होकर जब वह नर पक्षी धरती पर तड़पने लगा, तो उसकी मादा (भार्या) अपने मृत पति को देखकर अत्यंत करुण स्वर में विलाप करने लगी।

English Translation:

Right before the sage's eyes, a wicked hunter, filled with cruelty, shot and killed the male bird of the pair. Seeing her mate slain and rolling on the ground covered in blood, the female bird cried out in deep grief.

श्लोक १२, १३ व १४: मुनि का हृदय करुणा से भरना
वियुक्ता पतिना तेन द्विजेन सहचारिणा ।
ताम्रशीर्षेण मत्तेन पत्त्रिणा सहितेन वै ॥१-२-१२॥

तथाविधं द्विजं दृष्ट्वा निषादेन निपातितम् ।
ऋषेर्धर्मात्मनस्तस्य कारुण्यं समपद्यत ॥१-२-१३॥

ततः करुणवेदित्वादधर्मोऽयमिति द्विजः ।
निशाम्य रुदतीं क्रौञ्चीमिदं वचनमब्रवीत् ॥१-२-१४॥
हिन्दी व्याख्या:

सुंदर लाल कलगी वाले, पंखों से युक्त अपने मत्त सहचारी पति से अलग होकर रोती हुई उस क्रौञ्ची को देखकर धर्मात्मा ऋषि वाल्मीकि का हृदय करुणा और शोक से भर उठा। पक्षी की उस करुण पुकार को सुनकर उन्होंने इसे घोर अधर्म माना और उनके मुख से स्वतः ही यह बात फूट पड़ी।

English Translation:

Separated from her copper-crested, winged mate, the female's pitiful cries moved the righteous sage to intense compassion. Observing this injustice, he considered it a great sin and spoke out.

श्लोक १५: आदि श्लोक — निषाद को शाप
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः ।
यत् क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम् ॥१-२-१५॥
हिन्दी व्याख्या:

"हे निषाद! तुम्हें आने वाले अनंत वर्षों तक कभी प्रतिष्ठा (शांति या आदर) प्राप्त न हो, क्योंकि तुमने काम-क्रीड़ा में मग्न इस क्रौञ्च पक्षी के जोड़े में से एक निरपराध का बिना कारण ही वध कर दिया है।" (यह संसार का पहला लौकिक श्लोक माना जाता है।)

English Translation:

"O Hunter, may you find no peace or honor for eternal years to come, since you have slain one of this pair of Krauncha birds while it was infatuated with love."

भाग 2: छंद के स्वरूप पर विचार एवं ब्रह्मा जी का आगमन (श्लोक १६ से ३०)
श्लोक १६, १७ व १८: श्लोक के स्वरूप पर विचार
तस्यैवं ब्रुवतश्चिन्ता बभूव हृदि वीक्षतः ।
शोकार्तेनास्य शकुनेः किमिदं व्याहृतं मया ॥१-२-१६॥

चिन्तयन् स महाप्राज्ञश्चकार मतिमान्मतिम् ।
शिष्यं चैवाब्रवीद् वाक्यमिदं स मुनिपुङ्गवः ॥१-२-१७॥

पादबद्धोऽक्षरसमस्तन्त्रीलयसमन्वितः ।
शोकार्तस्य प्रवृत्तो मे श्लोको भवतु नान्यथा ॥१-२-१८॥
हिन्दी व्याख्या:

यह शाप देने के बाद मुनि के मन में गहरी चिंता हुई। उन्होंने सोचा, "पक्षी के शोक से दुखी होकर मेरे मुख से यह क्या निकल गया?" उस महाप्राज्ञ मुनि ने बहुत विचार करने के बाद अपने शिष्य से कहा—"हे शिष्य! मेरे मुख से जो वाणी निकली है, वह चार चरणों में बंधी है, उसमें अक्षरों की संख्या समान है और उसे वीणा की लय पर गाया जा सकता है। चूँकि यह मेरे 'शोक' से उत्पन्न हुआ है, इसलिए इसे 'श्लोक' ही कहा जाना चाहिए, कुछ और नहीं।"

English Translation:

After speaking thus, the sage reflected: "What is this that I have uttered in my grief for the bird?" Thinking deeply, the wise sage said to his disciple: "This utterance of mine is divided into four feet with equal syllables and can be sung to music. Born out of my grief (Shoka), let it be called a verse (Shloka)."

श्लोक १९ व २०: आश्रम में वापसी
चिष्यस्तु तस्य ब्रुवतो मुनेर्वाक्यमनुत्तमम् ।
प्रतिजग्राह संहृष्टस्तस्य तुष्टोऽभवद्गुरुः ॥१-२-१९॥

सोऽभिषेकं ततः कृत्वा तीर्थे तस्मिन् यथाविधि ।
तमेव चिन्तयन्नर्थमुपावर्तत वै मुनिः ॥१-२-२०॥
हिन्दी व्याख्या:

शिष्य भरद्वाज ने गुरुदेव की इस अद्भुत और अनूठी बात को सहर्ष स्वीकार किया, जिससे गुरु वाल्मीकि अत्यंत प्रसन्न हुए। इसके बाद मुनि ने उस घाट पर विधिपूर्वक स्नान किया और उसी श्लोक के अर्थ के बारे में सोचते हुए वे आश्रम की ओर लौट पड़े।

English Translation:

The disciple Bharadwaja gladly accepted this sublime statement of the master. Then the sage performed his ablutions at the stream and returned, still pondering over the meaning of that verse.

श्लोक २१ व २२: एकांत में पुनः वही विचार
भरद्वाजस्ततः शिष्यो विनीतः श्रुतवान् गुरोः ।
कलशं पूर्णमादाय पृष्ठतोऽनुजगाम ह ॥१-२-२१॥

स प्रविश्याश्रमपदं शिष्येण सह धर्मवित् ।
उपविष्टः कथाश्चान्याश्चकार ध्यानमास्थितः ॥१-२-२२॥
हिन्दी व्याख्या:

विनीत और वेदज्ञ शिष्य भरद्वाज जल से भरा हुआ कलश लेकर गुरुदेव के पीछे-पीछे आश्रम आ गए। आश्रम में प्रवेश कर धर्मज्ञ वाल्मीकि जी बैठ गए, परंतु शिष्यों से अन्य बातें करते हुए भी उनका मन आंतरिक रूप से उसी घटना के ध्यान में लीन था।

English Translation:

The humble disciple Bharadwaja followed his master with the filled water-jar. Entering the hermitage, the righteous sage sat down but remained absorbed in meditation on that incident.

श्लोक २३, २४ व २५: साक्षात् ब्रह्मा जी का आगमन
आजगाम ततो ब्रह्मा लोककर्ता स्वयं प्रभुः ।
चतुर्मुखो महातेजा द्रष्टुं तं मुनिपुङ्गवम् ॥१-२-२३॥

वाल्मीकिरथ तं दृष्टषा सहसोत्थाय वाग्यतः ।
प्राञ्जलिः प्रयतो भूत्वा तस्थौ परमविस्मितः ॥१-२-२४॥

पूजयामास तं देवं पाद्यार्घ्यासनवन्दनैः ।
प्रणम्य विधिवच्चैनं पृष्ट्वा चैव निरामयम् ॥१-२-२५॥
हिन्दी व्याख्या:

इसी बीच, संसार के रचयिता, परम तेजस्वी, चतुर्मुख ब्रह्मा जी स्वयं उस मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकि से मिलने वहाँ प्रकट हुए। उन्हें देखकर वाल्मीकि जी अत्यंत विस्मित हो गए। वे तुरंत मौन होकर हाथ जोड़कर अत्यंत श्रद्धापूर्वक खड़े हो गए। उन्होंने पाद्य, अर्घ्य, आसन और वंदना से परमेश्वर ब्रह्मा जी का विधिपूर्वक पूजन किया और उनके चरणों में प्रणाम कर उनकी कुशलता पूछी।

English Translation:

Then, the creator of the worlds, the self-effulgent, four-faced Lord Brahma, arrived there to see the eminent sage. Valmiki stood up in great amazement, with folded hands, and worshipped the deity with traditional offerings.

श्लोक २६, २७, २८ व २९: ब्रह्मा जी के सामने भी वही शोक
अथोपविश्य भगवान् आसने परमार्चिते ।
वाल्मीकये च ऋषये संदिदेशासनं ततः ॥१-२-२६॥

ब्रह्मणा समनुज्ञातः सोऽप्युपाविशदासने ।
उपविष्टे तदा तस्मिन् साक्षाल्लोकपितामहे ॥१-२-२७॥

तद्गतेनैव मनसा वाल्मीकिर्ध्यानमास्थितः ।
पापात्मना कृतं कष्टं वैरग्रहणबुद्धिना ॥१-२-२८॥

यत् तादृशं चारुरवं क्रौञ्चं हन्यादकारणात् ।
शोचन्नेव पुनः क्रौञ्चीमुपश्लोकमिमं जगौ ॥१-२-२९॥
हिन्दी व्याख्या:

परम पूजित आसन पर बैठने के बाद भगवान ब्रह्मा ने वाल्मीकि ऋषि को भी बैठने की आज्ञा दी। ब्रह्मा जी की आज्ञा पाकर वे बैठ तो गए, पर साक्षात् लोकपितामह के सम्मुख होने पर भी वाल्मीकि जी का मन उसी क्रौञ्च वध की घटना में अटका था। वे मन ही मन सोच रहे थे कि "उस दुष्ट बहेलिए ने कितना क्रूर कार्य किया, जिसने मधुर ध्वनि करने वाले उस निर्दोष क्रौञ्च पक्षी को बिना किसी कारण के मार डाला।" वे ब्रह्मा जी के सामने भी शोक मग्न होकर मन ही मन उसी श्लोक को दोहराने लगे।

English Translation:

Brahma sat on the honored seat and ordered Valmiki to sit as well. Even in the presence of the grandfather of the worlds, Valmiki's mind reverted to the same grief, lamenting the cruel act of the hunter and recalling his verse.

श्लोक ३०: ब्रह्मा जी का मुस्कुराना
पुनरन्तर्गतमना भूत्वा शोकपरायणः ।
तमुवाच ततो ब्रह्मा प्रहसन् मुनिपुङ्गवम् ॥१-२-३०॥
हिन्दी व्याख्या:

वाल्मीकि जी को इस प्रकार पुनः अंतर्मुखी और शोक में डूबा हुआ देखकर, सृष्टि रचयिता ब्रह्मा जी मंद-मंद मुस्कुराए और उन मुनिश्रेष्ठ से यह दिव्य बात कही।

English Translation:

Seeing the sage thus absorbed once more in his sorrow, Lord Brahma smiled gently and addressed the foremost of sages.

भाग 3: रामायण रचना का आदेश, वरदान एवं उपसंहार (श्लोक ३१ से ४३)
श्लोक ३१ व ३२: सरस्वती का प्राकट्य और रामायण रचना का आदेश
श्लोक एवास्त्वयं बद्धो नात्र कार्या विचारणा ।
मच्छन्दादेव ते ब्रह्मन् प्रवृत्तेयं सरस्वती ॥१-२-३१॥

रामस्य चरितं कृत्स्नं कुरु त्वमृषिसत्तम ।
धर्मात्मनो भगवतो लोके रामस्य धीमतः ॥१-२-३२॥
हिन्दी व्याख्या:

ब्रह्मा जी ने कहा—"हे ब्रह्मन्! तुम्हारे मुख से जो छंदबद्ध वाणी निकली है, वह श्लोक ही है, इसमें कोई संशय मत करो। मेरी ही इच्छा से तुम्हारी जिह्वा पर यह सरस्वती प्रवृत्त (प्रकट) हुई है। इसलिए, हे ऋषिश्रेष्ठ! अब तुम इसी छंद में संसार के परम बुद्धिमान, धर्मात्मा और साक्षात् भगवान स्वरूप श्रीराम के संपूर्ण चरित्र की रचना करो।"

English Translation:

Brahma said: "Let this composition remain a Shloka (verse), have no doubt about it. It was by my will alone that Goddess Saraswati manifested through your speech. Therefore, write the entire history of the righteous and wise Rama."

श्लोक ३३, ३४ व ३५: गुप्त रहस्यों को जानने का वरदान
वृत्तं कथय धीरस्य यथा ते नारदाच्छ्रुतम् ।
रहस्यं च प्रकाशं च यद् वृत्तं तस्य धीमतः ॥१-२-३३॥

रामस्य सहसौमित्रे राक्षसानां च सर्वशः ।
वैदेह्याश्चैव यद् वृत्तं प्रकाशं यदि वा रहः ॥१-२-३४॥

तच्चाप्यविदितं सर्वं विदितं ते भविष्यति ।
न ते वागनृता काव्ये काचिदत्र भविष्यति ॥१-२-३५॥
हिन्दी व्याख्या:

"तुमने उस धैर्यवान श्रीराम की जैसी कथा नारद जी के मुख से सुनी है, उसे विस्तार से कहो। उस बुद्धिमान राम, लक्ष्मण, माता सीता और समस्त राक्षसों के जीवन का जो भी चरित्र है—चाहे वह प्रकट हो या अत्यंत गुप्त (रहस्य) हो, जो किसी को भी ज्ञात नहीं है, वह सब मेरी कृपा से तुम्हें प्रत्यक्ष दिखाई देगा। इस काव्य में तुम्हारी कोई भी बात असत्य नहीं होगी।"

English Translation:

"Narrate the story of the steadfast Rama as you heard it from Narada. Every event, whether public or hidden, concerning Rama, Lakshmana, Sita, and the demons, will become fully known to you. No word in your epic shall be false."

श्लोक ३६ व ३७: अमरता का वरदान
कुरु रामकथां पुण्यां श्लोकबद्धां मनोरमाम् ।
यावत् स्थास्यन्ति गिरयः सरितश्च महीतले ॥१-२-३६॥

तावद् रामायणकथा लोकेषु प्रचरिष्यति ॥१-२-३७॥
हिन्दी व्याख्या:

"तुम इस प्रकार श्लोकबद्ध, परम पवित्र और मन को आनंद देने वाली रामकथा की रचना करो। इस पृथ्वी तल पर जब तक पर्वत और नदियाँ विद्यमान रहेंगी, तब तक संसार के लोगों के बीच तुम्हारे द्वारा रचित यह 'रामायण' कथा गूंजती रहेगी और सुनी जाती रहेगी।"

English Translation:

"Compose the holy and beautiful story of Rama in this verse format. As long as mountains and rivers stand on the surface of the earth, so long shall the story of Ramayana remain current in the worlds."

श्लोक ३८ व ३९: ब्रह्मा जी का अंतर्धान होना
यावद् रामस्य च कथा त्वत्कृता प्रचरिष्यति ।
तावदूर्ध्वमधश्च त्वं मल्लोकेषु निवत्स्यसि ॥१-२-३७.५॥

इत्युक्त्वा भगवान् ब्रह्मा तत्रैवान्तरधीयत ।
ततः सशिष्यो भगवान् र्मुनिर्विस्मयमाययौ ॥१-२-३८॥

तस्य शिष्यास्ततः सर्वे जगुः श्लोकमिमं पुनः ।
मुहुर्मुहुः प्रीयमाणाः प्राहुश्च भृशविस्मिताः ॥१-२-३९॥
हिन्दी व्याख्या:

"और जब तक तुम्हारे द्वारा रचित यह रामकथा लोक में जीवित रहेगी, तब तक तुम ऊपर (देवलोक) और नीचे (मृत्युलोक) मेरे सभी लोकों में आनंदपूर्वक निवास करोगे।" ऐसा कहकर भगवान ब्रह्मा वहीं अंतर्धान हो गए। उनके जाने के बाद शिष्यों सहित मुनि वाल्मीकि आश्चर्यचकित रह गए। उनके शिष्यों ने भी परम प्रसन्न होकर गुरुदेव द्वारा कहे गए उस अनूठे श्लोक को बार-बार गाया।

English Translation:

"As long as your epic travels through the world, so long shall you dwell happily in my higher and lower regions." Saying this, Lord Brahma vanished. The sage and his disciples were filled with wonder, and the students joyfully repeated the verse.

श्लोक ४० व ४१: रामायण रचना का दृढ़ संकल्प
समाक्षरैश्चतुर्भिर्यः पादैर्गीतो महर्षिणा ।
सोऽनुव्याहरणाद् भूयः शोकः श्लोकत्वमागतः ॥१-२-४०॥

तस्य बुद्धिरियं जाता वाल्मीकेर्भावितात्मनः ।
कृत्स्नं रामायणं काव्यमीदृशैः करवाण्यहम् ॥१-२-४१॥
हिन्दी व्याख्या:

समान अक्षरों वाले चार चरणों में महर्षि के मुख से जो छंद निकला था, वह बार-बार दोहराए जाने पर सिद्ध हो गया कि मुनि का वह 'शोक' ही साक्षात् 'श्लोक' का रूप ले चुका था। तब पवित्र आत्मा वाले महर्षि वाल्मीकि ने यह दृढ़ संकल्प किया कि मैं इसी अनुष्टुप छंद (श्लोक रूप) में संपूर्ण रामायण महाकाव्य की रचना करूँगा।

English Translation:

The utterance born from the sage's grief, consisting of four metrical quarters of equal syllables, became stabilized as a Shloka. Then the pure-souled Valmiki resolved to compose the entire epic of Ramayana in this very structural form.

श्लोक ४२ व ४३: सुंदर पदों में काव्य का उपसंहार
उदारवृत्तार्थपदैर्मनोरमै-
स्तदास्य रामस्य चकार कीर्तिमान् ।
समाक्षरैः श्लोकशतैर्यशस्विनो
यशस्करं काव्यमुदारदर्शनः ॥१-२-४२॥

तदुपगतसमाससंधियोगं
सममधुरोपनतार्थवाक्यबद्धम् ।
रघुवरचरितं मुनिप्रणीतं
दशशिरसश्च वधं निशामयध्वम् ॥१-२-४३॥
हिन्दी व्याख्या:

तदनन्तर, दिव्य दृष्टि वाले यशस्वी और कीर्तिमान महर्षि वाल्मीकि ने अत्यंत सुंदर, मनोरम, और उदार अर्थ देने वाले पदों के मेल से, समान अक्षरों वाले सैकड़ों श्लोकों में श्रीराम के इस परम यशश्वी महाकाव्य की रचना की। उत्तम संधियों, समासों और मधुर सरल वाक्यों से सजे, मुनि द्वारा प्रणीत इस श्रेष्ठ रघुवंश मणि श्रीराम के पावन चरित्र और दस सिर वाले रावण के वध की इस अमर कथा का अब आप सब ध्यानपूर्वक श्रवण करें।

English Translation:

Thereafter, the glorious and far-sighted sage composed the fame-bestowing biography of the renowned Rama in hundreds of harmonious verses. Listen now to this wonderful history of the chief of Raghus and the destruction of the ten-headed Ravana, beautifully bound in sweet and precise language.

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