Rigveda/1/185/2 | Ved Portal - Search & Read

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भूरिं द्वे अचरन्ती चरन्तं पद्वन्तं गर्भमपदी दधाते। नित्यं न सूनुं पित्रोरुपस्थे द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात् ॥

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