अथर्ववेद काण्ड ३ सूक्त १३ सरल संस्कृत शब्दार्थ और हिन्दी भावार्थ
०३।०१३।०१
यद॒दः सं॑प्रय॒तीरहा॒वन॑दता ह॒ते।
तस्मा॒दा न॒द्यो॒ नाम॑ स्थ॒ ता वो॒ नामा॑नि सिन्धवः ॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः(सिन्धवः) हे बहनेवाली नदियों ! (संप्रयतीः=संप्रयत्यः+यूयम्) मिलकर आगे बढ़ती हुई तुमने (अहौ हते) मेघ के ताड़े जाने पर (अदः) वह (यत्) जो (अनहत) नाद किया है। (तस्मात्) इसलिये (आ) ही (नद्यः) नाद करनेवाली, नदी (नाम) नाम (स्थ) तुम हो, (ता=तानि) वह [वैसे ही] (वः) तुम्हारे (नामानि) नाम हैं ॥१॥
भावार्थःजब मेघ आपस में टकराकर गरजकर बरसते हैं, तब वह जल पृथिवी पर एकत्र होकर नाद करता हुआ बहता है, इससे उसका नदी नाम है। इसी प्रकार वैदिक शब्दों की व्युत्पत्ति समझकर अर्थ करना चाहिये ॥१॥ अजमेर पुस्तक में ‘संप्रयतिः’ है, हमने अन्य पुस्तकों से ‘संप्रयतीः’ पाठ लिया है ॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ:(अहौ) मेघ के (हते) हनन हो जाने पर (यत्) जो (अदः) उस प्रदेश में (सं प्रयती:) मिलकर प्रयाण करती हुई "आप:" ने (अनदत) नाद किया, (तस्मात्) उससे (आ) आभिमुख्य रूप में (नद्यः नाम स्थ) नदीनामवाली तुम हो, (व:) [हे आपः!] तुम्हारे (ता=तानि नामानि) वे नाम हैं, (सिन्धवः) अर्थात् सिन्धु।
टिप्पणी: [अहौ=मेघे, “अहिवतु खलु मन्त्रवर्णा ब्राह्मणवादाश्च" (निरुक्त २।५।१६), तथा "अहिः अयनात् एति अन्तरिक्षे" (निरुक्त २।५।१७)। मन्त्र में दो नामों के निर्वचन दिए हैं, नद्यः का निर्वचन नदन द्वारा और सिन्धवः का निर्वचन स्यन्दन द्वारा।]
०३।०१३।०२
यत्प्रेषि॑ता॒ वरु॑णे॒नाच्छीभं॑ स॒मव॑ल्गत।
तदा॑प्नो॒दिन्द्रो॑ वो य॒तीस्तस्मा॒दापो॒ अनु॑ ष्ठन ॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः(यत्) जब (आत्) फिर (वरुणेन) सूर्य करके (प्रेषिताः) भेजे हुए तुम (शीभम्) शीघ्र (समवल्गत) मिलकर चलो, (तत्) तव (इन्द्रः) जीव ने [वा सूर्य ने] (यतीः) चलते हुए। (वः) तुमको (आप्नोत्) प्राप्त किया (तस्मात्) उससे (अनु) पीछे (आपः) प्राप्तियोग्य जल [नाम] (स्थन) तुम हो ॥२॥
भावार्थः इस मन्त्र में ‘आप्नोत्’ और ‘आपः’ शब्द एक ही धातु ‘आप्लृ व्याप्तौ’ से सिद्ध है। जब सूर्य की शक्ति से जल भूमि पर आकर फैलता है, तब जीव उसे पाता है, [और सूर्य भी फिर से लेता है] इससे जल का नाम ‘आपः’ पाने योग्य वस्तु है। ‘आपः’ शब्द नित्य स्त्रीलिङ्ग बहुवचनान्त है ॥२॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ:(यत्) जो (वरुणेन) वरुण देवता या आकाश का आवरण करनेवाले मेघ द्वारा (प्रेषिताः) प्रेरित हुए या भेजे गये हे आपः ! (शुभम्) शीघ्र (समवल्गत) मिलकर तुम गति करते हो, (तत्) तो (वः) तुम्हें (यती:) चलती हुई को (इन्द्रः) आदित्य (आप्नोत्) प्राप्त करता है, (तस्मात्) उस कारण से (आपः) हे जलो! (अनु) तत्पश्चात् (आपः स्तन) "आपः" तुम हो।
टिप्पणी: [वरुण है अपांपतिः (अथर्व० ५।२४।४) अथवा "वरुणः" आकाश का आवरण करनेवाला मेघशीभम् क्षिप्रनाम (निघं० २।१५)। अवल्गत=वल्गु गत्यर्थः (भ्वादि:)। वर्षा के पश्चात् आप: जब मिलकर गति करते हैं, प्रवाहित होते हैं, तदनन्तर आदित्य निज रश्मियों द्वारा इन्हें प्राप्त करता है, मेघरुप में परिणत करता है। "आपन" क्रिया के कारण "आप:" नाम हुआ है। मन्त्र में "आप:" का निर्वचन हुआ है।]
०३।०१३।०३
अ॑पका॒मं स्यन्द॑माना॒ अवी॑वरत वो॒ हि क॑म्।
इन्द्रो॑ वः॒ शक्ति॑भिर्देवी॒स्तस्मा॒द्वार्नाम॑ वो हि॒तम् ॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (वः) वेगवान् वा वरणीय (इन्द्रः) जीव [वा सूर्य्य] ने (हि) ही (अपकामम्) व्यर्थ (स्यन्दमानाः) बहते हुए (वः) तुमको (शक्तिभिः) अपनी शक्तियों द्वारा (कम्) सुख से (अवीवरत) वरण [स्वीकार] अथवा, वारण [रोकना] किया, (तस्मात्) इससे (देवीः=देव्यः) हे दिव्य गुणवाली वा खेलवाली जल धाराओ ! (वः) तुम्हारा (नाम) नाम (वार्) वरणयोग्य वा वारणयोग्य जल (हितम्) रक्खा गया है ॥३॥
भावार्थः मनुष्य भूमि पर अन्नादि के लिये और सूर्य्य आकाश में वृष्टि के लिये जल को चाहता है वा रोकता है, इसलिये जल का नाम ‘वार्’ है। ‘अवीवरत’ क्रिया और ‘वार्’ शब्द दोनों ‘वृञ्’ चाहना वा रोकना धातु से बनते हैं ॥३॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थः(अपकामम्) बिना कामना (स्यन्दमानाः) प्रवाहित होती हुई (व:) तुम्हें (हि) यतः (इन्द्रः) आदित्य ने (अवीवरत) "वर" बनकर वरण कर लिया (शक्तिभिः) निज शक्तियों द्वारा। (देवी:) हे आप: देवियो! (तस्मात्) उस वरण के कारण (व:) तुम्हारा (नाम) नाम (वाः) वा अर्थात् वारि [जल] (हितम्) रखा गया है, अथवा हितकर हुआ है।
टिप्पणी: [अभिप्राय यह कि "आप:" हैं तो देवीः, अर्थात् दिव्य गुणोंवाली, परन्तु बिना कामना के इधर उधर चलती-फिरती रहती हैं इनके दिव्यगुणों को देखकर, इन्द्र अर्थात् आदित्य ने निज पत्नीरूप में इनका वरण कर लिया है, और आदित्य की शक्तियों द्वारा प्रभावित होकर "आप:" ने पत्नी बनना स्वीकार कर लिया है। इसलिए आप: का नाम "वा:" हुआ है, आदित्य द्वारा वरण कर लेने के कारण। वाः=वृञ् वरणे। प्ररोचनार्थ कथा द्वारा वर-वधू के परस्पर चुनाव का वर्णन हुआ है। "अवीवरत तथा वा: " दोनों में वृञ् वरणे का प्रयोग हुआ है। हि=हेत्वपदेशे (निरुक्त १।२।५)। कम्=पदपूरणार्थः(निरुक्त १।३।९)।]
०३।०१३।०४
एको॑ वो दे॒वोऽप्य॑तिष्ठ॒त्स्यन्द॑माना यथाव॒शम्।
उदा॑निषुर्म॒हीरिति॒ तस्मा॑दुद॒कमु॑च्यते ॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (एकः) अकेला (देवः) जयशील परमात्मा (यथावशम्) इच्छानुसार (स्यन्दमानाः) बहते हुए (वः) तुम्हारा (अपि अतिष्ठत्) अधिष्ठाता हुआ। (महीः=महत्यः) शक्तिवाले [आपः जल] ने (इति) इस प्रकार (उत्+आनिषुः) ऊपर को श्वास ली, (तस्मात्) इसलिये (उदकम्) ऊपर को श्वास लेनेवाला उदक वा जल (उच्यते) कहा जाता है ॥४॥
भावार्थः ईश्वर की सामर्थ्य से सूर्य्य द्वारा जल आकाश में चढ़ता है, इसलिये ‘उदक’ जल का नाम है। ‘उत् आनिषुः’ और ‘उदकम्’ उत्+अन, श्वास लेना-धातु से बनते हैं ॥४॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थः (यथावशम्) यथेच्छापूर्वक (स्पन्दमानाः) स्रवण करते हुए (व:) तुम पर [हे आपः ] हे जलो! (एकः देवः) एक देव आदित्य (अपि अतिष्ठत्) अधिष्ठित हुआ है, अतः (मही:) महती तुम (उदानिषुः इति) ऊपर आकाश की ओर उत्प्राणित हुई हो, (तस्मात्) उससे (उदकम् उच्यते) तुम्हें उदक कहा जाता है।
टिप्पणी: ["उदानिषुः" द्वारा उदक का निर्वाचन अभिप्रेत है। उदानिषु:=उद्+आ+अन् (प्राणने)। लुङि रूपम्।]
०३।०१३।०५
आपो॑ भ॒द्रा घृ॒तमिदाप॑ आसन्न॒ग्नीषोमौ॑ बिभ्र॒त्याप॒ इत्ताः। ती॒व्रो रसो॑ मधु॒पृचा॑मरंग॒म आ मा॑ प्रा॒णेन॑ स॒ह वर्च॑सा गमेत् ॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (आपः) जल (भद्राः) मङ्गलमय और (आपः) जल (इत्) ही (घृतम्) घृत (आसन्) था। (ताः) वह (इत्) ही (आपः) जल (अग्नीषोमौ) अग्नि और चन्द्रमा को (बिभ्रति) पुष्ट करता है। (मधुपृचाम्) मधुरता से भरी [जल धाराओं] का (अरंगमः) परिपूर्ण मिलनेवाला, (तीव्रः) तीव्र [तीक्ष्ण, शीघ्र प्रवेश होनेवाला] (रसः) रस (मा) मुझको (प्राणेन) प्राण और (वर्चसा सह) कान्ति वा बल के साथ (आ गमेत्) आगे ले चले ॥५॥
भावार्थःजल से घृत सारमय पदार्थ उत्पन्न होते हैं, जल अग्नि अर्थात् जठराग्नि, बिजुली, बड़वानल आदि और चन्द्रलोक से मिलकर हमें पुष्टि देता है और कृषि आदि में प्रयुक्त होकर अन्नादि उत्पन्न करके प्राणियों का बल और तेज बढ़ाता है ॥५॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थः(आप:) जल (भद्राः) कल्याणकारी तथा सुखदायी हैं, (आप:) जल (घृतम् इत् आसन) घृत ही हैं। (आप:) जल (अग्निषोमौ) अग्नि और सोम रूप (आसन्) थे, (ता: आपः इत्) वे आपः ही (विभ्रति) इन दो अग्नि और सोम का धारण करते हैं। (मधुपृचाम्) मधुसम्पृक्त आपः का (तीव्रः रसः) तीव्र रस (अरंगम) पर्याप्त रूप में प्राप्त होता हुआ, (प्राणेन वर्चसा सह) प्राण और वर्चस् के साथ (मा) मुझे (आ गमेत्) प्राप्त हो।
टिप्पणी: [आपः घृतम्=गौएँ जल पीती हैं तो उनका दूध भी आप: प्रधान होता है, जिसमें कि घृत प्रच्छननरूप में विद्यमान होता है—सम्भवत: यह अभिप्राय हो। अग्नीषोमौ विभ्रति=आप: में अग्नि और सोम हैं। मेघों में विद्युत चमकती है, जोकि अग्निरूप है, इसके प्रपात से वृक्ष आदि भस्मीभूत हो जाते हैं। परन्तु मेघ जब बरसता है तो उसका वर्षा जल शीत होता है, सौम्यरूप होता है, यह आपः में सोम की सत्ता है। मधुपृचाम्=मधुरदुग्ध से सम्पृक्त गौओं का तीव्ररस है दुग्ध। इसके पर्याप्त पान करने से प्राणशक्ति बढ़ती और वर्चस् अर्थात् मुख और शरीर में दीप्ति प्राप्त होती है। यथा "यूयं गावो मेदयथा कृशं चिदभ्रीरं चित् कृणुथा सुप्रतीकम्" (अथर्व० ४।२१।६)। "आपः घृतम्" में, कारण में कार्य का उपचार है। आपः है कारण और घृतम् है कार्य।]
०३।०१३।०६
आदित्प॑श्याम्यु॒त वा॑ शृणो॒म्या मा॒ घोषो॑ गच्छति॒ वाङ्मा॑साम्। मन्ये॑ भेजा॒नो अ॒मृत॑स्य॒ तर्हि॒ हिर॑ण्यवर्णा॒ अतृ॑पं य॒दा वः॑ ॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः(आत्) तब (इत्) ही (पश्यामि) मैं देखता हूँ, (उत) और (वा) अथवा (शृणोमि) मैं सुनता हूँ, (आसाम्) इसकी [जल के रस की] (घोषः) ध्वनि (मा) मुझे (आ गच्छति) आती है और (वाक्) वाक्शक्ति (मा) मुझे [आती है]। (हिरण्यवर्णाः) हे कमनीय पदार्थ वा सुवर्ण का विस्तार करनेवाले [जल]। (तर्हि) तभी (अमृतस्य) अमृत का (भेजानः) भोग करता हुआ मैं (मन्ये) अपने को मानूँ, (यदा) जब (वः) तुम्हारी (अतृपम्) तृप्ति मैंने पाई है ॥६॥
भावार्थःजल के यथावत् प्रयोग से प्राणी में दर्शनशक्ति और श्रवणशक्ति और ‘घोष’ ध्वन्यात्मक शब्द और ‘वाक्’ वर्णात्मक शब्द बोलने की शक्ति होती है और तभी वह इष्ट सुवर्णादि धन की प्राप्ति से भूख आदि से मृत्युदुःख का त्याग करके अमृत अर्थात् आनन्द भोगता है ॥६॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थः (आत् इत्) तदनन्तर (पश्यामि) मैं देखता हूँ, (उत वा) तथा (शृणोमि) सुनता हूँ (मा) मुझे (घोषः) शब्द (आ गच्छति) प्राप्त होता है, (मा वाक्) तथा मुझे वाणी (आ गच्छति) प्राप्त होती है (आसाम्) इन आप: के [रसागमन से, मन्त्र ५]। (तहि) तब (अमृतस्य) अमृत का (भेजानः) सेवन करता हुआ (मन्ये) मैं अपने को मानता हूँ (यदा) जबकि (हिरण्यवर्णाः) हितरमणीयवर्ण वाले हे आपः! (व:) तुम्हारे सेवन से (अतृपम्) मैं तृप्त हो जाता हूँ।
टिप्पणी: [आत् इत्=मन्त्र ५ के अनुसार "तीव्र रस" के सेवन पश्चात् श्रवण आदि में शक्ति संचार हो जाने पर। भेजन:= भज सेवायाम् (भ्वादिः)।]
०३।०१३।०७
इ॒दं व॑ आपो॒ हृद॑यम॒यं व॒त्स ऋ॑तावरीः।
इ॒हेत्थमेत॑ शक्वरी॒र्यत्रे॒दं वे॒शया॑मि वः ॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (आपः) हे प्राप्ति के योग्य जल धाराओं ! (इदम्) यह (वः) तुम्हारा (हृदयम्) स्वीकार योग्य हृदय वा कर्म है। (ऋतावरीः) हे सत्यशील [जलधाराओं !] (अयम्) यह (वत्सः) निवास देनेवाला, आश्रय है। (शक्वरीः) हे शक्तिवालियों ! (इत्थम्) इस प्रकार से (इह) यहाँ पर (आ इत) आओ, (यत्र) जहाँ (वः) तुम्हारे (इदम्) जल को (वेशयामि) प्रवेश करूँ ॥७॥
भावार्थःकृषि, यन्त्र, औषधादि में जल के यथायोग्य प्रयोग से प्राणियों को सुख मिलता है ॥७॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थः (आप:) हे आपः! (इदम्) उदक (व:) तुम्हारा (हृदयम्) हृदय१ है, (अयम् वत्सः) [उदक] यह तुम्हारा वत्स है (ऋतावरी:) हे उदकवाली नदियों! (इह) इस स्थान में (शक्वरीः) हे शक्तिशाली आपः! (इत्थम्) इस प्रकार तुम (एत) आओ, (यत्र) जिस स्थान में (व:) तुम्हारे (इदम्) उदक को (वेशयामि) मैं प्रविष्ट करता हूँ।
टिप्पणी: ["इदम् उदकनाम" (निघं० १।१२)। यह उदक "ऋतावरी:" ऋत अर्थात् जलवाली नदियों का हृदयरूप है। हृदय में रक्तरूपी उदक होता है, तुम में भी ऋत अर्थात् उदक विद्यमान है, "ऋतम् उदकनाम" (निघं० १।१२) इस उदक के कारण नदियों को ऋतावरी: कहा है। "ऋतावर्यः नदीनाम" (निघं० १।१३)। उदक नदियों से उत्पन्न होते हैं, अत: उदक नदियों के वत्स हैं। आपः हैं शक्वरीः, शक्तिशाली। इन द्वारा कृषि होती है तथा अन्य कार्य भी सम्पन्न होते हैं। वेशयामि द्वारा कुल्या का वर्णन हुआ है। कुल्या२ है धारा, नहर।]
[१. जिस स्थान में कि उदक का प्रवेश हुआ है उसे हृदय कहा है, उदकपूर्ण स्थान हृदय-सदृश है। २. कौ पृथिव्यां लीयते। जोकि पृथिवी में ही लीन हो जाती है, समुद्र तक नहीं पहुँचती।]

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