अंधविश्वास, फला दिन शुभ है और फला दिन अशुभ है, ऐसा क्यों है वैज्ञानिक व्याख्या,

अंधविश्वास, फला दिन शुभ है और फला दिन अशुभ है, ऐसा क्यों है वैज्ञानिक व्याख्या,


 प्रश्न - हमारे समाज में मंगलवार का दिन शुभ माना जाता है जबकि शनिवार का दिन  अशुभ, क्या यह सही है ?

  उत्तर - नहीं, कोई भी दिन या घडी शुभ या अशुभ नहीं होती बल्कि व्यक्ति के कर्म ही शुभ या अशुभ होते हैं ।

        ईश्वर की सृष्टि में सभी दिन समान होते हैं । वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो ऋतु व मास के अनुसार दिन सर्द-गर्म या छोटे-बडे तो होते हैं परन्तु शुभ या अशुभ का किसी दिन विशेष या काल विशेष से कोई सम्बन्ध नहीं होता । जिन व्यक्तियों की मृत्यु मंगलवार को हो जाती है उनके लिए मंगलवार अशुभ हो जाता है इसी प्रकार शनिवार को यदि किसी के घर में बालक जन्म लेवे तो उसके लिए शनिवार भी शुभ हो जाता है | इसी प्रकार मंगलवार को लोगों के साथ अनेक दुखदायक घटनाएं घटती हैं व शनिवार को सुखदायक ।  इसलिए दिनों के विषय में यह नियम निर्धारित नहीं किया जा सकता कि अमुक दिन शुभ है अमुक दिन अशुभ ।

     यदि ऐसा होता तो मंगलवार को सब कुछ अच्छा ही होना चाहिए व शनिवार को बुरा परन्तु ऐसा नहीं होता । किसी भी दिन अच्छा भी घटित हो सकता है किसी भी दिन बुरा भी ।

     वास्तविक स्थिति यही है कि शुभ या अशुभ अच्छा या बुरा समय व्यक्ति के अच्छे या बुरे कर्मों के कारण होता है । फिर इस विषय में यह भी विचारणीय है कि संसार में कोई मंगलवार को कोई सोमवार को कोई बृहस्पतिवार को,कोई बुधवार को या रविवार को शुभ मानकर व्रत उपवास आदि रखते हैं अपने कार्यों को आरम्भ करते हैं । वहीं कई लोग इन्हीं दिनों में काम करना अशुभ भी मानते हैं  जैसे नाई लोग मंगलवार को बाल काटने के लिए अशुभ मानते हैं । मुस्लिम लोग शुक्रवार को शुभ मानते हैं । यदि हम संसार में दिन या काल विषयक मान्यताएं खोजने निकलें तो हजारों प्रकार कि मान्यताएं मिल जाएगीं जिनमें सप्ताह के सभी दिनों को लोग शुभ या अशुभ मानते मिल जाएगें ।

    इसलिए दिनों के शुभ या अशुभ होने का सम्बन्ध व्यक्ति की धारणा या आस्था से ही है न कि विज्ञान से न ही शास्त्रीय परम्परा या ज्ञान से क्योंकि शास्त्रों में भी कोई ऐसा प्रमाण उपलब्ध नहीं होता जिससे यह सिद्ध होता हो कि अमुक दिन या काल अच्छा है अमुक बुरा ।  वस्तुत: जो शास्त्रों में है वह सब विज्ञानसम्मत है व जो  विज्ञानयुक्त है वही शास्त्रों में है ।

ओ३म् हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्। योऽसावादित्ये पुरूष: सऽ सावहम्। ओ३म् खं ब्रह्म ।।( यजुर्वेद ४०|१७ )

अर्थ :- ( हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्य मुखम् अपिहितम्।) ज्योतिर्मय चमकीले ढक्कन से सत्य स्वरूप परमात्मा का मुंह ढका हुआ है, अर्थात संसार की चमक-दमन, भोग - विलासों के अत्यन्त आकर्षण के कारण मनुष्य से भगवान ओझल हो गया है ।जिस दिन हमने इस संसार की चमक-दमन से, संसार के इन लुभावने भोग - विलासों से अपने को उभार लेंगे, अर्थात इस ढक्कन को उठा लेंगे, उसी समय हमें उस प्रकाश स्वरूप प्रभु का भान हो जायेगा और वही हमें अपने स्वरूप का साक्षात् कराता हुआ कहेगा कि ( य: असौ आदित्ये पुरूष: )  जो वह आदित्य में, सूर्यमंडल में व्यास हुआ पुरूष  -- पूर्ण परमेश्वर है। ( स: असौ अहम् ) वह पुरुष में ही ( ओ३म् खं ब्रह्म) ओ३म् नाम से विख्यात, सब जगत् का रक्षक, आकाश के समान सर्वत्र व्यापक और गुण - कर्म - स्वभाव की दृष्टि से सबसे महान  -- बड़ा हूँ ।  संसार के रमणीय भौतिक ऐश्वर्य के आवरण से सत्य स्वरूप प्रभु का स्वरूप ढका हुआ है । जिस दिन मानव यम -- ( अहिंसा - सत्य  - अस्तेय आदि)  - नियम   ---  ( शौच  - सन्तोष  - तप - स्वाध्याय आदि  ) आसन  - प्राणायाम  - प्रत्याहार आदि से इस सांसारिक लुभावने आवरण को उतारकर परे फैंक देगा और श्रद्धा- भक्ति निष्ठापूर्वक धारणा  - ध्यान- समाधि द्वारा उसमें समाहित होकर उसका अनुभव प्राप्त करेंगा, उस दिन वह प्रभु भी उसके सम्मुख अपना पूर्ण परिचय  देकर कण - कण में सर्वत्र उसको अपना भान करता हुआ कहेगा " जो वह आदित्यमण्डल  - सूर्यमण्डल में परिपूर्ण हुआ उसको अपने नियम में चलाने वाला पुरुष है,  सो वह में ही  ' ओ३म् ' नाम से प्रसिद्ध, सबका रक्षक, आकाश के तुल्य सर्वत्र व्यापक, सबसे सब दृष्टि से ज्येष्ठ और श्रेष्ठ पुरूष परमेश्वर हूँ ।

   साधकों को चाहिए कि वे जप -  तप आदि द्वारा इन सांसारिक भोग  - विलासों से ऊपर उठे, इन बाहरी आकर्षणों से विरक्त होकर,  अद्वितीय,  सर्वत्र परिपूर्ण हुए, 'ओ३म्' नाम से सर्वत्र प्रसिद्ध सबके रक्षक, कण- कण और क्षण- क्षण  में बसने वाले आकाशवत् सर्वत्र व्यापक महान् परमेश्वर का साक्षात करने का हार्दिक प्रयास करें ।

   क्योंकि यदि इस मानव चोले में आकर भी इस मुख्य लक्ष्य  - प्रभु के साक्षात करने से वञ्चित हो गये तो फिर यह महती विनष्टि होगी ।

धर्म संसार का आधार है, जीवन जीने की कला है।

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    धर्म के अनुरूप आचरण करने से ही इस मानव शरीर की सार्थकता है। संसार की विषम से विषम परिस्थितियों में भी धर्म ही मनुष्य का सहायक होता है। धर्म के ऊपर ही विश्व का समस्त भार है। यदि धर्माचरण ही समाप्त हो गया तो सबको अपने प्राण बचाने और दूसरों को कुचलने की चिंता ही रात-दिन बनी रहेगी। सर्वत्र लूट-खसोट, मार-पीट, अराजकता, अनाचार व अत्याचार का ही बोल बाला दिखाई देगा। सारा सुख चैन नष्ट हो जाएगा। आज चारों ओर अधिकांश यही हो रहा है। इसका कारण है कि लोगों ने अपने स्वार्थ के आगे धर्म को भुला दिया है। माया, मोह, लोभ की पट्टी उनकी आंखों पर बंधी है और उन्हे यह दिखता ही नहीं कि वे एक दूसरे की  जडें खोदने में लगे हैं और सबके लिए नारकीय परिस्थितियां उत्पन्न कर रहे हैं।

  धर्म कितना महत्वपूर्ण है, कितना सुदृढ है, इसका अनुमान इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि दुष्ट लोग भी धर्म की आड में अनुचित लाभ उठाने व ठगी का जाल फैलाने का प्रयास करते हैं। जहां श्रेष्ठता होती है वहां बुराई भी घुस आती है। लोग धर्म पालन को बहुत महत्व देते हैं। और इसके लिए हर प्रकार का त्याग व बलिदान करने को भी तत्पर रहते हैं। ऐसे में स्वार्थपरता भी अपनी जडें जमाने लगती हैं। अनेक व्यक्ति लाल पीले कपडे पहनकर तिलक चंदन लगाकर धर्म गुरू बनने का ढोंग रचते हैं और लोगों की धार्मिक भावनाओं का शोषण करते हैं। न जाने कितनी नकली धार्मिक संस्थाएं चारों ओर इसी आधार पर फल फूल रहीं हैं। वहां अनीति पूर्वक एकत्रित किए धन से हर प्रकार के दुराचार होते हैं। जिस धर्म के मजबूत आधार का आश्रय लेकर दुराचारी व्यक्ति भी अपना काम चलाना चाहते हैं उसे हम क्यों छोड़ दें? मनुष्य जीवन की इमारत का निर्माण ही धर्म के सुदृढ आधार पर होना चाहिए।

  दान-पुण्य, धार्मिक कर्मकांड आदि तो धर्म के साधन मात्र हैं। वास्तविक धर्म तो कर्तव्य पालन, दूसरों की सेवा, परोपकार,

सच्चाई और संयम में ही है। जो इन तत्त्वों को अपने विचार और आचरण में प्रमुख स्थान देता है वही सच्चा धर्मात्मा है। अन्यथा धर्म का ढोंग करने से कोई लाभ नहीं है। जीवन की सफलता तभी है जब  यह धर्म हमारे रक्त में घुला हुआ हो, रोम रोम में व्याप्त हो। जो कुछ भी हम देखें, सोचे, करें सब कुछ धर्मानुकूल ही हो। दूसरों को अधर्माचरण से यदि कुछ लाभ हो रहा है तो उसे देखकर अपनी नियत मत बिगाडों। कांटे में लिपटी हुई आटे की गोली खाकर मछली की जो दशा होती है वही अनीति से लाभ उठाने वालो की भी होती है। कोई भी बुद्धिमान और दूरदर्शी व्यक्ति इस मार्ग के अनुसरण करने की मूर्खता नहीं कर सकता।

    धर्म-अधर्म का निर्णय करने के लिए सदबुद्धि हमारे पास है। अल्पबुद्धि और बिना पढे लिखे लोगों को भी सदबुद्धि का वरदान मिला हुआ है। उसका निष्पक्ष, निर्भय होकर उपयोग करना चाहिए अपनी सदबुद्धि की सहायता से उपयोगी रीति रिवाज  व आचरण को निर्धारित करके पालन करना ही सच्चा मानव धर्म है ।

ओ३म् पुरीष्यासोऽअग्नय: प्रावणेभि: सजोषस:।

जुषन्तां यज्ञमद्रुहोऽनमीवाऽइषो मही:॥ यजुर्वेद १२-५०

 हे विद्वान, मनुष्य अपने आप को मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ कर। अपने आप को ईर्ष्या और घृणा से मुक्त कर। दिव्य ज्ञान से अपने आप को प्रकाशित कर और फिर यज्ञ अर्थात दूसरों के कल्याण के लिए काम कर। 

आओ लौट चलें वेदों की ओर।

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      एक समय था जब भारत विश्वगुरु था ।संसार का सिरमौर था सारे संसार के लोग भारत के ऋषि मुनियों के चरणों मे बैठकर ज्ञान-विज्ञान और चरित्र की शिक्षा लिया करते थे।

      संसार के आदि सम्राट महर्षि मनु ने हिमाचल की चोटी पर खड़े होकर  भारतवर्ष के गौरव की डिण्डिम घोषणा करते हुए कहा था----

ऐतददेशप्रसूतस्य  सकाशादग्रजन्मनः।

स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन पृथिव्यां सर्वमानवाः।।

 ----- मनु० २/२०

आर्यावर्त देश में उत्पन्न अग्रजन्मा=ब्रहामणों के चरणों में बैठकर संसार के लोग अपने अपने योग्य विद्या और चरित्र की शिक्षा ग्रहण करें।

      महर्षि दयानंद सरस्वती भारतवर्ष के गौरव और महिमा का वर्णन करते हुए  लिखते है-----

"यह आर्यावर्त्त देश ऐसा है,जिसके सदृश भूगोल में दूसरा कोई देश नहीं. है।इसलिए इस भूमि का नाम स्वर्णभूमि है,क्योंकि यही स्वर्णादि रत्नों को उत्पन्न करती है इसलिए सृष्टि के आदि मे आर्यलोग इसी देश में आकर बसे ।जितने भूगोल में देश हैं वे सब इसी की प्रशंसा करते हैं और आशा करते हैं कि इस देश की संस्कृति और सभ्यता से ही हमारा कल्याण होगा।"

    फ्रैंच लेखक जैकालियट महोदय ने अपने ग्रंथ Bible in Indiya  में "भारतवर्ष को सभ्यता का हिंडोला कहा है।"

भारतवर्ष को ज्ञान और धर्म का आदिस्रोत स्वीकार करते हुए प्रो०हीरेन लिखते हैं----

"भारतवर्ष ही वह स्रोत है,जिससे न केवल एशिया ने अपितु समस्त पाश्चात्य जगत् ने भी अपनी विद्या और धर्म प्राप्त किया।"

मेजर डी० ग्राह्मपोल का कथन है------

"भारत उस समय सभ्यता और विद्या के उच्च शिखर पर पहुँचा हुआ था,जिस समय हमारे पूर्वज अभी वृक्षों की छाल के बने हुए कपड़े पहनकर अफ्रातफ्री में इधर-उधर भटक रहे थे।"

      मुसलमान लेखक वस्साफ़ अपने ग्रंथ 'तारीखे वस्साफ़  में लिखते हैं---"सभी इतिहासवेत्ता यह मानते है कि भारतवर्ष भूमंडल का एक अतीव रमणीय और चित्ताकर्षक देश है।इसकी पावन पुनीत मिट्टी के रजकण वायु से भी अधिक हल्के और पवित्र हैं और इसकी वायु की पवित्रता स्वयं पवित्रता से भी अधिक पवित्र है।इसके ह्रदयग्राही मैदान स्वर्ग की स्मृति को जगाने वाले हैं।"

वे पुनः लिखते हैं----

"यदि मैं यह दावा करूँ कि स्वर्ग भारत में ही है तो तू आश्चर्य मत करना क्योंकि स्वयं स्वर्ग भी भारत की समानता नहीं कर सकता ।"

     परन्तु दुर्भाग्य हमने अपनी सभ्यता, संस्कृति ज्ञान-विज्ञान, धर्म सबको भुलाकर इस पवित्रतम धरा को पाप ,हत्या, बलात्कार,हिंसा,, लूट-खूसूट और अपराध की भूमि बना दिया।अंधाधुंध प्रदूषण कर जल,वायु और भूमि को अपवित्र कर दिया ।

यदि आज भी हम अपने स्वर्णिम अतीत को देखें और परमात्मा प्रदत्त ज्ञान वेदों का अध्ययन करें और उसका अनुसरण करे तो भारत पुनः उतना ही गौरवशाली, समृद्ध  पवित्र ,संस्कारी देश बन संसार का सिरमौर बन सकता है ।आज भी हममें वो क्षमता है की हम विश्वगुरु का पद प्राप्त कर सकें ।अपने ,सामर्थ्य को जगाओ .....जुड़ो जड़ों से लौटो वेदों की ओर।

जय आर्य ।जय आर्यावर्त ।जय भारत ।

 ओ३म् ये देवानां यज्ञिया यज्ञियानां मनोर्यजत्रा अमृता ऋतज्ञा: । ते नो रासन्तामुरूगायमद्य यूयं पात स्वस्तिभि: सदा न:। (ऋग्वेद ७|३५|१५ )

अर्थ :-  पूजनीय विद्वान् यज्ञमय जीवन वाले ज्ञानी, यशस्वी देव जन, धर्म के जानने हारे हमको उत्तम ज्ञान का उपदेश करें ।हे देवों सुखों द्वारा सदा हमारी रक्षा करें।

वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है ।

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   जैसे व्यक्ति सूर्यप्रकाश के बिना अंधकार में  ठोकरें खाकर दुखी होता है। इसी प्रकार से जब वेद रूपी सूर्य का प्रकाश नहीं होता, तो व्यक्ति अविद्या रूपी अन्धकार में ठोकरें खाकर अनेक प्रकार के दुख भोगता है।"

      सुख तो सभी लोग चाहते हैं। एक दो घंटा नहीं, २४ घंटे सुख चाहते हैं। सुख की प्राप्ति के लिए प्रयत्न भी बहुत करते हैं इतना सब करने पर भी सुख बहुत कम मिल पाता है और बहुत से दुख भी साथ साथ भोगने पड़ते हैं।

     इसका कारण -- "सुख प्राप्ति की विधि का ज्ञान नहीं है, दुखों से निवृत्ति करने का ज्ञान नहीं है।" इस ज्ञान के अभाव से व्यक्ति सुखों को अधिक मात्रा में प्राप्त कर नहीं पाता, और दुखों से छूट नहीं पाता। जैसे दिन में सूर्य का प्रकाश होता है, उस प्रकाश में सब वस्तुएं ठीक-ठीक स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं।_ _और सबका आना जाना चलना फिरना दुर्घटनाओं से बचना सुगम होता है। इसी प्रकार से यदि वेद रूपी सूर्य का ज्ञान रूपी प्रकाश व्यक्ति प्राप्त कर ले, तो उस के प्रकाश में व्यक्ति सब बातें ठीक-ठीक समझ सकता है। 'क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए, क्या सही है, क्या गलत है,' इन सब बातों को व्यक्ति सरलता से समझ सकता है।

    फिर बुद्धिमान व्यक्ति उस वेदज्ञान रूपी प्रकाश की सहायता से सब बातों को ठीक-ठीक समझकर, यदि पुरुषार्थी भी हो, तो सब अच्छे अच्छे कार्यों को करता है, तथा बुरे कार्यों से बचता रहता है। इस विधि से व्यक्ति बहुत से सुखों की प्राप्ति कर लेता है, और दुखों से छूट जाता है।" सारी बात का सार यह हुआ, कि व्यक्ति को ज्ञान चाहिए। सत्य ज्ञान चाहिए। शुद्ध ज्ञान चाहिए, जिससे वह दुखों की निवृत्ति और सुखों की प्राप्ति कर सके। और वह शुद्ध ज्ञान मिलता है वेदो से।

    उदाहरण के लिए एक व्यक्ति अच्छा भोजन बनाना चाहता है। उसे भोजन बनाने की विधि का ज्ञान नहीं है। वह उल्टे-सीधे ढंग से भोजन बनाएगा। दाल सब्जी रोटी ठीक प्रकार से नहीं बना पाएगा। ऐसे खराब भोजन को खाकर वह दुखी होगा। सुख को प्राप्त नहीं कर पाएगा। यदि वह पाक विद्या के किसी विद्वान के पास जाकर उससे पाक विद्या सीख ले, और उसके ज्ञान से प्रकाशित होकर फिर भोजन बनाए, तो अब उसका भोजन ठीक बनेगा। अच्छा स्वादिष्ट पुष्टिकारक बुद्धि वर्धक आयु वर्धक भोजन बनेगा। और उसे खा कर वह भूख के दुख से निवृत हो जाएगा, तथा अच्छा स्वादिष्ट भोजन खाने से वह सुख की प्राप्ति भी करेगा। इस प्रकार से उसे सब लाभ हो जाएंगे।

    तो जैसे इस उदाहरण में बताया, कि पाकविद्या सीखने से वह भोजन संबंधी दुखों से छूट जाएगा। इस उदाहरण के समान यदि व्यक्ति, आत्मा परमात्मा और संसार के विषय में भी ठीक ठीक ज्ञान प्राप्त करने के लिए, वेदों का अध्ययन करे, अच्छे योग्य वैदिक विद्वानों से वेदों को समझे, सीखे, तो वेद रूपी सूर्य के प्रकाश में उसका ज्ञान शुद्ध हो जाएगा। वेदों को पढ़ने से बुद्धि का विकास होगा, जीवन में आने वाली अनेक समस्याओं के दुखों से व्यक्ति छूट जाएगा, और उससे व्यक्ति के सब कार्य आसान हो जाने से, उसे सुख शांति आनंद की प्राप्ति होगी।

   इसलिए अच्छे योग्य वैदिक विद्वानों से वेदों का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। उसके अनुसार आचरण करके अपने जीवन को सुखी एवं सफल बनाना चाहिए।

ओ३म्  यदाकूतात् समसुस्रोद्धृदो वा मनसो वा सम्भृतं चक्षुषो वा। तदनु प्रेत सुकृतामु लोकं यत्रऽऋषयो जग्मु: प्रथमजा: पुराणा:॥ यजुर्वेद १८-५८॥

हे विद्वान मनुष्य, तुम सत्य और असत्य के अंतर को अर्जित ज्ञान के द्वारा समझो। ज्ञान का प्रवाह आता है आत्मा के प्रकाश से, उत्तम इच्छाओं से, हृदय से, मन से, बुद्धि से, और इंद्रियों पर नियंत्रण से। तुम सत्य और उत्तम कर्म से प्रेम करने वाले बनो। तुम उस पथ पर जाओ जिस पर  तुम्हारे पवित्र पूर्वज गए थे ।





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