आत्मा क्या है, परमात्मा क्या है, इन दोनों का आपस में सबन्ध क्या है- ?
इस विषय का नाम अध्यात्म है, आत्मा और परमात्मा दोनों ही भौतिक पदार्थ नहीं हैं, इन्हें आँख से देखा नहीं जा सकता,और न ही कान से सुना नहीं जा सकता व नाक से सूँघा भी नहीं जा सकता, जिह्वा से चखा नहीं जा सकता, त्वचा से छुआ नहीं जा सकता है !
परमात्मा एक है, अनेक नहीं, ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि उसी एक ईश्वर के नाम हैं, "एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति" अर्थात् एक ही परमात्मा शक्ति को विद्वान लोग अनेक नामों से पुकारते हैं, संसार में जीवधारी प्राणी अनन्त हैं, इसलिए आत्माएँ भी अनन्त हैं।
न्यायदर्शन के अनुसार ज्ञान, प्रयत्न, इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख ये छः प्रकार के गुण जिसमें हैं उसमें आत्मा है, ज्ञान और प्रयत्न आत्मा के स्वाभाविक गुण हैं, बाकी चार गुण इसमें शरीर के मेल से आते हैं, आत्मा की उपस्थिति के कारण ही यह शरीर प्रकाशित है, नहीं तो मुर्दा अप्रकाशित और अपवित्र है, यह संसार भी परमात्मा की विद्यमानता के कारण ही प्रकाशित है।
आत्मा और परमात्मा दोनों ही अजन्मा व अनन्त हैं, ये न कभी पैदा होते हैं और नही कभी मरते हैं, ये सदा रहते हैं, आत्मा अणु है, बेहद छोटी है, परमात्मा आकाश की तरह सर्व व्यापक है, आत्मा का ज्ञान सीमित है, थोड़ा है, परमात्मा सर्वज्ञ है, वह सब कुछ जानता है।
जो कुछ हो चुका है और हो रहा है, सब कुछ उसके संज्ञान में है, आत्मा की शक्ति सीमित है, थोड़ी है, परन्तु परमात्मा सर्वशक्तिमान है, सृष्टि को बनाना, चलाना, प्रलय करना- आदि अपने सभी काम करने में वह समर्थ है, ईश्वर आनन्द स्वरूप है, वह सदा एकरस आनन्द में रहता है। वह किसी से राग-द्वेष नहीं करता।
वह काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार से परे है, ईश्वर की उपासना करने से अर्थात् उसके समीप जाने से आनन्द प्राप्त होता है, जैसे सर्दी में आग के पास जाने से सुख मिलता है, ईश्वर सर्व व्यापक होने से निराकार है , उसे शुद्ध मन व ज्ञान से जाना जा सकता है, जैसे हम सुख-दुःख मन में अनुभव करते हैं।
यह आत्मा जब मनुष्य शरीर में होती है, तब वह कार्य करने में स्वतन्त्र रहती है, उस समय किये कार्यों के अनुसार ही उसे परमात्मा सुख, दुःख तथा अगला जन्म देता है, दूसरी योनियाँ या तो किसी दूसरे के आदेश पर चलती हैं या स्वभाव से काम करती हैं, उनमें विचार शक्ति नहीं होती, इसलिए उन योनियों में की गई क्रियाओं का उन्हें अच्छा या बुरा फल नहीं मिलता।
वे केवल भोग योनियाँ हैं जो पहले किए कर्मों का फल भोग रही हैं, मनुष्य योनि में कर्म और भोग दोनों का मिश्रण है, मनुष्य स्वतन्त्र रूप से कर्म भी करता है और कर्मफल भी भोगता है, मैं आत्मा हूँ, शरीर नहीं हूँ, शरीर मेरा संसार में व्यवहार करने का साधन है, कर्ता और भोक्ता आत्मा है, सुख-दुःख आत्मा को होता है।
जीवात्मा न स्त्रीलिंग है, न पुलिंग है और न ही नपुंसक है, यह जैसा शरीर पाता है, श्वेताश्वतर उपनिषद् में कहा गया है कि ईश्वर की पूजा ऐसे नहीं की जाती, जैसे मनुष्यों की पूजा अर्थात सेवा सत्कार किया जाता है, ईश्वर की आज्ञा का पालन अर्थात सत्य और न्याय का आचरण- यही ईश्वर की पूजा है।
कठोपनिषद में मनुष्य-शरीर की तुलना घोड़ागाड़ी से की गई है, इसमें आत्मा गाड़ी का मालिक अर्थात सवार है, बुद्धि सारथी अर्थात् कोचवान है, मन लगाम है, इन्द्रियाँ घोड़े हैं, इन्द्रियों के विषय वे मार्ग हैं जिन पर इन्द्रियाँरूपी घोड़े दौड़ते हैं, आत्मारूपी सवार अपने लक्ष्य तक तभी पहुँचेगा, जब बुद्धिरूपी सारथी मनरूपी लगाम को अपने वश में रखकर इन्द्रियाँरूपी घोड़ों को सन्मार्ग पर चलाएगा।
उपनिषद में घोड़ागाड़ी को रथ कहा जाता है और रथ पर सवार को रथी, मनुष्य शरीर में आत्मा रथी है, जब आत्मा निकल जाती है, तब शरीर अरथी रह जाता है, परमात्मा हम सबका माता-पिता और मित्र है, हम सब प्राणियों का भला चाहता है, जब मनुष्य कोई अच्छा काम करने लगता है तो उसे आनन्द, उत्साह, निर्भयता महसूस होती है।
वह परमात्मा की तरफ से होता है, और जब वह कोई बुरा काम करने लगता है, तब उसे भय, शंका, लज्जा महसूस होती है,वह भी परमात्मा की तरफ से ही होता है।
ओ३म् को व: स्तोमं राधति यं जुषोषथ विश्वे देवासो मनुषो यतिष्ठन। को वोऽध्वरं तुविजाता अरं करधौ न: पर्षदत्यंह: स्वस्तये।( ऋग्वेद १|६३|६)
अर्थ :- हे सब दिव्यगुण युक्त विद्वानों! तुम जितने भी हो, उन सबकी स्तुति - उपासना जिसका तुम सेवन करते हो, प्रजापति परमेश्वर सिद्ध करता रहता है।वहीं सुखमय परमात्मा तुम अनेक जन्म धारण करने वालों के हिंसा रहित यज्ञ को पूर्ण करता है, जो यज्ञ पाप को हटाकर हमारे लिए आनन्द को प्राप्त कराता है।
क्या होते हैं ६ शास्त्र ?
हिन्दू समाज ने चार वेदों के बाद ६ शास्त्रों का नाम कई बार सुन रखा है । लेकिन हमारा हिन्दू समाज इनसे अंजान है । तो ये आर्य समाज का दायित्व बनता है कि हिन्दू अपने प्रत्येक धर्मग्रंथ को अच्छे से जाने और समझे । जैसा कि आर्य समाज सदा से इसी प्रयास में रहा है कि हिन्दू अपने मूल वैदिक धर्म को ठीक से जानकर इससें जुड़ जाए और इसलिये समय समय पर आर्य समाज ने अपनी प्रखर लेखनी के द्वारा हिन्दू जनता में चेतना फैलाई है ।
तो इन ६ शास्त्रों को वेदों के उपांग या दर्शन शास्त्र भी कहा जाता है । हमारे ऋषियों ने वेदों में यत्र तत्र बिखरे सिद्धान्तों को समेटकर इन ६ दर्शनशास्त्रों का निर्माण किया है जिनके आधार पर हम वेदवाणी को ठीक ठीक समझ सकते हैं । ये ६ वैदिक दर्शन आस्तिक दर्शन कहलाते हैं । ये हमारे तर्कशास्त्र हैं जिन्हें पढ़कर हर मनुष्य की बुद्धि खुल जाती है और वह कभी भ्रमित होकर ईश्वर, धर्म, अधर्म, सत्य, असत्य आदि के विषय पर शंका नहीं करता । इन दर्शन शास्त्रों को पढ़कर सभी प्रकार की शंकाओं का समाधान स्वयं ही हो जाता है । ये ६ दर्शन इस प्रकार हैं :-
(१) न्याय शास्त्र :- इसकी रचना गौतम मुनि ने की है । इस शास्त्र का विषय मुख्यतः तर्क है । चार प्रकार के प्रमाणों ( प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द ) के द्वारा मनुष्य अपने आसपास बिछे हुए संसार में से सत्य और असत्य को छाँटकर अलग करके जान पाए इस उद्देश्य से ये दर्शन रचा गया है ।
(२) वैशेषिक शास्त्र :- इसकी रचना कणाद मुनि ने की है । ये शास्त्र पदार्थ विद्या के बारे में है । ईश्वर ने हमारे लिये संसार के जिन पदार्थों का निर्माण किया है उनके गुण कर्म आदि जानकर उनसे कैसे उपयोग लेना है ? ये इस शास्त्र का विषय है । ( ये भौतिक शास्त्र है )
(३) सांख्य शास्त्र :- इसकी रचना कपिल मुनि ने की है । इसका मुख्य विषय है प्रकृति के सबसे सूक्ष्म कणों ( सत, रज, और तम से शब्द, स्पर्श, रूप,रस और गन्ध ) से सृष्टि की उत्पत्ति कैसे होती है ? कैसे सभी पदार्थों में समानता होते हुए विशेषता है ? ये शास्त्र पूर्ण रूप से प्रकृति और आत्मा में भेद बतलाता है ।
(४) योग शास्त्र :- इसकी रचना पतंजलि मुनि ने की है । इसका मुख्य विषय है आठ मर्यादाओं ( यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधी ) का पालन करते हुए सभी दुखों से छूटते हुए मोक्ष प्राप्त करने की विधि बताना ।
(५) मिमांसा :- इसकी रचना जैमिनि मुनि ने की है । इसका विषय है कि किस प्रकार के वैदिक कर्मकांड और मर्यादाओं का पालन करने से मनुष्य पूर्ण सुखी हो सकता है और अपने जीवन के लक्ष्य मोक्ष को पा सकता है ?
(६) वेदान्त ( ब्रह्मसूत्र ) :- इसकी रचना वेदव्यास मुनि ने की है । इसका मुख्य विषय है ईश्वर के स्वरूप उसके गुणों का वर्णन करना जिनकों जानकर मनुष्य उनके विषय में सभी शंकाओं से निवृत होकर उनकी उपासना में लगे और योगाभ्यास करते हुए उनको प्राप्त करे ।
ये हमारे ६ वैदिक आस्तिक दर्शन हैं जिनको पढ़कर मनुष्य वेद के मन्तव्य ठीक से समझकर तार्किक होकर अपने मूल धर्म को ठीक से जान सकता है ।
ओ३म् अहानि शं भवन्तु न: शं रात्री: प्रतिधीयताम् ।शं न इन्द्राग्नी भवतामवोभि: शं न इन्द्रावरूणा रातहव्या। शं न इन्द्रापूषणा वाजसातौ शमिन्द्रासोमा सुविताय शं यो:।(यजुर्वेद ३६|११)
अर्थ :- हे ईश्वर ! दिन हमें सुखकारी हो, रातें शान्ति देने वाली हों, विद्युत् वा अग्नि रक्षक सामग्री सहित सुखकारक हो, विद्युत् व जल के ग्रहण करने योग्य सुख हमें शान्ति दायक हो, विद्युत् और पृथ्वी हमारे लिए अन्नो के सेवनार्थ सुखदायी हों तथा विद्युत् और उत्तम् औषधियां रोगनाशक एवं भय निवर्तक हों, ऐसी कृपा करो ।
मनुष्य एक चेतन प्राणी है। यह चेतन प्राणी इसलिए है कि इसके शरीर में एक चेतन पदार्थ आत्मा विद्यमान होता है। यह आत्मा अनादि, नित्य, सनातन, शाश्वत, अमर, अविनाशी, अल्प परिमाण, एकदेशी, आकार रहित, ससीम, अल्पज्ञ, ज्ञान प्राप्ति व कर्मों को करने में समर्थ, उपासना से ईश्वर को प्राप्त होकर जन्म मरण से छूटकर मुक्ति प्राप्त करने वाला है। हमारी आत्मा ऐसी है जिसको अग्नि जला नहीं सकती, जल गीला नहीं कर सकता, वायु सुखा नहीं सकती और शस्त्र से यह काटा नहीं जा सकता। यह सदा से है और सदा रहेगा।
आत्मा जन्म-मरण धर्मा होने से जन्म और मृत्यु के चक्र में फंसा हुआ है और इसका जन्म के बाद मृत्यु और मृत्यु के बाद जन्म होता रहता है। हम अर्थात् हमारी आत्मा सदैव सुख चाहती है। सुख का कारण शुभ कर्म होते हैं। हमें जो दुःखों की प्राप्ति होती है उसका कारण हमारे अज्ञान युक्त अशुभ कर्म होते हैं। ईश्वर, जीवात्मा, प्रकृति व सृष्टि सहित अपने कर्तव्य व अकर्तव्यों का ज्ञान प्राप्त करना मनुष्य जीवन का उद्देश्य है। ज्ञान से ही अमृत अर्थात् दुःखों की निवृत्ति और सुखों की प्राप्ति होती है। अज्ञानी मनुष्य का जीवन दुःखों से युक्त होता है और वह बलहीन तथा रोगों से ग्रस्त होकर अल्पायु में ही मृत्यु का ग्रास बन जाता है।
अतः सत्य ज्ञान के आदि स्रोत वेदों की शरण में जाकर मनुष्य को अपने कर्तव्य एवं अकर्तव्यों का ज्ञान प्राप्त करना चाहिये और असत्य का त्याग तथा सत्य को ग्रहण करना चाहिये। आर्यसमाज के नियमों पर दृष्टि डाल कर उसके अनुरूप कर्म व व्यवहार करने से भी मनुष्य दुःखों से बच सकता है। वेदों का अध्ययन करने पर हमें सत्यासत्य एवं कर्तव्याकर्तव्यों का ज्ञान होता है। सत्य के ज्ञान और उसके अनुरूप कर्तव्यों का पालन कर हम विद्या की वृद्धि कर जीवन के लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त कर सकते हैं।
इतिहास में अनेक ऋषि, महर्षि, योगी और विद्वान हुए हैं जिन्होंने वेदों के अध्ययन-अध्यापन में ही अपना जीवन व्यतीत किया और जीवन भर सन्तोष का अनुभव करते हुए अज्ञान व अकर्तव्यों के आचरण से स्वयं को दूर रखा। वह सब देश, समाज व प्राणीमात्र के हित के कार्यों को करते हुए लम्बी आयु का भोग कर ईश्वर को प्राप्त रहे व उसके ज्ञान व योगाभ्यास से समाधि को सिद्ध कर ईश्वरानन्द के अनुभव से उन्होंने अपनी जीवन यात्रा को इसके ध्येय तक पहुंचाया और सफलता दिलाई।
ओ३म् अग्ने मृळ महाँ असि य ईमा देवयुं जनम् ।आये बर्हिरासदम्।।( ऋग्वेद ४|९|१)
अर्थ :- ( अग्ने! य: त्वम् माहान असि)
हे अग्नि के समान प्रकाशमान प्रभो! जो तू महान् है, पूजनीय है, वह तू !
( ईभ् देवयुं जनं मृड)
सब प्रकार व सब प्रकार से आत्मन: जो तू परमेश्वर को चाहने वाला है ऐसे उस मुझ उपासक को सुखी कर। हे प्यारे और सब जग से न्यारे मेरे भगवन्!
( आसदं बर्हि: आ इयेथ)
तू भलीभांति बैठने योग्य मेरे ह्रदयासन पर आ विराजमान हो।
हे प्रभुवर ! जो तू महान् है, अपने मान से,अपने यश और प्रयश से सबको पीछे छोड़ देने वाला है ।जो तू पूजनीय है, सब प्रकार से स्तुति - प्रार्थना और उपासना के योग्य है, वह तू सब प्रकार से और सब ओर से, जो उपासक तुझ महान्, तुझ पूजनीय प्रभु पर मुग्ध होकर तुझ देवाधिराज को चाहता है, तुझ दिव्य गुण-कर्म- स्वभाव वाले परमदेव की अन्त:करण की टीस के साथ कामना करता है,उस मुझ श्रद्धा और विश्वास से ओत - प्रोत भक्त को तू सुखी कर, तृप्त कर,आनन्दित कर।इतना ही नहीं वरन् इससे और आगे बढ़कर मेरे उस ह्रदयासन पर आ विराजमान हो, जिसको मैने सब प्रकार से बड़े जप-तप से निर्मल और स्वच्छ करके तेरे बैठने योग्य बनाया है ।
रामायण-सार
श्री रामचन्द्रजी के भक्तो! दिन-रात रामायण के पढ़नेवालो! महाराज रामचन्द्रजी को अपना बड़ा माननेवालो ! देश के क्षत्रिय जनो ! आप रामायण को, जो आर्यकुलभूषण, क्षत्रिय-कुलदिवाकर, वेदवित्, वेदोक्त कर्मप्रचारक, देशरक्षक, शूर-सिरताज, रघुकुलभानु, दशरथात्मज, महाराजाधिराज महाराज रामचन्द्रजी का जीवन-चरित सदा पढ़ते-सुनते हैं, परन्तु शोक है कि आप उस महानुभाव के दिव्य जीवन से कुछ भी लाभ नहीं उठाते ।
महाशयो! यह रामचरित्र ऐसा उत्तम है कि यदि मनुष्य इसके अनुसार अपना जीवन व्यतीत करें तो अवश्य मुक्ति-पद को प्राप्त हो जाएँ।
महाशयो ! रामायण के आदि में महाराज रामचन्द्रजी के जन्म का वृत्तान्त लिखा है, जिससे बोध होता है कि हमारे देश के राजाओं को जब सन्तान की आवश्यकता होती थी तब वे लोग विद्वान् ब्राह्मणों को बुलाकर यज्ञ कराते थे। इस समय के लोगों की भाँति गाजीमियाँ की क़ब्रों में जाने और पूजा करने के ढकोसले नहीं करते थे। वे कभी सण्डों-मुष्टण्डों से सन्तान न चाहते थे। वे गूगापीर और मसानी को नहीं मानते थे। वे टोने और धागे नहीं कराते थे। ये सब शिक्षाएँ आपको महाराज रामचन्द्रजी के जन्म से प्राप्त होती हैं।
हे रामायण के पढ़नेवालो! ऐसी मूर्खता की बातों को शीघ्र त्यागकर यज्ञादि कर्म प्रारम्भ करो। पुनः महाराज का वसिष्ठजी से विद्याभ्यास करना है, जिससे बोध होता है कि पूर्व-समय में सभी क्षत्रिय, ब्राह्मण और वैश्य-द्विजातिमात्र पढ़ते थे। आजकल की भाँति ऐसा न था कि विद्योपार्जन को आजीविका के लिए समझें, अपितु विद्याभ्यास मनुष्यत्व का हेतु माना जाता था । मूर्ख को मनुष्य की संज्ञा ही नहीं मिलती थी।
हे रामायण के पढ़नेवालो ! शीघ्र विद्याभ्यास करो और उस वेद-विद्या को पढ़ो जिसे महाराज रामचन्द्रजी ने पढ़ा था। उस वेद-ज्ञान को समस्त संसार में फैलाओ। तत्पश्चात् महाराज रामचन्द्रजी का विश्वामित्र के साथ जाना है, जो इस बात का पूरा प्रमाण है कि पूर्व-समय में विद्वानों और तपस्वियों का कैसा मान था ! देखो, राजा दशरथ ने प्राणों से अधिक प्यारे अपने दोनों पुत्र विश्वामित्र को दे दिये। दूसरे, उस काल में क्षत्रियों के बालक ऐसे बली होते थे कि रामचन्द्रजी छोटी-सी अवस्था में भी ऋषि के साथ वन जाने से भयभीत नहीं हुए और दोनों भाइयों ने सहस्रों दुष्ट राक्षसों को मार गिराया। ब्रह्मचर्य, विद्या और धर्म के ऐसे प्रताप को देखकर भी हम लोग धर्म नहीं करते।
तत्पश्चात् रामचन्द्रजी का जनकपुर में जाकर धनुष तोड़ना लिखा है। इससे भी उनके बल की महिमा विदित होती है। इसके पश्चात् महाराजा रामचन्द्रजी के विवाह का वृत्तान्त है, जिससे यह विदित होता है कि उस काल में स्वयंवर की रीति थी। आजकल की भाँति गुडे-गुडियों का विवाह, अर्थात बाल-विवाह का प्रचार न था। कन्या और वर दोनों ब्रह्मचर्य का पालन करते थे और जब वे पूर्ण विद्वान और बल-वीर्य में पुष्ट हो जाते थे तब विवाह करते थे, जिससे पति और पत्नी में सदा प्रीति रहती थी और उनके गृहस्थाश्रम सुख से व्यतीत होते थे तथा सन्तान हष्ट-पुष्ट और शुद्ध बुद्धिवाली उत्पन्न होती थी।
रामायण के माननेवालो! आप क्यों बालविवाह करके अपनी सन्तान को नष्ट करते हो?
इसके पश्चात् महाराज को राज मिलने का लेख है और कैकेयी के आदेश से महाराज का वन को जाना और दशरथ महाराज की मृत्यु लिखी है। इससे क्या ज्ञात होता है? प्रथम तो यह कि नीच के संग से सदा हानि होती है। देखो, कैकेयी ने मन्थरा के संग से अपना सुहाग नष्ट किया। संसार को दुःख दिया, जगत् में अपयश लिया। जिस पुत्र के लिए यह अधर्म किया था, उस पुत्र ने भी उसको बुरा कहा। क्या इससे कुसंग से बचने की शिक्षा नहीं मिलती? जो लोग अधर्म करते हैं उनके घर के लोग भी उन्हें बुरा कहते हैं। दूसरे, महाराज दशरथ ने राज्य त्याग दिया, अपने प्यारे, नहीं-नहीं, नयनों के तारे पुत्र को चौदह वर्ष का वनवास दिया, अपने प्राणप्रिय पुत्र का वियोग स्वीकार किया, परन्तु अपना वचन नहीं तोड़ा। जिससे संसारभर में यश लिया और संसार को यह शिक्षा दी कि मनुष्य को जो कुछ किसी को देना हो शीघ्र दे दे, परन्तु किसी से प्रतिज्ञा न करे, न जाने कब कैसा समय आ जाए! क्योंकि, राजा दशरथ कैकेयी को यदि वर न देते तो उनको यह कष्ट और पुत्र का वियोग न सहना पड़ता। यहाँ बन्धुओ, बहुत-सी शिक्षाएँ मिलती हैं, जैसे अन्धे माता-पिता अपने पुत्र श्रवण की मृत्यु से मर गये। इसी के फल से राजा दशरथ भी अपने पुत्र के वियोग से मरे। महाराज रामचन्द्रजी के वन-गमन के समय लक्ष्मणजी का सङ्ग में जाना भी अत्यन्त शिक्षापूर्ण है। देखो, उस समय के लोग कैसे पितृभक्त होते थे! महाराजा रामचन्द्रजी ने पिता के कहने से राज ही नहीं त्यागा, वनवास भी स्वीकार किया। क्या आजकल रामायण के पढ़नेवाले अपने पितरों की आज्ञा का पालन करते। हैं? दूसरे, लक्ष्मणजी का सङ्ग जाना भाइयों की प्रीति का प्रमाण देता है। लक्ष्मणजी ने भाई के लिए देश व माता-पिता का सुख त्याग दिया। सच्चे भाइयों की प्रीति ऐसी होती है।
क्या आजकल के रामायण पढ़नेवाले अपने भाइयों से ऐसी प्रीति करते हैं? महाराज के साथ सीताजी का वन गमन लिखा है, जिससे स्वयंवर की रीति का गुण और सीताजी का पतिव्रत-धर्म झलकता है। क्या आजकल के लोग बालविवाह से इस पतिव्रत-धर्म की आशा रखते हैं? सीताजी ने अपने पति के लिए माता-पिता, सास, राजगृह का सुख त्याग दिया और पति के साथ वन-वन घूमना स्वीकार किया तथा पति के बिना सब सुखों को दुःखस्वरूप समझा। आह! क्या ही उत्तम पतिव्रत धर्म उस समय देश में प्रचलित था! आजकल की बालविवाह की पत्नी तो सदा मेलों में गङ्गा के किनारे मन्दिरों में घूमना धर्म समझती हैं, सच्चे पतिव्रत-धर्म का तो उनमें लेश भी नहीं रहा।
पश्चात् महाराजा भरत का रामचन्द्रजी को लेने जाना लिखा है। वह क्या ही देश के सौभाग्य का समय था कि अधिकारी के अधिकार का इतना ध्यान रखा जाता था! भरतजी में राज्य की तृष्णा नहीं थी। सबसे अधिक भाई की प्रीति दिखाई। फिर वन में रावण की बहिन सूर्पनखा का रामचन्द्रजी के पास जाकर विवाह करने की प्रार्थना करना और महाराज का मना करना, उसका न मानना और हठ करना, लक्ष्मणजी का उसकी नाक काटने का वर्णन है। इससे रामचन्द्र का एक ही स्त्री से सन्तुष्ट रहकर परस्त्री-गमन व विवाह से घृणा करना प्रकट है। क्या रामायण के पढ़नेवाले यहाँ से शिक्षा ग्रहण कर परस्त्री-गमन के दोषों का त्याग करेंगे? प्यारे देशवासियो ! परस्त्री-गमन जैसे घोर पाप को शीघ्र त्यागो! यह भी यौवन के विवाह का फल है कि पति और पत्नी में ऐसी प्रीति है कि पत्नी उसके लिए घर-बार सब-कुछ त्याग दे और पति उसके लिए संसारभर की स्त्रियों को काक-विष्ठा के समान माने। इससे यह भी शिक्षा मिलती है कि जो अधर्म पर हठ करता है उसकी नाक काटी जाती है। वीर क्षत्रियगण ऐसे हठी और दुराचारी को सदा दण्ड ही दिया करते थे।
इसके पश्चात् रावण का योगी-स्वरूप में आना लिखा है। इससे ज्ञात होता है कि जब दुष्ट अपने में बल नहीं देखता तब इसी प्रकार के छल करके सत्पुरुषों को कष्ट देता है। इससे यह भी ज्ञात होता है कि किसी के बाह्यस्वरूप पर नहीं रीझना चाहिए, क्योंकि दुष्टजन भी अच्छे पुरुषों का आकार बना सकते हैं। शोक है कि इस बात को देखकर भी हमारे देशवासी अपनी स्त्रियों को मुष्टण्डे वेषधारियों के पास जाने से नहीं रोकते ! जब सीता जैसी पतिव्रता स्त्री को एक कपटी पुरुष धोखा देकर निकाल ले-गया तो और साधारण स्त्रियों को वे क्या समझते हैं !
इसके पश्चात् जटायु का रावण के साथ युद्ध करके प्राण देना लिखा है, जिससे सच्चे मित्रों का मित्र-भाव ज्ञात होता है। जटायु ने प्राण दिये, परन्तु अपने जीतेजी अपने मित्र दशरथ की पतोहू को दुष्ट रावण से बचाया। क्या रामायण-प्रेमी अपने मित्रों का इस पक्षी से भी न्यून उपकार करेंगे?
उसके आगे रामचन्द्र जी का सीताजी से वियोग और विलाप है, जिससे ज्ञात होता है कि संसार में संयोग का वियोग अच्छे-अच्छे महात्माओं को भी घबराहट में डाल देता है। उसके पश्चात् रामचन्द्रजी को सुग्रीव का मिलना है, जिससे ज्ञात होता है कि संसार में दो प्राणियों के मेल से दोनों का कार्य सिद्ध होता है। तत्पश्चात् रामचन्द्रजी की बाली को मारना लिखा है। इससे यह स्पष्ट होता है कि जो किसी से शत्रुता रखता है उसका एक दिन अवश्य नाश हो जाता है। फिर महाराज का समुद्र पर पुल बाँधना है, जो उस समय की विशाल विद्या और उन महात्माओं के महान् प्रयत्न का साक्षी है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि यदि मनुष्य दृढ़ निश्चय रखता हो तो अवश्य कृतकार्य होगा। इसके पश्चात् विभीषण का रावण से विरुद्ध होकर रामचन्द्रजी से मिलना है। इससे स्पष्ट ज्ञात होता है कि जब बुरे दिन आते हैं तब भाई भी शत्रु बन जाते हैं और जिस घर में दो मत होते हैं वह एक दिन अवश्य नष्ट होता है। कारण यह कि रावण और विभीषण का एक मत न था, इसी से विभीषण उससे अप्रसन्न हो गया और यही मतवाद भारत का नाशक है। तीसरे, इससे यह भी ज्ञात होता है कि जब घर में फूट पड़ती है तब शीघ्र सत्यानाश हो जाता है, अतः हे सज्जन पुरुषो! तुम सदा फूट से अलग रहो ।
हे रामायण के पढ़नेवालो! तुम कभी भी अपने भाई से विरोध न करो और मतवाद को नष्ट करो।
इसके पश्चात रावणादि का महाराजा रामचन्द्रादि के हाथ से मारा जाना है, जिससे जात होता है कि जो अपने बल से बढ़कर छल के आश्रय काम करता है, वह अवश्य नष्ट हो जाता है। देखो, रावण ने रामचन्द्र के बल को जानते हुए यह ढीठपन किया। यदि वह रामचन्द्र के बल को न जानता तो पहले ही बल से सीता को लाता, छल न करता। रावण का छल करना ही उसकी निर्बलता को प्रकट करता है। रावण ने जान-बूझकर यह कार्य किया, अन्त में नष्ट हो गया। इससे यह भी ज्ञात होता है कि जो लोग झूठे अभिमानी मनुष्य के भरोसे संसार से बिगाड करते हैं और उस कपटी के व्यवहारों को नहीं विचारते, वे सदैव हानि उठाते हैं। देखो, यदि रावण के साथी इस बात का विचार करते कि रावण चोरी करके सीता को लाया है तो कभी रामचन्द्रजी से विरोध न करते और उनका नाश न होता। दूसरे, रावण ने जो पाप किया उसका फल पाया; कोई उसे पाप के फल से बचा न सका। जो परस्त्री पर कुदृष्टि करेगा उसकी यही दशा होगी! इसके अतिरिक्त और भी बहुत-से अशुभ फल प्राप्त होते हैं।
शोक है कि हमारे देश के लोग रामायण पढ़ते हैं, नित्य रामलीला देखते हैं, परन्तु उस पर विचार कुछ भी नहीं करते । उनका लीला देखना या नित्य रामायण पढ़ना ऐसा है जैसे एक बकरी का बाग में जाना। वह कभी घास चरती है तो कभी पत्तों पर मुँह मारती है। उसके लिए बार और जंगल एक-समान हैं। वह हानिकारक स्थलों से हानि तो उठाती है, वन में गढे में गिर पड़े तो टाँग टूट जाए, परन्तु बाग की उपयोगिता से उसे कोई मतलब नहीं ! इसी प्रकार हमारे देशीय भाई यदि दूषित और गन्दी पुस्तकों को पढ़ते हैं तो शीघ्र उनमें डूब जाते हैं, परन्तु उत्तम पुस्तकों को पढ़कर उनसे कुछ भी लाभ नहीं उठाते। यदि बहुत किया तो कहीं की दो चार चौपाई कण्ठस्थ कर लीं और जब कहीं कोई बातचीत हुई तो अपना पाण्डित्य जताने के लिए सभा में कह दीं। मैं बहुत-से लोगों को रामायण पढ़ते देखता हूँ, परन्तु उसके अनुकूल आचरण करनेवाले बहुत ही न्यून हैं। अब इस रामायण-सार का सूक्ष्मता से आशय कहते हैं।
रामायण में महावीर जी के चरित्र से सच्चे सेवकों का व्यवहार जान पड़ता है और रावण के इतिहास से जाना जाता है कि यदि कुल में एक भी दुष्ट पुरुष उत्पन्न हो जाए तो सारे कुल को नष्ट कर देता है। दूसरे, रावण पुलस्त्य मुनि का पौत्र था, शिवजी का भक्त था, वेदों का पण्डित था, परन्तु इतने पर भी मांस खाने और मदिरापान और परस्त्री-गमन करने से उसकी पदवी राक्षस की हो गई। अब तो रामायण के पढ़नेवाले लाखों दुराचार करते हैं, परन्तु अपने आपको साधु और ब्राह्मण ही मानते हैं। देखो महात्मा लोगो ! विचारो, जिस परस्त्री-गमन ने रावण को राक्षस बना दिया क्या जो अब करते हैं वा करेंगे वे राक्षस नहीं? रावण शिव का भक्त था, परन्तु मांसाहार ने उसे राक्षस बना दिया।
रामायण के पढ़नेवालो ! शीघ्र इस राक्षसी व्यवहार को त्याग दो। परस्त्री-गमन, मादक द्रव्यों का सेवन और मांस-भक्षण का शीघ्र त्याग करो और रामायण से जो शिक्षा मिलती है उसका संसार में प्रचार करो! यज्ञादिक कर्म करो! वर्णाश्रम धर्म को ग्रहण करो ! सम्प्रदायों को मिटाओ, वेद का प्रचार करो! विद्या को पढ़ो-पढ़ाओ ! विद्वान् तपस्वियों का मान करो ! मूर्ख वेषधारियों का अपमान करो ! मूर्ख वेषधारियों से बचो ! ब्राह्मण वेषधारियों से बचो ! ब्राह्मण वेद का अभ्यास करें, क्षत्रिय वीर बनें । बालविवाह को दूर करो ! ब्रह्मचर्य का प्रचार करो? वर-कन्या का गुण-कर्म की योग्यता अनुसार विवाह करो। आजकल साठ वर्ष का वर और नौ वर्ष की कन्या-दादा और पोती का विवाह हज़ार-दो हज़ार रुपये के लोभ से कर देते हैं और थोड़े दिनों में वह विधवा होकर कुलकलङ्कनी हो जाती है-ऐसा मत करो!
हे रामायण के पढ़नेवालो! अयोग्य से लालचवश विवाह मत करो! धर्म को नष्ट मत करो! माता-पिता की आज्ञा का पालन करो! माता को देवता मानो! उसकी श्रद्धापूर्वक सेवा करो! भाइयों से प्रीति रक्खो! थोड़ी बातों में उनसे विरोध मत करो! जहाँ तक हो सके प्राणान्त-पर्यन्त भाई को कष्ट मत दो !
यदि तुम इस प्रकार का जीवन व्यतीत करोगे तो अत्यन्त सुख होगा। अपनी स्त्रियों को पतिव्रत-धर्म सिखलाओ, तुम स्वयं स्त्रीव्रत धारण करो। स्त्रियों को मुष्टण्डे साधुओं के पास मत जाने दो! उन्हें दुराचारी पुजारियों से अर्थात् पूजा के शत्रुओं से बचाओ! अकेले मन्दिरों में उन्हें जाने से रोको ! उन्हें समझाओ कि स्त्री के लिए पति ही देवता है! पति को छोड़कर जो स्त्री दूसरे देवता का पूजन करती है, उसका धर्म नष्ट हो जाता है ! आप कभी परस्त्री-गमन मत करो? सदा वेश्याओं से बचो, कुसंग मत करो! कु-ढङ्गों से बचो ! मित्रों को लाभ पहुँचाओ! आपस में मेल करो ! घर में फूट मत करो! दृढव्रत रहो। जहाँ तक बने सच्चे महात्माओं की सेवा करो!
हे पाठको ! ये सब कार्य करने से आपकी रामचन्द्रजी के प्रति भक्ति पूर्ण होगी और आप सदा सुख पाओगे, नहीं तो तुमको कुछ फल न होगा। प्रायः मनुष्य परमेश्वर का भजन करते है, परन्तु फल नहीं मिलता, कारण यह है कि मनुष्य दश दोषों से नहीं बचते। वे दश दोष ये हैं ।
सन्निन्दासतिनाम वैभवकथा श्रीशेशयोर्भेदधीरश्रद्धा श्रुतिशास्त्रदैशिकगिरां नाम्न्यर्थवादभ्रमः।
नामास्तीति निषिद्धवृत्तिविहितत्यागो हि धर्मान्तरैः साम्यं नाम्नि जये शिवस्य च हरेर्नामापराधा दशः ॥
अर्थ-जो सत्पुरुषों की निन्दा करता है, उसे परमेश्वर नाम-फल नहीं देता। जो ऐसे नास्तिकों का नाम-माहात्म्य सुनाता है, जो महादेव और विष्णु को देव समझता है, जिसे वेदशास्त्र और गुरु की आज्ञा में श्रद्धा न हो, उसके लिए ईश्वर का नाम जपना व्यर्थ है। जो नाम के सहारे से मांस-मदिरा आदि दूषित वस्तुओं का सेवन करता है और नित्य-नैमित्तिक धर्म को छोड़कर केवल नाम ही जपा करता है अथवा ईश्वर के नाम को अन्य कार्यों के बराबर ही एक काम समझता है, उसे सब कामों से श्रेष्ठ नहीं मानता-ऐसे मनुष्य को नाम जपने से कोई फल प्राप्त नहीं होता।
✍🏻 लेखक- स्वामी दर्शनानन्द सरस्वती
📖 पुस्तक - दर्शनानन्द ग्रन्थ संग्रह

0 टिप्पणियाँ
If you have any Misunderstanding Please let me know