अथर्ववेद काण्ड ३ सूक्त १० सरल संस्कृत शब्दार्थ और हिन्दी भावार्थ
०३।०१०।०१
प्र॑थ॒मा ह॒ व्यु॑वास॒ सा धे॒नुर॑भवद्य॒मे ।
सा नः॒ पय॑स्वती दुहा॒मुत्त॑रामुत्तरा॒म्समा॑म् ॥१॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (सा) वह [ईश्वरी वा लक्ष्मी] (प्रथमा) प्रसिद्ध वा पहली शक्ति [प्रकृति] (ह) निश्चय करके (वि, उवास) प्रकाशित हुई। वह (यमे) नियम में (धेनुः) तृप्त करनेवाली [वा गौ के समान] (अभवत्) हुई है। (सा) वह (पयस्वती) दुधेल [प्रकृति] (नः) हमको (उत्तराम्-उत्तराम्) उत्तम-उत्तम (समाम्) सम [समान वा निष्पक्ष] शक्ति से (दुहाम्) भरती रहे ॥१॥
भावार्थः इस सूक्त में ‘रात्रि’ म० और ‘एका-टका’ म० ५ दोनों शब्द प्रकृति के वाचक हैं। प्रकृति ईश्वरशक्ति वा जगत् की सामग्री, सृष्टि से पहिले विद्यमान थी, उसने ईश्वर नियम से [मन्त्र २ वा ८ देखो] विविध पदार्थ सूर्य, अन्नादि उत्पन्न किये हैं। विद्वान् लोग प्रकृति के विज्ञान और प्रयोग से अधिक-२ ऐश्वर्यवान् होते हैं ॥१॥ इस मन्त्र का उत्तरार्ध ‘सा नः पयस्वती’ ऋ० ४।५७।७ में हैं ॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (प्रथमा) सृष्टि के प्रारम्भ में पहली उषा ने (ब्युवास) तमस् अर्थात् अन्धकार को स्थानच्युत कर दिया, [विवासित कर दिया] (सा) वह उषा (यमे) दिन-रात के जोड़े में (धेनुः अभवत्) खाद्य-अन्न प्रदान करनेवाली हो गई। (सा) वह (न:) हमारे लिए (पयस्वती) दुग्धवाली हो गई, वह (उत्तराम्, उत्तराम्, समाम्) उत्तरोत्तर वर्षों में (दुहाम) दुग्ध बादि दोहन करे, प्रदान करे। समा=चान्द्रवर्ष (स+[चन्द्र]+मा), संवत्सर है सौरवर्ष।
०३।०१०।०२
यां दे॒वाः प्र॑ति॒नन्द॑न्ति॒ रात्रि॑म्धे॒नुमु॑पाय॒तीम् ।
सं॑वत्स॒रस्य॒ या पत्नी॒ सा नो॑ अस्तु सुमङ्ग॒ली ।।२।।
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (देवाः) महात्मा पुरुष, वा सूर्य, वायु चन्द्रादि दिव्य पदार्थ (उपायतीम्) पास आती हुई (धेनुम्) तृप्त करनेवाली (याम्) जिस (रात्रिम्) दानशीला और ग्रहणशीला शक्ति, वा रात्रिरूप [प्रकृति] को (प्रतिनन्दन्ति) अभिनन्दन करते [धन्य मानते] हैं और (या) जो (संवत्सरस्य) यथावत् निवास देनेवाले [परमेश्वर] की (पत्नी) पालनशक्ति है, (सा=सा सा) वह ईश्वरी (नः) हमारेलिये (सुमङ्गली) बड़े-२ मङ्गल करनेवाली (अस्तु) होवे ॥२॥
भावार्थः प्रकृति ईश्वरनियम से पदार्थों को उत्पन्न करके जीवों को सुख देकर उनका दुःख हरती है और अनन्त होने से वह रात्रि वा अन्धकाररूप है। विज्ञानी पुरुष खोज लगा-लगाकर उससे उपकार लेकर विविध उन्नति करते हैं ॥२॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (उपायतीम्) समीप आती हुई (याम्) जिस (धेनुम्, रात्रिम्) धेनुरूपा रात्री को [प्राप्त कर] (देवाः) दिव्य शक्तियां (प्रतिनन्दन्ति) समृद्ध होती हैं, तथा (या) जो रात्री (संवत्सरस्य पत्नी) संवत्सर की पत्नी है, (सा) वह (नः) हमें (सुमज्ली अस्तु) उत्तम-मङ्गलकारिणी हो।
टिप्पणी: [संवत्सर है सौर वर्ष। मन्त्र में समाम् द्वारा चान्द्रवर्ष का कथन हुआ है। सौर वर्ष का प्रारम्भ रात्री द्वारा कहा है। दिन, रात्री के १२ बजे की समाप्ति पर, आनेवाली रात्री के १२ बजे तक होता है। इस आनेवाली रात्री के पश्चात् दिन का प्रारम्भ होता है जोकि नववर्ष को प्रारम्भ करता है। इस नववर्ष के आते भूमण्डल की दिव्य शक्तियां समृद्ध होने लगती हैं। यह रात्री नववर्ष की पत्नी होती है, नववर्ष की दिव्य शक्तियों की उत्पादिका होती है। नन्दन्ति=टुनदि समृद्धौ (भ्वादिः)। इस प्रथमा रात्री को संवत्सर की पत्नी कहा है। इस प्रथमा रात्री से संवत्सर प्रारब्ध होता है, सम्भवतः यह अभिप्राय है।]
०३।०१०।०३
सं॑वत्स॒रस्य॑ प्रति॒मां यां त्वा॑ रात्र्यु॒पास्म॑हे ।
सा न॒ आयु॑ष्मतीं प्र॒जां रा॒यस्पोषे॑ण॒ सं सृ॑ज ॥३॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (रात्रि) हे सुखदात्री वा दुःखहर्त्री वा रात्रिरूप [प्रकृति] (संवत्सरस्य) यथावत् निवास देनेवाले परमेश्वर की (प्रतिमाम्) प्रतिमा [प्रतिरूप वा प्रतिनिधि] (याम्) सर्वत्र व्यापिनी (त्वा) तुझको (उपास्महे) हम भजते हैं। (सा) वह लक्ष्मी तू (नः) हमारेलिये (आयुष्मतीम्) चिरंजीविनी (प्रजाम्) प्रजा को (रायः) धन की (पोषेण) बढ़ती के साथ (संसृज) संयुक्त कर ॥३॥
भावार्थः अनन्त परमेश्वरी प्रकृति के सूक्ष्म और स्थूलरूप के ज्ञान से उपकार लेकर हम अपनी सन्तान के सहित धनी, स्वस्थ और चिरंजीवी बने रहें ॥३॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (रात्रि) हे रात्रि ! (याम् त्वा) जिस तुझको (संवत्सरस्य) सौरवर्ष की (प्रतिमाम्) प्रतिकृति रूप में, या निर्मात्रीरूप में (उपास्महे) हम उपासित१ करते हैं, (सा) वह तूं (नः प्रजाम्) हमारी पुत्र-पौत्र आदि सन्तान को (आयुष्मतीम्) प्रशंसित आयुवाली (रायस्पोषेण) तथा सम्पत्ति की पुष्टि के (सं सृज) साथ सम्बद्ध कर ।
टिप्पणी: [रात्री सौर वर्ष की पत्नी है, निर्मात्री है (देखो मन्त्र २ की व्याख्या। आयुष्मतीम्= प्रशंसार्थे मतूप्। उपास्महे= आसना परमेश्वर की को जाती है, ध्यान में उसके समीप बैठा जाता है। उप (समीप)+ आस (उपवेशने) बैठना। मन्त्र में रात्रि के समीपस्थ होने का निर्देश हुआ है, जोकि नववर्ष की पहली रात्री है। इस रात्री में प्रसन्नता प्रकट करना इसकी उपासना है।]
[१. अथवा रात्रीमुपाश्रित्य परमात्मानमुपाास्य है ।]
०३।०१०।०४
इ॒यमे॒व सा या प्र॑थ॒मा व्यौछ॑दा॒स्वित॑रासु चरति॒ प्रवि॑ष्टा । म॒हान्तो॑ अस्यां महि॒मानो॑ अ॒न्तर्व॒धूर्जि॑गाय नव॒गज्जनि॑त्री ॥४॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (इयम् एव) यही (सा) वह ईश्वरी, [रात्रि, प्रकृति] है (या जो प्रथमा) प्रथम (वि-औच्छत्) प्रकाशमान हुई है और (आसु) इन सब और (इतरासु) दूसरी [सृष्टियों] में (प्रविष्टा) प्रविष्ट होकर (चरति) विचरती है। (अस्याम अन्तः) इसके भीतर (महान्तः) बड़ी-२ (महिमानः) महिमायें हैं। उस (नवगत्) नवीन-२ गतिवाली (वधूः) प्राप्ति योग्य (जनित्री) जननी ने [अनर्थों को] (जिगाय) जीत लिया है ॥४॥
भावार्थः परमाणुरूपा प्रकृति जगत् के सब पदार्थों में प्रविष्ट है। विद्वान् लोग जैसे-२ खोजते हैं, उसकी नवीन-२ शक्तियों का प्रादुर्भाव करके सुख पाते हैं ॥४॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (इयम् एव सा) यह ही वह (प्रथमा) पहली उषा है (या) जिससे कि (इतरासु प्रविष्टा) अन्य उषाओं में प्रविष्ट होकर (व्यौच्छत्) तमस् का निरसन किया है, (चरति) और उनमें विचरती है। (अस्याम् अन्तः) इस पहली उषा के भीतर (महान्तः महिमानः) अपरिमित महिमाएँ हैं, (जिगाय) अत: यह विजेत्री हुई है, जैसेकि (नवगत वधू) पतिगृह में नई-नई गई वधू, (जनित्री) सन्तानोत्पादिका बनकर, विजयवाली हो जाती है।
टिप्पणी: [सृष्टि के प्रारम्भ में प्रकट हुई पहली उषा ही मानो तदनन्तर प्रकट हुई उषाओं में प्रकट हो रही है। इन सब उषाओं के स्वरूपों में साम्य है। अतः इन उषाओं में प्रथमोत्पन्न उषा का प्रकट होना कहा है। नववधू सन्तानोत्पादन कर, पतिगृहवासियों को प्रसन्न कर, उनके मनों पर विजय पा लेती है, क्योंकि यह वंशपरम्परा को जारी रखने में सहायिका हुई है।]
०३।०१०।०५
वा॑नस्प॒त्या ग्रावा॑णो॒ घोष॑मक्रत ह॒विष्कृ॒ण्वन्तः॑ परिवत्स॒रीण॑म् । एका॑ष्टके सुप्र॒जसः॑ सु॒वीरा॑ व॒यं स्या॑म॒ पत॑यो रयी॒णाम्।।५।।
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (वानस्पत्याः) वनस्पति अर्थात् सेवकों वा सेवनीय गुणों के रक्षक परमेश्वर से सम्बन्धवाले (ग्रावाणः) सूक्ष्मदर्शी, स्तोता पुरुषों ने, (परिवत्सरीणम्) परिवत्सर, सब प्रकार निवास देनेवाले परमेश्वर से सिद्ध किये हुए (हविः) ग्राह्य वस्तु को (कृण्वन्तः) उत्पन्न करते हुए, (घोषम्) ध्वनि (अक्रत) की है। “(एकाष्टके) हे अकेली व्याप्तिवाली वा अकेली भोजन स्थानशक्ति [प्रकृति] ! (वयम्) हम लोग (सुप्रजसः) उत्तम सन्तानवाले, (सुवीराः) उत्तम वीरोंवाले और (रयीणाम्) सब प्रकार के धनों के (पतयः) पति (स्याम्) होवें” ॥५॥
भावार्थः ऋषि-मुनि प्रकृति द्वारा परमेश्वर रचित पदार्थों के गुणों के ज्ञान और प्रयोग से सब प्रकार का सुख भोगते हैं। इसी प्रकार सब मनुष्य उद्योग करके आनन्द भोगें ॥५॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (परिवत्सरीणम्) संवत्सर भर पैदा किये जानेवाले (हविः कृण्वन्त) खाद्यान्न के उत्पादक, तथा (वानस्पत्याः) वनों के अधिपतियों अर्थात् महाकाय वृक्षों के उत्पादक (ग्रावाण:) मेघों ने (घोषम्) गर्जना (अक्रत) की है। (एकाष्टके) हे माघकृष्णाष्टमी! (सुप्रजसः) उत्तम संतानोंवाले तथा (सुवीराः) उत्तम वीर (वयम्) हम, (रयीणाम्) सम्पत्तियों के (पतय: स्याम) स्वामी हों।
टिप्पणी: [हविः=हु दानाक्षनयोः (जुहोत्यादिः), अदन अर्थ अभिप्रेत है, अर्थात अदनीय अन्न। ग्रवाण:= ग्रावा मेघनाम (निघं० १।१०)। मेघ की वर्षा द्वारा वनस्पतियां तथा अदनीय अन्न पैदा होते हैं। माघकृष्णाष्टमी से इसकी पत्नी और पति संवत्सर का प्रारम्भ होता है [मन्त्र २, ८]। एकाष्टका=माघकृष्णाष्टमी (मन्त्र १२, सायण)।]
०३।०१०।०६
इडा॑यास्प॒दं घृ॒तव॑त्सरीसृ॒पं जात॑वेदः॒ प्रति॑ ह॒व्या गृ॑भाय। ये ग्रा॒म्याः प॒शवो॑ वि॒श्वरू॑पा॒स्तेषां॑ सप्ता॒नां मयि॒ रन्ति॑रस्तु ॥६॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (जातवेदः) हे उत्पन्न पदार्थों के ज्ञानवाले पुरुष ! (इडायाः) प्राप्ति योग्य [प्रकृति] के (घृतवत्) सारयुक्त और (सरीसृपम्) अत्यन्त रेंगते हुए (पदम् प्रति) पद से (हव्या=हव्यानि) देने-लेने योग्य वस्तुओं को (गृभाय) ग्रहण कर। (ये) जो (ग्राम्यः) ग्राम निवासी, (विश्वरूपाः) नानारूपवाले (पशवः) व्यक्त और अव्यक्त वाणीवाले जीव हैं। (तेषाम्) उन सब (सप्तानाम्) आपस में मिले हुए प्राणियों की (रन्तिः) प्रीति वा क्रीड़ा (मयि) मुझमें (अस्तु) होवे ॥६॥
भावार्थः सृष्टिविद्या में निपुण पुरुष संसार के पदार्थों से विज्ञान द्वारा उपकार लेकर सब प्राणियों को सुखी रखकर आप सुखी रहते हैं ॥६॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (इडाया:१) स्तुत्या [एकाष्टका को] (पद्म२) गति (घृतवत्३ सरीसृपम्४) पिघले घृत के सदृश अति सर्पणवाली है, (जातवेदः) हे जातप्रज्ञ परमेश्वर ! तू (हव्या=हवींषि) हमारी प्रदत्त हव्या को (प्रतिगृभाय) ग्रहण कर। (ये) जो (विश्वरूपाः) नानारूपाकृतियोंवाले (ग्राम्याः पशवः) ग्राम के पशु हैं, (तेषाम्, सप्तानाम्) उन सात का (रन्तिः) रमण (मयि अस्तु) मुझमें हो [यह प्रार्थना की गई है।]
टिप्पणी: [प्रकरण के अनुसार इडा का अर्थ एकाष्टका प्रतीत होता है (मन्त्र ५)। एकाष्टका की गति अति-सर्पणशील है। परमेश्वर के प्रति प्रकृतिजन्य हवियों को समर्पित कर, उसे ग्रहण करने की प्रार्थना की है। ग्राम के सात पशु हैं गौ, अश्व, अजा, अवि, पुरुष, गर्दभ अौर उष्ट्र (सायण)। फलरूप में इनका रमण चाहा है। एकाष्टका है माघकृष्णाष्टमी (सायण), (अथर्व० १०।५।१)]
[१. इडा= ईड स्तुतौ, दीर्घ ईकार का ह्रस्वत्व छान्दस है।
२. पद्म= पद गतौ अर्थात् गति, विचलन।
३. घुतवत्= घृतम् उदकनाम (निघं० १।१२)।
४. सरीसृपम्= उदकवत् अति सर्पणशील; यङ्लुगन्तरूप।
ज्योतिष सिद्धान्तानुसार भूमध्यरेखा तथा क्रान्तिवृत्त के मेल अर्थात् परस्पर कटाव के बिन्दुओं का जब संक्रमण होता है तो यह संक्रमण शनैः-शनै: इन बिन्दुओं पर पूर्वापेक्षया कुछ शीघ्र पहुँच जाता है। इसे "Precession of equinoxes" कहते हैं। Equinoxes का अर्थ है "दिन और रात का बराबर हो जाना।" यह बराबर होना राशिचक्र में पश्चिम से पूर्व की ओर होता रहता है। राशियों का क्रम है, मेष, वृष, मिथुन आदि, और इनका विपरीत क्रम है, मीन, कुम्भ, मकर बादि। Equinoxes की गति इस विपरीत क्रम में होती रहती है। इस गति का प्रभाव एकाष्टका पर भी होता है। इसे "सरीसृपम्" द्वारा निर्दिष्ट किया है। एकाष्टका = माघकृष्णाष्टमी (सायण)।]
०३।०१०।०७
आ मा॑ पु॒ष्टे च॒ पोषे॑ च॒ रात्रि॑ दे॒वानां॑ सुम॒तौ स्या॑म ।
पू॒र्णा द॑र्वे॒ परा॑ पत॒ सुपू॑र्णा॒ पुन॒रा प॑त ।
सर्वा॑न्य॒ज्ञान्त्सं॑भुञ्ज॒तीष॒मूर्जं॑ न॒ आ भ॑र ॥७।।
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (रात्रि) हे सुख देनेवाली वा दुःख हरनेवाली, वा रात्रीरूप [प्रकृति] (पुष्टे) धन की समृद्धि (च) और (पोषे) अन्नादि की वृद्धि में (च) निश्चय करके (मा) मुझको (आ=आ भर) भर दे, [जिससे] (देवानाम्) देवताओं की (सुमतौ) सुमति में (स्याम) हम रहें। (दर्वे) हे दुःख दलनेवाली ! [वा चमसारूप !] (पूर्णा) भरी-भराई (परापत) ऊपर आ और (पुनः) बार-२ (सुपूर्णा) भले प्रकार भरी-भराई (आ पत) पास आ ! (सर्वान्) सब (यज्ञान्) पूजनीय गुणों का (सम्भुञ्जती) ठीक-ठीक पालन करती हुई तू (इषम्) अन्न और (ऊर्जम्) बल (नः) हमें (आ भर) लाकर भर दे ॥७॥
भावार्थः मनुष्य सृष्टि के पदार्थों के गुण साक्षात् करके जितना-२ आगे बढ़ता है, उतना-२ ही वह धनी और बली होकर देवताओं का प्रिय होता और आनन्द भोगता है ॥७॥ ‘पूर्णा दर्वे.... पुनरापत’ इतना भाग यजुर्वेद अ० ३।४९ में है, वहाँ ‘दर्वे’ के स्थान पर ‘दर्वि’ पद है ॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (रात्रि) हे रात्रि ! (मा) मुझे (पुष्टे च पोषे च) पुष्ट पदार्थों में, और [उन द्वारा प्राप्त] पुष्टि में (आ) आस्थापित कर, ताकि (देवानाम्) दिव्य व्यक्तियों की (सुमतौ) सुमति में (स्याम) हम हों। (दर्वे) हे दारु द्वारा निर्मित कड़छी! (परापत) अग्नि की ओर तु जा गिर, तदनन्तर (सुपूर्णा) और अभिमत फलों से पूर्ण हुई, भरी हुई (पुनः) फिर (आ पत) हमारी ओर आ गिर। (सर्वान यज्ञान्) सब यज्ञों को (संभुञ्जती) सम्यक सफल करती हुई (नः) हमारे लिये (इषम्) अभीष्ट अन्न, (च) और (ऊर्जम्) बल और प्राण (आ भर=आ हर) ला।
टिप्पणी: [रात्री है संवत्सर की प्रथमा रात्री, जिस रात्री से संवत्सर का प्रारम्भ होता है। उस रात्री में सांवत्सरिक यज्ञ करना चाहिए (मन्त्र ५)। इस यज्ञ में यज्ञकर्त्ताओं को दिव्य व्यक्तियों की सुमति के अनुसार जीवनचर्या करनी चाहिए। घृत तथा हवियों को यज्ञाग्नि में डालने के लिए दारुनिर्मित कड़छी चाहिए, ताकि आहुतियाँ प्रभूतमात्रा में दी जा सकें, कड़छी को पूर्ण भरकर आहुतियां दी जा सकें, उसका फल भी प्रभुत होगा। सब यज्ञों के पूर्णतया परिपालित होने पर हमें अभीष्ट अन्न और उस द्वारा बल और प्राणशक्ति प्राप्त होगी। ऊर्ज बलप्राणनयोः (चुरादिः)। भुञ्जती = भुज पालने (रुधादिः), भोजन से पालन होता ही है। यज्ञों और यज्ञियाग्नियों को समुचित भोजन मिलने पर ये भी परिपालित होंगे।]
०३।०१०।०८
आयम॑गन्त्संवत्स॒रः पति॑रेकाष्टके॒ तव॑ ।
सा न॒ आयु॑ष्मतीं प्र॒जां रा॒यस्पोषे॑ण॒ सं सृ॑ज ।।८॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (एकाष्टके) अकेली व्यापक रहनेवाली, वा अकेली भोजन स्थानशक्ति ! [प्रकृति] (अयम्) यह (संवत्सरः) यथावत् निवास देनेवाला, (तव) तेरा (पतिः) पति वा रक्षक [परमेश्वर] (आ अगन्) प्राप्त हुआ है। (सा) लक्ष्मी तू (नः) हमारेलिए (आयुष्मतीम्) बड़ी आयुवाली (प्रजाम्) प्रजा को (रायः) धन की (पोषेण) बढ़ती के साथ (संसृज) संयुक्त कर ॥८॥
भावार्थः विद्वान् साक्षात् कर लेते हैं कि परमेश्वर ही प्रकृति, जगत् सामग्री का स्वामी अर्थात् उसके अंशों का संयोजक और वियोजक है और प्रकृति के यथावत् प्रयोग से मनुष्य अपनी सन्तान सहित चिरंजीवी और धनी होते हैं ॥८॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (एकाष्टके) हे एकाष्टका की रात्री! (अयम्) यह (तव पतिः) तेरा पति (संवत्सरः) सौर वर्ष (आ अगन्) आ गया है। (सा) वह तू (न: प्रजाम्) हमारी प्रजा को (आयुष्मतीम्) दीर्घायु कर और (रायस्पोषण) धन की पुष्टि के साथ (संसृज) उसका संसर्ग अर्थात् सम्बन्ध कर।
टिप्पणी: [ मंत्र (२) में रात्री को संवत्सर की पत्नी कहा है, अतः संवत्सर है उसका पति। व्याख्या के लिये देखो मन्त्र (२)।]
०३।०१०।०९
ऋ॒तून्य॑ज ऋतु॒पती॑नार्त॒वानु॒त हा॑य॒नान् ।
समाः॑ संवत्स॒रान्मासा॑न्भू॒तस्य॒ पत॑ये यजे ॥९॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (ऋतून्) ऋतुओं, (ऋतुपतीन्) ऋतुओं के स्वामियों [सूर्य, वायु आदिकों], (आर्तवान्) ऋतुओं में उत्पन्न होनेवाले (हायनान्) पाने योग्य चावल आदि पदार्थों से (संवत्सरान्) यथाविधि निवास देनेवाले (मासान्) कर्मों के नापनेवाले महीनों (उत) और (समाः) सब अनुकूल क्रियाओं को (भूतस्य) सत्ता में आये हुए जगत् के (पतये) पति के (यजे यजे) मैं बार-बार अर्पण करता हूँ ॥९॥
भावार्थः तत्त्वज्ञानी पुरुष ग्रीष्म, वर्षा, शीतादि ऋतुओं और उनके कारण सूर्य, चन्द्र, वायु, पृथिवी आदि एवं संसार के अन्य पदार्थों तथा क्रियाओं का आदि कारण जगत् पिता परमेश्वर को मानते और उसका धन्यवाद करते हैं ॥९॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (ऋतून् यजे) मैं ऋतूयज्ञ करता हूँ, (ऋतुपतीन्) ऋतुओं के पतियों को, (आर्तवान्) ऋतुओं के समूहों या अवयवों को, (उत) तथा (हायनान्=सायनान) अयनोंवाले आयनवर्षों को, (समाः) चान्द्रवर्षों को, (संवत्सरान्) सौरवर्षों को, (मासान्) मासों को [लक्ष्य कर] यज्ञ करता हूँ। (भूतस्य पतये) और भौतिक जगत् के पति अर्थात् परमेश्वर का (यजे) मैं यजन करता हूँ।
टिप्पणी: [संवत्सर की पहली रात्री से प्रारम्भ कर प्रत्येक ऋतु तथा मास में यज्ञ करने का विधान हुआ है। ये यज्ञ भौतिक जगत् के पति परमेश्वर की प्रसन्नता के लिये हैं। दो अयनों के मेल से हायन होता है। दो अयन हैं उत्तरायण तथा दक्षिणायन। हायन है सायन, यथा सिन्धु है हिन्दु। सकार को हकार प्रायः हो जाता है। ऋतुपति हैं अग्नि, वायु, विद्युत्, मेघ, आदित्य आदि।]
०३।०१०।१०
ऋ॒तुभ्य॑ष्ट्वार्त॒वेभ्यो॑ मा॒द्भ्यः सं॑वत्स॒रेभ्यः॑ ।
धा॒त्रे वि॑धा॒त्रे स॒मृधे॑ भू॒तस्य॒ पत॑ये यजे॥१०॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः [हे काष्टके प्रकृति !] (त्वा) तुझको (ऋतुभ्यः) ऋतुओं के लिए, (आर्तवेभ्यः) ऋतुओं में उत्पन्न पदार्थों के लिए, (माद्भ्यः) महीनों के लिए और (संवत्सरेभ्यः) यथावत् निवास देनेवाले वर्षों के [सुधार के] लिए, (धात्रे) धारण करनेवाले, (विधात्रे) रचनेवाले, (समृधे) यथा नियम बढ़ानेवाले (भूतस्य) जगत् के (पतये) पति के लिए (यजे) मैं समर्पण करता हूँ ॥१०॥
भावार्थः परमेश्वर नियम से जगत् की उत्पन्न करनेवाली प्रकृति की चेष्टाओं को सब ऋतुओं में देखते हुए विद्वान् लोग अपने समय को उपकार में लगाते हैं ॥१०॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (त्वा) तुझे (ऋतुभ्यः) ऋतुओं [की पुष्टि के] लिये, (आर्तर्वेभ्यः) ऋतुओं के समूह या अवयवों [की पुष्टि] के लिये, (माद्भ्यः) मासों [की पुष्टि के] लिये, (संवत्सरेभ्यः) संवत्सरों [की पुष्टि के] लिये, (धात्रे) तथा धारणपोषण करनेवाले के लिये, (विधात्रे) जगत् का विधिविधान करनेवाले के लिये, (समृधे) सब की समृद्धि के लिये, (भूतस्य पतये) भूत-भौतिक जगत् के स्वामी परमेश्वर [की प्रसन्नता] के लिये (यजे) मैं यज्ञ करता हूँ।
टिप्पणी: [त्वा=तुझे लक्ष्य करके, अर्थात संवत्सर की रात्री को लक्ष्य करके, अर्थात् संवत्सर की पहली रात्री से मैं यज्ञ प्रारम्भ करता हूँ।]
०३।०१०।११
इड॑या॒ जुह्व॑तो व॒यं दे॒वान्घृ॒तव॑ता यजे ।
गृ॒हानलु॑भ्यतो व॒यं सं॑ विशे॒मोप॒ गोम॑तः॥११॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (इडया) स्तुतियोग्य प्रकृति [की विद्या] से (घृतवता=घृतवता कर्मणा) सारयुक्त [कर्म] के द्वारा (जुह्वतः) होम [आत्मदान] करनेवाले (देवान्) देवताओं को (वयम्) हम (यजे=यजामहे) पूजते हैं [जिससे] (अलुभ्यतः) तृष्णारहित [सर्वथा भरे-पूरे] और (गोमतः) बहुत सी उत्तम-२ गौओंवाले (गृहान्) घरों में (उप=उपेत्य) आकर (वयम्) हम (संविशेम) सुख से रहें ॥११॥
भावार्थः संसार के ज्ञान से उत्तम कामों में आत्मदान करनेवाले महात्माओं के हम आदरपूर्वक अनुगामी बनें और सब कामनाओं तथा घृत दुग्धादि पोषक पदार्थों को प्राप्त करके आनन्द भोगें ॥११॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (घृतवता इडया) घृतसम्पृक्त अन्न द्वारा (वयम्) हम (जुहूत:) आहुतियाँ देते हुए (देवान्) अग्नि आदि देवों का [यजन करते हैं], (यजे) मैं प्रत्येक गृहस्थी भी यज्ञ करता हूं। (अलुभ्यतः वयम्) निर्लोभी हुए हम (गोमतः) गौओंवाले (गृहान्) घरों में (उप) उपस्थित हुए (सं विशेम) मिलकर प्रवेश करें।
टिप्पणी: [नवनिर्मित गृहों में प्रवेश करने का कथन हुआ है। प्रवेश के लिये सबको अर्थात् प्रत्येक को गृहप्रवेश संस्कार करना चाहिए। गृहों में गोसम्पत्ति होनी चाहिए। गृहस्थियों को निर्लोभी होना चाहिए, ताकि भिक्षुकों और अतिथियों का वे सत्कार कर सकें। इडा= अन्न (निघं० २।७) अन्नाहुतियां घृतसम्पृक्त होनी चाहिए। सम्भवतः मन्त्र में नवसस्येष्टि का भी विधान हुआ है।]
०३।०१०।१२
ए॑काष्ट॒का तप॑सा त॒प्यमा॑ना ज॒जान॒ गर्भं॑ महि॒मान॒मिन्द्र॑म् । तेन॑ दे॒वा व्य॑सहन्त॒ शत्रू॑न्ह॒न्ता दस्यू॑नामभव॒च्छची॒पतिः॑ ॥१२॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (एकाष्टका) अकेली व्यापक रहनेवाली वा अकेली भोजन स्थानशक्ति [प्रकृति] ने (तपसा) बड़े ऐश्वर्यवाले ब्रह्मद्वारा (तप्यमाना) ऐश्वर्यवाली होकर (गर्भम्) स्तुतियोग्य, (महिमानम्) पूजनीय (इन्द्रम्) परम ऐश्वर्यवाले जीव को (जजान) प्रकट किया। (तेन) उस [इन्द्र, जीव] के द्वारा (देवाः) प्रकाशमान इन्द्रियों ने (शत्रून्) शत्रुओं [दोषों] को (वि) विविध प्रकार से (असहन्त) हराया है और (शचीपतिः) वाणियों वा कर्मों वा बुद्धियों का पति [इन्द्र, जीव] (दस्यूनाम्) दस्युओं को (हन्ता) मारनेवाला (अभवत्) हुआ है ॥१२॥
भावार्थः मनुष्य ईश्वरनियम से प्रकृति के संयोग-वियोग से शरीर पाकर इन्द्रियों द्वारा परीक्षा करके दोषों का त्याग और गुणों का ग्रहण करके आनन्द भोगते और भुगाते हैं ॥१२॥
‘तपस्’ शब्द ब्रह्म वा परमेश्वरवाची है, जैसे−“ओं तपः। ओं सत्यम्” प्राणायाम मन्त्र में है। ऋग्वेद मण्डल १० सूक्त १९० मन्त्र १ में भी ऐसा वर्णन है ॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (एकाष्टका) एकाष्टका ने, (तपसा तप्यमाना) अर्थात् तप द्वारा प्रतप्त हुई ने, (गर्भम् जजान) गर्भ को जन्म दिया, (महिमानम् इन्द्रम्) अर्थात् महिमासम्पन्न आदित्य को। (तेन) उस आदित्य द्वारा (देवाः) दिव्यतत्त्वों ने (शत्रून व्यसहन्त) शत्रुओं का विशेषतया पराभव किया, अतः (शचीपतिः) शक्तियों का अधिपति आदित्य (दस्युनाम हन्ता अभवत्) अपक्षयकारियों का हनन करने वाला हुआ।
टिप्पणी: [एकाष्टका है माघकृष्णाष्टमी (सायण, मन्त्र १२)। पौषमास तक आदित्य दक्षिण तक जाता रहता है। माघमास से आदित्य की गति उत्तरायण की ओर हो जाती है, और क्रमशः उत्तरोत्तर गति करता हुआ अधिकाधिक गर्म होता जाता है। यह स्थिति है एकाष्टका की गर्मी को गर्भरूप में धारण करने की। तदनन्तर गर्मी के अधिक बढ़ जाने पर आदित्य को एकाष्टका जन्म देती है। एकाष्टका के "तपसा तप्यमाना जजान" का यह अभिप्राय प्रतीत होता है। इन्द्र है परमैश्वर्यवान् आदित्य। आदित्य का पूर्णरूप में प्रतप्त हो जाना उसका परम ऐश्वर्य है। ऐसे आदित्य को राहायता द्वारा दिव्य शक्तियां अन्धकार तथा शैत्यरूपी शत्रुओं का पराभव करती हैं।]
०३।०१०।१३
इन्द्र॑पुत्रे॒ सोम॑पुत्रे दुहि॒तासि॑ प्र॒जाप॑तेः ।
कामा॑न॒स्माकं॑ पूरय॒ प्रति॑ गृह्णाहि नो ह॒विः॥१३ ॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (इन्द्रपुत्रे) हे सूर्य जैसे पुत्रवाली ! (सोमपुत्रे) हे चन्द्रमा जैसे पुत्रवाली ! [प्रकृति] तू (प्रजापतेः) प्रजारक्षक परमेश्वर के (दुहिता) कार्यों की पूर्ण करनेवाली (असि) है, (अस्माकम्) हमारे (कामान्) मनोरथों को (पूरय) पूर्ण कर, (नः) हमारी (हविः) भक्ति को (प्रति गृह्णाहि) स्वीकार कर ॥१३॥
भावार्थः परमेश्वर ने प्रकृति से सूर्य-चन्द्रादिलोक और बड़े-बड़े प्रतापी तथा उपकारी मनुष्य उत्पन्न किये हैं, उस प्रकृति की शक्तियों के ज्ञान और प्रयोग से संसार की भलाई चाहनेवाले पुरुष अपनी कामनायें पूरी करते हैं ॥१३॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: हे एकाष्टका ! तु इन्द्रपुत्रवाली है, सोमपुत्रवाली है, प्रजापति परमेश्वर की तू दुहिता है। (अस्माकम्, कामान्) हमारी कामनाओं को (पूरय) पूरी कर, सफल कर। (न:) हमारी (हवि) हवि को (प्रति गृह्णाहि) स्वीकार कर।
टिप्पणी: [एकाष्टका अर्थात् माघ कृष्णाष्टमी के दो पुत्र हैं इन्द्र अर्थात् आदित्य और सोम अर्थात् चन्द्रमा। आदित्य तो दिन में और चन्द्रमा रात्री में प्रकाश देकर हमारी कामनाओं को पूर्ण करता है, दिन और रात्री में की गई कामनाओं को ये दोनों पूर्ण करते हैं, सफल करते हैं। एकाष्टका प्रजाओं-के-पति परमेश्वर की दुहिता है, परमेश्वर की कामनाओं का दोहन करती है “दुहिता दोग्धतेर्वा”(निरुक्त ३/१/३) परमेश्वर की कामना है प्राणियों को सृष्ट्युत्पादन द्वारा भोगापवर्ग का प्रदान। परमेश्वर की इस कामना द्वारा हम प्राणियों की कामनाएं पूर्ण हो रही हैं, सफल हो रही हैं। हविः है माघकृष्णाष्टमी पर किये गये यज्ञ की हविः।]
॥ इति द्वितीयोऽनुवाकः ॥

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