वेद कहता है कि पहले शुक्ल पक्ष और उसके बाद कृष्ण पक्ष होकर चान्द्र मास बनता है। पौराणिक पञ्चाङ्ग पहले कृष्ण पक्ष लेते हैं और उसके बाद शुक्ल पक्ष के साथ चान्द्र मास पूरा करते हैं । आश्चर्य ये है कि उनके पास आज अपना वैदिक पञ्चाङ्ग होते हुए भी, वेद की प्राथमिकता वाला हमारा वैदिक समाज उन पौराणिक पञ्चाङ्गों पर ही चलता है ।
वेद कहता है कि नक्षत्र २८ होते हैं । पौराणिक, पञ्चाङ्गों में २७ नक्षत्रों का ही विस्तार स्वीकार करते हैं। आश्चर्य ये है कि उनके पास आज अपना वैदिक पञ्चाङ्ग होते हुए भी, वेद की प्राथमिकता वाला हमारा वैदिक समाज उन पौराणिक पञ्चाङ्गों पर ही चलता है ।
वेद कहता है कि ऋतुवें सूर्य से ही सम्भव होती हैं । यह बात प्रत्यक्ष से भी प्रमाणित है । पौराणिक पञ्चाङ्ग धर्मसिन्धु और निर्णयसिन्धु जैसे ( महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के शब्दों में कपोल कल्पित ग्रन्थ - सत्यार्थ प्रकाश तृतीय समुल्लास ) ग्रन्थों के द्वारा मान्य "चान्द्र ऋतुवें भी होती हैं" के मार्गदर्शन पर बनते हैं। आश्चर्य ये है कि उनके पास आज अपना वैदिक पञ्चाङ्ग होते हुए भी, वेद की प्राथमिकता वाला हमारा वैदिक समाज उन पौराणिक पञ्चाङ्गों पर ही चलता है।
वेद कहता है कि राशियां (प्रधियाँ ) क्रान्तिवृत्त के भाग होते हैं किन्तु पौराणिक पञ्चाङ्ग तारा समूहों से बनी (कल्पित) भेड़, बैल मछली आदि जैसी आकृति परक राशियां (जो भारत की भी नहीं हैं) मानकर पञ्चाङ्ग बनाते हैं। आश्चर्य ये है कि उनके पास आज अपना वैदिक पञ्चाङ्ग होते हुए भी, वेद की प्राथमिकता वाला हमारा वैदिक समाज उन पौराणिक पञ्चाङ्गों पर ही चलता है।
वेद कहता है कि ऋतुवें परस्पर ९० -९० अंशों के प्रखण्डों पर बन रहे सम्पातों और अयनों से नियमित होती हैं। पौराणिक पञ्चाङ्गों का इस सत्य से कोई लेना देना ही नहीं है। आश्चर्य ये है कि उनके पास आज अपना वैदिक पञ्चाङ्ग होते हुए भी, वेद की प्राथमिकता वाला हमारा वैदिक समाज उन पौराणिक पञ्चाङ्गों पर ही चलता है।
कल तक की बात कुछ और थी। उनके पास अपना वैदिक पञ्चाङ्ग था ही नहीं। आश्चर्य ये है कि उनके पास आज अपना वैदिक पञ्चाङ्ग होते हुए भी, वेद की प्राथमिकता वाला हमारा वैदिक समाज उन पौराणिक पञ्चाङ्गों पर ही चलता है।
दुष्कर्म और कुविचार
दुष्कर्मों के और कुविचारों के जो कुसंस्कार मन पर जमते हैं वे एक प्रकार से विषैली पर्तों के रूप में चेतन मस्तिष्क और अचेतन चित्त पर जमते रहते हैं। ये मन की चंचलता, उद्विग्नता, अस्थिरता, आवेग, विक्षोभ आदि के रूप में फूटते हैं और व्यक्ति को अर्ध पागल जैसा बना देते हैं। वह किसी काम को एकाग्रचित होकर नहीं कर पाता और हर घडी उधेडबुन में ही लगा रहता है। फलस्वरूप पग-पग पर उसे असफलता मिलती है और ठोकरें लगती हैं। असंतुलित व्यवहार से वह रूष्ट और असंतुष्ट होकर असहयोगी, विरोधी और अपराधी बन जाता है। परिवार और समाज में सभी से कलह करने का अभ्यस्त व्यक्ति हर घडी विक्षुब्ध बना रहता है। न तो मस्तिष्क ठीक प्रकार से सोच पाता है, न कोई सही रास्ता मिलता है। शरीर से रूग्न और मन से विक्षुब्ध व्यक्ति जीवित रहते स्वयं नरक भोगता है और सामाजिक वातावरण को भी दूषित करता है।
व्यसन और मृत्यु में व्यसन अधिक कष्टदायक होता है। व्यसनों में अलिप्त व्यक्ति मरकर भी सुख प्राप्त करता है पर दुर्व्यसनों में फंसा हुआ व्यक्ति प्रति पल मरता रहता है। और अधोगति को प्राप्त होता है। निर्व्यसनता मनुष्य की शोभा का कारण होती है। जो व्यक्ति मादक द्रव्यों का सेवन नहीं करता उसे निश्चित रूप से नशा करने वालों से अच्छा समझा जाएगा। मांसाहार न करने वाला व्यक्ति मांसा हारी की अपेक्षा श्रेष्ठ समझा जाएगा। जुआरी की अपेक्षा जुआ न खेलने वाला ही सम्मान व प्रतिष्ठा पाता है।
दुराचारों, दुष्कर्मों और दुर्व्यसनों में उलझा हुआ व्यक्ति अपने पतन का कारण तो बनता ही है, समाज के प्रति भी घोर अपराध करता है। उसके कारण समाज में अराजकता और अशांति फैलती है और न जाने कितने लोगों के जीवन पर भी उसका दुष्प्रभाव पडता है। व्यभिचार और बलात्कार से पीडित व्यक्ति को आजीवन मानसिक यातना भुगतनी पडती है।
जहां ये सब दुर्व्यसन समाज के प्रति अपराध हैं वहां मांसाहार जीव जगत के प्रति अपराध है। यह मनुष्य को जंगली और अशिष्ट बनाता है और बुद्धि को मलिन करता है। मांसाहार से मनुष्य के हृदय से दया का भाव दूर हो जाता है। यह उसकी शारीरिक, मानसिक, आत्मिक तथा बौद्धिक उन्नति को रोककर अवनति की ओर ले जाता है अतः इसे वर्जित समझना चाहिए। संसार भर में जितने भी महापुरूष हुए हैं वे सभी शाकाहारी रहे हैं और उन्होने मांसाहार की भरपूर निंदा की है। मांसाहार अहिंसा को त्याग कर ही किया जा सकता है। हमारे ऋषियों ने सदैव ही अहिंसा की महिमा का बखान किया है। महाभारत ( आदि पर्व ) में ऋषि ने स्पष्ट कहा है 'अहिंसा परमोधर्मः सर्वप्राणभूतां वर।' किसी भी प्राणी को न मारना ही परम धर्म है। अहिंसा से बढकर दूसरा कोई धर्म नहीं है।
समाज एवं जीव जगत के इन अपराधियों को, मानवता के विरोधियों को उचित दंड अवश्य मिलना चाहिए। ऐसी दुष्प्रवृत्तियों को जड से उखाड फेंकने के उपक्रम हम सभी को करने चाहिए तभी हम सामाजिक उत्तरदायित्व को भली प्रकार निभा सकेंगे।
स्वाध्याय
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स्वाध्याय से मनुष्य की बुद्धि एवं आत्मा की उन्नति व विकास होता है। ईश्वर व जीव सहित जड़ सृष्टि वा ब्रह्माण्ड विषयक सभी शंकाओं व प्रश्नों का समाधान भी होता है। मनुष्य जन्म क्यों हुआ व हमारा भविष्य एवं परजन्म किन बातों से उन्नत व अवनत होते हैं, इसका ज्ञान भी हम स्वाध्याय से प्राप्त कर सकते हैं। ईश्वर, माता-पिता, समाज, देश व विश्व के प्रति हमारे क्या कर्तव्य हैं और उनका पालन किस प्रकार से किया जा सकता है, इसका ज्ञान भी हमें स्वाध्याय से मिलता है।
मनुष्य जीवन का उद्देश्य दुःखों से पूर्ण निवृत्ति है। दुःखों से पूर्ण निवृत्ति का नाम मोक्ष है। इसकी प्राप्ति के लिए करणीय कर्तव्यों का विधान ऋषि दयानन्द जी के ग्रन्थों एवं दर्शन व उपनिषद आदि ग्रन्थों में मिलता है। जो मनुष्य वैदिक ग्रन्थों का अध्ययन करता है उसे ईश्वर, जीवात्मा, सृष्टि, उपासना सहित भौतिक विषयों का भी पूर्ण ज्ञान प्राप्त होता है।
स्वाध्याय से मनुष्य देव, विद्वान, आर्य, ईश्वरभक्त, वेदभक्त, मातृपितृभक्त, आचार्यभक्त, देशभक्त, समाजसेवी व समाज सुधारक सहित आदर्श जीवन व चरित्र से पूर्ण मानव बनता है। मत-मतान्तर के ग्रन्थ मनुष्य का ऐसा विकास नहीं करते जैसा कि वेद व वैदिक साहित्य से होता है। हमारे विश्व प्रसिद्ध आदर्श महापुरुष राम, कृष्ण, दयानन्द, चाणक्य, शंकराचार्य जी आदि सभी वैदिक साहित्य की देन थे। इन लाभों को प्राप्त करने के लिए सभी मनुष्यों को वेद एवं वैदिक ग्रन्थों का नित्य प्रति स्वाध्याय अवश्य ही करना चाहिये जिससे उनका सम्पूर्ण विकास व उन्नति होगी और उनका जीवन ज्ञान की प्राप्ति से सुखी व सन्तुष्ट होगा।
ऋषि दयानन्द जी ने लिखा है कि मनुष्य को जो सुख ज्ञान की प्राप्ति से मिलता है उतना व वैसा सुख धन व सुख के साधनों से भी नहीं मिलता। अतः स्वाध्याय से अपना ज्ञान बढ़ाना सब मनुष्यों का कर्तव्य है ।
ओ३म् विष्णो: कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि पस्पशे।
इन्द्रस्य युज्य: सखा॥ यजुर्वेद १३-३३॥
🌷 हे मनुष्य, तुम उस सर्वव्यापी ईश्वर को समझो। वो सृष्टि की रचना, पालन और प्रलय करने वाला है। वो गुणों से परिपूर्ण है। तुम उस परमात्मा के गुण, कर्म और स्वभाव के अनुकूल आचरण करो। वह जीवात्माओं का मित्र है।
इन्धानास्त्वा शतँहिमा द्युमन्तँ समिधीमहि । वयस्वन्तो वयस्कृतँ सहस्वन्तः सहस्कृतम् । अग्ने सपत्नदम्भनमदब्धासो अदाभ्यम् । चित्रावसो स्वस्ति ते पारमशीय ।। (यजुर्वेद ३\१८ )
अर्थ :- मनुष्यों को अपने पुरुषार्थ, ईश्वर की उपासना तथा अग्नि आदि पदार्थों से उपकार लेके दुःखों से पृथक होकर उत्तम-उत्तम सुखों को प्राप्त होकर सौ वर्ष जीना चाहिए अर्थात् क्षणभर भी आलस्य में नहीं रहना चाहिए, किन्तु जैसे पुरुषार्थ की वृद्धि हो, वैसा अनुष्ठान निरन्तर करना चाहिए ।
ओ३म् अग्निरस्मि जन्मना जातवेदा घृतं मे चक्षुरमृतं मऽआसन्।अर्कस्त्रधातू रजसो विमानोऽजस्रो घर्मो हविरस्मि नाम॥ यजुर्वेद १८-६६॥
💐 अर्थ :- अग्नि मुझ में जन्म से है, और मैं इस प्रारंभिक ज्ञान से निरंतर ज्ञान प्राप्त करता रहूं। मेरे चक्षु(घृत) प्रकाश ग्रहण करने वाली हो, मेरी वाणी मधुर हो। मेरा मन आराधना के लिए हो, मेरा मस्तिष्क ज्ञान के लिए हो, और शरीर उत्तम कर्मों के लिए हो। 'हे ईश्वर, मेरे ज्ञान में वृद्धि करो और मेरी वाणी को मधुर करो।

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