अथर्ववेद काण्ड ३ सूक्त ५ संस्कृत शब्दार्थ और हिन्दी भावार्थ

अथर्ववेद काण्ड ३ सूक्त ५ संस्कृत शब्दार्थ और हिन्दी भावार्थ


सूक्त ५

०३।००५।०१

आयम॑गन्पर्णम॒णिर्ब॒ली बले॑न प्रमृ॒णन्त्स॒पत्ना॑न् ।

ओजो॑ दे॒वानां॒ पय॒ ओष॑धीनां॒ वर्च॑सा मा जिन्व॒न्त्वप्र॑यावन् ॥ १ ॥

✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉

भाषार्थः (अयम्) यह (बली) बली (पर्णमणिः) पालन करनेवालों में प्रशंसनीय [परमेश्वर] (बलेन) अपने बल से (सपत्नान्) हमारे वैरियों को (प्रमृणन्) विध्वंस करता हुआ (आ अगन्) प्राप्त हुआ है (देवानाम्) इन्द्रियों का (ओजः) बल और (ओषधीनाम्) अन्नादि औषधों का (पयः) रस, (अप्रयावन्=०−वा) भूल न करनेवाला वह (मा) मुझको (वर्चसा) तेज से (जिन्वतु) सन्तुष्ट करे ॥१॥

भावार्थः जैसे अन्तर्यामी परम कारण परमेश्वर अपने सामर्थ्य से हमारे विघ्नों को हटाकर हमें ओजस्वी इन्द्रियाँ और पुष्टिकारक अन्नादि पदार्थ देकर उपकार करता है वैसे ही हम ओजस्वी, पराक्रमी होकर परस्पर उपकार करते रहें ॥१

✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉

भाषार्थः (अयम्) यह (पर्णमणि:) मणिरूप पर्ण अर्थात पालक (आ अगन्) आया है, (बली) बलवान् वह (बल) बल द्वारा (शत्रुन्) शत्रुओं को (प्रमृणन्) मारता हुआ। (देवानाम् ओजः) यह देवों का ओज रूप है, (ओषधीनां पयः) ओषधियों के सार के सदृश है, (अप्रयावन्१) छोड़कर न जानेवाला (मा) मुझे (वर्चसा) दीप्ति के साथ (जिन्वत्) प्रीणित करे, तृप्त करे।

टिप्पणी: (पर्णमणि =पर्ण है पालन करने वाला मणि अर्थात् रत्नरूप, सेना पति१। पर्ण= पृ पालनपूरणयोः (जुहोत्यादिः)। यह बली है और शत्रुओं को मारता है, अत: क्षत्रिय है। देवानाम् = विजिगीषुणाम् ("दिवु क्रीडाविजिगीषा...") (दिवादिः)। ओषधीनाम् सार:= ओषधियों के रस के सदृश राष्ट्रशरीर का रसरूप है। जिन्वतु=जिवि प्रीणनार्थः (भ्वादिः)।] 

[१. अप्रयावन्=अ + प्र+या+ वनिप्= मां विहाय अनपगम्ता।]

०३।००५।०२

मयि॑ क्ष॒त्रं प॑र्णमणे॒ मयि॑ धारयता

अ॒हं रा॒ष्ट्रस्या॑भीव॒र्गे नि॒जो भू॑यासमुत्त॒मः ॥२॥

✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉

भाषार्थः (पर्णमणे) हे पालन करनेवालों में प्रशंसनीय ! तू (मयि) मुझमें (क्षत्रम्) बल और (मयि) मुझमें ही (रयिम्) सम्पत्ति (धारयतात्) स्थापित कर। (अहम्) मैं (राष्ट्रस्य) राज्य के (अभीवर्गे) मण्डल में (निजः) आप ही (उत्तमः) उत्तम (भूयासम्) बना रहूँ ॥२॥

भावार्थः मनुष्य सर्वशक्तिमान् परमेश्वर का ध्यान करता हुआ अपने बुद्धिबल और बाहुबल से शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति और सुवर्णादि धन प्राप्त करके संसार भर में कीर्ति बढ़ावे और आनन्द भोगे ॥२॥

✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉

भाषार्थः (पर्णमणि) हे पालक रत्न ! (मयि) मुझ सम्राट१ में (क्षत्रम्) क्षात्रबल, (मयि) मुझमें (रयिम्) धनसम्पत् (धारयतात्) स्थापित कर। (अहम्) मैं सम्राट (निजः) जोकि तुम्हारा अपना हूँ, (राष्ट्रस्य अभिवर्गे) राष्ट्र के सब वर्गों में (उत्तमः) सर्वोत्तम हो जाऊँ।

टिप्पणी: [वर्गे=मनुष्य वर्ग, पौरवर्ग, क्षत्रियवर्ग, भौमवर्ग आदि।] 

[१. मन्त्र (६,७)। वह सम्राटों का भी सम्राट् है, भूमण्डल का सम्राट्। तथा इन्द्रेन्द्र (अथर्व० ३।४।६)।]

०३।००५।०३

यं नि॑द॒धुर्वन॒स्पतौ॒ गुह्यं॑ दे॒वाः प्रि॒यं म॒णिम् ।

तम॒स्मभ्यं॑ स॒हायु॑षा दे॒वा द॑दतु॒ भर्त॑वे ॥ ३॥

✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉

भाषार्थः (यम्) जिस (गुह्यम्) गुप्त, (प्रियम्) प्रिय वा हितकारी (मणिम्) प्रशंसनीय [परमेश्वर] को (देवाः) व्यवहार जाननेवाले देवताओं ने (वनस्पती) वननीय अर्थात् सेवनीय गुणों के रक्षक [पुरुष] में (निदधुः) अवश्य दान किया है, (तम्) उस [परमेश्वर] को (अस्मभ्यम्) हमें (देवाः) तेजस्वी महात्मा पुरुष (आयुषा सह) बड़ी आयु के साथ (भर्तवे) हमारे पोषण करने के लिये (ददतु) दान करें ॥३॥

भावार्थः सूक्ष्मदर्शी देवताओं ने निश्चय किया है कि वह अन्तर्यामी, सर्वहितकारी परमेश्वर प्रत्येक शुभचिन्तक पुरुष में वर्तमान रहकर साहस बढ़ाता है, उसी परमात्मा का उपदेश विद्वान् महात्मा संसार में करें ॥३॥

✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉

भाषार्थः (देवाः) विजिगीषु सैनिकों ने (यम् प्रियं मणिम्) जिस प्रिय रत्न-रूप-सेनापति को (गृह्यम्) गोपनीय रूप में (निदधु:) स्थापित किया है, जैसे कि दिव्य शक्तियों ने (वनस्पतौ) वनस्पति में [रस] की, (तम्) उसे (आयुषा सह) आयु के साथ (देवाः) विजिगीषु-सैनिक (अस्मभ्यम्) हमारे लिये (ददतु) दें, [हमें सौंप दें], (भर्तवे) हमारे भरण-पोषण के लिये।

टिप्पणी: [आयुष सह=जीवित रूप में। सैनिकों को चाहिये कि निज सेनापति को सुरक्षित रखें, उसे गोपनीय रूप में रखें, उसे मरने से बचाय रखें। वनस्पतौ, देखो "ओषधीनां पयः" (मन्त्र १) देवः= दिबु क्रीडा विजिगीषा आदि (दिवादिः), विजिगीषु अर्थ अभिप्रेत है।]

०३।००५।०४

सोम॑स्य प॒र्णः सह॑ उ॒ग्रमाग॒न्निन्द्रे॑ण द॒त्तो वरु॑णेन शि॒ष्टः। तं प्रि॑यासं ब॒हु रोच॑मानो दीर्घायु॒त्वाय॑ श॒तशा॑रदाय ॥४॥

✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉

भाषार्थः (इन्द्रेण) बड़े ऐश्वर्यवाले और (वरुणेन) स्वीकरणीय श्रेष्ठ, गुरु आदि करके (दत्तः) हमें दिया हुआ और (शिष्टः) सिखाया हुआ (सोमस्य) अमृत का (पर्णः) पूर्ण करनेवाला परमेश्वर, (उग्रम्) पराक्रमवाला (सहः) बल [बलरूप], (आ) सब ओर से (अगन्) मिला है। (बहु) अनेक प्रकार से (रोचमानः) रुचि करता हुआ मैं (तम्) उः [अमृतपूरक परमेश्वर] को (शतशारदाय) सौ शरद् ऋतु युक्त (दीर्घायुत्वाय) बड़े जीवन के लिये (प्रियासम्) प्रसन्न करूँ ॥४॥

भावार्थः जब मनुष्य विद्वानों की शिक्षा पाकर शुद्ध मुक्त स्वभाव परमेश्वर के ज्ञान से आत्मा में बल पाता है, तब वह धर्मात्मा बड़े उत्साह से परमात्मा की आज्ञापालता हुआ बड़े अर्थात् यशस्वी जीवन के साथ आनन्द भोगता है ॥४॥ ‘इन्द्रेण दत्तो वरुणेन शिष्टः’ यह पाद, अ० २।२९।४। में और ‘दीर्घायुत्वाय शतशारदाय’ यह पाद, अ० १।३५।१। में आ चुके हैं ॥

✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉

भाषार्थः (इन्द्रेण) परमेश्वर्यवान् परमेश्त्र ने [कृपापूर्वक] (दत्तः) दिया, (वरुणेन) वरुण रूप आचार्य द्वारा (शिष्ट:) शिक्षा तथा अनुशासित, (सोमस्य) सेनाप्रेरक रोनाध्यक्ष का (पर्ण:) पालक, (उग्रम् सहः) उग्रबल रूप सेनापति (आ अगन्) मुझे प्राप्त हुआ है, (तम् प्रियासम्) उसे मैं अपना प्रिय जानूं, (बहु रोचमानः) बहुत प्रदीप्त होता हुआ, (दीर्घायुत्वाय) दीर्घायु के लिये, (शतशारदाय) सो शरद्-ऋतुओं के लिये [सौ वर्षों के लिये।

टिप्पणी: [वरुण है आचार्य। यथा "आचार्यो वरुणो भूत्वा" (अथर्व० ११।५।१५)। प्रियासम्=प्रिय [नामधातु]+सिप्, अट्, आकार का आगम। रोचमानः प्रदीप्त हुआ "सम्राटों का सम्राट" सेनापति की प्राप्ति के कारण प्रदीप्त हुआ, चमकता हुआ। सोमस्य=सोम है सेनाप्रेरक तथा सेनाध्यक्ष, जोकि युद्ध के लिये सेना के मुख्य भाग में आगे-आगे चलता है [षु प्रेरणे तुदादि:], देखो यजु० (१७।४०)। सेनापति द्वारा सुरक्षित "सम्राटों का सम्राट" सौ वर्षों तक जीवित रहने का अभिलाषी है। सोम और सेनापति दोनों का सम्बन्ध सेना के साथ है। सेनापति को "पर्णः" अर्थात् पालक कहा है, यह सोम का भी पालक है। सेनापति "पर्ण", गुरुकुल आश्रम में रहकर आचार्य द्वारा शिक्षित और अनुशासित हुआ है।]

०३।००५।०५

आ मा॑रुक्षत्पर्णम॒णिर्म॒ह्या अ॑रिष्ट॒तात॑ये ।

यथा॒हमु॑त्त॒रो ऽसा॑न्यर्य॒म्ण उ॒त सं॒विदः॑ ॥५॥

✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी

भाषार्थः (पर्णमणिः) पालन करनेवालों में श्रेष्ठ परमेश्वर (मह्यै अरिष्टतातये) बड़ी कुशलता के लिये (मा) मेरे (आ, अरुक्षत्) ऊपर बैठा है। (यथा) जिससे (अहम्) मैं (अर्यम्णः) श्रेष्ठों के मान करनेवाले, (उत) और (संविदः) ज्ञानी पुरुष से (उत्तरः) अधिक श्रेष्ठ (असानि) हो जाऊँ ॥५॥

भावार्थः सर्वोपरि परमेश्वर अन्तर्यामी होकर हमें दुष्कर्मों से बचने की प्रेरणा करता है जिससे हम श्रेष्ठों में अति श्रेष्ठ और ज्ञानियों में अति ज्ञानी होवें ॥५॥

✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉

भाषार्थः (मह्यै अरिष्टतातये) महा अहिंसा अर्थात् सुरक्षा के विस्तार के लिये, (पर्णगणिः) पालक-सेनापति रत्न१, (मा) मुझ सम्राटों के सम्राट् पर (आ अरुक्षत्) आरूढ़ हुआ है, (यथा) जिस प्रकार कि (अहम्) मैं (अर्यम्णः) अर्यमा से (उत) तथा (संविद:) सम्यक्-वेत्ता अर्थात् सम्यक-ज्ञानी से भी (उत्तरः) उत्कृष्टतर (असानि) हो जाऊँ।

टिप्पणी: [आ अरुक्षत्= आ+रूह + क्स: ( अष्टा० ३।१।४५), लुङ्लकार। भूमण्डल सम्राट सेनापति को अपने से भी ऊँचा मानता है, व्योंकि उसके कारण ही भूमण्डल की महारक्षा होती है। अर्यमा है न्यायाधीश, जोकि भुमण्डल में न्याय करता है। सम्राट् कहता है कि मैं सेनापत्ति के कारण अर्यमा-और-सम्यक् ज्ञानियों से भी उत्कृष्टतर हो जाऊँ। ] 

[१. जातौ जातौ यदुत्कृष्टं तद् रत्मगभिधीयते (आप्टे)।]

०३।००५।०६

ये धीवा॑नो रथका॒राः क॒र्मारा॒ ये म॑नी॒षिणः॑ ।

उ॑प॒स्तीन्प॑र्ण॒ मह्यं॑ त्वं॒ सर्वा॑न्कृण्व॒भितो॒ जना॑न् ॥६॥

✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉

भाषार्थः (ये) जो (धीवानः) तीक्ष्ण बुद्धिवाले (रथकाराः) रथों के बनानेवाले और (ये) जो (मनीषिणः) बड़े पण्डित (कर्माराः) कर्मों में गति रखनेवाले शिल्पीजन हैं। (पर्ण) हे पालन करनेवाले परमेश्वर ! (त्वम्) तू (मह्यम्) मेरेलिये (सर्वान्) उन सब (जनान्) जनों को (अभितः) चारों ओर से (उपस्तीन्) समीपवर्ती (कृणु) कर ॥६॥

भावार्थः सब मनुष्यों और विशेषकर राजा लोगों को चाहिये कि भूमिरथ, आकाशरथ, जलरथ आदि के बनानेवाले और अन्य शिल्पकर्मी, विश्वकर्मा चतुर विद्वानों का सत्कार करते रहें जिससे अनेक व्यापारों से संसार में उन्नति होवे ॥६॥

✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉

भाषार्थः (ये) जो (धीवानः) बद्धिमान (रथकारा:) रथों के निर्माता है (ये) जो (मनीषिणः) मननशील (कर्मारा:) लोहे कर्मोवाले हैं। (पर्ण) हे पालक सेनापति ! (त्वम्) तू तथा (सर्वान् जनान्) अन्य सब जनों को (मह्यम्) मुझ भूमण्डल राम्राट् के लिये (अभितः) मेरे अभिमुख (उपस्तीन्) मेरे समीप होनेवाले, या बैठनेवाले (कृणु) कर

टिप्पणी: [कर्मारा:=अयस्कारप्रभृतयः (सायण)। कर्म+आर [ores], खनिज-ores में काम करनेवाले, कच्ची धातु में काम करनेवाले। उपस्तीन्=उप + अस् भुवि या आस उपवेशने (सायण)। भूमण्डल का सम्राट सेनापति से कहता है कि रथकार आदि को मेरे समीप होने या बैठने के लिये प्रोत्साहित कर, प्रेरित कर, उन्हें मेरे समीप आने या आकर बैठने में निषेध न कर।]

०३।००५।०७

ये राजा॑नो राज॒कृतः॑ सू॒ता ग्रा॑म॒ण्य॑श्च॒ ये ।

उ॑प॒स्तीन्प॑र्ण॒ मह्यं॒ त्वं सर्वा॑न्कृण्व॒भितो॒ जना॑न् ॥ ७॥

✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉

भाषार्थः (ये) जो (राजानः) ऐश्वर्यवाले (राजकृतः) राजाओं के बनानेवाले, (च) और (ये) जो (सूताः) सर्वप्रेरक, (ग्रामज्यः) ग्रामों के नेता लोग हैं। (पण) हे पालन करनेवाले परमेश्वर ! (त्वम्) तू (मह्यम्) मेरेलिए (सर्वान्) उन सब (जनान्) जनों को (अभितः) चारों ओर से (उपस्तीन्) समीपवर्ती (कृणु) कर ॥७॥

भावार्थः चक्रवर्ती राजा सबके राजाधिराज परमेश्वर का ध्यान करता हुआ अपने हितकारी माण्डलिक राजाओं और अन्य प्रधान पुरुषों को यथोचित

 व्यवहार से अपना इष्ट मित्र बनाये रक्खे ॥७॥

✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉

भाषार्थः (वे) जो (राजानः) राजा हैं, (राजा कृतः) तथा [निर्वाचन द्वारा] राजाओं को करने वाली प्रजाएं हैं, (ये) जो (सुताः) प्रजाओं के प्रेरक नेता, (च) और (ग्रामण्यः) ग्रामों के नेता हैं, (सर्वान् तान्) आदि पूर्ववत् [मन्त्र ६।]

टिप्पणी: [राजकृतः यथा "विशस्त्त्वा सर्वा वाच्छन्तु मा त्वद्राष्ट्रमधिभ्रशत्" (अथर्व० ६।८७।१); तथा सूक्त (८६-८८)।]

०३।००५।०८

प॒र्णो ऽसि॑ तनू॒पानः॒ सयो॑निर्वी॒रो वी॒रेण॒ मया॑ ।

सं॑वत्स॒रस्य॒ तेज॑सा॒ तेन॑ बध्नामि त्वा मणे ॥८॥

✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉

भाषार्थः (मणे) हे प्रशंसनीय परमेश्वर ! तू (पर्णः) हमारा पूर्ण करनेवाला, (तनूपानः) शरीररक्षक और (वीरेण मया) मुझ वीर के साथ (सयोनिः) मिलने योग्य घर में रहनेवाला (वीरः) वीर (असि) है। (संवत्सरस्य) सबमें यथानियम वास करनेवाले [तेरे] (तेन तेजसा) उस तेज से (त्वा) तुझको (बध्नामि) मैं बाँधता हूँ ॥८॥

भावार्थः मनुष्य उस उत्तम कामनाओं के पूरक और शरीररक्षक महापराक्रमी परमेश्वर को अपने साथ सब स्थानों में निवास करता हुआ जानकर और उसके तेजोमय स्वरूप को हृदय में धारण करके पराक्रमी और तेजस्वी होकर आनन्द भोगे ॥८॥

ईश्वर का जीव के साथ नित्य सम्बन्ध है जैसे-

द्वा सु॑प॒र्णा स॒युजा॒ सखा॑या समा॒नं वृ॒क्षं परि॑षस्वजाते। तयो॑र॒न्यः पिप्प॑लं स्वा॒द्वत्त्यन॑श्नन्न॒न्यो अ॒भिचा॑कशीति ॥

                        ऋ० १।१६४।२०, अ० ९।९।२० ॥

(द्वा) दो (सुपर्णा) सुन्दर पालनशक्तिवाले, (सयुजा) समान सम्बन्ध रखनेवाले, (सखाया) मित्रों के समान वर्तमान [ईश्वर और जीव] (समानम्) एक (वृक्षम्) सेवनीय [संसार वा वृक्ष] से (परि) सब प्रकार (सस्वजाते) सम्बन्ध रखते हैं। (तयोः) उन दोनों में (अन्यः) एक [जीव, ईश्वराधीन होने से] (स्वादु) चखने योग्य (पिप्पलम्) फल [पुण्य-पाप का] (अत्ति) खाता है (अन्यः) दूसरा [परमात्मा] (अनश्नन्) न खाता हुआ (अभि) भले प्रकार [जीवों को] (चाकशीति) देखता है ॥

✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉

भाषार्थः (मणे) हे रत्न ! [सेनापति !] (पर्णः असि) तू पालक है, (तनुपान:) साम्राज्य शरीर का पालक है, (सयोनिः) हम दोनों की समान-योनि है, प्रजा; (बीरः) तू वीर है। (संवत्सरस्व) संवत्सर के तेजोमय आदित्य१ के (तेन तेजसा) उस तेज से युक्त (त्वा) तुझे (बध्नामि) मैं अपने साथ बांधता हूँ, सुदृढ़ सम्बद्ध करता हूँ।

टिप्पणी: [तनूपान:=साम्राज्य-शरीर तथा सम्राट् का निज-शरीर। पालक सेनापति दोनों शरीरों की रक्षा करता है। साम्राज्य भी शरीर है, यथा "यजु० २०।५।९; तथा विशेषतया मन्त्र ८।" सयोनी= योनिः, प्रजा। अथवा सम्राट् और सेनापति की समान योनि [घर] (निघं० ३।४), है "भूमण्डल।" दोनों वीर हैं "वीरो, बीरेन मया।" बध्नामि=बन्धन केवल धागे आदि द्वारा ही नहीं होता। "देशबन्धः चित्तस्य धारणा" (योग ३।१) में नासिकाग्र आदि में चित्त को बांधने का भी कथन हुआ है। धारणा योगाङ्ग है। इसी प्रकार मन्त्र में "बध्नामि" का अर्थ भी यथोचित हो करना चाहिए।] 

 [१. संवत्सरस्य तेजसा=संवत्सरस्य, एतदुपलक्षितकालभेदनियामकस्य आदित्यस्य तेजसा युक्तं त्वाम् (सायण)।]

विशेष वक्तव्य

दर्शनशास्त्र के अनुसार वैदिक वाक्यरचना बुद्धिपूर्वक हुई है यथा "बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेद।" अतः सूक्त ५ के मन्थार्थ बुद्धिग्राह्य ही किये गए हैं। सायणाचार्य ने सूक्तार्थ सोमोषधि के पत्ते के सम्बन्ध में किये हैं, जिसमें मन्त्रार्थ संगत नहीं होते।

॥ इति प्रथमोऽनुवाकः ॥

॥ अथद्वितीयोऽनुवाकः॥

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