यहाँ महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत 135वें अध्याय के श्लोकों का क्रमबद्ध (सीरियल नंबर से) श्लोक, हिंदी अनुवाद और व्याख्या प्रस्तुत है:
श्लोक 1
श्लोक:
वैशंपायन उवाच। पाण्डोरुपरमं दृष्ट्वा देवकल्पा महर्षयः। ततो मन्त्रविदः सर्वे मन्त्रयांचक्रिरे मिथः।। (1-135-1)
- हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—देवताओं के समान तेजस्वी महर्षियों ने पाण्डु की मृत्यु देखकर, मन्त्रों के ज्ञाता उन सभी ऋषियों ने आपस में विचार-विमर्श किया।
- व्याख्या: जब राजा पाण्डु का स्वर्गवास हो गया, तब शतशृंग पर्वत पर निवास करने वाले देवतुल्य ऋषियों ने उनके बालकों और रानी कुंती के भविष्य को लेकर आपस में मंत्रणा की कि अब आगे क्या करना चाहिए।
श्लोक 2
श्लोक:
तापसा ऊचुः। हित्वा राज्यं च राष्ट्रं च स महात्मा महायशाः। अस्मिंस्थाने तपस्तप्त्वा तापसाञ्शरणं गतः।। (1-135-2)
- हिंदी अनुवाद: तापसों (ऋषियों) ने कहा—वे महायशस्वी महात्मा (पाण्डु) अपना राज्य और राष्ट्र छोड़कर इस स्थान पर तपस्या करके हम तापसों की शरण में आए थे।
- व्याख्या: ऋषिगण पाण्डु के महान त्याग और उनके द्वारा आश्रम में बिताए गए तपस्वी जीवन को याद कर रहे हैं कि कैसे वे राजपाट का मोह छोड़कर एक संन्यासी की तरह यहाँ रहे थे।
श्लोक 3
श्लोक:
स जातमात्रान्पुत्रांश्च दारांश्च भवतामिह। प्रादायोपनिधिं राजा पाण्डुः स्वर्गमितो गतः।। (1-135-3)
- हिंदी अनुवाद: वे राजा पाण्डु अपने यहाँ उत्पन्न हुए इन बालकों और अपनी पत्नी को आपके (हम सबके) पास धरोहर (उपनिधि) के रूप में सौंपकर स्वर्ग सिधार गए हैं।
- व्याख्या: ऋषियों का कहना है कि पाण्डु जी ने अपने पुत्रों और पत्नी माद्री को अनाथ अवस्था में छोड़कर स्वर्ग की यात्रा की है, इसलिए अब इन बच्चों की रक्षा करना हमारा ही नैतिक दायित्व है।
श्लोक 4
श्लोक:
तस्येमानात्मजान्देहं भार्यां च सुमहात्मनः। स्वराष्ट्रं गृह्य गच्छामो धर्म एष हि नः स्मृतः।। (1-135-4)
- हिंदी अनुवाद: इसलिए हम उस महाशयी पाण्डु के इन पुत्रों को, उनके शरीर (मृत देह) तथा उनकी पत्नी को लेकर उनके अपने राष्ट्र (हस्तिनापुर) चलते हैं; क्योंकि वेदों में यही श्रेष्ठ धर्म बताया गया है।
- व्याख्या: ऋषियों ने निर्णय लिया कि वे पाण्डु और माद्री के पार्थिव शरीर, जीवित रहने वाली कुंती तथा पाँचों पाण्डुपुत्रों को लेकर हस्तिनापुर के शाही दरबार में जाएंगे।
श्लोक 5 और 6
श्लोक:
वैशंपायन उवाच। ते परस्परमामन्त्र्य देवकल्पा महर्षयः। पाण्डोः पुत्रान्पुरस्कृत्य नगरं नागसाह्वयम्।। (1-135-5) उदारमनसः सिद्धा गमने चक्रिरे मनः। भीष्माय पाण्डवान्दातुं धृतराष्ट्राय चैव हि।। (1-135-6)
- हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—आपस में विचार करके देवतुल्य उदार मन वाले उन सिद्ध महर्षियों ने पाण्डु के पुत्रों को आगे करके हस्तिनापुर (नागसाह्वय) जाने का मन बनाया, ताकि पाण्डवों को भीष्म और धृतराष्ट्र को सौंपा जा सके।
- व्याख्या: ऋषियों ने अपने तपोबल से यह उचित समझा कि पांडवों और माद्री-पाण्डु के शवों को उनके परिजनों (भीष्म और धृतराष्ट्र) को सौंप दिया जाए ताकि उनका उचित संस्कार और पालन-पोषण हो सके।
श्लोक 7
श्लोक:
तस्मिन्नेव क्षणे सर्वे तानादाय प्रतस्थिरे। पाण्डोर्दारांश्च पुत्रांश्च शरीरे ते च तापसाः।। (1-135-7)
- हिंदी अनुवाद: उसी क्षण वे सभी तापस (ऋषि) पाण्डु की पत्नी (कुंती), उनके पुत्रों तथा दोनों शवों को लेकर यात्रा के लिए प्रस्थान कर गए।
- व्याख्या: बिना किसी विलंब के ऋषियों ने पाण्डु एवं माद्री के पार्थिव शरीरों, कुंती और पाँचों बालकों को साथ लिया और हस्तिनापुर की ओर चल पड़े।
श्लोक 8
श्लोक:
सुखिनी सा पुरा भूत्वा सततं पुत्रवत्सला। प्रपन्ना दीर्घमध्वानं संक्षिप्तं तदमन्यत।। (1-135-8)
- हिंदी अनुवाद: वे यशस्विनी रानी कुंती, जो पहले सदैव सुख में रही थीं और पुत्रों से अत्यंत स्नेह करती थीं, इस लंबे मार्ग को तय करते हुए (ऋषियों के प्रभाव से) उस मार्ग को बहुत छोटा और सुगम मानती रहीं।
- व्याख्या: यद्यपि कुंती का जीवन महलों के सुखों से भरा था और यह यात्रा कठिन थी, किंतु ऋषियों के सानिध्य और पुण्य प्रताप से उन्हें मार्ग की थकान या कठिनाई का अनुभव नहीं हुआ।
श्लोक 9
श्लोक:
सा त्वदीर्घेण कालेन संप्राप्ता कुरुजाङ्गलम्। वर्धमानपुरद्वारमाससाद यशस्विनी।। (1-135-9)
- हिंदी अनुवाद: थोड़े ही समय में वे यशस्विनी कुंती कुरुजांगल देश में पहुँच गईं और वर्धमानपुर के द्वार पर जा पहुँचीं।
- व्याख्या: यात्रा करते हुए ऋषिगण और पाण्डव परिवार कुरुजांगल प्रदेश के अंतर्गत आने वाले वर्धमानपुर के द्वार तक सकुशल पहुँच गए।
श्लोक 10
श्लोक:
द्वारिणं तापसा ऊचू राजानं च प्रकाशय। ते तु गत्वा क्षणेनैव सभायां विनिवेदिताः।। (1-135-10)
- हिंदी अनुवाद: तापसों ने द्वारपाल से कहा कि जाकर राजा (हस्तिनापुर के शासक) को सूचित करो। द्वारपाल ने तुरंत भीतर सभा में जाकर इस बात की सूचना दी।
- व्याख्या: नगर के द्वार पर पहुँचकर ऋषियों ने द्वारपाल के माध्यम से हस्तिनापुर के राजदरबार में अपने आगमन और पाण्डवों के आने का संदेश भिजवाया।
श्लोक 11
श्लोक:
तं चारणसहस्राणां मुनीनामागमं तदा। श्रुत्वा नागपुरे नॄणां विस्मयः समपद्यत।। (1-135-11)
- हिंदी अनुवाद: तब हजारों चारणों और मुनियों के इस प्रकार आगमन का समाचार सुनकर नागपुर (हस्तिनापुर) के मनुष्यों को बहुत विस्मय हुआ।
- व्याख्या: जब नगरवासियों को पता चला कि इतने सारे ऋषि-मुनि और चारण एक साथ तपस्वियों के वेश में नगर के द्वार पर आए हैं, तो वे आश्चर्यचकित हो गए।
श्लोक 12
श्लोक:
मुहूर्तोदित आदित्ये सर्वे बालपुरस्कृताः। सदारास्तापसान्द्रष्टुं निर्ययुः पुरवासिनः।। (1-135-12)
- हिंदी अनुवाद: सूर्योदय के थोड़े ही समय बाद, नगर के सभी निवासी अपने बालकों और पत्नियों सहित उन तापसों के दर्शन के लिए नगर से बाहर निकल पड़े।
- व्याख्या: महान मुनियों और तपस्वियों के दर्शन की लालसा में हस्तिनापुर के स्त्री, पुरुष और बच्चे उत्साहपूर्वक शहर के बाहर आ गए।
श्लोक 13 और 14
श्लोक:
स्त्रीसङ्घाः क्षत्रसङ्घाश्च यानसङ्घसमास्थिताः। ब्राह्मणैः सह निर्जग्मुर्ब्राह्मणानां च योषितः।। (1-135-13) तथा विट्शूद्रसङ्घानां महान्यतिकरोऽभवत्। न कश्चिदकरोदीर्ष्यामभवन्धर्मबुद्धयः।। (1-135-14)
- हिंदी अनुवाद: स्त्रियों के समूह, क्षत्रियों के समूह, विभिन्न वाहनों पर बैठे लोग, ब्राह्मण और उनकी पत्नियाँ सब बाहर निकल आए। इसी प्रकार वैश्य और शूद्रों के समूहों की भी भारी भीड़ एकत्र हो गई। उस समय किसी के मन में किसी के प्रति ईर्ष्या नहीं थी, सबके हृदय धर्ममय हो रहे थे।
- व्याख्या: इस श्लोक में समाज के सभी वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) के लोगों के एक समान उत्साह और धार्मिक उल्लास का सुंदर चित्रण है, जहाँ ऊँच-नीच या ईर्ष्या का कोई भाव नहीं था।
श्लोक 15, 16 और 17
श्लोक:
तथा भीष्मः शान्तनवः सोमदत्तोऽथ बाह्लिकः। प्रज्ञाचक्षुश्च राजर्षिः क्षत्ता च विदुरः स्वयम्।। (1-135-15) सा च सत्यवती देवी कौसल्या च यशस्विनी। राजदारैः परिवृता गान्धारी चापि निर्ययौ।। (1-135-16) धृतराष्ट्रस्य दायादा दुर्योधनपुरोगमाः। भूषिता भूषणैश्चित्रैः शतसङ्ख्या विनिर्ययुः।। (1-135-17)
- हिंदी अनुवाद: शांतनु पुत्र भीष्म, सोमदत्त, बाह्लिक, प्रज्ञाचक्षु राजर्षि धृतराष्ट्र, स्वयं विदुर जी, सत्यवती देवी, यशस्विनी कौसल्या (अम्बिका/अम्बालिका), राजधानियों की स्त्रियों से घिरी हुई गान्धारी तथा दुर्योधन आदि धृतराष्ट्र के सौ पुत्र भी भांति-भांति के आभूषणों से सजकर बाहर आए।
- व्याख्या: कुरुवंश के सभी प्रमुख वृद्ध और युवा सदस्य, जिनमें भीष्म, धृतराष्ट्र, विदुर, गान्धारी, कुंती की सासें (सत्यवती आदि) और दुर्योधन सहित सभी कौरव राजकुमार आदरपूर्वक मुनियों के स्वागत के लिए नगर से बाहर पधारे।
श्लोक 18 और 19
श्लोक:
तान्महर्षिगणान्दृष्ट्वा शिरोभिरभिवाद्य च। उपोपविविशुः सर्वे कौरव्याः सपुरोहिताः।। (1-135-18) तथैव शिरसा भूमावभिवाद्य प्रणम्य च। उपोपविविशुः सर्वे पौरजानपदा अपि।। (1-135-19)
- हिंदी अनुवाद: उन महर्षियों के समूहों को देखकर कौरवों ने पुरोहितों सहित सिर झुकाकर उनका अभिवादन किया और उनके समीप बैठ गए। इसी प्रकार नगर और जनपद के सभी नागरिकों ने भी पृथ्वी पर सिर टेककर उन्हें प्रणाम किया और पास ही बैठ गए।
- व्याख्या: हस्तिनापुर के राजपरिवार और आम नागरिकों ने पूरी विनम्रता के साथ महर्षियों को दंडवत प्रणाम किया और उनके चारों ओर आदरपूर्वक बैठ गए।
श्लोक 20 और 21
श्लोक:
तमकूजमभिज्ञाय जनौघं सर्वशस्तदा। पूजयित्वा यथान्यायं पाद्येनार्घ्येण च प्रभो।। (1-135-20) भीष्मो राज्यं च राष्ट्रं च महर्षिभ्यो न्यवेदयत्। तेषामथो वृद्धतमः प्रत्युत्थाय जटाजिनी। ऋषीणां मतमाज्ञाय महर्षिरिदमब्रवीत्।। (1-135-21)
- हिंदी अनुवाद: हे प्रभु! तब भीष्म जी ने उस विशाल जनसमूह का यथार्थ सम्मान करके पाद्य (पैर धोने के लिए जल) और अर्घ्य द्वारा महर्षियों की पूजा की तथा उन्हें राज्य और राष्ट्र समर्पित कर दिया। तब उन ऋषियों में जो सबसे वृद्ध और जटा-मृगछर्म धारण किए हुए थे, उन्होंने सब ऋषियों का मत समझकर यह बात कही।
- व्याख्या: भीष्म पितामह ने परंपरा के अनुसार आए हुए सभी महर्षियों का सत्कार किया। इसके बाद वृद्ध ऋषि ने पाण्डु के जीवन और उनके बच्चों के संबंध में पूरी कथा विस्तार से कहनी शुरू की।
श्लोक 22
श्लोक:
यः स कौरव्यदायादः पाण्डुर्नाम नराधिपः। कामभोगान्परित्यज्य शतशृङ्गमितो गतः।। (1-135-22)
- हिंदी अनुवाद: वृद्ध ऋषि ने कहा—जो कौरव वंश के उत्तराधिकारी और राजा पाण्डु थे, वे समस्त काम-भोगों का त्याग करके शतशृंग पर्वत पर गए थे।
- व्याख्या: ऋषि कुरुवंशियों को याद दिला रहे हैं कि उनके परिवार के राजा पाण्डु कैसे महलों के सुख छोड़कर शतशृंग पर्वत पर तपस्या करने गए थे।
श्लोक 23 और 24
श्लोक:
राजा भोगान्परित्यज्य तपस्वी संबभूव ह। स यथोक्तं तपस्तेपे पत्रमूलफलाशनः।। (1-135-23) पत्नीभ्यां सह धर्मात्मा संचित्कालमतन्द्रितः। तेन वृत्तसमाचारैस्तपसा च तपस्विनः।। (1-135-24)
- हिंदी अनुवाद: राजा ने भोगों का त्याग कर संन्यासी (तपस्वी) का जीवन अपनाया। उन्होंने बिना किसी आलस्य के दोनों पत्नियों (कुंती और माद्री) के साथ कड़े नियम से तपस्या की और केवल पत्ते, मूल तथा फल खाकर जीवन बिताया। उनके सदाचार और तप से वहाँ के तापसी लोग बहुत संतुष्ट हुए।
- व्याख्या: पाण्डु का वनवास काल पूरी तरह धर्म, संयम और तपस्या में बीता था, जिससे शतशृंग के ऋषि अत्यधिक प्रसन्न थे।
श्लोक 25, 26 और 27
श्लोक:
तोषितास्तापसास्तत्र शतशृङ्गनिवासिनः। स्वर्गलोकं गन्तुकामं तापसाः संनिवार्य तम्।। (1-135-25) उद्यन्तं सह पत्नीभ्यां विप्रा वचनमब्रुवन्। अनपत्यस्य राजेन्द्र पुण्या लोका न सन्ति ते।। (1-135-26) तस्माद्धर्मं च वायुं च महेन्द्रं च तथाऽश्विनौ। आराधयस्व राजेन्द्र पत्नीभ्यां सह देवताः।। (1-135-27)
- हिंदी अनुवाद: जब पाण्डु अपनी दोनों पत्नियों के साथ स्वर्ग जाने के लिए उद्यत हुए, तब शतशृंग के निवासियों ने उन्हें रोककर कहा—"हे राजन्! बिना संतान वाले मनुष्य के लिए पुण्य लोक (सद्गति) नहीं मिलते हैं। इसलिए हे राजेन्द्र! तुम अपनी पत्नियों के साथ धर्म, वायु, महेन्द्र और अश्विनीकुमारों इन देवताओं की आराधना करो।"
- व्याख्या: ऋषियों ने पाण्डु को समझाया कि पितृऋण और वंश वृद्धि के लिए संतान का होना आवश्यक है, इसलिए उन्हें देवताओं की तपस्या करनी चाहिए।
श्लोक 28 और 29
श्लोक:
प्रीताः पुत्रान्प्रदास्यन्ति ऋणमुक्तो भविष्यसि। तपसा दिव्यचक्षुष्ट्वात्पश्यामस्ते तथा सुतान्।। (1-135-28) अस्माकं वचनं श्रुत्वा देवानाराधयत्तदा।' ब्रह्मचर्यव्रतस्थस्य तस्य दिव्येन हेतुना।। (1-135-29)
- हिंदी अनुवाद: "देवता प्रसन्न होकर तुम्हें पुत्र देंगे और तुम पितृऋण से मुक्त हो जाओगे। हम अपनी दिव्य दृष्टि से देख पा रहे हैं कि तुम्हारे ऐसे ही श्रेष्ठ पुत्र होंगे।" हमारा यह वचन सुनकर उन्होंने तब देवताओं की आराधना की। ब्रह्मचर्य व्रत में स्थित उन पाण्डु के लिए दिव्य कारणों से... (आगे पुत्र प्राप्ति का प्रसंग है)।
- व्याख्या: ऋषियों के परामर्श पर पाण्डु और कुंती-माद्री ने देवताओं की आराधना की, जिसके फलस्वरूप उन्हें दिव्य और पराक्रमी पुत्रों की प्राप्ति हुई।
श्लोक 30 और 31
श्लोक:
साक्षाद्धर्मादयं पुत्रस्तत्र जातो युधिष्ठिरः। तथैनं बलिनां श्रेष्ठं तस्य राज्ञो महात्मनः।। (1-135-30) मातरिश्वा ददौ पुत्रं भीमं नाम महाबलम्। पुरन्दरादयं जज्ञे कुन्त्यां सत्यपराक्रमः।। (1-135-31)
- हिंदी अनुवाद: वहाँ कुंती के गर्भ से साक्षात धर्मराज से ये युधिष्ठिर उत्पन्न हुए। इसी प्रकार वायुदेव (मातरिश्वा) ने उन महात्मा राजा पाण्डु को महाबली भीम नाम का पुत्र दिया, और इंद्र (पुरंदर) से कुंती के गर्भ से ये सत्यपराक्रमी अर्जुन उत्पन्न हुए।
- व्याख्या: यहाँ पाण्डु के पहले तीन पुत्रों (युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन) के जन्म का परिचय दिया गया है जो देवताओं के अंश से उत्पन्न हुए थे।
श्लोक 32 और 33
श्लोक:
अस्मिञ्जाते महेष्वासे पृथामिन्द्रस्तदाऽब्रवीत्। मत्प्रसादादयं जातः कुन्ति सत्यपराक्रमः।। (1-135-32) अजेयानपि जेताऽरीन्देवतादीन्न संशयः।' यस्य कीर्तिर्महेष्वासान्सर्वानभिभविष्यति।। (1-135-33)
- हिंदी अनुवाद: इस महान धनुर्धर (अर्जुन) के उत्पन्न होने पर इन्द्र ने कुंती से कहा था—"हे कुंति! यह सत्यपराक्रमी बालक मेरी कृपा से उत्पन्न हुआ है। यह देवताओं आदि शत्रुओं को भी जीत लेगा, इसमें कोई संदेह नहीं है। इसकी कीर्ति सभी महान धनुर्धरों से बढ़कर होगी।"
- व्याख्या: देवराज इंद्र ने अर्जुन के जन्म के समय ही उसकी महानता और अजेय होने की भविष्यवाणी कर दी थी।
श्लोक 34, 35 और 36
श्लोक:
युधिष्ठिरो राजसूयं भ्रातृवीर्यादवाप्स्यति। एष जेता मनुष्यांश्च सर्वान्गन्धर्वराक्षसान्।। (1-135-34) एष दुर्योधनादीनां कौरवाणां च जेष्यति। वीरस्यैतस्य विक्रान्तैर्धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः।। (1-135-35) यक्ष्यते राजसूयाद्यैर्धर्म एव परः सदा।' यौ तु माद्री महेष्वासावसूत पुरुषोत्तमौ।। (1-135-36)
- हिंदी अनुवाद: "युधिष्ठिर अपने भाइयों के पराक्रम से राजसूय यज्ञ करेंगे। यह (अर्जुन) समस्त मनुष्यों, गंधर्वों और राक्षसों को जीत लेगा। यह दुर्योधन आदि कौरवों को भी विजित करेगा। इसी वीर के पराक्रम से धर्मपुत्र युधिष्ठिर राजसूय आदि महान यज्ञ करेंगे।" और माद्री ने जिन दो श्रेष्ठ पुरुषों को जन्म दिया...
- व्याख्या: ऋषिगण हस्तिनापुर के लोगों को बता रहे हैं कि पाण्डव साधारण बालक नहीं हैं, बल्कि वे भविष्य में महान यज्ञ और विजय प्राप्त करने वाले हैं।
श्लोक 37 और 38
श्लोक:
अश्विभ्यां पुरुषव्याघ्राविमौ तावपि तिष्ठतः। नकुलः सहदेवश्च तावप्यमिततेजसौ।। (1-135-37) चरता धर्मनित्येन वनवासं यशस्विना। एष पैतामहो वंशः पाण्डुना पुनरुद्धृतः।। (1-135-38)
- हिंदी अनुवाद: पुरुषों में व्याघ्र के समान वे दोनों अमित तेजस्वी नकुल और सहदेव भी अश्विनीकुमारों से उत्पन्न होकर यहाँ विद्यमान हैं। धर्म में तत्पर रहने वाले उन यशस्विनी पाण्डु ने वनवास में रहकर अपने इस पैतृक वंश का पुनरुद्धार किया है।
- व्याख्या: माद्री के पुत्रों (नकुल और सहदेव) का परिचय देते हुए ऋषि बताते हैं कि पाण्डु ने अपने वंश को लुप्त होने से बचा लिया है।
श्लोक 39 और 40
श्लोक:
पुत्राणां जन्म वृद्धिं च वैदिकाध्ययनानि च। पश्यन्तः सततं पाण्डोः परां प्रीतिमवाप्स्यथ।। (1-135-39) वर्तमानः सतां वृत्ते पुत्रलाभमवाप च। पितृलोकं गतः पाण्डुरितः सप्तदशेऽहनि।। (1-135-40)
- हिंदी अनुवाद: पाण्डु अपने पुत्रों का जन्म, उनकी वृद्धि और उनका वेदों का अध्ययन देखते हुए निरंतर परम आनंद को प्राप्त हुए। संतों के आचरण पर चलते हुए पुत्र लाभ प्राप्त करके राजा पाण्डु आज से सत्रहवें दिन पितृलोक को सिधार गए।
- व्याख्या: पाण्डु ने अपने जीवन के अंतिम दिनों में पुत्रों का सुख देखा और उचित समय पर उनका देहावसान हो गया।
श्लोक 41 और 42
श्लोक:
तं चितागतमाज्ञाय वैश्वानरमुखे हुतम्। प्रविष्टा पावकं माद्री हित्वा जीवितमात्मनः।। (1-135-41) सा गता सह तेनैव पतिलोकमनुव्रता। तस्यास्तस्य च यत्कार्यं क्रियतां तदनन्तरम्।। (1-135-42)
- हिंदी अनुवाद: जब पाण्डु की देह चिता पर रखकर अग्नि के हवाले की जा रही थी, तब माद्री ने अपने जीवन का मोह छोड़कर पावक (अग्नि) में प्रवेश कर लिया। पति के पीछे-पीछे चलती हुई वे उन्हीं के साथ पतिलोक को प्राप्त हो गई हैं। अब उनके और पाण्डु के पश्चात जो भी (अंतिम संस्कार आदि) कर्तव्य शेष हैं, उन्हें तुरंत किया जाए।
- व्याख्या: माद्री के सती होने की घटना का वर्णन करते हुए ऋषिगण हस्तिनापुर के लोगों से पाण्डु और माद्री के अंतिम संस्कार के कार्य को संपन्न करने का आग्रह करते हैं।
श्लोक 43, 44 और 45
श्लोक:
पृथां च शरणं प्राप्तां पाण्डवांश्च यशस्विनः। यथावदनुमन्यन्तां धर्मो ह्येष सनातनः।। (1-135-43) इमे तयोः शरीरे द्वे पुत्राश्चेमे तयोर्वराः। क्रियाभिरनुगृह्यन्तां सह मात्रा परंतपाः।। (1-135-44) प्रेतकार्ये निवृत्ते तु पितृमेधं महायशाः। लभतां सर्वधर्मज्ञः पाण्डुः कुरुकुलोद्वहः।। (1-135-45)
- हिंदी अनुवाद: शरण में आई हुई पृथा (कुंती) और इन यशस्विनी पाण्डवों का यथासत्य स्वागत और स्वीकृति दी जाए, क्योंकि यही सनातन धर्म है। ये दोनों (पाण्डु और माद्री के) शरीर और उनके श्रेष्ठ पुत्र यहाँ मौजूद हैं, माता कुंती के साथ इन परंतप बालकों का संस्कारों द्वारा अनुग्रह किया जाए। प्रेत-कर्म (अंतिम संस्कार) संपन्न होने के बाद, सर्वधर्मज्ञ कुरुवंशोद्धारक महायशस्वी पाण्डु का पितृमेध (श्राद्ध/दाह संस्कार) किया जाए।
- व्याख्या: ऋषिगण हस्तिनापुर के राजपरिवार को निर्देश दे रहे हैं कि वे कुंती और पाण्डवों को अपनाएं तथा पाण्डु-माद्री का अंतिम संस्कार विधिवत पूरा करें।
श्लोक 46 और 47
श्लोक:
वैशंपायन उवाच। एवमुक्त्वा कुरून्सर्वानकुरूणामेव पश्यताम्। क्षणेनान्तर्हिताः सर्वे तापसा गुह्यकैः सह।। (1-135-46) गन्धर्वनगराकारं तथैवान्तर्हितं पुनः। ऋषिसिद्धगणं दृष्ट्वा विस्मयं ते परं ययुः।। (1-135-47)
- हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—कुरुवंश के सभी लोगों को यह सब कहकर, कुरुवंशियों के देखते-देखते ही वे सभी तापसी और गुह्यकगण क्षणभर में अंतर्ध्यान हो गए। गंधर्व नगर के समान उनका अचानक प्रकट होकर फिर अंतर्हित हो जाना देखकर ऋषियों और सिद्धों के उस समूह को देखकर वे सब लोग अत्यधिक विस्मय में पड़ गए।
- व्याख्या: अपने कर्तव्य का संदेश देने के पश्चात ऋषिगण अपनी अलौकिक शक्ति से वहाँ से अदृश्य हो गए, जिसे देखकर हस्तिनापुर के सभी लोग और कौरव अत्यंत आश्चर्यचकित हुए।
(इस प्रकार महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत 135वाँ अध्याय समाप्त होता है)
।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः।। 135 ।।
