श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि षट्‌त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः

महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत 136वें अध्याय के श्लोकों का क्रमबद्ध (सीरियल नंबर से) श्लोक, हिंदी अनुवाद और व्याख्या प्रस्तुत है:

श्लोक 1

श्लोक:

धृतराष्ट्र उवाच। पाण्डोर्विदुर सर्वाणि प्रेतकार्याणि कारय। राजवद्राजसिंहस्य माद्र्याश्चैव विशेषतः।। (1-136-1)

  • हिंदी अनुवाद: धृतराष्ट्र ने कहा—हे विदुर! राजा पाण्डु के तथा विशेष रूप से माद्री के सभी प्रेत-कार्य (अंतिम संस्कार) राजोचित सम्मान के साथ करवाओ।
  • व्याख्या: राजा धृतराष्ट्र ने अपने छोटे भाई पाण्डु और उनकी पत्नी माद्री के अंतिम संस्कार को पूरी भव्यता और शाही मर्यादा के साथ संपन्न करने का आदेश विदुर को दिया।

श्लोक 2

श्लोक:

पशून्वासांसि रत्नानि धनानि विविधानि च। पाण्डोः प्रयच्छ माद्र्याश्च येभ्यो यावच्च वाञ्छितम्।। (1-136-2)

  • हिंदी अनुवाद: पशु, वस्त्र, रत्न और भाँति-भांति के धन—पाण्डु और माद्री के निमित्त जिन्हें-जितनी इच्छा हो, उन सबको वे वस्तुएँ प्रदान करो।
  • व्याख्या: अंतिम संस्कार के अवसर पर ब्राह्मणों, गरीबों और जरूरतमंदों को दान-दक्षिणा देने के लिए धृतराष्ट्र ने खजाने से प्रचुर मात्रा में धन, वस्त्र और वस्तुएं बांटने का निर्देश दिया।

श्लोक 3

श्लोक:

यथा च कुन्ती सत्कारं कुर्यान्माद्र्यास्तथा कुरु। यथा न वायुर्नादित्यः पश्येतां तां सुसंवृताम्।। (1-136-3)

  • हिंदी अनुवाद: कुंती जिस प्रकार (सम्मान की अधिकारिणी) है, वैसा ही सत्कार माद्री का भी करो। और इस बात का ध्यान रखो कि माद्री का शव इस प्रकार सुसंवृत (ढका हुआ) रहे कि उसे वायु या सूर्य भी न देख सकें।
  • व्याख्या: धृतराष्ट्र ने आदेश दिया कि माद्री को भी कुंती के समान ही पूरा आदर मिले और उनकी देह की पूरी गोपनीयता व शालीनता शाही परंपरा के अनुसार सुरक्षित रखी जाए।

श्लोक 4

श्लोक:

न शोच्यः पाण्डुरनघः प्रशस्यः स नराधिपः। यस्य पञ्च सुता वीरा जाताः सुरसुतोपमाः।। (1-136-4)

  • हिंदी अनुवाद: निष्पाप राजा पाण्डु शोक करने योग्य नहीं हैं, वे तो प्रशंसा के पात्र हैं, जिनके देवताओं के समान तेजस्वी पाँच वीर पुत्र उत्पन्न हुए हैं।
  • व्याख्या: धृतराष्ट्र सांत्वना देते हुए कहते हैं कि पाण्डु का जीवन और उनके महान पुत्रों का होना यह बताता है कि उनका यश अमर है, इसलिए उनके लिए अत्यधिक शोक करना उचित नहीं है।

श्लोक 5 और 6

श्लोक:

वैशंपायन उवाच। विदुरस्तं तथेत्युक्त्वा भीष्मेण सह भारत। पाण्डुं संस्कारयामास देशे परमपूजिते।। (1-136-5) ततस्तु नगरात्तूर्णमाज्यगन्धपुरस्कृताः। निर्हृताः पावका दीप्ताः पाण्डो राजन्पुरोहितैः।। (1-136-6)

  • हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—हे भारत! विदुर जी ने 'तथास्तु' कहकर भीष्म जी के साथ मिलकर पाण्डु का अत्यंत पवित्र देश में संस्कार कराया। हे राजन्! तदनन्तर पुरोहितों द्वारा घी की सुगंध से युक्त प्रदीप्त अग्नियों को नगर से शीघ्रतापूर्वक बाहर निकाला गया।
  • व्याख्या: भीष्म और विदुर ने मिलकर हस्तिनापुर के पुरोहितों की सहायता से दाह संस्कार के लिए पावन अग्नि की व्यवस्था की और पूरी विधि के साथ यात्रा आरंभ की।

श्लोक 7 और 8

श्लोक:

अथैनामार्तवैः पुष्पैर्गन्धैश्च विविधैर्वरैः। शिबिकां तामलङ्कृत्य वाससाऽऽच्छाद्य सर्वशः।। (1-136-7) तां तथा शोभितां माल्यैर्वासोभिश्च महाधनैः। अमात्या ज्ञातयश्चैनं सुहृदश्चोपतस्थिरे।। (1-136-8)

  • हिंदी अनुवाद: तत्पश्चात ऋतु के फूलों और उत्तम सुगंधित द्रव्यों से उस शिबिका (पालकी) को सजाकर चारों तरफ से वस्त्रों से आच्छादित किया गया। बहुमूल्य वस्त्रों और मालाओं से सुसज्जित उस शिबिका के पास मंत्री, संबंधी और सुहृदगण उपस्थित हुए।
  • व्याख्या: पाण्डु और माद्री के पार्थिव शरीर को ले जाने के लिए एक भव्य और सुगंधित फूलों से सजी हुई पालकी तैयार की गई, जिसके चारों ओर सगे-सम्बंदी एकत्र हुए।

श्लोक 9 और 10

श्लोक:

नृसिंहं नरयुक्तेन परमालङ्कृतेन तम्। अवहन् यानमुख्येन सह माद्र्या सुसंवृतम्।। (1-136-9) पाण्डुरेणातपत्रेण चामरव्यजनेन च। सर्ववादित्रनादैश्च समलञ्चक्रिरे ततः।। (1-136-10)

  • हिंदी अनुवाद: मनुष्यों में सिंह के समान श्रेष्ठ पाण्डु और माद्री के शवों को उत्तम मनुष्यों द्वारा उठाई गई और पूरी तरह अलंकृत सर्वोत्तम पालकी में रखा गया। उस समय श्वेत छत्र, चंवर और सभी प्रकार के बाजों के नादों से उसे सुशोभित किया गया।
  • व्याख्या: शाही ठाट-बाट और पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ शव यात्रा निकाली गई, जिसमें राजाओं वाले प्रतीक चिह्न (छत्र-चंवर) और संगीत वाद्ययंत्र शामिल थे।

श्लोक 11 और 12

श्लोक:

रत्नानि चाप्युपादाय बहूनि शतशो नराः। प्रददुः काङ्क्षमाणेभ्यः पाण्डोस्तस्यौर्ध्वदेहिके।। (1-136-11) अथ च्छत्राणि शुभ्राणि चामराणि बृहन्ति च। आजह्रुः कौरवस्यार्थे वासांसि रुचिराणि च।। (1-136-12)

  • हिंदी अनुवाद: सैकड़ों मनुष्यों ने बहुमूल्य रत्नों को लेकर पाण्डु के और्ध्वदेहिक (अंतिम संस्कार) कार्य में इच्छुकों को दान किया। इसके अतिरिक्त कौरव की शवयात्रा के लिए श्वेत छत्र, बड़े-बड़े चंवर और सुंदर वस्त्र मंगाए गए।
  • व्याख्या: इस अवसर पर गरीबों और याचकों को बड़े पैमाने पर रत्न व धन दान दिए गए तथा शाही प्रतीकों से यात्रा को भव्य बनाया गया।

श्लोक 13 और 14

श्लोक:

याजकैः शुक्लवासोभिर्हूयमाना हुताशनाः। अगच्छन्नग्रतस्तस्य दीप्यमानाः स्वलङ्कृताः।। (1-136-13) ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चैव सहस्रशः। रुदन्तः शोकसंतप्ता अनुजग्मुर्नराधिपम्।। (1-136-14)

  • हिंदी अनुवाद: श्वेत वस्त्र पहने हुए याजक (ऋत्विज) प्रज्वलित अग्नि में आहुति देते हुए आगे-आगे चल रहे थे। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के हजारों लोग शोक से संतप्त होकर रोते हुए उस राजा की पालकी के पीछे-पीछे चल रहे थे।
  • व्याख्या: यज्ञीय अग्नि को आगे रखकर पूरी प्रजा और वर्णों के लोग अपने प्रिय राजा की अंतिम यात्रा में अश्रुपूर्ण नेत्रों के साथ सम्मिलित हुए।

श्लोक 15, 16 और 17

श्लोक:

अयमस्मानपाहाय दुःखे चाधाय शाश्वते। कृत्वा चास्माननाथांश्च क्व यास्यति नराधिपः।। (1-136-15) क्रोशन्तः पाण्डवाः सर्वे भीष्मो विदुर एव च। बाह्लीकः सोमदत्तश्च तथा भूरिश्रवा नृपः।। (1-136-16) अन्योन्यं वै समाश्लिष्य अनुजग्मुः सहस्रशः।' रमणीये वनोद्देशे गङ्गातीरे समे शुभे।। (1-136-17)

  • हिंदी अनुवाद: "यह नराधिप हमें छोड़कर, शाश्वत दुःख में डालकर और हमें अनाथ बनाकर कहाँ जा रहे हैं?" इस प्रकार विलाप करते हुए पाण्डव, भीष्म, विदुर, बाह्लिक, सोमदत्त और राजा भूरिश्रवा आदि सब एक-दूसरे को गले लगाकर सहस्रों की संख्या में पीछे चल रहे थे। वे सब गंगा के तट पर एक रमणीय और समतल सुंदर वन प्रदेश में पहुँचे।
  • व्याख्या: परिजनों और बालकों का विलाप देखकर पूरी यात्रा का वातावरण बेहद मर्मस्पर्शी हो गया था, और अंततः सब लोग गंगा के पवित्र तट पर पहुँचे।

श्लोक 18, 19 और 20

श्लोक:

न्यासयामासुरथं तां शिबिकां सत्यवादिनः। सभार्यस्य नृसिंहस्य पाण्डोरक्लिष्टकर्मणः।। (1-136-18) ततस्तस्य शरीरं तु सर्वगन्धाधिवासितम्। शुचिकालीयकादिग्धं दिव्यचन्दनरूषितम्।। (1-136-19) पर्यषिञ्चञ्जलेनाशु शातकुम्भमयैर्घटैः। चन्दनेन च शुक्लेन सर्वतः समलेपयन्।। (1-136-20)

  • हिंदी अनुवाद: सत्यवादी लोगों ने पत्नी सहित उन नृसिंह पाण्डु की उस पालकी को गंगा तट पर उतारा। इसके बाद उनके संपूर्ण शरीर पर सुगंधित द्रव्य, कालीयक चूर्ण और दिव्य चंदन का लेप किया गया। सुवर्णमय घटों के पवित्र जल से उनके शरीर का अभिषेक किया गया और चारों तरफ श्वेत चंदन का लेप लगाया गया।
  • व्याख्या: गंगा तट पर पहुँचकर पाण्डु और माद्री के पार्थिव शरीर को पालकी से उतारा गया और शास्त्रीय विधि के अनुसार विभिन्न सुगंधित द्रव्यों व पवित्र जल से उनका लेपन व स्नान कराया गया।

श्लोक 21 और 22

श्लोक:

कालागुरुविमिश्रेण तथा तुङ्गरसेन च। अथैनं देशजैः शुक्लैर्वासोभिः समयोजयन्।। (1-136-21) संछन्नः स तु वासोभिर्जीवन्निव नराधिपः। शुशुभे स नव्याघ्रो महार्हशयनोचितः।। (1-136-22)

  • हिंदी अनुवाद: काले अगर और तुंग रस (सुगंधित गोंद) को मिलाकर उनके शरीर पर लगाया गया। फिर उन्हें देश में बने उत्तम श्वेत वस्त्र पहनाए गए। कीमती शय्या पर सोने योग्य उन कुरुश्रेष्ठ राजा पाण्डु को जब उन वस्त्रों से ढका गया, तो वे ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो वे अभी जीवित ही हों।
  • व्याख्या: शव को दिव्य वस्त्रों और सुगंधों से सुसज्जित किया गया, जिससे उनका रूप शांत और जीवंत प्रतीत हो रहा था।

श्लोक 23 और 24

श्लोक:

हयमेधाग्निना सर्वे याजकाः सपुरोहिताः। वेदोक्तेन विधानेन क्रियांचक्रुः समन्त्रकम्।। (1-136-23) याजकैरभ्यनुज्ञाते प्रेतकर्मण्यनिष्ठिते। घृतावसिक्तं राजानं सह माद्र्या स्वलङ्कृतम्।। (1-136-24)

  • हिंदी अनुवाद: अश्वमेध यज्ञ की अग्नि से पुरोहितों सहित सभी याजकों ने वेदोक्त विधि और मंत्रों के साथ संस्कार की क्रियाएं कीं। याजकों की अनुमति मिलने पर प्रेत-कर्म (दाह संस्कार) के लिए अलंकृत राजा पाण्डु और माद्री के शरीरों को घी से सींचा गया।
  • व्याख्या: वैदिक मंत्रोच्चार और यज्ञीय अग्नि का उपयोग करते हुए पाण्डु और माद्री के शरीरों को दाह संस्कार के लिए घी से सिंचित किया गया।

श्लोक 25 और 26

श्लोक:

तुङ्गपद्मकमिश्रेण चन्दनेन सुगन्धिना। सरलं देवदारुं च गुग्गुलं लाक्षया सह।। (1-136-25) हरिचन्दनकाष्ठैश्च हरिबेरैरुशीरकैः। अन्यैश्च विविधैर्गन्धैर्विधिना समदाहयन्।। (1-136-26)

  • हिंदी अनुवाद: तुंग, पद्मकमिश्रित सुगंधित चंदन, सरल (चीड़), देवदार, गुग्गुल, लाख, हरिचंदन की लकड़ी, जटामांसी (हरिबेर), उशीर (खस) तथा अन्य विविध सुगंधित द्रव्यों के साथ विधिपूर्वक उनका दाह संस्कार किया गया।
  • व्याख्या: चिता में अत्यंत सुगंधित लकड़ियां और दिव्य औषधियां अर्पित की गईं ताकि संस्कार पूरी पवित्रता और महक के साथ संपन्न हो।

श्लोक 27 और 28

श्लोक:

ततस्तयोः शरीरे द्वे दृष्ट्वा मोहवशं गता। हाहा पुत्रेति कौसल्या पपात सहसा भुवि।। (1-136-27) तां प्रेक्ष्य पतितामार्तां पौरजानपदो जनः। रुरोद दुःखसंतप्तो राजभक्त्या कृपाऽन्वितः।। (1-136-28)

  • हिंदी अनुवाद: तत्पश्चात उन दोनों (पाण्डु और माद्री) के शरीरों को (चिता पर) देखकर कौसल्या मोहवश "हा पुत्र!" कहकर अचानक पृथ्वी पर गिर पड़ीं। आर्त भाव से गिरी हुई रानी कौसल्या को देखकर नगर और जनपद के लोग राजभक्ति और करुणा से संतप्त होकर फूट-फूटकर रोने लगे।
  • व्याख्या: माता कौसल्या अपने पुत्र को अग्नि में देखकर अपने सुध-बुध खो बैठीं और उनके विलाप को देख वहां मौजूद पूरी जनता की आँखें नम हो गईं।

श्लोक 29 और 30

श्लोक:

कुन्त्याश्चैवार्तनादेन सर्वाणि च विचुक्रुशुः। मानुषैः सह भूतानि तिर्यग्योनिगतान्यपि।। (1-136-29) तथा भीष्मः शान्तनवो विदुरश्च महामतिः। सर्वशः कौरवाश्चैव प्राणदन्भृशदुःखिताः।। (1-136-30)

  • हिंदी अनुवाद: कुंती के आर्तनाद (रुदन) से मनुष्यों सहित समस्त प्राणी और यहाँ तक कि पशु-पक्षी (तिर्यग्योनि के जीव) भी रो पड़े। इसी प्रकार शांतनु पुत्र भीष्म, महाज्ञानी विदुर और सभी कौरव अत्यंत दुखी होकर विलाप करने लगे।
  • व्याख्या: इस करुण दृश्य ने प्रकृति और सभी जीवों को झकझोर दिया। राजपरिवार के सभी प्रमुख सदस्य शोक में डूब गए।

श्लोक 31 और 32

श्लोक:

ततो भीष्मोऽथ विदुरो राजा च सह पाण्डवैः। उदकं चक्रिरे तस्य सर्वाश्च कुरुयोषितः।। (1-136-31) चुक्रुशुः पाण्डवाः सर्वे भीष्मः शान्तनवस्तथा। विदुरो ज्ञातयश्चैव चक्रुश्चाप्युदकक्रियाः।। (1-136-32)

  • हिंदी अनुवाद: इसके बाद भीष्म, विदुर, राजा धृतराष्ट्र, पाण्डवों तथा कुरुवंश की सभी स्त्रियों ने उनके लिए जलांजलि (उदक क्रिया) दी। सभी पाण्डव, शांतनु पुत्र भीष्म, विदुर और संबंधियों ने रोते हुए उदक-कर्म (तर्पण) संपन्न किया।
  • व्याख्या: दाह संस्कार के पश्चात परंपरा के अनुसार गंगा नदी में सभी परिजनों ने दिवंगत राजा पाण्डु और माद्री के निमित्त तिलांजलि व जल अर्पित किया।

श्लोक 33 और 34

श्लोक:

कृतोदकांस्तानादाय पाण्डवाञ्छोककर्शितान्। सर्वाः प्रकृतयो राजञ्शोचमाना न्यवारयन्।। (1-136-33) यथैव पाण्डवा भूमौ सुषुपुः सह बान्धवैः। तथैव नागरा राजञ्शिश्यिरे ब्राह्मणादयः।। (1-136-34)

  • हिंदी अनुवाद: हे राजन्! जलांजलि देने के पश्चात शोक से विह्वल हुए पाण्डवों को दुःखी प्रजाजनों ने सांत्वना देकर रोका (घर लौटने का आग्रह किया)। जिस प्रकार पाण्डव अपने बन्धु-बान्धवों के साथ भूमि पर सोए, उसी प्रकार नगर के ब्राह्मण आदि नागरिक भी भूमि पर ही शयन करने लगे।
  • व्याख्या: राजा के शोक में पूरे राज्य ने विलाप किया। पाण्डवों और नागरिकों ने उस रात महलों के सुख त्यागकर जमीन पर सोकर शोक व्यक्त किया।

श्लोक 35

श्लोक:

तद्गतानन्दमस्वस्थमाकुमारमहृष्टवत्। बभूव पाण्डवैः सार्धं नगरं द्वादश क्षपाः।। (1-136-35)

  • हिंदी अनुवाद: पाण्डवों के साथ वह हस्तिनापुर नगर बारह दिनों तक आनंद-रहित, अस्वस्थ (शोकग्रस्त) और बालकों से लेकर बड़ों तक सभी के उल्लास से हीन बना रहा।
  • व्याख्या: पाण्डु के निधन के उपरांत शोक की अवधि के बारह दिनों तक पूरे हस्तिनापुर में उत्सव या हर्ष का कोई माहौल नहीं रहा, हर कोई गहरे दुःख में डूबा हुआ था।

(इस प्रकार महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत 136वाँ अध्याय समाप्त होता है)

।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि षट्‌त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः।। 136 ।।

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