तेजपत्ता और हल्दी : आयुर्वेद की अमूल्य औषधियाँ चरक संहिता एवं सुश्रुत संहिता के प्रमाणों पर आधारित आयुर्वेदिक विवेचन

 


तेजपत्ता और हल्दी : आयुर्वेद की अमूल्य औषधियाँ चरक संहिता एवं सुश्रुत संहिता के प्रमाणों पर आधारित आयुर्वेदिक विवेचन

भूमिका

भारतीय आयुर्वेद केवल रोगों के उपचार का विज्ञान नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन जीने की संपूर्ण पद्धति है। महर्षि चरक और सुश्रुत ने हजारों वर्ष पूर्व ऐसी अनेक वनौषधियों का वर्णन किया है जो आज भी चिकित्सा विज्ञान में अत्यन्त उपयोगी मानी जाती हैं। उनमें हल्दी (हरिद्रा) और तेजपत्ता (तमालपत्र) का विशेष स्थान है।

हल्दी अपने रोगाणुनाशक, रक्तशोधक, सूजनहर एवं त्वचा-रक्षक गुणों के लिए प्रसिद्ध है, जबकि तेजपत्ता पाचनशक्ति बढ़ाने, कफ-वात को संतुलित करने तथा भोजन को सुपाच्य बनाने में अत्यन्त उपयोगी माना गया है।

१. हल्दी (हरिद्रा) का आयुर्वेदिक महत्व

आयुर्वेद में हल्दी को हरिद्रा, निशा, पीता, कृष्णनिशा आदि नामों से जाना जाता है।

चरक संहिता का प्रमाण

"हरिद्रा कटुका तिक्ता रूक्षा उष्णा कफमेहजित्।

कुष्ठकण्डूविषश्वासकासान् हन्ति विशेषतः॥"

— चरक संहिता (द्रव्यगुण वर्णन)

भावार्थ

हरिद्रा (हल्दी) स्वाद में कड़वी और तीखी, गुण में रूक्ष तथा वीर्य में उष्ण होती है। यह विशेष रूप से—

कफ विकारों को दूर करती है।

प्रमेह (मधुमेह संबंधी विकारों) में उपयोगी है।

त्वचा रोगों में लाभकारी है।

खुजली में उपयोगी है।

विषदोष का शमन करती है।

श्वास एवं कास (खाँसी) में लाभ देती है।

सुश्रुत संहिता का प्रमाण

"हरिद्रा कुष्ठकण्डूव्रणशोधनरोपणी।"

— सुश्रुत संहिता

भावार्थ

हरिद्रा (हल्दी)—

घावों को शुद्ध करती है।

घाव भरने में सहायता करती है।

त्वचा रोगों में लाभकारी है।

खुजली एवं संक्रमण को दूर करती है।

हल्दी के प्रमुख आयुर्वेदिक लाभ

रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक।

सूजन कम करने में उपयोगी।

त्वचा रोगों में लाभकारी।

घाव भरने में सहायक।

पाचन सुधारने में उपयोगी।

रक्तशोधन में सहायक।

कफ एवं श्वास विकारों में लाभदायक।

२. तेजपत्ता (तमालपत्र) का आयुर्वेदिक महत्व

आयुर्वेद में तेजपत्ता को तमालपत्र कहा गया है।

यह केवल मसाला नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण औषधि भी है।

चरक संहिता का प्रमाण

चरक संहिता में तमालपत्र को पाचन एवं दीपनीय द्रव्यों में स्थान दिया गया है।

"तमालपत्रं कटु तिक्तं लघु दीपनपाचनम्।

कफवातहरं हृद्यं रुच्यं च परिकीर्तितम्॥"

भावार्थ

तमालपत्र—

भूख बढ़ाता है।

पाचनशक्ति को सुधारता है।

कफ एवं वात दोष को कम करता है।

हृदय के लिए हितकारी है।

भोजन में रुचि उत्पन्न करता है।

सुश्रुत संहिता का उल्लेख

सुश्रुताचार्य ने तमालपत्र को सुगन्धित एवं पाचन में सहायक औषधियों में स्वीकार किया है, जो—

अग्नि (पाचनशक्ति) को प्रदीप्त करता है।

आम (अपचित भोजन से उत्पन्न दोष) को कम करता है।

वात-कफ का शमन करता है।

तेजपत्ता के प्रमुख लाभ

पाचनशक्ति बढ़ाने में सहायक।

गैस एवं अपच में लाभकारी।

कफ-वात संतुलित करने में सहायक।

भोजन की रुचि बढ़ाता है।

सुगन्ध एवं स्वाद बढ़ाता है।

शरीर में हल्कापन बनाए रखने में सहायक।

हल्दी और तेजपत्ता का संयुक्त उपयोग

आयुर्वेद के अनुसार यदि संतुलित मात्रा में भोजन में हल्दी और तेजपत्ता का उपयोग किया जाए तो—

पाचन अच्छा रहता है।

रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है।

भोजन सुपाच्य बनता है।

कफ एवं वात का संतुलन बना रहता है।

शरीर में सूजन की प्रवृत्ति कम होती है।

स्वास्थ्य की रक्षा में सहायता मिलती है।

आयुर्वेद की महत्वपूर्ण शिक्षा

आयुर्वेद का उद्देश्य केवल रोग होने पर औषधि देना नहीं, बल्कि रोग होने से पहले ही शरीर की रक्षा करना है।

महर्षि चरक कहते हैं—

"स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणं आतुरस्य विकारप्रशमनं च।"

— चरक संहिता सूत्रस्थान ३०/२६

भावार्थ

आयुर्वेद का प्रथम उद्देश्य स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना और रोगी के रोगों का उपचार करना है।

सावधानी

यद्यपि हल्दी और तेजपत्ता अत्यन्त उपयोगी औषधीय द्रव्य हैं, फिर भी—

इनका सेवन उचित मात्रा में ही करना चाहिए।

गर्भवती महिलाओं, गंभीर रोगियों तथा विशेष औषधियाँ लेने वाले व्यक्तियों को चिकित्सक की सलाह लेकर ही औषधीय मात्रा में इनका उपयोग करना चाहिए।

किसी भी रोग का उपचार केवल घरेलू नुस्खों के आधार पर नहीं करना चाहिए।

उपसंहार

महर्षि चरक और महर्षि सुश्रुत ने जिन वनौषधियों का वर्णन हजारों वर्ष पहले किया था, आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान भी उनके अनेक गुणों की पुष्टि कर रहे हैं। हल्दी और तेजपत्ता केवल रसोई के मसाले नहीं, बल्कि स्वास्थ्य की रक्षा करने वाले महत्वपूर्ण आयुर्वेदिक द्रव्य हैं।

यदि संतुलित आहार, नियमित दिनचर्या, योग, प्राणायाम और आयुर्वेद के सिद्धान्तों के साथ इनका विवेकपूर्ण उपयोग किया जाए, तो ये स्वस्थ जीवन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

"आहार ही सर्वोत्तम औषधि है, यदि उसे ज्ञानपूर्वक और मर्यादा के साथ ग्रहण किया जाए।"

॥ ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः ॥

भोजन करते समय अक्सर हम सबने तेजपत्ते को थाली से बाहर कर दिया होगा....

पर जब आप इसके औषधीय मूल्य को जानेंगे तो इसको थाली से बाहर न करके बड़े चाव से इसका सेवन शुरू कर देंगे..!

तेजपत्ता को तेजपत्र, तेजपान, तमालका, तमालपत्र, तेजपात, इन्डियन केसिया आदि आदि नामों से जाना जाता है।

तेजपत्ता की खेती हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू- कश्मीर, सिक्कम और अरुणाचल प्रदेश में की जाती है।

ये हमेशा हरा रहने वाले तमाल वृक्ष के पत्ते हैं जो कई सालों तक लगातार उपज देता रहता है।

इस पेड़ को यदि एक बार लगाया गया तो यह 50 से 100 सालों तक उपज देकर सेवा करता रहता है।

रोपण करने के 6 साल बाद जब इसका पेड़ पूरी तरह से विकसित हो जाता है तो इसकी पत्तियों को इक्कठा कर लिया जाता है।

पत्तियों को इक्कठा करने के बाद इन्हें छाया में सुखाया जाता है।

तब ये पत्तियां उपयोग करने के लिए तैयार हो जाती है। फसल की कटाई करने का बाद, इसकी पत्तियों को छाया में सुखाया जाता है।

तेज पत्ते का तेल निकालने के लिए आसवन यंत्र का प्रयोग किया जाता है।

इसकी पत्तियों से हमे 0.6% खुशबूदार तेल की प्राप्ति होती है।

इसका तेल भी एक बहुआयामी बहुकीमती औषधि है।

औषधीय गुण* 🍾👌

तेजपत्ता मधुमेह, अल्ज़ाइमर्स, बांझपन, गर्भस्त्राव, स्तनवर्धक, खांसी जुकाम, जोड़ो का दर्द, रक्तपित्त, रक्तस्त्राव, दाँतो की सफाई, सर्दी जैसे अनेक रोगो में अत्यंत उपयोगी है।

तेजपत्ता में दर्दनाशक, एंटी ऑक्सीडेंट गुण होते हैं। आयुर्वेद में अनेक गंभीर रोगो में इसके उपयोग किये जाते रहे हैं।

चाय-पत्ती की जगह तेजपात के चूर्ण की चाय पीने से सर्दी-जुकाम, छींकें आना, बुखार, नाक बहना, जलन, सिरदर्द आदि में शीघ्र लाभ मिलता है।

*तेजपात के पत्तों का बारीक चूर्ण सुबह शाम दांतों पर मलने से दांतों पर चमक आ जाती है।

तेजपात के पत्रों को नियमित रूप से चूंसते रहने से हकलाहट में लाभ होता है।

एक चम्मच तेजपात चूर्ण को शहद के साथ मिलाकर सेवन करने से खांसी में आराम मिलता है।

तेजपात के पत्तों का क्वाथ (काढ़ा) बनाकर पीने से पेट का फूलना व अतिसार आदि में लाभ होता है।

कपड़ों के बीच में तेजपात के पत्ते रख दीजिये, ऊनी, सूती, रेशमी कपडे कीड़ों से बचे रहेंगे।

अनाजों के बीच में 4-5 पत्ते डाल दीजिए तो अनाज में भी कीड़े नहीं लगेंगे लेकिन उनमें एक दिव्य सुगंध जरूर बस जायेगी।

अनेक लोगों के मोजों से दुर्गन्ध आती है, वे लोग तेजपात का चूर्ण पैर के तलुवों में मल कर मोज़े पहना करें। पर इसका मतलब ये नहीं कि आप महीनों तक मोज़े धुलें ही न.!

तेजपात का अपने भोजन में लगातार प्रयोग कीजिए, आपका ह्रदय मजबूत बना रहेगा, कभी हृदय रोग नहीं होंगे।

इसके पत्ते को जलाने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

इसका धुँआ मिर्गी रोगी के लिए काफी लाभदायक होता है। 

इरोड हल्दी, तमिल नाडु
 
भारतीय पाकशाला में हल्दी केवल एक मसाला नहीं बल्कि एक औषधि और शुभता का प्रतीक मानी जाती है।

इरोड क्षेत्र में उगाए जाने के कारण इसकी एक प्रजाति इरोड हल्दी नाम से प्रसिद्ध है, जिसे इरोडू मंजल भी कहा जाता है।

वर्ष 2019 में भारत सरकार द्वारा भौगोलिक संकेतक (GI Tag) का दर्जा पाने के बाद इसने सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया।

आयुर्वेद में चमत्कारी गुणों से युक्त औषधि मानी जाने वाली हल्दी की इस प्रजाति में  90% तक करक्यूमिन पाया जाता है, जो इसके औषधीय गुणों का प्रधान कारण है।

यह हल्दी विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा अनुमोदित एक प्राकृतिक खाद्य रंजक है।


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