*🚩‼️ओ३म्‼️🚩*
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🔥ऋषिबोधोत्सव / सच्चे शिव की खोज!!!
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क्या आपके मन में ये प्रश्न नहीं आ रहा होगा कि समस्त सनातन (हिन्दू ) समाज जिस पर्व को 'महाशिवरात्रि' के रूप में मनाता चला आ रहा है वहीँ हम सभी वैदिक धर्मी "'ऋषि बोध दिवस'" के रूप में मनाते चले आ रहे हैं। जो लोग आर्य समाज से गम्भीरता व दृढ़ता के साथ जुड़े है वे तो जानते ही हैं कि १४ वर्षीय "मूलशंकर" ने शिवरात्रि का व्रत पूरी श्रद्धा व आस्था से रखा था और शिव दर्शन की अभिलाषा से पूरी रात्रि जागे थे। शिव तो दर्शन देने नहीं आये अपितु एक चूहा शिव के लिए लगाये गए भोगों को खाता है और शिवलिंग पर ही मूत्रादि का त्याग भी करता है, इस दृश्य को देखकर बालक मूलशंकर के मन में प्रश्न उपस्थित होता है कि क्या ये वही सच्चा शिव है जो सर्व रक्षक व देवाधिदेव महादेव कहा जाता है?
बन्धुओ ये सामान्य सी घटना कितने ही मनुष्यों ने उससे पूर्व भी देखी होंगी और आगे भी देखेंगे परन्तु प्रश्न क्यों नहीं उठाया गया? किसी भी प्रचलित परम्परा अथवा निराधार कुरीति के विषय में प्रश्न ऐसे ही नहीं उत्पन्न हो जाते ये तो पूर्व जन्मों में अर्जित ज्ञान व तप का परिणाम होता है ऐसा ही हुआ उस महान आत्मा ऋषि दयानंद के साथ जो पूर्व जन्मों में ऋषि जन्मों को धारण किये चला आ रहा था।
उस दिव्य आत्मा ने मानव मात्र के कल्याण व प्राणिमात्र के हित के निमित्त उस प्रश्न के समाधान का बीज उसी दिन बो दिया और संकल्प लिया कि *"सच्चे शिव की खोज ही जीवन का उद्देश्य रहेगा, सच्चा शिव ये पाषाण की आकृति मात्र नहीं हो सकता"*
बन्धुओ बालक मूलशंकर ने उस रात्रि घर जाकर माँ से माँगकर भोजन भी किया यानी वह परम्परागत 'व्रत' तोड़ दिया उसके स्थान पर स्वजीवन अर्पण का व्रत धारण कर हम जैसे करोड़ों जिज्ञासुओं के लिए परमपिता परमात्मा द्वारा प्रदत्त वेद ज्ञान की गंगा आर्यभाषा ( हिन्दी) में प्रवाहित की और वेद वर्णित सच्चे शिव का विराट स्वरुप प्रस्तुत किया।
आइये हम सब मिलकर वेदों, ऋषियों के ग्रंथों, दर्शनों, उपनिषदों, स्मृतियों, वाल्मीकि रामायण व महाभारत आदि के स्वाध्याय का संकल्प लें अपने अज्ञान व अन्धकार को नष्ट कर जीवन में सच्चा प्रकाश प्राप्त करने के लिए सत्यार्थ प्रकाश व संस्कार विधि को अपनी निधि बनाएं।
हम सभी अपना कुछ समय समाज में फैली कुरीतियों के प्रति जागरण में भी लगाएं, अपने संपर्क में आने वाले भाई बहिनों को अन्धकार से निकालकर वेदों के प्रकाश तक पहुंचाये ।
🕉️ "नमः शम्भवाय च..." — परमात्मा के कल्याणकारी स्वरूप की वैदिक स्तुति
मन्त्र
ॐ नमः शम्भवाय च मयोभवाय च।नमः शङ्कराय च मयस्कराय च।नमः शिवाय च शिवतराय च॥
यह मन्त्र यजुर्वेद के श्रीरुद्राध्याय (नमकम्) में आता है। इसमें परमात्मा के अनेक कल्याणकारी गुणों का स्तवन किया गया है।
भावार्थ
हे परमेश्वर! आपको नमस्कार है, जो समस्त सुख और कल्याण के मूल स्रोत हैं। आपको नमस्कार है, जो जगत् का मंगल करते हैं, आनन्द प्रदान करते हैं और सबका कल्याण करने वाले हैं। आप शिव हैं—अर्थात् कल्याणस्वरूप हैं, और सबसे बढ़कर कल्याण करने वाले हैं; आपको बार-बार नमस्कार है।
मन्त्र का गूढ़ अर्थ
🔹 शम्भवाय
"शम्" अर्थात् कल्याण, शान्ति और सुख। "भव" अर्थात् उत्पन्न करने वाला।
शम्भु वह है जो समस्त प्राणियों के लिए कल्याण और सुख का कारण है।
🔹 मयोभवाय
"मयः" का अर्थ है आनन्द और परम सुख।
परमात्मा वह है जिसके सान्निध्य और ज्ञान से जीवन में वास्तविक आनन्द की प्राप्ति होती है।
🔹 शङ्कराय
"शं करोति इति शङ्करः"—जो सबका मंगल करे, वही शङ्कर है।
परमात्मा किसी एक जाति, देश या सम्प्रदाय का नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि का हितकारी है।
🔹 मयस्कराय
जो मनुष्य को सुख, समृद्धि, सद्बुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करे, वह मयस्कर है।
🔹 शिवाय
"शिव" का अर्थ है—कल्याणस्वरूप, मंगलमय, दोषरहित, पवित्र।
परमात्मा स्वयं पूर्णतः शुद्ध, पवित्र और कल्याणकारी है।
🔹 शिवतराय
जो सबसे अधिक कल्याण करने वाला है, जो सर्वोच्च मंगलदाता है, वही शिवतर है।
इससे स्पष्ट होता है कि परमात्मा अनन्त कल्याण का स्रोत है।
वेद का संदेश
यह मन्त्र हमें केवल ईश्वर की स्तुति करना ही नहीं सिखाता, बल्कि उसके गुणों को अपने जीवन में धारण करने की प्रेरणा भी देता है।
यदि हम परमात्मा को शम्भु कहते हैं, तो हमें भी दूसरों के सुख का कारण बनना चाहिए।
यदि हम उसे शङ्कर कहते हैं, तो हमें भी समाज में शान्ति, प्रेम और सद्भाव फैलाना चाहिए।
यदि हम उसे शिव कहते हैं, तो हमें भी अपने विचार, वाणी और कर्म को पवित्र बनाना चाहिए।
वेदों के अनुसार सच्ची उपासना
सच्ची उपासना केवल मन्त्रों का उच्चारण नहीं, बल्कि ईश्वर के गुणों को जीवन में उतारना है।
- सत्य बोलना ही शिव की उपासना है।
- परोपकार करना ही शङ्कर की आराधना है।
- सबके सुख की कामना करना ही शम्भु की वन्दना है।
- अपने जीवन को पवित्र बनाना ही परमात्मा के प्रति वास्तविक नमस्कार है।
निष्कर्ष
यह दिव्य मन्त्र हमें बताता है कि परमात्मा कल्याण, आनन्द, शान्ति और मंगल का अनन्त स्रोत है। जो मनुष्य उसके गुणों को अपने जीवन में अपनाता है, वही स्वयं भी समाज के लिए कल्याणकारी बन जाता है।
आइए संकल्प लें—
हम केवल "नमः शिवाय" का जप ही न करें, बल्कि अपने जीवन को भी "शिवमय" अर्थात् सत्य, पवित्रता, करुणा और परोपकार से युक्त बनाएँ। यही इस वैदिक मन्त्र का वास्तविक संदेश है।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
🌷जो सुखस्वरूप संसार के उत्तम सुखों का देव्ने वाला कल्याण का कर्ता , मोक्षस्वरूप , धर्मयुक्त कामों का ही करनेवाला अपने भक्तों का सुख देनेवाला और धर्मयुक्त कामों में युक्त करनेवाला , अत्यंत मंगलस्वरूप और धार्मिक मनुष्यों को मोक्ष का सुख देनेवाला है उस सच्चिदानंद स्वरुप निराकार सर्व शक्तिमान न्यायकारी दयालु अजन्मे अनंत निर्विकार अनादि अनुपम सर्वाधार सर्वेश्वर सर्व व्यापक सर्वान्तर्यामी अजर अमर अभय नित्य पवित्र और सृष्टिकर्ता परमपिता परमात्मा को हमारा बारम्बार नमस्कार
📖 विद्या और अविद्या का समन्वय — यजुर्वेद का वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक संदेश
मन्त्र
ॐ अन्यदेवाहुर्विद्ययाऽन्यदाहुरविद्यया।इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे॥(यजुर्वेद ४०.१३ / ईशावास्योपनिषद् मन्त्र १३)
भावार्थ
विद्वान ऋषियों ने हमें बताया है कि विद्या का फल एक प्रकार का होता है और अविद्या का फल उससे भिन्न होता है। दोनों का क्षेत्र और उद्देश्य अलग-अलग हैं; इसलिए मनुष्य को दोनों का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करना चाहिए।
विद्या और अविद्या का वास्तविक अर्थ
इस मन्त्र में विद्या और अविद्या शब्दों का अर्थ केवल "पढ़ा-लिखा" और "अनपढ़" नहीं है।
महर्षि दयानन्द सरस्वती के अनुसार—
- विद्या वह है जिससे परमात्मा, आत्मा, प्रकृति, सत्य, धर्म और मोक्ष का यथार्थ ज्ञान प्राप्त हो।
- अविद्या यहाँ उन लौकिक विद्याओं और कर्मों का भी बोध कराती है जिनके द्वारा संसार का व्यवहार, विज्ञान, कृषि, चिकित्सा, उद्योग, शासन, तकनीक और जीवन-निर्वाह चलता है।
अर्थात् मनुष्य को केवल आध्यात्मिक ज्ञान ही नहीं, बल्कि जीवनोपयोगी लौकिक ज्ञान भी प्राप्त करना चाहिए।
अगले मन्त्र में इसका और स्पष्ट निर्देश
यजुर्वेद कहता है—
विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह।अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते॥(यजुर्वेद ४०.१४)
भावार्थ: जो मनुष्य विद्या और अविद्या—दोनों को साथ-साथ जानता है, वह अविद्या (लौकिक ज्ञान और कर्म) के द्वारा संसार के कष्टों पर विजय पाता है और विद्या (आत्मज्ञान) के द्वारा अमृत अर्थात् मोक्ष को प्राप्त करता है।
आज के समाज के लिए वेद का संदेश
आज संसार दो अतियों में बँटा दिखाई देता है—
- कुछ लोग केवल भौतिक उन्नति को ही जीवन का लक्ष्य मानते हैं।
- कुछ लोग केवल आध्यात्मिकता की बात करते हुए कर्म और विज्ञान की उपेक्षा करते हैं।
वेद इन दोनों अतियों का समर्थन नहीं करता। वह संतुलन सिखाता है।
यदि विज्ञान है, परन्तु नैतिकता नहीं, तो विज्ञान विनाश का कारण बन सकता है।
यदि आध्यात्मिकता है, परन्तु कर्म और कौशल नहीं, तो समाज का विकास रुक जाएगा।
इसलिए वेद कहता है—ज्ञान भी चाहिए, विज्ञान भी; धर्म भी चाहिए, कर्म भी।
वेदों का समन्वित जीवन-दर्शन
मनुष्य को चाहिए कि—
- 📖 वेद, उपनिषद् और शास्त्रों का अध्ययन करे।
- 🔬 विज्ञान, चिकित्सा, कृषि, तकनीक और आधुनिक शिक्षा में दक्ष बने।
- 🕉️ ईश्वर की उपासना करे।
- 🤝 समाज की सेवा करे।
- ⚖️ सत्य, न्याय और धर्म का पालन करे।
यही पूर्ण शिक्षा है।
निष्कर्ष
यजुर्वेद का यह मन्त्र मानवता को समन्वय का मार्ग दिखाता है। केवल आध्यात्मिक ज्ञान या केवल भौतिक ज्ञान—दोनों में से कोई भी अकेला पर्याप्त नहीं है। जीवन की पूर्णता तब है जब लौकिक ज्ञान से संसार का कल्याण और आध्यात्मिक ज्ञान से आत्मा का कल्याण हो।
वेद का संदेश है—
"विद्या आत्मा को ऊँचा उठाती है और अविद्या (लौकिक ज्ञान एवं कर्म) जीवन को समर्थ बनाती है। दोनों का संतुलित समन्वय ही पूर्ण मानव और श्रेष्ठ समाज का निर्माण करता है।"
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
💐भावार्थ :- ज्ञान आदि गुण से युक्त चेतन से जो उपयोग किया जा सकता है, वह अज्ञानयुक्त जड़ वस्तु से नहीं। और जो जड़ वस्तु से प्रयोजन सिद्ध होता है, वह चेतन से नहीं हो सकता। ऐसा सब मनुष्यों को विद्वानों के संग्, विज्ञान, योग और धर्माचरण से इन दोनों का विवेचन करके, जड़ और चेतन दोनों का ठीक- ठाक उपयोग करना चाहिए।

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