🚩‼️ओ३म्‼️🚩
🔥प्राण किसे कहते है ?
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हमारा शरीर जिस तत्व के कारण जीवित है उसका नाम प्राण है। प्राण जड वस्तु है। शरीर के सभी अंग प्राण से ही शक्ति पाकर अपने काम करते है। प्राण से ही भोजन का पाचन रस,रक्त ,मांस,मेद आदि धातुओं का निर्माण , व्यर्थ पदार्थों का बाहर निकलना,उठना ,बैठना ,चलना ,बोलना ,चिन्तन ,मनन ,ध्यान आदि सब स्थूल व सूक्ष्म क्रिया होती है।प्राण यदि बलवान है तो शरीर के सभी अंग ठीक से कार्य करते है और यदि निर्बल है तो शरीर रोगी हो जाता है। इसलिए शरीर को स्वस्थ रखने के लिए प्राण को शुद्ध खानपान ,प्रगाढ निद्रा ,ब्रह्मचर्य व प्राणायाम के द्वारा बलवान बनाना चाहिये ।
प्राण दश है।
प्राणोऽपानः समानश्च उदानो व्यान एव च।
नागः कूर्मः कृकरश्च देवदत्तो धनञ्जयः॥
१-प्राण- इसका स्थान नासिका से हृदय तक है। आंख ,नाक,कान मुख आदि इसी की सहायता से काम करते है।
२- अपान- इसका स्थान नाभि से पैर तक होता है। मल,मूत्र , प्रजनन आदि क्रिया इसकी सहायता से होती है।
३- समान- इसका स्थान हृदय से नाभि तक होता है।यह खाये अन्न को पचाने तथा उससे रस ,रक्त आदि धातु बनाने का कार्य करता है।
४- उदान- यह कण्ठ से सिर तक रहता है। बोलना,उल्टियाँ करना इसी के कारण होता है।
५- व्यान- यह सारे शरीर मे रहता है। हृदय से मुख्यत:१०१ नाडिया निकलती है उनकी अनेक शाखा है।सारे शरीर मे रक्त संचार का कार्य यही करता है।
६- नाग- यह कण्ठ से मुख तक रहता है।डकार ,हिचकी इसी से होती है।
७- कूर्म- इसका स्थान नेत्र गोलक है।गोलको को उपर नीचे दांये बांये यही घुमाता है।आंसू भी इसी से आते है।
८- कृकल- यह मुख से हृदय तक रहता है।भूख ,प्यास ,जंभाई इसी से उत्पन्न होती है।
९- देवदत्त- यह नासिका से कण्ठ तक होता है।इससे छींक , आलस्य , निद्रा आदि आती है।
१०- धनञ्जय- यह सारे शरीर मे व्यापक रहता है।इसका कार्य शरीर के अवयवों को खींचे रखना ,मांसपेशियो को सुंदर बनाना है।
यदि प्रश्न है "प्राण किसे कहते हैं?", तो पहले यह देखना होगा कि वेद और उपनिषद "प्राण" शब्द का प्रयोग किस अर्थ में करते हैं। केवल एक मंत्र से नहीं, अनेक प्रमाणों से अर्थ स्पष्ट होता है।
1. प्राण जीवन का आधार है
में कहा गया है—
प्राणो वा एष यः सर्वभूतैर्विभाति।
अर्थ: प्राण वही है जिसके कारण सभी प्राणी जीवित और प्रकाशित हैं।
2. प्राण से ही शरीर चलता है
(11.4) में प्राण की महिमा वर्णित है—
प्राणाय नमो यस्य सर्वमिदं वशे।
अर्थ: उस प्राण को नमस्कार है जिसके अधीन यह समस्त शरीर और जीवन-व्यवस्था है।
3. प्राण ईश्वर नहीं, पर ईश्वर द्वारा संचालित जीवनशक्ति है
(2.2.5)
न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन।इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ॥
अर्थ: मनुष्य केवल प्राण और अपान से जीवित नहीं रहता; वह उस परम सत्ता से जीवित रहता है जिसके आश्रय में प्राण और अपान भी कार्य करते हैं।
यह मंत्र बताता है कि प्राण अंतिम सत्ता नहीं है, बल्कि उसके पीछे भी एक परम आधार है।
4. प्राण केवल श्वास नहीं है
में प्राण को इन्द्रियों का अधिपति बताया गया है। जब प्राण शरीर से निकलता है, तब इन्द्रियाँ भी कार्य करना छोड़ देती हैं।
इससे स्पष्ट होता है कि प्राण केवल हवा का आना-जाना नहीं, बल्कि वह जीवन-शक्ति है जिसके कारण शरीर की समस्त क्रियाएँ चलती हैं।
वैदिक निष्कर्ष
इन प्रमाणों के आधार पर कहा जा सकता है कि—
प्राण वह जीवन-संचालक शक्ति है जिसके कारण शरीर, इन्द्रियाँ, मन और जैविक क्रियाएँ सक्रिय रहती हैं। श्वास उसका एक प्रमुख माध्यम है, स्वयं प्राण नहीं। प्राण भी परमात्मा के अधीन कार्य करता है।
अब यदि आप ऋग्वेद के आधार पर "प्राण" की अपनी शोध-व्याख्या विकसित करना चाहते हैं, तो हम केवल ऋग्वेद के मंत्रों को लेकर भी उसका क्रमिक अध्ययन कर सकते हैं। मुझे लगता है कि आपकी पद्धति के अनुसार वहाँ "प्राण" का विषय केवल श्वसन तक सीमित नहीं होगा, बल्कि चेतना, ऊर्जा और जीवन के व्यापक सिद्धांत से जुड़ा होगा।
🌷 ओ३म् को व: स्तोमं राधति यं जुषोषथ विश्वे देवासो मनुषो यतिष्ठन ।को वोऽध्वरं तुविजाता अरं करद्यो न: पर्षदत्यंह: स्वस्तये ( ऋग्वेद १०|६३|६ )
💐 अर्थ :- हे सब दिव्यगुण युक्त विद्वानों ! तुम जितने भी हो, उन सबकी स्तुति- उपासना जिसका तुम सेवन करते हो, प्रज्ञापति परमेश्वर सिद्ध करता रहता है। वहीं सुख स्वरूप परमात्मा तुम अनेक जन्म धारण करने वालों के हिंसा रहित यज्ञ को पूर्ण करता है, जो यज्ञ पाप को हटाकर हमारे लिए आनन्द की प्राप्ति कराता है ।
मैं इस मंत्र का शब्द-दर-शब्द व्याकरणिक अर्थ भी दूँगा और फिर वैज्ञानिक/दार्शनिक व्याख्या प्रस्तुत करूँगा। वैज्ञानिक व्याख्या में मैं यह स्पष्ट रखूँगा कि यह व्याख्यात्मक दृष्टि है, न कि शब्दकोश का अनिवार्य अर्थ।
मंत्र (ऋग्वेद 10.63.6)
ओ३म् को वः स्तोमं राधति यं जुषोषथ विश्वे देवासो मनुषो यतिष्ठन्।
को वोऽध्वरं तुविजाता अरं करद्यो नः पर्षदत्यंहः स्वस्तये॥
पद-पद अर्थ
- कः = कौन
- वः = तुम्हारा / तुम लोगों के लिए
- स्तोमम् = स्तुति, समन्वित ज्ञान, सुव्यवस्थित अभिव्यक्ति
- राधति = सिद्ध करता है, सफल बनाता है, पूर्ण करता है
- यम् = जिसे
- जुषोषथ = स्वीकार करते हो, प्रसन्न होकर ग्रहण करते हो
- विश्वे = समस्त
- देवासः = प्रकाशमान शक्तियाँ, दिव्य गुण, प्राकृतिक नियम
- मनुषः = मननशील मनुष्य
- यतिष्ठन् = प्रयत्न करता है, आगे बढ़ता है
दूसरा चरण—
- कः = कौन
- वः = तुम्हारे लिए
- अध्वरम् = अहिंसक यज्ञ, दोषरहित कर्म, सुव्यवस्थित प्रक्रिया
- तुविजाताः = महान सामर्थ्य वाले, प्रबल उत्पत्ति वाले
- अरम् = पर्याप्त, उपयुक्त, कल्याणकारी
- करत् = करता है
- यः = जो
- नः = हमें
- पर्षत् = पार कराए
- अंहः = संकट, पाप, संकीर्णता, बाधा
- स्वस्तये = कल्याण के लिए
वैज्ञानिक-दार्शनिक व्याख्या (आपकी शैली के निकट)
यदि इसे चेतना-विज्ञान और सार्वभौमिक नियमों की दृष्टि से पढ़ें, तो ऋषि प्रश्न कर रहे हैं—
कौन-सी ज्ञान-पद्धति (स्तोम) ऐसी है जिसे प्रकृति की समस्त शक्तियाँ (विश्वे देवाः) स्वीकार करती हैं और जिसके अनुसार चलकर मनुष्य अपने विकास की सर्वोच्च अवस्था तक पहुँच सकता है?
यहाँ—
- देव = प्रकृति के सार्वभौमिक नियम।
- मनुष = वह चेतन सत्ता जो उन नियमों को समझने का प्रयास करती है।
- स्तोम = केवल स्तुति नहीं, बल्कि ऐसा ज्ञान-संयोजन जो प्रकृति के नियमों के अनुरूप हो।
दूसरे भाग में ऋषि पूछते हैं—
कौन-सी वैज्ञानिक, नैतिक और आध्यात्मिक प्रक्रिया (अध्वर) मनुष्य को ऐसी सामर्थ्य प्रदान करती है कि वह अज्ञान, दुःख, भय और अव्यवस्था (अंहः) को पार करके स्वस्ति (समग्र कल्याण और संतुलन) को प्राप्त करे?
आधुनिक दृष्टांत
यदि आपकी शैली में उदाहरण दिया जाए, तो इस मंत्र का सिद्धांत ऐसा हो सकता है—
जिस प्रकार कोई वैज्ञानिक सिद्धांत तभी मान्य होता है जब वह प्रकृति के सभी नियमों के साथ सामंजस्य रखता हो, उसी प्रकार ऋषि पूछ रहे हैं कि वह कौन-सा सार्वभौमिक ज्ञान है जिसे प्रकृति स्वयं स्वीकार करती है और जो मनुष्य को सुरक्षित, संतुलित और कल्याणकारी जीवन की ओर ले जाता है।
एक टिप्पणी
आपकी व्याख्या-पद्धति के अनुसार सम्भव है कि इस मंत्र का वास्तविक विषय पूरा सूक्त (ऋग्वेद 10.63) पढ़ने पर अधिक स्पष्ट हो। जैसा आपने पहले कहा था, सूक्त का केंद्रीय विषय मिल जाने पर प्रत्येक मंत्र उसी का सहयोगी बन जाता है। इसलिए इस एक मंत्र की अंतिम वैज्ञानिक व्याख्या करने से पहले मैं पूरे सूक्त का केंद्रीय विषय देखना उचित मानूँगा। तब इस मंत्र के शब्द भी उसी सूत्र में अधिक स्वाभाविक रूप से बैठेंगे।
क: कौन है व: वह जो तुमसे अलग रहकर स्तोमम् तुम्हारे ज्ञान और समझ को निर्देशित करता है और राधति और उस विचार या समझ सिद्धांत को सिद्ध करने का सामर्थ्य रखता है, यम निश्चित हि वह यम मृत्यु का देवता जो भौतिक सत्ता पर एकाधिकार करती है इसलिए तुम उससे जुषोषथ विशेष सूक्ष्म रूप से जूडे हो क्योंकि विश्वे समस्त विश्व ब्रह्माण्ड में देवास: जड़ प्राकृतिक शक्तियों पर एकाधिकार उसी का है, मनुष: मनुष्यों पर भी उसी का एकाधिकार है यतिष्ठन् यत्न पुरुषार्थ परिश्रम से उसपर अपना ध्यान केंद्रित करे।
क: कौन है व: वह जो तुमसे अलग है, जो अध्वरम् सुव्यवस्थित जगत का संचालन निरंतर गतिशील रखता है, तुविजाता: तुम उसको विज्ञान का जन्मदाता जानो क्योंकि वह अरम् अर्थात वह सिथिल स्थित जड़ नहीं कर्म पुरुषार्थ की गति है कर्म करने वाला चेतन करत् है य: यह जब न: हम सब जानते हैं तो हम पर्षत भौतिक विज्ञान से परे अहं: चेतना का स्वयं का अहंकार का भान बोध है उससे हम सावधान रहकर स्वस्तये कल्याण करें।

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