🚩‼️ओ३म्‼️🚩
🔥आध्यात्मिक प्रगति में उत्पन्न होने वाली बाधाएं और उनके उपाय!
इन ९ विघ्न के साथ-साथ अन्य पाँच विघ्नों को भी याद रखना चाहिए। जो इस प्रकार है:-
(१) दुःख:- जो इंद्रिय को बुरा लगे वह
(2) दौर्मनस्य:- इच्छा की पूर्ति न होने पर जो मन में क्षोभ उत्पान होता है।
(३) अगों का कापना:- शरीर के अंगों मे कम्पन होना।
(४) श्वास:- बिना इच्छा के बाहर की वायु का भीतर प्रवेश कर जाना अर्थात बाहरी कुम्भक में बाधा उत्पन्न होना।
(५) प्रश्वास:- बिना इच्छा के भीतर की वायु का बाहर आना अर्थात भीतरी कुम्भक में बाधा उत्पन्न होना।
ये पांचों बाधाए चित्त में ही होती हैं। प्रत्येक मनुष्य को यह अवश्य जानना चाहिए कि बाधाओं को दूर करने का महान उपाय अभ्यास , वैराग्य, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान तो है ही, साथ मे अन्य उपाय भी है जो इस प्रकार है
एकतत्वाभ्यास:- भाव यह है कि किसी एक वस्तु पर चित्त को बार - बार स्थित करने का प्रयत्न करने से भी एकाग्रता उत्पन्न होकर बाधाओं का नाश हो जाता है।
चार भावनाएँ:- अर्थात सुखी मनुष्यों में मित्रता की भावना।,दुःखी मनुष्यों में दया की भावना।,पुण्यात्मा मनुष्यो में प्रसन्नता की भावना। तथा पापियों मे उपेक्षा की भावना करने से चित्त के राग, द्वेष, घृणा, ईर्ष्या और क्रोध आदि मलो(दोषों) का नाश होकर चित्त शुद्ध-निर्मल हो जाता है।
प्राणायाम:- बारम्बार प्राण वायु को शरीर से बाहर निकालने का तथा यथाशक्ति बाहर रोके रखने का अभ्यास करने से मन में निर्मलता आती है तथा शरीर की नाड़ीयों का भी मल नष्ट होता है।
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🚩‼️आज का वेद मंत्र‼️🚩
ओ३म् धृताहवन सन्त्येमा उ षु श्रुधी गिर:। याभि: कण्वस्य सुनवो हवन्तेंऽवसें त्वा॥ ( ऋग्वेद १|४५|५ )
💐अर्थ :- जो मनुष्य माता, पिता व आचार्य से उत्तम् शिक्षा ग्रहण कर उन्हें अपने जीवन में अपनाते है, वे सदैव सफल होते है।
जैसा की पिछले मंत्र में ऋषि ने शुक्र शोचिषे शुक्र विर्य ब्रह्मचर्य कि विचारधारा को मजबुती से रखा था, उसी विषय को यहां आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि घृतहवन साधारणत: घृत का उपयोग हवन में करके यज्ञाग्नी के माध्यम से हवन सामग्री जड़ी बूटियों को रूपांतरित करके वायुमंडल को शुद्ध और पवित्र करना है, जो आज के समय में हर मनुष्य के लिए संभव नहीं है, क्योंकि पहले शुद्ध घी तो लोगो को खाने के लिए नहीं मील रहा है, दूसरी बात घृत जो मील रहा है उसमे मिलावट हो रही है या फिर रासायनिक रूप से तैयार देशी घृत मिलता है, वह भी काफी महंगा है साधारण आदमी की जेब उसका भार उठाने में असमर्थ हैं, और जिनके पास पर्याप्त धन है उन्हें घृत और हवन में कोई खास रूचि नहीं है, इसलिए यह भौतिक यज्ञ करना भी बहुत कठिन कार्य है, तीसरी बात इसका वैज्ञानिक उपयोग हो सकता है जैसे डीजल पेट्रोल इत्यादि उसकी भी भारी किल्लत हमारे समाज में है, और इनकी भी एक सीमा है, इसलिए गाड़ी से मंहगा तेल का खर्चा पड़ता है,यहां ऋषि का भाव ब्रह्मचर्य विर्य रक्षा ही है, क्योंकि यह सार्वभौमिक सत्य है क्योंकि यह परम शांति को उपलब्ध करने महान श्रोत है, इसलिए कहते हैं सन्तयेमा शांति को धारण करने वाला ही सन्त होता है, सन्त की पहचान ही है कि वह शांति में स्थित है, इसलिए वह सन्त है, ऐसे ही सन्त पुरुष जो परम ब्रह्मचर्य को सिद्ध करृ लिए है, उनकी उ उर्धगति होती है, वह शरीर में रहते हुए शरीर के भार से सर्वथा मुक्त होते हैं इसलिए वह षु परमात्मा कि अनुभूति करने में समर्थ होते है, वह ऋषि है, जो श्रुधि श्रुति के भावार्थ को अपनी हृदय की गुहा सुनने में समर्थ होते हैं, याभी ऐसा ही कण्वस्य कण्व के साथ हुआ था या कण्व ऋषि ने इसी विधि से परम शांत आनंददायक इश्वर का साक्षात्कार किया और श्रुतियों मंत्रों के शब्दों को देखा शब्द ब्रह्म रूप में, सूनवो हवन्तेऽवसे त्वा तुम भी इसी विधि से परम स्थिर शांति और ईश्वर से मंत्रार्थ भावार्थ प्राप्त करो।
