जनमेजय उवाच। 1-70-1x ययातिः पूर्वजोऽस्माकं दशमो यः प्रजापतेः। कथं स शुक्रतनयां लेभे परमदुर्लभाम्।। 1-70-1a एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण तपोधन। आनुपूर्व्या च मे शंस राज्ञो वंशकरान्पृथक्।। 1-70-2a
- हिन्दी अनुवाद: राजा जनमेजय ने पूछा— हे तपोधन! प्रजापति से दसवें स्थान पर उत्पन्न हमारे पूर्वज ययाति ने शुक्राचार्य की परम दुर्लभ पुत्री (देवयानी) को किस प्रकार प्राप्त किया? मैं यह सब विस्तार से सुनना चाहता हूँ। इसके अतिरिक्त राजाओं के वंश को बढ़ाने वालों का क्रमपूर्वक अलग-अलग वर्णन कीजिए।
- व्याख्या: जनमेजय की इस जिज्ञासा से महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत अत्यंत प्रसिद्ध 'कच और देवयानी' तथा 'ययाति-देवयानी विवाह' का आख्यान आरंभ होता है।
वैशंपायन उवाच। 1-70-3x ययातिरासीन्नृपतिर्देवराजसमद्युतिः। तं शुक्रवृषपर्वाणौ वव्राते वै यथा पुरा।। 1-70-3a तत्तेऽहं संप्रवक्ष्यामि पृच्छते जनमेजय। देवयान्याश्च संयोगं ययातेर्नाहुषस्य च।। 1-70-4a
- हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी बोले— हे जनमेजय! देवराज इंद्र के समान कांति वाले नृपति ययाति हुए थे। शुक्राचार्य और असुरराज वृषपर्वण ने जैसे पहले उनका आदर किया था, वह सब तुम्हारे पूछने पर मैं देवयानी और नहुषनंदन ययाति के संयोग की कथा के साथ कहता हूँ।
- व्याख्या: ययाति और देवयानी के मिलन की पृष्ठभूमि देवताओं और असुरों के संघर्ष तथा महर्षि अंगिरा एवं उशनस् (शुक्राचार्य) की पुरोहिती से जुड़ी हुई है।
सुराणामसुराणां च समजायत वै मिथः। ऐश्वर्यं प्रति संघर्षस्त्रैलोक्ये सचराचरे।। 1-70-5a जिगीषया ततो देवा वव्रिरेऽङ्गिरसं मुनिम्। पौरोहित्येन याज्यार्थे काव्यं तूशनसं परे।। 1-70-6a
- हिन्दी अनुवाद: चराचर सहित तीनों लोकों में ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए देवताओं और असुरों में आपस में संघर्ष उत्पन्न हो गया। तब त्रैलोक्य को जीतने की इच्छा से देवताओं ने तो (बृहस्पति के पिता) अङ्गिरसा मुनि को अपना पुरोहित चुना और दूसरी ओर असुरों ने काव्य (शुक्राचार्य) को अपना पुरोहित बनाया।
- व्याख्या: देवताओं और असुरों के युद्ध में दोनों पक्षों के अलग-अलग गुरु और पुरोहित थे—देवताओं के गुरु बृहस्पति (अंगिरस के वंशज) और असुरों के गुरु शुक्राचार्य (कवि/उशनस्) थे।
ब्राह्मणौ तावुभौ नित्यमन्योन्यस्पर्धिनौ भृशम्। तत्र देवा निजघ्नुर्यान्दानवान्युधि संगतान्।। 1-70-7a तान्पुनर्जीवयामास काव्यो विद्याबलाश्रयात्। ततस्ते पुनरुत्थाय योधयांचक्रिरे सुरान्।। 1-70-8a
- हिन्दी अनुवाद: वे दोनों ही ब्राह्मण नित्य अत्यंत परस्पर स्पर्धी (एक-दूसरे से होड़ लेने वाले) थे। युद्ध में देवता जिन दानवों को मार गिराते थे, उन्हें शुक्राचार्य अपनी 'संजीवनी विद्या' के बल पर पुनः जीवित कर देते थे। तब वे दानव पुनः उठकर देवताओं से युद्ध करने लगते थे।
- व्याख्या: शुक्राचार्य के पास मृतसंजीवनी विद्या थी, जिसके बल पर वे मरे हुए असुरों को बार-बार जीवित कर देते थे, जिससे देवता कभी असुरों को पूरी तरह पराजित नहीं कर पा रहे थे।
असुरास्तु निजघ्नुर्यान्सुरान्समरमूर्धनि। न तान्सञ्जीवयामास बृहस्पतिरुदारधीः।। 1-70-9a न हि वेद स तां विद्यां यां काव्योवेत्ति वीर्यवान्। सञ्जीविनीं ततो देवा विषादमगमन्परम्।। 1-70-10a
- हिन्दी अनुवाद: किंतु युद्ध के मैदान में असुर जिन देवताओं को मार डालते थे, उन्हें उदारबुद्धि बृहस्पति जीवित नहीं कर पाते थे; क्योंकि वे उस संजीवनी विद्या को नहीं जानते थे जिसे वीर शुक्राचार्य जानते थे। इस कारण देवता परम विषाद (दुख और चिंता) को प्राप्त हो गए।
- व्याख्या: संजीवनी विद्या के अभाव में देवता युद्ध में मरने वाले अपने सैनिकों और योद्धाओं को खो देते थे, जिससे उनकी स्थिति कमजोर होने लगी और वे चिंतित हो उठे।
ते तु देवा भयोद्विग्नाः काव्यादुशनसस्तदा। ऊचुः कचमुपागम्य ज्येष्ठं पुत्रं बृहस्पतेः।। 1-70-11a भजमानान्भजस्वास्मान्कुरु नः साह्यमुत्तमम्। या सा विद्या निवसति ब्राह्मणेऽमिततेजसि।। 1-70-12a शुक्रे तामाहर क्षिप्रं भागभाङ्गो भविष्यसि। वृषपर्वसमीपे हि शक्यो द्रष्टुं त्वया द्विजः।। 1-70-13a
- हिन्दी अनुवाद: तब शुक्राचार्य (उशनस्) से भयभीत और उद्विग्न हुए देवताओं ने बृहस्पति के ज्येष्ठ पुत्र कच के पास जाकर कहा— "आप हमारी शरण में आएँ और हमारी उत्तम सहायता करें। अमित तेजस्वी ब्राह्मण शुक्राचार्य के पास जो संजीवनी विद्या निवास करती है, आप उसे शीघ्र ही वहाँ से ले आइए, जिससे आप यज्ञ के हवियों के भागी (देवताओं के पूज्य) बनेंगे। वृषपर्व के समीप रहने वाले उन द्विज (शुक्राचार्य) के दर्शन आप ही कर सकते हैं।"
- व्याख्या: देवताओं ने बृहस्पति के पुत्र कच को यह गुप्त मिशन सौंपा कि वे किसी प्रकार शुक्राचार्य के पास जाकर वह मृतसंजीवनी विद्या सीखकर आएँ।
रक्षते दानवांस्तत्र न S रक्षत्यदानवान्। तमाराधयितुं शक्तो भवान्पूर्ववयाः कविम्।। 1-70-14a देवयानीं च दयितां सुतां तस्य महात्मनः। त्वमाराधयितुं शक्तो नान्यः कश्चन विद्यते।। 1-70-15a शीलदाक्षिण्यमाधुर्यैराचारेण दमेन च। देवयान्यां हि तुष्टायां विद्यां तां प्राप्स्यसि ध्रुवम्।। 1-70-16a
- हिन्दी अनुवाद: "वे (शुक्राचार्य) वहाँ दानवों की रक्षा करते हैं, अदानवों (देवताओं) की रक्षा नहीं करते। युवा होने के कारण आप ही उन कवि (शुक्राचार्य) की आराधना करने में समर्थ हैं। साथ ही, उन महात्मन की प्रिय पुत्री देवयानी को भी केवल आप ही प्रसन्न करने में समर्थ हैं, दूसरा कोई नहीं है। अपने अच्छे शील, दाक्षिण्य, माधुर्य, सदाचार और संयम (दम) से देवयानी को संतुष्ट कर लेने पर आप निश्चित ही उस विद्या को प्राप्त कर लेंगे।"
- व्याख्या: देवताओं ने कच को समझाया कि चूँकि शुक्राचार्य असुरों के यहाँ रहते हैं, इसलिए उनकी पुत्री देवयानी को अपने आचरण से प्रसन्न करके ही वह संजीवनी विद्या प्राप्त की जा सकती है।
वैशंपायन उवाच। 1-70-17x तथेत्युक्त्वा ततः प्रायाद्बृहस्पतिसुतः कचः। तदाऽभिपूजितो देवैः समीपे वृषपर्वणः।। 1-70-17a स गत्वा त्वरितो राजन्देवैः संप्रेषितः कचः। असुरेन्द्रपुरे शुक्रं दृष्ट्वा वाक्यमुवाच ह।। 1-70-18a ऋषेरङ्गिरसः पौत्रं पुत्रं साक्षाद्बृहस्पतेः। नाम्ना कच इति ख्यातं शिष्यं गृह्णात् मां भवान्।। 1-70-19a ब्रह्मचर्यं चरिष्यामि त्वय्यहं परमं गुरौ। अनुमन्यस्व मां ब्रह्मन्सहस्रं परिवत्सरान्।। 1-70-20a
- हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी बोले— देवताओं द्वारा सम्मानित होकर बृहस्पति के पुत्र कच ने 'बहुत अच्छा' कहकर असुरराज वृषपर्वण के निवास के समीप प्रस्थान किया। हे राजन्! देवताओं द्वारा भेजे गए कच वहाँ तुरंत गए और असुरेंद्र के नगर में शुक्राचार्य को देखकर उन्होंने यह वचन कहा— "मैं महर्षि अंगिरा का पौत्र और साक्षात् बृहस्पति का पुत्र हूँ, जो 'कच' नाम से विख्यात है। आप मुझे अपना शिष्य स्वीकार कीजिए। हे ब्रह्मन्! मैं आपके पास रहकर परम ब्रह्मचर्य का पालन करूँगा। आप सहस्रों वर्षों (तक शिष्य के रूप में) मेरी अनुमति दें।"
- व्याख्या: कच ने पूरी विनम्रता के साथ असुरों के नगर में जाकर शुक्राचार्य से अपने कुल का परिचय दिया और उनकी शरण में रहकर ब्रह्मचर्यपूर्वक विद्या सीखने की इच्छा व्यक्त की।
शुक्र उवाच। 1-70-21x कच सुस्वागतं तेऽस्तु प्रतिगृहّणामि ते वचः। अर्चयिष्येऽहमर्च्यं त्वामर्चितोऽस्तु बृहस्पतिः।। 1-70-21a
- हिन्दी अनुवाद: शुक्राचार्य ने कहा— हे कच! तुम्हारा सुस्वागत है। मैं तुम्हारे इस वचन (शिष्य बनने के प्रस्ताव) को स्वीकार करता हूँ। मैं पूजनीय तुम्हारा सत्कार करूँगा (जिससे) बृहस्पति भी पूजित समझे जाएँगे।
- व्याख्या: शुक्राचार्य ने बृहस्पति के पुत्र कच को सहर्ष अपना शिष्य स्वीकार कर लिया, क्योंकि वे विद्वान और योग्य अतिथि के रूप में आए थे।
वैशंपायन उवाच। 1-70-22x कचस्तु तं तथेत्युक्त्वा प्रतिजग्राह तद्व्रतम्। आदिष्टं कविपुत्रेण शुक्रेणोशनसा स्वयम्।। 1-70-22a व्रतस्य प्राप्तकालं स यथोक्तं प्रत्यगृह्णत। आराधयन्नुपाध्यायं देवयानीं च भारत।। 1-70-23a
- हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी बोले— 'बहुत अच्छा' कहकर कच ने कविपुत्र शुक्राचार्य द्वारा बताए गए उस ब्रह्मव्रत को ग्रहण किया। हे भारत! व्रत के समय के अनुसार उन्होंने यथोचित नियमों का पालन किया और अपने गुरु (उपाध्याय) तथा देवयानी की आराधना (सेवा) करने लगे।
- व्याख्या: कच ने पूरी निष्ठा के साथ गुरु शुक्राचार्य की सेवा और देवयानी को प्रसन्न करने का कार्य शुरू किया, ताकि वे अपना लक्ष्य पूरा कर सकें।
नित्यमाराधयिष्यंस्तां युवा यौवनगां मुनिः। गायन्नृत्यन्वादयंश्च देवयानीमतोषयत।। 1-70-24a स शीलयन्देवयानीं कन्यां संप्राप्तयौवनाम्। पुष्पैः फलैः प्रेषणैश्च तोषयामास भारत।। 1-70-25a
- हिन्दी अनुवाद: युवावस्था में प्रवेश कर चुकी उन कन्या देवयानी को नित्य प्रसन्न करने की इच्छा से वह मुनि (कच) गाकर, नाचकर और वाद्य यंत्र बजाकर उन्हें संतुष्ट करते थे। हे भारत! यौवन को प्राप्त हुई उन कन्या देवयानी के स्वभाव के अनुकूल रहकर कच पुष्प, फल और उनकी सेवा-सुश्रूषा (प्रेषण) द्वारा उन्हें हमेशा प्रसन्न रखते थे।
- व्याख्या: कच ने देवयानी का मन मोहने के लिए संगीत, नृत्य और उनकी हर सेवा का पूरा ध्यान रखा, जिससे देवयानी उन पर अत्यधिक स्नेह रखने लगीं।
देवयान्यपि तं विप्रं नियमव्रतधारिणम्। गायन्ती च ललन्ती च रहः पर्यचरत्तथा।। 1-70-26a `गायन्तं चैव शुल्कं च दातारं प्रियवादिनम्। नार्यो नरं कामयन्ते रूपिणं स्रग्विणं तथा।।' 1-70-27a
- हिन्दी अनुवाद: नियम और व्रत धारण करने वाले उन ब्राह्मण कुमार (कच) की देवयानी भी गाती-ललनाती हुई एकांत में सेवा करती थीं। (कहा भी गया है कि)— गा गाने वाले, शुल्क (उपहार या यश) देने वाले, प्रिय बोलने वाले, सुंदर रूप वाले तथा माला धारण करने वाले पुरुष को नारियाँ अत्यंत प्यार करती हैं।
- व्याख्या: इन श्लोकों में कच के आकर्षक व्यक्तित्व और देवयानी के साथ उनके आत्मीय संबंधों का वर्णन है, जो धीरे-धीरे प्रेम में बदल रहे थे।
पञ्चवर्षशतान्येवं कचस्य चरतो व्रतम्। तत्रातीयुरथो बुद्ध्वा दानवास्तं ततः कचम्।। 1-70-28a गा रक्षन्तं वने दृष्ट्वा रहस्येकममर्षिताः। जघ्नुर्बृहस्पतेर्द्वेषाद्विद्यारक्षार्थमेव च।। 1-70-29a हत्वा शालावृकेभ्यश्च प्रायच्छँल्लवशः कृतम्। ततो गावो निवृत्तास्ता अगोपाः स्वं निवेशनम्।। 1-70-30a
- हिन्दी अनुवाद: इस प्रकार कच को व्रत का पालन करते हुए पाँच सौ वर्ष बीत गए। तब कच को वन में अकेले गायों की रक्षा करते हुए देखकर क्रोधी दानवों ने जान लिया (कि यह बृहस्पति का पुत्र है)। बृहस्पति के प्रति द्वेष और अपनी संजीवनी विद्या की रक्षा के लिए उन दानवों ने कच को मार डाला। उन्होंने कच की हत्या करके उनके शरीर के टुकड़े-टुकड़े करके जंगली कुत्तों और भेड़ियों (शालावृकों) को खाने के लिए फेंक दिया। इसके बाद बिना ग्वालों के ही वे गाएँ वापस अपने घर लौट आईं।
- व्याख्या: जब असुरों को पता चला कि कच संजीवनी विद्या सीखने आया है, तो उन्होंने द्वेषवश उसे मारकर उसके टुकड़े कर दिए, ताकि वह विद्या सीख न सके।
सा दृष्ट्वा रहिता गाश्च कचेनाभ्यागता वनात्। उवाच वचनं काले देवयान्यथ भारत।। 1-70-31a देवयान्युवाच। 1-70-32x आहुतं चाग्निहोत्रं ते सूर्यश्चास्तं गतः प्रभो। अगोपाश्चागता गावः कचस्तात न दृश्यते।। 1-70-32a व्यक्तं हतो मृतो वापि कचस्तात भविष्यति। तं विना न च जीवेयमिति सत्यं ब्रवीमि ते।। 1-70-33a
- हिन्दी अनुवाद: हे भारत! वन से बिना कच के अकेली लौटी गायों को देखकर देवयानी ने उचित समय पर अपने पिता (शुक्राचार्य) से यह वचन कहा— "हे तात! अग्निहोत्र की आहुति का समय हो गया है, सूर्य भी अस्त हो चुके हैं और ग्वालों के बिना ही गाएँ लौट आई हैं, किंतु कच कहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं। हे तात! स्पष्ट है कि कच या तो मार डाले गए हैं या उनकी मृत्यु हो चुकी है। मैं उनके बिना जीवित नहीं रहूँगी, यह मैं आपसे सत्य कहती हूँ।"
- व्याख्या: कच के न लौटने पर देवयानी अत्यंत व्याकुल हो उठीं और अपने पिता से साफ कह दिया कि यदि कच जीवित नहीं लौटे, तो वे भी प्राण त्याग देंगी।
शुक्र उवाच। 1-70-34x अयमेहीति संशब्द्य मृतं संजीवयाम्यहम्। 1-70-34a वैशंपायन उवाच। 1-70-34x ततः संजीविनीं विद्यां प्रयुज्य कचमाह्वयत्।। 1-70-34b भित्त्वा भित्त्वा शरीराणि वृकाणां स विनिर्गतः। आहूतः प्रादुरभवत्कचो हृष्टोऽथ विद्यया।। 1-70-35a
- हिन्दी अनुवाद: शुक्राचार्य ने कहा— "वह आ रहा है— ऐसा कहकर मैं अभी मरे हुए को जीवित किए देता हूँ।" वैशंपायन जी बोले— तब शुक्राचार्य ने 'संजीवनी विद्या' का प्रयोग करके कच को पुकारा। कच ने पुकारे जाने पर भेड़ियों और कुत्तों के शरीर को अंदर से चीर-फाड़कर बाहर निकल आए। विद्या के प्रभाव से बुलाए जाने पर वे जीवित होकर हर्षित हुए वहाँ प्रकट हो गए।
- व्याख्या: शुक्राचार्य ने अपनी मृतसंजीवनी विद्या के बल पर कच को पुनर्जीवित कर दिया, जिससे कच पशुओं के शरीर को चीरकर सुरक्षित बाहर आ गए।
कस्माच्चिरायितोऽसीति पृष्टस्तामाह भार्गवीम्। 1-70-36a कच उवाच। 1-70-36x समिधश्च कुशादीनि काष्ठभारं च भामिनि।। 1-70-36b गृहीत्वा श्रमभारार्तो वटवृक्षं समाश्रितः। गावश्च सहिताः सर्वा वृक्षच्छायामुपाश्रिताः।। 1-70-37a असुरास्तत्र मां दृष्ट्वा कस्त्वमित्यभ्यचोदयन्। बृहस्पतिसुतश्चाहं कच इत्यभिविश्रुतः।। 1-70-38a इत्युक्तमात्रे मां हत्वा पेषीकृत्वा तु दानवाः। दत्त्वा शालावृकेभ्यस्तु सुखं जग्मुः स्वमालयं।। 1-70-39a आहूतो विद्यया भद्रे भार्गवेण महात्मना। त्वत्समीपमिहायातः कथंचित्प्राप्तजीवितः।। 1-70-40a
- हिन्दी अनुवाद: "तुम इतनी देर से क्यों आए हो?"— भृगुपुत्री (देवयानी) के ऐसा पूछने पर कच ने उनसे यह सब कहा— "हे भामिनी! मैं समिधा, कुशा और लकड़ियों का भारी गट्ठर लेकर थकान और बोझ से पीड़ित एक वटवृक्ष के पास गया था, और सभी गाएँ भी वृक्ष की छाया में बैठी थीं। वहाँ असुरों ने मुझे देखकर पूछा कि 'तू कौन है?' मैंने कहा— 'मैं बृहस्पति का पुत्र कच के नाम से विख्यात हूँ।' इतना सुनते ही दानवों ने मुझे काटकर मेरे टुकड़े-टुकड़े कर दिए और उन्हें भेड़ियों को खिलाकर अपने घर चले गए। हे भद्रे! महात्मा भृगुपुत्र (आपके पिता) की विद्या द्वारा बुलाए जाने पर मैं किसी प्रकार जीवन प्राप्त करके आपके समीप आया हूँ।"
- व्याख्या: कच ने देवयानी को अपनी हत्या और पुनर्जीवन का पूरा सच बता दिया कि कैसे असुरों ने उन्हें मारकर कुत्तों-भेड़ियों को खिला दिया था और शुक्राचार्य ने उन्हें जीवित किया।
हतोऽहमिति चाचख्यौ पृष्टो ब्राह्मणकन्यया। स पुनर्देवयान्योक्तः पुष्पाण्याहर मे द्विज।। 1-70-41a वनं ययौ कचो विप्रो ददृशुर्दानवाश्च तम्। पुनस्तं पेषयित्वा तु समुद्राम्भस्यमिश्रयन्।। 1-70-42a
- हिन्दी अनुवाद: ब्राह्मणकन्या (देवयानी) द्वारा पूछे जाने पर कच ने उन्हें बता दिया कि "मैं मारा गया था।" इसके बाद देवयानी के फिर से कहने पर— "हे द्विज! मेरे लिए फूल लेकर आओ"— कच विप्र दोबारा वन में गए। दानवों ने उन्हें फिर देख लिया और इस बार उन्हें पीसकर समुद्र के जल में मिला दिया।
- व्याख्या: असुरों को जब पता चला कि शुक्राचार्य ने कच को जीवित कर दिया है, तो उन्होंने इस बार अधिक सतर्कता बरतते हुए कच को मारकर उनके शरीर का चूरा बनाकर समुद्र में घोल दिया, ताकि वे दोबारा जीवित न हो सकें।
चिरं गतं पुनः कन्या पित्रे तं संन्यवेदयत। विप्रेण पुनराहूतो विद्यया गुरुदेहजः। पुनरावृत्य तद्वृत्तं न्यवेदयत तद्यथा।। 1-70-43a ततस्तृतीयं हत्वा तं दग्ध्वा कृत्वा च चूर्णशः। प्रायच्छन्ब्राह्मणायैव सुरायामसुरास्तथा।। 1-70-44a `अपिबत्सुरया सार्धं कचभस्म भृगूद्वहः। सा सायन्तनवेलायामगोपा गाः समागताः।। 1-70-45a
- हिन्दी अनुवाद: कच के बहुत देर तक न लौटने पर कन्या (देवयानी) ने फिर से अपने पिता से उनकी बात कही। गुरु (शुक्राचार्य) ने अपनी विद्या से पुनः पुकार कर उन्हें बुला लिया और कच ने लौटकर वह सारा वृत्तांत ज्यों का त्यों कह सुनाया। इसके बाद, दानवों ने उन्हें तीसरी बार मारकर, जलाकर और चूर्ण-चूर्ण करके मदिरा (सुरा) में मिलाकर भृगुवंशी शुक्राचार्य को ही पीने के लिए दे दिया। असुरों के साथ मदिरा के साथ कच का वह भस्म गुरु शुक्राचार्य ने पी लिया। संध्या के समय ग्वालों के बिना ही गाएँ वापस लौट आईं।
- व्याख्या: असुरों ने इस बार एक नई चाल चली और कच के भस्म को सुरा (मदिरा) में मिलाकर शुक्राचार्य को ही पिला दिया, ताकि कच उनके पेट के भीतर चला जाए और बाहर न निकल सके।
देवयानी शङ्कमाना दृष्ट्वा पितरमब्रवीत्।' पुष्पाहारः प्रेषणकृत्कचस्तात न दृश्यते।। 1-70-46a व्यक्तं हतो मृतो वापि कचस्तात भविष्यति। तं विना न च जीवेयं कचं सत्यं ब्रवीमि ते।। 1-70-47a `वैशंपायन उवाच। 1-70-48x श्रुत्वा पुत्रीवचः काव्यो मन्त्रेणाहूतवान्कचम्। ज्ञात्वा बहिष्ठमज्ञात्वा स्वकुक्षिस्थं कचं नृप'।। 1-70-48a
- हिन्दी अनुवाद: आशंका से ग्रस्त देवयानी ने पिता को देखकर कहा— "फूल लाने और सेवा करने वाले कच हे तात! कहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं। स्पष्ट है कि कच या तो मारे गए हैं या उनकी मृत्यु हो चुकी है। मैं उनके बिना जीवित नहीं रहूँगी, यह मैं आपसे सत्य कहती हूँ।" वैशंपायन जी बोले— पुत्री के ऐसे वचन सुनकर काव्य (शुक्राचार्य) ने मंत्र से कच को पुकारा, किंतु यह न जानते हुए कि कच बाहर नहीं बल्कि उनके अपने पेट (कुक्षि) के भीतर हैं, उन्होंने मन्त्र का प्रयोग किया।
- व्याख्या: देवयानी के फिर से विलाप करने पर शुक्राचार्य ने संजीवनी मंत्र का प्रयोग किया, लेकिन इस बार कच उनके पेट के अंदर थे, जिससे स्थिति अत्यंत रोचक और संकटपूर्ण हो गई।
शुक्र उवाच। 1-70-49x बृहस्पतेः सुतः पुत्रि कचः प्रेतगतिं गतः। विद्यया जीवितोऽप्येवं हन्यते करवाम किम्।। 1-70-49a मैवं शुचो मा रुद देवयानि न त्वादृशी मर्त्यमनुप्रशोचते। यस्यास्तव ब्रह्म च ब्राह्मणाश्च सेन्द्रा देवा वसवोऽथाश्विनौ च।। 1-70-50a सुरद्विषश्चैव जगच्च सर्व- मुपस्थाने सन्नमन्ति प्रभावात्। अशक्योऽसौ जीवयितुं द्विजातिः संजीवितो वध्यते चैव भूयः।। 1-70-51a
- हिन्दी अनुवाद: शुक्राचार्य ने कहा— "हे पुत्री! बृहस्पति के पुत्र कच मृत्यु को प्राप्त हो गए हैं। विद्या द्वारा जीवित करने पर भी वे बार-बार मार डाले जाते हैं, अब हम क्या करें? हे देवयानी! इस प्रकार शोक मत करो और रोओ मत। तुम्हारे जैसी स्त्री किसी साधारण मनुष्य के लिए विलाप नहीं करती; क्योंकि तुम्हारे प्रभाव से तो ब्रह्म (वेदों के ज्ञाता), ब्राह्मण, इंद्र सहित देवता, वसुगण, अश्विनीकुमार, असुर और संपूर्ण संसार सेवा में नतमस्तक रहते हैं। वह द्विज (कच) अब जीवित करने योग्य नहीं है, क्योंकि जीवित किए जाने पर वह फिर मार डाला जाता है।"
- व्याख्या: जब शुक्राचार्य ने अपनी विद्या से कच को खोजना चाहा, तो कच पेट के अंदर से ही बोल पड़े, जिससे शुक्राचार्य को वास्तविकता का ज्ञान हुआ कि कच उनकी ही मदिरा पीने के कारण उनके उदर में स्थित हैं।
देवयान्युवाच। 1-70-52x यस्याङ्गिरा वृद्धतमः पितामहो बृहस्पतिश्चापि पिता तपोनिधिः। ऋषेः पुत्रं तमथो वापि पौत्रं कथं न शोचेयमहं न रुद्याम्।। 1-70-52a
- हिन्दी अनुवाद: देवयानी ने कहा— "जिनके वृद्धतम पितामह अंगिरा ऋषि हैं और तपोनिधि बृहस्पति जिनके पिता हैं, ऐसे महर्षि के पुत्र या पौत्र के लिए मैं क्यों न शोक करूँ और क्यों न रोऊँ?"
- व्याख्या: देवयानी कच के उच्च कुल और अपने अगाध प्रेम का हवाला देते हुए पिता शुक्राचार्य से कहती हैं कि वे हर हाल में कच को पुनः जीवित देखना चाहती हैं।
स ब्रह्मचारी च तपोधनश्च सदोत्थितः कर्मसु चैव दक्षः। कचस्य मार्गं प्रतिपत्स्ये न भोक्ष्ये प्रियो हि मे तात कचोऽभिरूपः।। 1-70-53a
- हिन्दी अनुवाद: देवयानी ने कहा— "वे ब्रह्मचारी हैं, तपोधन हैं, सदा कर्मों में तत्पर रहने वाले और चतुर हैं। मैं भी कच के ही मार्ग का अनुसरण करूँगी और अन्न-जल ग्रहण नहीं करूँगी (उपवास रखूँगी), क्योंकि हे तात! सुंदर रूप वाले कच मुझे अत्यंत प्रिय हैं।"
- व्याख्या: देवयानी अपने प्राण त्यागने तक की जिद पर अड़ जाती हैं, जिससे शुक्राचार्य धर्मसंकट में पड़ जाते हैं कि यदि कच को नहीं बचाया, तो पुत्री प्राण दे देगी और यदि बचाया, तो ब्रह्महत्या का पाप लगेगा।
शुक्र उवाच। 1-70-54x कं ब्रह्महत्या न दहेदपीन्द्रम्।। 1-70-54f `वैशंपायन उवाच। 1-70-55x संचोदितो देवयान्या महर्षिः पुनराह्वयत्। संरम्भेणैव काव्यो हि बृहस्पतिसुतं कचम्।। 1-70-55a कचोऽपि राजन्स महानुभावो विद्याबलाल्लब्धमतिर्महात्मा।' गुरोर्हि भीतो विद्यया चोपहूतः। शनैर्वाक्यं जठरे व्याजहार।। 1-70-56a
- हिन्दी अनुवाद: शुक्राचार्य ने कहा— "ब्रह्महत्या किसे नहीं जला देगी, यहाँ तक कि इंद्र को भी भस्म कर सकती है!" वैशंपायन जी बोले— देवयानी द्वारा बार-बार प्रेरित किए जाने पर महाज्ञानी काव्य (शुक्राचार्य) ने अत्यंत क्रोध और आवेश के साथ बृहस्पतिपुत्र कच को फिर से पुकारा। हे राजन्! महानुभाव और विद्या के बल से बुद्धि प्राप्त करने वाले महात्मा कच भी गुरु के भय से तथा विद्या द्वारा बुलाए जाने पर पेट के अंदर से ही धीरे-धीरे वचन बोले—
- व्याख्या: शुक्राचार्य ब्रह्महत्या के पाप से भयभीत थे, किंतु पुत्री के अड़ियल रवैये के कारण उन्हें आखिरकार कच को पेट के भीतर से ही पुनर्जीवित करने का मंत्र देना पड़ा।
`प्रसीद भगवन्मह्यं कचोऽहमभिवादये। यथा बहुमतः पुत्रस्तथा मन्यतु मां भवान्।।' 1-70-57a वैशंपायन उवाच। 1-70-58x तमब्रवीत्केन पथोपनीत- स्त्वं चोदरे तिष्ठसि ब्रूहि विप्र। अस्मिन्मुहूर्ते ह्यसुरान्विनाश्य गच्छामि देवानहमद्य विप्र।। 1-70-58a
- हिन्दी अनुवाद: "हे भगवन्! मुझ पर प्रसन्न होइए, मैं कच आपको प्रणाम करता हूँ। आप मुझे वैसे ही मानिए जैसे आपका अपना प्रिय पुत्र होता है।" वैशंपायन जी बोले— शुक्राचार्य ने उससे पूछा— "हे विप्र! तू किस मार्ग से आकर मेरे उदर में स्थित है? मुझे बता, क्योंकि मैं इसी मुहूर्त में असुरों का नाश करके आज ही देवताओं के पास चला जाऊँगा।"
- व्याख्या: कच ने उदर के भीतर से ही अत्यंत विनयपूर्वक गुरु शुक्राचार्य की वंदना की, जिस पर शुक्राचार्य ने पूछा कि वह इस स्थिति में कैसे पहुँचे।
कच उवाच। 1-70-59x तव प्रसादान्न जहाति मां स्मृतिः स्मरामि सर्वं यच्च यथा च वृत्तम्। नत्वेवं स्यात्तपसः संक्षयो मे ततः क्लेशं घोरमिमं सहामि।। 1-70-59a असुरैः सुरायां भवतोऽस्मि दत्तो हत्वा दग्ध्वा चूर्णयित्वा च काव्य। ब्राह्मीं मायां चासुरीं विप्र मायां त्वयि स्थिते कथमेवातिवर्तेत्।। 1-70-60a
- हिन्दी अनुवाद: कच ने कहा— "आपकी कृपा से मेरी स्मरणशक्ति नष्ट नहीं हुई है और जो कुछ जैसे-जैसे बीता है, मुझे सब याद है। यदि ऐसा (स्मृति का रहना) न होता, तो मेरे तप का क्षय हो जाता, इसीलिए मैंने इस घोर कष्ट को सहा है। हे काव्य! असुरों ने मुझे मारकर, जलाकर और चूर्ण करके आपकी मदिरा (सुरा) में मिलाकार आपको पिला दिया था। हे विप्र! जब आप स्वयं यहाँ (जीवित) हैं, तो ब्राह्मी माया और आसुरी माया कैसे जीत सकती है?"
- व्याख्या: कच ने अपनी असाधारण स्मरणशक्ति का परिचय देते हुए बताया कि कैसे वे पेट के अंदर भी तप और चेतना को बचाए रख सके, क्योंकि गुरु की कृपा उनके साथ थी।
शुक्र उवाच। 1-70-61x किं ते प्रियं करवाण्यद्य वत्से वधेन मे जीवितं स्यात्कचस्य। नान्यत्र कुक्षेर्मम भेदनेन दृश्येत्कचो मद्गतो देवयानि।। 1-70-61a देवयान्युवाच। 1-70-62x द्वौ मां शोकावग्निकल्पौ दहेतां कचस्य नाशस्तव चैवोपघातः। कचस्य नाशे मम शर्म नास्ति तवोपघाते जीवितुं नास्मि शक्ता।। 1-70-62a
- हिन्दी अनुवाद: शुक्राचार्य ने कहा— "हे वत्से! मैं आज तुम्हारा क्या प्रिय कार्य करूँ? कच के जीवित रहने के लिए तो मुझे ही अपने प्राणों का बलिदान देना होगा (क्योंकि मेरे पेट को चीरकर ही वह बाहर निकल सकता है); मेरे इस उदर को फाड़े बिना मेरे भीतर गया हुआ कच दिखाई नहीं दे सकता, हे देवयानी!" देवयानी ने कहा— "अग्नि के समान दो शोक मुझे जला रहे हैं— एक कच का नाश और दूसरा आपका उपघात (मृत्यु)। कच के नष्ट होने पर मुझे कोई सुख नहीं है और आपके मरने पर मैं भी जीवित रहने में समर्थ नहीं हूँ।"
- व्याख्या: यहाँ एक और धर्मसंकट उत्पन्न हो गया— कच को बाहर निकालने के लिए शुक्राचार्य के पेट को चीरना आवश्यक था, जिससे शुक्राचार्य की मृत्यु निश्चित थी। देवयानी दोनों को खोना नहीं चाहती थीं।
शुक्र उवाच। 1-70-63x संसिद्धरूपोऽसि बृहस्पतेः सुत यत्त्वां भक्तं भजते देवयानी। विद्यामिमां प्राप्नुहि जीवनीं त्वं न चेदिन्द्रः कचरूपी त्वमद्य।। 1-70-63a न निवर्तेत्पुनर्जीवन्कश्चिदन्यो ममोदरात्। ब्राह्मणं वर्जयित्वैकं तस्माद्विद्यामवाप्नुहि।। 1-70-64a पुत्रो भूत्वा भावय भावितो मा- मस्मद्देहादुपनिष्क्रम्य तात। समीक्षेथा धर्मवतीमवेक्षां गुरोः सकाशात्प्राप्य विद्यां सविद्यः।। 1-70-65a
- हिन्दी अनुवाद: शुक्राचार्य ने कहा— "हे बृहस्पति के पुत्र कच! तुम पूरी तरह सिद्ध हो चुके हो, क्योंकि देवयानी भक्त की तरह तुम्हारा भजन करती है। तुम इस संजीवनी विद्या को प्राप्त करो— बशर्ते तुम आज कच के रूप में छिपे हुए कोई इंद्र न हो। एकमात्र ब्राह्मण को छोड़कर मेरे उदर से पुनर्जीवित होकर दूसरा कोई बाहर नहीं लौट सकता, इसलिए तुम इस विद्या को प्राप्त कर लो। हे तात! मेरे शरीर से बाहर निकलकर मेरे पुत्र बनकर मेरा भरण-पोषण करना और गुरु के पास से इस विद्या को पाकर सविद्य (ज्ञानी) बनकर धर्मयुक्त दृष्टि से देखना।"
- व्याख्या: अंततः शुक्राचार्य ने कच को अपनी मृतसंजीवनी विद्या पूरी तरह सिखा दी और उन्हें अपना पुत्र मानकर अपने शरीर से बाहर निकलने का मार्ग प्रशस्त किया।
वैशंपायन उवाच। 1-70-66x गुरोः सकाशात्समवाप्य विद्यां भित्त्वा कुक्षिं निर्विचक्राम विप्रः। कचोऽभिरूपस्तत्क्षणाद्ब्राह्मणस्य शुक्लात्यये पौर्णमास्यामिवेन्दुः।। 1-70-66a
- हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी बोले— गुरु (शुक्राचार्य) के पास से संजीवनी विद्या प्राप्त करके सुंदर रूप वाले विप्र कच ने उनके उदर (पेट) को चीरकर बाहर प्रस्थान किया। वे ब्राह्मण (शुक्राचार्य) के शरीर से ऐसे बाहर निकले जैसे शुक्ल पक्ष के अंत में पौर्णमासी (पूर्णिमा) का चंद्रमा प्रकट होता है।
- व्याख्या: कच ने उदर चीरकर बाहर आते ही मृतसंजीवनी विद्या के बल पर अपने गुरु शुक्राचार्य को पुनः जीवित कर दिया, जिससे सभी की विपत्ति टल गई और कच का उद्देश्य पूरा हुआ।
दृष्ट्वा च तं पतितं ब्रह्मराशि- मुत्थापयामास मृतं कचोऽपि। विद्यां सिद्धां तामवाप्याभिवाद्य ततः कचस्तं गुरुमित्युवाच।। 1-70-67a
- हिन्दी अनुवाद: उदर को चीरकर बाहर निकलने के कारण पृथ्वी पर गिरे हुए ब्रह्मराशि (तेजस्वी गुरु शुक्राचार्य) को मृत देखकर कच ने भी अपनी प्राप्त सिद्ध विद्या (मृतसंजीवनी) का प्रयोग करके उन्हें तुरंत पुनर्जीवित कर दिया। उस विद्या को पूरी तरह पाकर और गुरु को प्रणाम करके कच ने अपने गुरु से यह कहा—
- व्याख्या: पेट चीरे जाने के कारण शुक्राचार्य की मृत्यु हो गई थी, किंतु कच ने कृतज्ञता प्रकट करते हुए तुरंत अपनी नई सीखी हुई संजीवनी विद्या से गुरु को जीवित कर दिया।
यः श्रोत्रयोरमृतं सन्निषिञ्चे- द्विद्यामविद्यस्य यथा त्वमार्यः। तं मन्येऽहं पितरं मातरं च तस्मै न द्रुह्येत्कृतमस्य जानन्।। 1-70-68a ऋतस्य दातारमनुत्तमस्य निधिं निधीनामपि लब्धविद्याः। ये नाद्रियन्ते गुरुमर्चनीयं पापाँल्लोकांस्ते व्रजन्त्यप्रतिष्ठाः।। 1-70-69a
- हिन्दी अनुवाद: "(कच ने कहा—) जो अज्ञानी के कानों में अमृत के समान (श्रेष्ठ) विद्या का सिंचन करता है, हे आर्य! मैं उसी को माता और पिता मानता हूँ। उपकार को जानने वाले मनुष्य को ऐसे गुरु से कभीद्रोह नहीं करना चाहिए। सत्य और उत्तम ज्ञान को देने वाले तथा सभी निधियों के भंडार रूप उन पूजनीय गुरु का जो लब्धविद्या (विद्या प्राप्त करने वाले) लोग आदर नहीं करते, वे प्रतिष्ठाहीन होकर पापी लोकों को प्राप्त होते हैं।"
- व्याख्या: कच ने गुरु शुक्राचार्य के प्रति अगाध श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा कि गुरु ही माता-पिता तुल्य हैं और विद्या पाकर गुरु का अनादर करने वाले का पतन निश्चित है।
वैशंपायन उवाच। 1-70-70x सुरापानाद्वञ्चनां प्राप्य विद्वा- न्संज्ञानाशं चैव महातिघोरम्। दृष्ट्वा कचं चापि तथाभिरूपं पीतं तदा सुरया मोहितेन।। 1-70-71a समन्युरुत्थाय महानुभाव- स्तदोशना विप्रहितं चिकीर्षुः। सुरापानं प्रति संजातमन्युः काव्यः स्वयं वाक्यमिदं जगाद।। 1-70-71a
- हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी बोले— मदिरा (सुरा) पीने के कारण हुई वंचना, संज्ञा का अतिघोर नाश तथा अपनी मति भ्रमित होने पर पेट में पिए गए कच को वैसे ही सुंदर रूप में जीवित खड़ा देखकर महानुभाव उशनस् (शुक्राचार्य) को अत्यंत क्रोध आया। ब्राह्मणों का हित करने की इच्छा वाले और मदिरापान पर भारी रोष से भरे हुए कवि (शुक्राचार्य) ने स्वयं यह घोषणा की—
- व्याख्या: शुक्राचार्य को जब ज्ञात हुआ कि असुरों ने उन्हें मदिरा में कच का भस्म मिलाकर धोखा दिया था और उनकी मति भ्रमित की थी, तो उन्होंने मदिरापान के विरुद्ध कड़ा नियम बनाने का निर्णय लिया।
यो ब्राह्मणोऽद्यप्रभृतीह कश्चि- न्मोहात्सुरां पास्यति मन्दबुद्धिः। अपेतधर्मा ब्र्हमहा चैव S स्या- दस्मिंल्लोके गर्हितः स्यात्परे च।। 1-70-72a मया चैतां विप्रधर्मोक्तिसीमां मर्यादां वै स्थापितां सर्वलोके। सन्तो विप्राः शुश्रुवांसो गुरूणां देवा लोकाश्चोपशृण्वन्तु सर्वे।। 1-70-73a
- हिन्दी अनुवाद: "जो कोई भी मन्दबुद्धि ब्राह्मण आज से लेकर भविष्य में मोहवश मदिरा (सुरा) पिएगा, वह धर्मभ्रष्ट, ब्रह्महत्या का पापी और इस लोक तथा परलोक दोनों में निंदित होगा। मैंने ब्राह्मण धर्म की इस मर्यादा की सीमा को समस्त लोकों में स्थापित कर दिया है। संत, ब्राह्मण, गुरुओं की सेवा करने वाले तथा सभी देवता और लोक इस बात को भली-भांति सुन लें।"
- व्याख्या: शुक्राचार्य ने भविष्य के लिए यह कड़ा नियम (शराबबंदी का शाप/नियम) बना दिया कि जो भी ब्राह्मण मदिरापान करेगा, उसे ब्रह्महत्या के पाप के समान दोषी माना जाएगा।
वैशंपायन उवाच। 1-70-74x इतीदमुक्त्वा स महानुभाव- स्तपोनिधीनां निधिरप्रमेयः। तान्दानवान्दैवविमूढबुद्धी- निदं समाहूय वचोऽभ्युवाच।। 1-70-74a आचक्षे वो दानवा बालिशाः स्थ सिद्धः कचो वत्स्यति मत्सकाशे। सञ्जीविनीं प्राप्य विद्यां महात्मा तुल्यप्रभावो ब्राह्मणो ब्रह्मभूतः।। 1-70-75a `योऽकार्षीद्दुष्करं कर्म देवानां कारणात्कचः। न तत्किर्तिर्जरां गच्छेद्याज्ञीयश्च भविष्यति।। 1-70-76a
- हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी बोले— ऐसा कहकर तपोनिधि और अप्रमेय प्रभाव वाले उन महानुभाव (शुक्राचार्य) ने दैवविमूढ (भाग्य के मारे) बुद्धि वाले उन दानवों को बुलाकर यह वचन कहा— "हे दानवों! मैं तुम्हें बताता हूँ कि तुम सब बड़े मूर्ख हो। कच अब सिद्ध होकर मेरे पास ही निवास करेगा। यह महात्मा कच संजीवनी विद्या प्राप्त करके मेरे समान ही प्रभाव वाला ब्रह्मभूत ब्राह्मण बन चुका है। देवताओं के कार्य के लिए कच ने जो दुष्कर (कठिन) कार्य किया है, उसकी कीर्ति कभी पुरानी (क्षीण) नहीं होगी और वह यज्ञों में पूजनीय होगा।"
- व्याख्या: शुक्राचार्य ने असुरों को स्पष्ट कर दिया कि उनके लाख प्रयासों के बावजूद कच ने संजीवनी विद्या प्राप्त कर ली है और अब वे पूरी तरह सुरक्षित और यशस्वी होकर उनके पास रहेंगे।
वैशंपायन उवाच।' 1-70-77x एतावदुक्त्वा वचनं विरराम स भार्गवः। दानवा विस्मयाविष्टाः प्रययुः स्वं निवेशनम्।। 1-70-77a गुरोरुष्य सकाशे तु दश वर्षशतानि सः। अनुज्ञातः कचो गन्तुमियेष त्रिदशालयम्।। 1-70-78a
- हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी बोले— इतना वचन कहकर भृगुपुत्र शुक्राचार्य शांत हो गए। दानव लोग विस्मय से चकित होकर अपने-अपने घर लौट गए। गुरु के पास एक हजार वर्ष तक निवास करने के बाद कच ने देवलोक (त्रिदशालय) जाने की अनुमति माँगी और जाने के लिए तत्पर हुए।
- व्याख्या: कच ने गुरु के पास अपने अध्ययन के हजार वर्ष पूरे किए और देवताओं का कार्य सफल करके वापस देवलोक लौटने की अनुमति प्राप्त की। इसके साथ ही महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत 70वाँ अध्याय संपन्न होता है।
संभवपर्वणि सप्ततितमोऽध्यायः।। 70 ।।
