श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि एकोनसप्ततितमोऽध्यायः

श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि एकोनसप्ततितमोऽध्यायः

जनमेजय उवाच। 1-69-1x त्वत्तः श्रुतमिदं ब्रह्मन्देवदानवरक्षसाम्। अंशावतरणं सम्यग्गन्धर्वाप्सरसां तथा।। 1-69-1a इमं तु भूय इच्छामि कुरूणां वंशमादितः। कथ्यमानं त्वया विप्र विप्रर्षिगणसन्निधौ।। 1-69-2a

  • हिन्दी अनुवाद: राजा जनमेजय ने पूछा— हे ब्रह्मन्! मैंने आपसे देवताओं, दानवों, राक्षसों तथा गंधर्वों और अप्सराओं का यह अंशावतरण भली-भांति सुन लिया है। अब मैं विप्रर्षियों के इस समूह के संनिधि में आप से कुरुवंश का आदिकाल से लेकर सारा वंशक्रम फिर से सुनना चाहता हूँ।
  • व्याख्या: महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत अब आगे कुरुवंश, यदुवंश और भरतवंश की विस्तृत वंशावली का आरंभ हो रहा है, जिसे जनमेजय की जिज्ञासा पर वैशंपायन मुनि सुना रहे हैं।

वैशंपायन उवाच। 1-69-3x धर्मार्थकामसहितं राजर्षीणां प्रकीर्तितम्। पवित्रं कीर्त्यमानं मे निबोधेदं मनीषिणाम्।। 1-69-3a प्रजापतेस्तु दक्षस्य मनोर्वैवस्वतस्य च। भरतस्य कुरोः पूरोराजमीढस्य चानघ।। 1-69-4a यादवानामिमं वंशं कौरवाणां च सर्वशः। तथैव भरतानां च पुण्यं स्वस्त्ययनं महत्।। 1-69-5a धन्यं यशस्यमायुष्यं कीर्तयिष्यामि तेऽनघ। तेजोभिरुदिताः सर्वे महर्षिसमतेजसः।। 1-69-6a

  • हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी बोले— हे अनघ (पापमुक्त जनमेजय)! धर्म, अर्थ और काम से युक्त तथा महर्षियों के समान तेजस्वी राजर्षियों के इस पवित्र एवं मंगलकारी वंश का वर्णन तुम ध्यानपूर्वक सुनो। मैं तुम्हारे लिए प्रजापति दक्ष, वैवस्वत मनु, भरत, कुरु, पूरु, राजमीढ तथा यादवों, कौरवों और भरतों के इस संपूर्ण पवित्र वंश का कीर्तन करूँगा, जो धन, यश और आयु को बढ़ाने वाला है।
  • व्याख्या: यह वंशावली मनुष्य को धर्म, अर्थ और काम का बोध कराने वाली तथा श्रवण करने मात्र से यश व आयु प्रदान करने वाली है।

दश प्राचेतसः पुत्राः सन्तः पुण्यजनाः स्मृताः। मुखजेनाग्निना यैस्ते पूर्वं दग्धा महौजसः।। 1-69-7a तेभ्यः प्राचेतसो जज्ञे दक्षो दक्षादिमाः प्रजाः। संभूताः पुरुषव्याघ्र स हि लोकपितामहः।। 1-69-8a वीरिण्या सह सङ्गम्य दक्षः प्राचेतसो मुनिः। आत्मतुल्यानजनयत्सहस्रं संशितव्रताान।। 1-69-9a

  • हिन्दी अनुवाद: प्राचीन काल में प्राचेतस (प्रचेतनों) के दस पुत्र हुए, जो पुण्यकर्मी माने गए हैं। महातेजस्वी प्रचेतनों के क्रोध रूपी मुखाग्नि से पूर्वकाल में वृक्ष जल गए थे (तब वे शांत हुए)। उन प्रचेतनों से ही दक्ष (प्राचेतस) का जन्म हुआ। हे पुरुषव्याघ्र! उन्हीं दक्ष से संपूर्ण प्रजाओं की उत्पत्ति हुई, क्योंकि वे ही लोकपितामह हैं। प्राचेतस मुनि दक्ष ने वीरिवणी के साथ समागम करके अपने ही समान व्रत का पालन करने वाले सहस्रों पुत्रों को उत्पन्न किया।
  • व्याख्या: सृष्टि के विस्तार क्रम में प्रजापति दक्ष का प्रसंग आता है, जिन्हें समस्त प्रजाओं का मूल पितामह माना गया है।

सहस्रसङ्ख्यानसंभूतान्दक्षपुत्रांश्च नारदः। मोक्षमध्यापयामास साङ्ख्यज्ञानमनुत्तमम्।। 1-69-10a ततः पञ्चाशतं कन्या पुत्रिका अभिसन्दधे। प्रजापतिः प्रजा दक्षः सिसृक्षुर्जनमेजय।। 1-69-11a ददौ दश s धर्माय कश्यपाय त्रयोदश। कालस्य नयने युक्ताः सप्तविंशतिमिन्दवे।। 1-69-12a

  • हिन्दी अनुवाद: हे जनमेजय! दक्ष के उत्पन्न हुए उन सहस्रों पुत्रों को देवर्षि नारद ने मोक्ष देने वाला उत्तम सांख्यज्ञान पढ़ाया (जिससे वे विरक्त हो गए)। इसके बाद प्रजा की सृष्टि करने की इच्छा वाले प्रजापति दक्ष ने पचास कन्याओं को अपनी पुत्रियों के रूप में स्वीकार किया। हे राजन्! उनमें से दस कन्याएँ उन्होंने धर्म को, तेरह कश्यप को और सत्ताईस नक्षत्र रूप में चंद्रमा को ब्याह दीं।
  • व्याख्या: दक्ष की पुत्रियों के विवाह से ही देवताओं, ऋषियों, गंधर्वों, नागों और समस्त चराचर जगत की जातियों का विस्तार हुआ, जिसमें कश्यप ऋषि की पत्नियों से देवताओं और दैत्यों का जन्म हुआ।

त्रयोदशानां पत्नीनां या तु दाक्षायणी वरा। मारीचः कश्यपस्त्वस्यामादित्यान्समजीजनत्।। 1-69-13a इन्द्रादीन्वीर्यसंपन्नान्विवस्वन्तमथापि च। विवस्वतः सुतो जज्ञे यमो वैवस्वतः प्रभुः।। 1-69-14a मार्तण्डस्य मनुर्धीमानजायत सुतः प्रभुः। धर्मात्मा स मनुर्धीमान्यत्र वंशः प्रतिष्ठितः।। 1-69-15a

  • हिन्दी अनुवाद: उन तेरह पत्नियों में जो श्रेष्ठ दाक्षायणी (अदिति) थीं, मरीचिपुत्र कश्यप ने उनके गर्भ से आदित्यों को उत्पन्न किया। उन आदित्यों में इंद्र आदि वीर तथा विववान् (सूर्य) भी उत्पन्न हुए। विवस्वान के पुत्र प्रभु वैवस्वत यम हुए और मार्तण्ड (सूर्य) के ही दूसरे धीमान् पुत्र प्रभु मनु हुए। वे हीर्मात्मा मनु थे, जिनसे यह मानव वंश प्रतिष्ठित हुआ।
  • व्याख्या: सूर्यदेव और अदिति के पुत्र वैवस्वत मनु से ही इस पृथ्वी पर मानवों और क्षत्रियों-ब्राह्मणों का मूल वंश आगे बढ़ा है।

मनोर्वंशो मानवानां ततोऽयं प्रथितोऽभवत्। ब्रह्मक्षत्रादयस्तस्मान्मनोर्जातास्तु मानवाः। ततोऽभवन्महाराज ब्रह्म क्षत्रेण सङ्गतम्।। 1-69-16a ब्राह्मणा मानवास्तेषां साङ्गं वेदमदारयन्। वेनं धृष्णुं नरिष्यन्तं नाभागेक्ष्वाकुमेव च।। 1-69-17a कारूषमथ शर्यातिं तथा चैवाष्टमीमिलाम्। पृष्टध्रं नवमं प्राहुः क्षत्रधर्मपरायणम्।। 1-69-18a नाभागारिष्टदशमान्मनोः पुत्रान्प्रचक्षते। पञ्चाशत्तु मनोः पुत्रास्तथैवान्येऽभवन्क्षितौ।। 1-69-19a

  • हिन्दी अनुवाद: मनु से ही मनुष्यों का यह वंश 'मानव वंश' के रूप में प्रसिद्ध हुआ। उन मनु से ही ब्रह्म और क्षत्र आदि मानवी प्रजाएँ उत्पन्न हुईं। हे महाराज! उस समय ब्रह्म (ब्राह्मणत्व) और क्षत्र (क्षत्रियत्व) परस्पर मिले हुए थे। उनमें जो ब्राह्मण मानव थे, उन्होंने अंगों सहित संपूर्ण वेदों का अध्ययन किया। मनु के पुत्रों के नाम ये हैं— वेन, धृष्णु, नरिष्यन्त, नाभाग, इक्ष्वाकु, कारूष, शर्याति, आठवीं इळा और नौवें क्षत्रधर्मपरायण पृष्टध्र। इसके अतिरिक्त नाभागारिष्ट को दसवाँ पुत्र कहा जाता है। इस प्रकार पृथ्वी पर मनु के पचास पुत्र और भी हुए थे।
  • व्याख्या: वैवस्वत मनु की संतानों से ही इस धरती पर विभिन्न राजवंशों और वेदों के आचार्यों की श्रृंखला का विस्तार हुआ।

नाभागारिष्टदशमान्मनोः पुत्रान्प्रचक्षते। पञ्चाशत्तु मनोः पुत्रास्तथैवान्येऽभवन्क्षितौ।। 1-69-20a

  • हिन्दी अनुवाद: मनु के नौवें पुत्र पृष्टध्र कहे गए हैं, जो क्षत्रधर्म के परायण थे। नाभाग और अरिष्ट को मनु का दसवाँ पुत्र कहा जाता है। इस प्रकार पृथ्वी पर मनु के अन्य पचास पुत्र और भी हुए थे।
  • व्याख्या: वैवस्वत मनु की विशाल संतति और उनके पुत्रों का विवरण यहाँ दिया गया है, जो आगे चलकर विभिन्न राजवंशों के मूल पुरुष बने।

अन्योन्यभेदात्ते सर्वे विनेशुरिति नः श्रुतम्। पुरूरवास्ततो विद्वानिलायां समपद्यत।। 1-69-21a सा वै तस्याभवन्माता पिता चैवेति नः श्रुतम्। त्रयोदश समुद्रस्य द्वीपानश्नन्पुरूरवाः।। 1-69-22a

  • हिन्दी अनुवाद: हमने ऐसा सुना है कि आपस के मतभेद और संघर्ष के कारण वे सभी पुत्र नष्ट हो गए। तदनंतर इळा के गर्भ से विद्वान् पुरूरवा का जन्म हुआ। ऐसा सुनने में आता है कि वे (इळा) ही उनकी माता थीं और वे ही उनके पिता भी बने थे। महायशस्वी पुरूरवा ने समुद्र से घिरे हुए तेरहों द्वीपों पर अपना अधिकार कर लिया (उनका उपभोग किया)।
  • व्याख्या: मनु की संतानें आपसी संघर्ष से समाप्त हो गईं, जिसके बाद इळा से पुरूरवा का प्राकट्य हुआ, जिन्होंने चंद्रवंश की नींव रखी और त्रैलोक्य/द्वीपों पर विजय प्राप्त की।

अमानुषैर्वृतः सत्वैर्मानुषः सन्महायशाः। विप्रैः स विग्रहं चक्रे वीर्योन्मत्तः पुरूरवाः।। 1-69-23a जहार च स विप्राणां रत्नान्युत्क्रोशतामपि। सनत्कुमारस्तं राजन्ब्रह्मलोकादुपेत्य ह।। 1-69-24a अनुदर्शं ततश्चक्रे प्रत्यगृह्णान्न चाप्यसौ। ततो महर्षिभिः क्रुद्धैः सद्यः शप्तो व्यनश्यत।। 1-69-25a

  • हिन्दी अनुवाद: महान यशस्वी होने पर भी मनुष्य रूप धारी पुरूरवा अमानवीय (दिव्य) जीवों और शक्तियों से घिरे रहते थे। अपनी वीरता के मद में चूर होकर उन्होंने ब्राह्मणों के साथ विरोध (विग्रह) मोल ले लिया। जब ब्राह्मण रोते-विलाप करते रहे, तब भी उन्होंने उनके रत्नों को बलपूर्वक छीन लिया। हे राजन्! तब सनत्कुमार जी ब्रह्मलोक से उतरकर वहाँ आए और उन्हें सही मार्ग दिखाने का प्रयास किया, किंतु अहंकार के कारण पुरूरवा ने उनकी बात स्वीकार नहीं की। तब क्रोधित होकर महर्षियों ने उन्हें तुरंत शाप दे दिया, जिससे वे नष्ट (पतित) हो गए।
  • व्याख्या: पुरूरवा अपने बल और ऐश्वर्य के अहंकार में इतने अंधे हो गए थे कि उन्होंने ब्राह्मणों से धन-रत्न छीने और ब्रह्मर्षियों-महर्षियों की उपेक्षा की, जिसके फलस्वरूप उन्हें शाप का सामना करना पड़ा।

लोभान्वितो बलमदान्नष्टसंज्ञो नराधिपः। स हि गन्धर्वलोकस्थानुर्वश्या सहितो विराट्।। 1-69-26a आनिनाय क्रियार्थेऽग्नीन्यथावद्विहितांस्त्रिधा। षट् सुता जज्ञिरे चैलादायुर्धीमानमावसुः।। 1-69-27a दृढायुश्च वनायुश्च शतायुश्चोर्वशीसुताः। नहुषं वृद्धशर्माणं रजिं गयमनेनसम्।। 1-69-28a स्वर्भानवी सुतानेतानायोः पुत्रान्प्रचक्षते।

  • हिन्दी अनुवाद: लोभ से युक्त और बल के मद में अपनी सुधि खो बैठे वे नराधिप राजा पुरूरवा बाद में गंधर्वलोक में अप्सरा उर्वशी के साथ रहे और विराट् कहलाए। उन्होंने यज्ञीय कार्यों के लिए विधिपूर्वक तीन प्रकार की अग्नियों को स्थापित किया। इळा (इला) के पुत्र पुरूरवा से छह तेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुए—आयु, धीमान् अमावसु, दृढायु, वनायु, शतायु और उर्वशी के ही अन्य पुत्र (या आयु के पुत्रों में गिने जाने वाले) नहुष, वृद्धशर्मा, रजि, गय, अनेन और स्वर्भानवी सुत। इनमें आयु के पुत्रों में मुख्य नहुष बताए गए हैं।
  • व्याख्या: उर्वशी के साथ गंधर्वलोक में रहने के बाद पुरूरवा ने यज्ञ की अग्नि की स्थापना की। उनके पुत्र आयु से आगे चंद्रवंश का विस्तार हुआ, जिसमें आगे प्रतापी राजा नहुष हुए।

आयुषो नहुषः पुत्रो धीमान्सत्यपराक्रमः।। 1-69-29a राज्यं शशास सुमहद्धर्मेण पृथिवीपते। पितॄन्देवानृषीन्विप्रान्गन्धर्वोरगराक्षसान्।। 1-69-30a नहुषः पालयामास ब्रह्मक्षत्रमथो विशः। स हत्वा दस्युसंघातानृषीन्करमदापयत्।। 1-69-31a पशुवच्चैव तान्पृष्ठे वाहयामास वीर्यवान्। कारयामास चेन्द्रत्वमभिभूय दिवौकसः।। 1-69-32a

  • हिन्दी अनुवाद: आयु के पुत्र धीमान् और सत्यपराक्रमी नहुष हुए। हे पृथिवीपते! उन्होंने धर्मपूर्वक एक विशाल राज्य का शासन किया। नहुष ने पितरों, देवताओं, ऋषियों, ब्राह्मणों, गंधर्वों, नागों, राक्षसों तथा ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्ण की प्रजा का भली-भांति पालन किया। उन्होंने दस्युओं के संघों का वध करके ऋषियों से कर (लगान) वसूल करवाया और महाबली नहुष ने उन ऋषियों को घोड़े या बैल की तरह अपनी पीठ पर सवारी बनाकर वाहन के रूप में जोता। इतना ही नहीं, देवताओं को परास्त करके उन्होंने स्वयं स्वर्ग के इंद्र का पद भी हथिया लिया और इंद्रत्व का उपभोग किया।
  • व्याख्या: राजा नहुष शुरुआत में अत्यंत धर्मी और प्रजापालक थे, किंतु बाद में अतुलनीय शक्ति और इंद्र का पद मिलने पर वे अहंकृत हो गए और उन्होंने ऋषियों को अपनी सवारी बनाया, जो उनके पतन का कारण बना।

तेजसा तपसा चैव विक्रमेणौजसा तथा। `विश्लिष्टो नहुषः शप्तः सद्यो ह्यजगरोऽभवत्'। यतिं ययातिं संयातिमायातिमयतिं ध्रुवम्।। 1-69-33a नहुषो जनयामास षट् सुतान्प्रियवादिनः। यतिस्तु योगमास्थाय ब्रह्मीभूतोऽभवन्मुनिः।। 1-69-34a

  • हिन्दी अनुवाद: अपने तेज, तपस्या, विक्रम और ओज के बल पर जब वे अहंकार में आ गए, तब ऋषियों के शाप से वे तत्काल अजगर (सर्प) योनि को प्राप्त हो गए। नहुष ने प्रिय बोलने वाले छह पुत्र उत्पन्न किए—यति, ययाति, संयाति, आयाति, अयति और ध्रुव। उनमें बड़े पुत्र यति ने योगमार्ग का आश्रय लिया और वे ब्रह्मलीन (मुनि) हो गए।
  • व्याख्या: अगस्त्य आदि महर्षियों के अपमान और उनके शाप के कारण नहुष को अजगर बनना पड़ा था। उनके पुत्रों में यति विरक्त हो गए, जबकि राज्यभार उनके दूसरे पराक्रमी पुत्र ययाति को मिला।

ययातिर्नाहुषः सम्राडासीत्सत्यपराक्रमः। स पालयामास महीमीजे च बहुभिर्मखैः।। 1-69-35a अतिभक्त्या पितॄनर्चन्देवांश्च प्रयतः सदा। अन्वगृह्णात्प्रजाः सर्वा ययातिरपराजितः।। 1-69-36a तस्य पुत्रा महेष्वासाः सर्वैः समुदिता गुणैः। देवयान्यां महाराज शर्मिष्ठायां च जज्ञिरे।। 1-69-37a देवयान्यामजायेतां यदुस्तुर्वसुरेव च। द्रुह्युश्चानुश्च पूरुश्च शर्मिष्ठायां च जज्ञिरे।। 1-69-38a

  • हिन्दी अनुवाद: नहुष के पुत्र सम्राट ययाति सत्यपराक्रमी हुए। उन्होंने पृथ्वी का पालन किया और अनेक यज्ञों द्वारा देवताओं का यजन किया। वे अत्यंत भक्तिभाव से पितरों और देवताओं की पूजा करते थे और पराजित न होने वाले ययाति ने अपनी सभी प्रजाओं पर कृपा की। हे महाराज! उनके महान धनुर्धर और सभी गुणों से संपन्न पुत्र देवयानी और शर्मिष्ठा के गर्भ से उत्पन्न हुए। देवयानी से यदु और तुर्वसु तथा शर्मिष्ठा के गर्भ से द्रुह्यु, अनु और पूरु—ये पाँचों पुत्र उत्पन्न हुए।
  • व्याख्या: राजा ययाति के दो पत्नियों (देवयानी और शर्मिष्ठा) से कुल पाँच पुत्र हुए। इन पाँचों पुत्रों से ही आगे चलकर यदुवंश, तुर्वसुवंश, द्रुह्युवंश, अनुवंश और पौरव वंश (कुरुवंश की मुख्य शाखा) का विस्तार हुआ।

स शाश्वतीः समा राजन्प्रजा धर्मेण पालयन्। जरामार्च्छन्महाघोरां नाहुषो रूपनाशिनीम्।। 1-69-39a जराऽभिभूतः पुत्रान्स राजा वचनमब्रवीत्। यदुं पूरुं तुर्वसुं च द्रुह्युं चानुं च भारत।। 1-69-40a

  • हिन्दी अनुवाद: हे राजन्! नहुष के पुत्र सम्राट ययाति ने इस प्रकार सनातन समा तक धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करते हुए बिताया, किंतु अंत में उनके शरीर को रूप और सुंदरता को नष्ट करने वाली महाघोर बुढ़ापे (जरा) ने आ घेरा। बुढ़ापे से अभिभूत हुए उन राजा ने हे भारत! अपने पुत्रों—यदु, पूरु, तुर्वसु, द्रुह्यु और अनु से यह वचन कहा—
  • व्याख्या: राजा ययाति ने लंबे समय तक राज्य किया, किंतु शुक्राचार्य के शाप के कारण उन्हें समय से पूर्व ही वृद्धावस्था ने घेर लिया, जिसके बाद उन्होंने अपने पुत्रों से यौवन आदान-प्रदान करने का प्रस्ताव रखा।

यौवनेन चरन्कामान्युवा युवतिभिः सह। बिहर्तुमहमिच्छामि साह्यं कुरुत पुत्रकाः।। 1-69-41a तं पुत्रो दैवयानेयः पूर्वजो वाक्यमब्रवीत्। किं कार्यं भवतः कार्यमस्माकं यौवनेन ते।। 1-69-42a ययातिरब्रवीत्तं वै जरा मे प्रतिगृह्यताम्। यौवनेन त्वदीयेन चरेयं विषयानहम्।। 1-69-43a

  • हिन्दी अनुवाद: "(ययाति ने कहा—) मैं युवा अवस्था में युवतियों के साथ रहकर अपनी इच्छाओं (भोगों) का आनंद लेना चाहता हूँ। हे पुत्रो! तुम सब इसमें मेरी सहायता करो।" तब देवयानी के बड़े पुत्र (यदु) ने पिता से कहा— "आपके उद्देश्य से हमारे यौवन का क्या प्रयोजन है?" इस पर ययाति ने कहा— "तुम लोग मेरी यह वृद्धावस्था (जरा) ले लो और तुम्हारे इस युवा शरीर से मैं विषयों का भोग करूँगा।"
  • व्याख्या: ययाति अपनी भोग-इच्छाओं की तृप्ति के लिए अपने पुत्रों से उनका यौवन मांगते हैं और बदले में अपना बुढ़ापा उन्हें देने की बात कहते हैं।

यजतो दीर्घसत्रैर्मे शापाच्चोशनसो मुनेः। कामार्थः परिहीणोऽयं तप्येयं तेन पुत्रकाः।। 1-69-44a मामकेन शरीरेण राज्यमेकः प्रशास्तु वः। अहं तन्वाऽभिनवया युवा काममवाप्नुयाम्।। 1-69-45a वैशंपायन उवाच। 1-69-46x ते न तस्य प्रत्यगृह्णन्यदुप्रभृतयो जराम्। तमब्रवीत्ततः पूरुः कनीयान्सत्यविक्रमः।। 1-69-46a

  • हिन्दी अनुवाद: "(ययाति ने आगे कहा—) लंबे सत्रों (यज्ञों) के अनुष्ठान के कारण तथा मुनि उशनस् (शुक्राचार्य) के शाप से मेरी काम-वासना तृप्त नहीं हो पा रही है, जिससे मैं संतप्त हो रहा हूँ, हे पुत्रो! मेरे इस (वृद्ध) शरीर से तुम में से कोई एक राज्य की देखभाल करे और मैं इस नवीन (युवा) शरीर से अपनी इच्छाओं को प्राप्त करूँ।" वैशंपायन जी बोले— यदु आदि किसी भी पुत्र ने उनके बुढ़ापे को स्वीकार नहीं किया, किंतु तब उनके सबसे छोटे सत्यपराक्रमी पुत्र पूरु ने उनसे यह बात कही—
  • व्याख्या: ज्येष्ठ पुत्रों (यदु आदि) ने पिता का बुढ़ापा लेने से मना कर दिया, क्योंकि वे भोग-विलास छोड़ने को तैयार नहीं थे, लेकिन सबसे छोटे पुत्र पूरु ने पिता की आज्ञा का पालन करने का दृढ़ संकल्प लिया।

राजंश्चराभिनवया तन्वा यौवनगोचरः। अहं जरां समादाय राज्ये स्थास्यामि तेज्ञया।। 1-69-47a एवमुक्तः स राजर्षिस्तपोवीर्यसमाश्रयात्। संचारयामास जरां तदा पुत्रे महात्मनि।। 1-69-48a पौरवेणाथ वयसा राजा यौवनमास्थितः। यायातेनापि वयसा राज्यं पूरुरकारयत।। 1-69-49a

  • हिन्दी अनुवाद: "(पूरु ने कहा—) हे राजन्! आप इस नवीन युवा शरीर से विषयों का आनंद लें। मैं आपकी इस वृद्धावस्था को लेकर आपकी आज्ञा से राज्य संभालूँगा।" ऐसा कहने पर राजर्षि ययाति ने अपने तप और प्रभाव से अपनी वह वृद्धावस्था अपने महात्मा पुत्र पूरु में संचारित (स्थानांतरित) कर दी। तब पूरु की युवा आयु पाकर राजा ययाति युवा हो गए और ययाति की वृद्ध आयु को लेकर पूरु ने राज्य का संचालन किया।
  • व्याख्या: पूरु की इस पितृभक्ति और आज्ञाकारिता से प्रसन्न होकर ययाति ने अपना बुढ़ापा उन्हें दे दिया और स्वयं युवा बनकर भोग-विहार में लीन हो गए, जबकि पूरु ने राजा बनकर राज्य संभाला।

ततो वर्षसहस्राणि ययातिरपराजितः। स्थितः स नृपशार्दूलः शार्दूलसमविक्रमः।। 1-69-50a ययातिरपि पत्नीभ्यां दीर्घकालं विहृत्य च। विश्वाच्या सहितो रेमे पुनश्चैत्ररथे वने।। 1-69-51a नाध्यगच्छत्तदा तृप्तिं कामानां स महायशाः। अवेत्य मनसा राजन्निमां गाथां तदा जगौ।। 1-69-52a

  • हिन्दी अनुवाद: इसके बाद सिंह के समान पराक्रमी उन नृपश्रेष्ठ ययाति ने अपराजित रहकर हजारों वर्षों तक यौवन का सुख भोगा। ययाति ने अपनी पत्नियों के साथ तथा चैत्ररथ वन में अप्सरा विश्वाची के साथ भी लंबे समय तक विलास किया। महायशस्वी होने पर भी विषयों के भोग से उनकी काम-वासना की तृप्ति नहीं हुई। तब हे राजन्! मन में यह बात जानकर उन्होंने उस समय यह प्रसिद्ध गाथा गाई—
  • व्याख्या: हजारों वर्षों तक भोग-विहार करने के बावजूद ययाति की तृष्णा शांत नहीं हुई। तब उन्हें बोध हुआ कि विषयों के उपभोग से कभी भी वासना समाप्त नहीं होती, बल्कि वह अग्नि में घी डालने की तरह बढ़ती जाती है।

न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति। इविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते।। 1-69-53a यत्पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः। नालमेकस्य तत्सर्वमिति मत्वा शमं व्रजेत्।। 1-69-54a यदा न कुरुते पापं सर्वभूतेषु कर्हिचित्। कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म संपद्यते तदा।। 1-69-55a

  • हिन्दी अनुवाद: "विषयों (कामनाओं) के उपभोग करने से कभी भी कामना शांत नहीं होती, बल्कि जैसे अग्नि में घी (हवि) डालने पर वह और अधिक प्रज्वलित हो जाती है, वैसे ही भोगों से तृष्णा और बढ़ती जाती है। पृथ्वी पर जितने भी अन्न (धान-जव), सोना, पशु और स्त्रियाँ हैं, वे सब मिलकर भी अकेले एक मनुष्य की तृष्णा को शांत करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं— ऐसा मानकर मनुष्य को शांति (संतोष) का आश्रय लेना चाहिए। जब मनुष्य मन, वचन और कर्म से किसी भी प्राणी के प्रति कभी पाप नहीं करता, तब उसे ब्रह्म की प्राप्ति होती है।"
  • व्याख्या: इन अंतिम श्लोकों में राजा ययाति के आत्मज्ञान का वर्णन है। भोगों से तृप्ति न मिलने का सत्य समझकर उन्होंने वासना का त्याग किया और शांति तथा ब्रह्म प्राप्ति का मार्ग अपनाया।
न बिभेति यदा चायं यदा चास्मान्न बिभ्यति।
यदा नेच्छति न द्वेष्टि ब्रह्म संपद्यते तदा।।1-69-56a
  • हिन्दी अनुवाद: जब यह (मनुष्य) किसी से भयभीत नहीं होता और इससे कोई जीव भय नहीं खाता, तथा जब यह न किसी की इच्छा (लोभ) करता है और न किसी से द्वेष करता है, तब यह ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।
  • व्याख्या: निर्भयता, अद्वेष और सभी प्राणियों के प्रति समभाव ही ब्रह्म प्राप्ति (मोक्ष) का मार्ग है, जिसे ययाति ने अपने जीवन के अनुभव से समझा।

इत्यवेक्ष्य महाप्राज्ञः कामानां फल्गुतां नृप। समाधाय मनो बुद्ध्या प्रत्यगृह्णाज्जरां सुतात्।। 1-69-57a `ततो वर्षसहस्रान्ते ययातिरपराजितः।' दत्वा च यौवनं राजा पूरुं राज्येऽभिषिच्य च। अतृप्त एव कामानां पूरुं पुत्रमुवाच ह।। 1-69-58a

  • हिन्दी अनुवाद: महाप्राज्ञ राजा ययाति ने विषयों (कामनाओं) की इस तुच्छता और असारता को भली-भांति समझकर अपनी बुद्धि से मन को स्थिर किया और अपने पुत्र (पूरु) से वापस अपनी वृद्धावस्था (जरा) ग्रहण कर ली। तदनंतर एक हजार वर्ष बीत जाने पर अपराजित राजा ययाति ने अपना यौवन पूरु को वापस लौटा दिया और पूरु को राज्य पर अभिषिक्त कर दिया। काम-वासनाओं से अतृप्त रहते हुए ही उन्होंने अपने पुत्र पूरु से यह कहा—
  • व्याख्या: हजार वर्षों तक भोग-विलास करने के बाद भी जब ययाति की तृष्णा नहीं मिटी, तो उन्हें अपनी भूल का अहसास हुआ। उन्होंने पूरु का यौवन लौटाकर अपनी वृद्धावस्था वापस ले ली और पूरु को अपने राज्य का उत्तराधिकारी घोषित किया।

त्वया दायादवानस्मि त्वं मे वंशकरः सुतः। पौरवो वंश इति ते ख्यातिं लोके गमिष्यति।। 1-69-59a वैशंपायन उवाच। 1-69-60x ततः स नृपशार्दूल पूरुं राज्येऽभिषिच्य च। ततः सुचरितं कृत्वा भृगुतुङ्गे महातपाः।। 1-60a कालेन महता पश्चात्कालधर्ममुपेयिवान्। कारयित्वा त्वनशनं सदारः स्वर्गमाप्तवान्।। 1-69-61a

  • हिन्दी अनुवाद: "(ययाति ने कहा—) हे पुत्र! तुम्हारे माध्यम से ही मैं वास्तविक उत्तराधिकारी (दायादवान्) हुआ हूँ और तुम ही मेरे कुल को बढ़ाने वाले पुत्र हो। संसार में तुम्हारा यह वंश 'पौरव वंश' के नाम से ख्याति प्राप्त करेगा।" वैशंपायन जी बोले— इसके बाद नृपश्रेष्ठ ययाति ने पूरु को राज्य पर बैठाकर और स्वयं भृगुतुङ्ग पर्वत पर जाकर कठोर तपस्या की। महातपस्वी ययाति ने बहुत समय बीतने के बाद अंत में कालधर्म (मृत्यु) को प्राप्त किया। उन्होंने अपनी पत्नी के साथ अनशन (प्रायोपवेशन/व्रत) करके शरीर छोड़ा और स्वर्गलोक को प्राप्त हुए।
  • व्याख्या: पूरु की अनन्य पितृभक्ति से प्रसन्न होकर ययाति ने उन्हें अपना मुख्य उत्तराधिकारी बनाया, जिनके नाम से 'पौरव वंश' प्रसिद्ध हुआ। अंत में ययाति ने तपस्या और योग बल से देहत्याग कर स्वर्ग प्राप्त किया। इसके साथ ही महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत 'संभवपर्व' का उनसत्तरवाँ (69वाँ) अध्याय पूरा होता है।
।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि
संभवपर्वणि एकोनसप्ततितमोऽध्यायः।। 69 ।।