महाभारत के आदिपर्व (अध्याय 79, श्लोक 1-23) का मूल श्लोक, हिन्दी अनुवाद और विस्तृत व्याख्या
ययाति का युवावस्था में भोग-विलास और लोक-पालन (1-79-1 से 1-79-6)
- मूल श्लोक:
वैशंपायन उवाच। 1-79-1 पौरवेणाथ वयसा ययातिर्नहुषात्मजः। रूपयौवनसंपन्नः कुमारः समपद्यत।। 1-79-1 प्रीतियुक्तो नृपश्रेष्ठश्चरा विषयान्प्रियान्। यथाकामं यथोत्साहं यथाकालं यथासुखम्।। 1-79-2 धर्माविरुद्धं राजेन्द्रो यथा भवति सोऽन्वभूत्।। 1-79-2 देवानतर्पयद्यज्ञैः श्राद्धैस्तद्वित्पितॄनपि। दीनाननुग्रहैरिष्टैः कामैश्च द्विजसत्तमान्।। 1-79-3 अतिथीनन्नपानैश्च विशश्च परिपालनैः। आनृशंस्येन शूद्रांश्च दस्यून्सन्निग्रहेण च।। 1-79-4 धर्मेण च प्रजाः सर्वा यथावदनुरञ्जयन्। ययातिः पालयामास साक्षादिन्द्र इवापरः।। 1-79-5 स राजा सिंहविक्रान्तो युवा विषयगोचरः। अविरोधेन धर्मस्य चचार सुखमुत्तमम्।। 1-79-6
- हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा—नहुष पुत्र राजा ययाति पूरु के युवा शरीर को प्राप्त करके रूप और यौवन से संपन्न एक कुमार के समान हो गए। श्रेष्ठ राजा ययाति प्रसन्नतापूर्वक अपनी इच्छा, उत्साह और समय के अनुसार धर्म के अनुकूल प्रिय विषयों का भोग करने लगे। उन्होंने यज्ञों द्वारा देवताओं को, श्रद्धा से पितरों को, कृपा और दान से दीनों को तथा अभीष्ट कामनाओं से ब्राह्मणों को तृप्त किया। अतिथियों को अन्न-जल से, वैश्यों को उनके पालन से, शूद्रों को दया से और दस्यूओं (अपराधियों) को दंड देकर नियंत्रित किया। इस प्रकार वे धर्मपूर्वक सभी प्रजाओं का रंजन करते हुए साक्षात् दूसरे इंद्र की भाँति पृथ्वी का पालन करने लगे। सिंह के समान पराक्रमी, युवा और विषयों में विचरने वाले उन राजा ने धर्म का उल्लंघन किए बिना उत्तम सुख का भोग किया।
- व्याख्या: जब ययाति को पूरु का युवा शरीर मिल जाता है, तो वे राजा के रूप में अपने सभी कर्तव्यों का पालन पूरी निष्ठा से करते हैं। वे केवल भोग-विमलास में ही लिप्त नहीं रहते, बल्कि अपने धर्म, यज्ञ, अतिथि सत्कार और प्रजापालन के दायित्वों को भी भली-भांति निभाते हैं।
हजार वर्ष का काल और अप्सरा के साथ विहार (1-79-7 से 1-79-10)
- मूल श्लोक:
स संप्राप्य शुभान्कामांस्तृप्तः खिन्नश्च पार्थिवः। कालं वर्षसहस्रान्तं सस्मार मनुजाधिपः।। 1-79-7 परिसंख्याय कालज्ञः कलाः काष्ठाश्च वीर्यवान्। यौवनं प्राप्य राजर्षिः सहस्रपरिवत्सरान्।। 1-79-8 विश्वाच्या सहितो रेमे व्यभ्राजन्नन्दने वने। अलकायां स कालं तु मेरुशृङ्गे तथोत्तरे।। 1-79-9 यदा स पश्यते कालं धर्मात्मा तं महीपतिः। पूर्णं मत्वा ततः कालं पूरुं पुत्रमुवाच ह।। 1-79-10
- हिन्दी अनुवाद: तदनंतर शुभ कामनाओं और भोगों को प्राप्त करके जब वे तृप्त और खिन्न हो गए, तब उन मनुजाधिप ने एक हजार वर्ष की अवधि का स्मरण किया। काल के ज्ञान में कुशल उन वीर राजर्षि ने एक हजार वर्ष तक युवावस्था में रहकर विश्वाची अप्सरा के साथ नंदनकानन, अलकापुरी और उत्तर मेरु के शिखरों पर प्रसन्नतापूर्वक विहार किया। जब धर्मात्मा महीपति ययाति ने देखा कि वह हजार वर्ष का समय पूरा हो गया है, तब उन्होंने काल को पूर्ण मानकर अपने पुत्र पूरु से बात की।
- व्याख्या: ययाति ने एक हजार वर्षों तक युवा बनकर दुनिया के समस्त ऐश्वर्य और अप्सरा विश्वाची के साथ स्वर्गिक एवं सुंदर वनों में आनंद लिया। जब समय सीमा समाप्त होती है, तो उनकी चेतना जागती है और वे विषयों की असारता को समझकर अपने पुत्र को बुलाते हैं।
ययाति के प्रसिद्धार्पण और तृष्णा का संदेश (1-79-11 से 1-79-16)
- मूल श्लोक:
ययातिरुवाच। 1-79-11 यथाकामं यथोत्साहं यथाकालमरिन्दम। सेविता विषयाः पुत्र यौवनेन मया तव।। 1-79-11 न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति। हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते।। 1-79-12 यत्पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः। एकस्यापि न पर्याप्तं तस्मान्नृष्णां परित्यजेत्।। 1-79-13 या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः। योऽसौ प्राणान्तिको रोगस्तांतृष्णां त्यजतः सुखम्।। 1-79-14 पूर्णं वर्षसहस्रं मे विषयासक्तचेतसः। तथाप्यनुदिनं तृष्णा ममैतेष्वभिजायते।। 1-79-15 तस्मादेनामहं त्यक्त्वा ब्रह्मण्याधाय मानसम्। निर्द्वन्द्वो निर्ममो भूत्वा चरिष्यामि मृगैः सह।। 1-79-16
- हिन्दी अनुवाद: ययाति ने कहा—'हे अरिन्दम पुत्र! तुम्हारे यौवन से मैंने स्वेच्छा, उत्साह और समय के अनुसार विषयों का उपभोग कर लिया है। किंतु विषयों के उपभोग से कभी भी काम-कामना शांत नहीं होती, बल्कि अग्नि में घी डालने के समान वह और अधिक प्रज्वलित होती जाती है। इस पृथ्वी पर जितने भी धान, जौ, सोना, पशु और स्त्रियाँ हैं, वे सब भी यदि एक ही व्यक्ति को मिल जाएँ, तब भी वे उसके लिए पर्याप्त नहीं होते, इसलिए मनुष्य को तृष्णा का त्याग कर देना चाहिए। जो दुर्मति लोगों के लिए दुस्त्यजा है, शरीर के बूढ़े होने पर भी जो स्वयं नहीं बूढ़ी होती और जो प्राण जाने तक साथ रहने वाला रोग है, उस तृष्णा का त्याग करना ही सबसे बड़ा सुख है। विषयासक्त चित्त वाले मेरे एक हजार वर्ष पूरे हो गए हैं, फिर भी मेरे मन में इन विषयों के प्रति प्रतिदिन तृष्णा बढ़ती ही जा रही है। इसलिए अब मैं इस तृष्णा का त्याग करके अपना मन ब्रह्म में लगाऊँगा और द्वंद्व तथा ममता से रहित होकर मृगों (वनवासियों) के साथ निवास करूँगा।'
- व्याख्या: यह महाभारत का सबसे दार्शनिक और महत्वपूर्ण उपदेश है। ययाति अपने लंबे अनुभव से इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि दुनिया के सारे भोग भी मनुष्य की लालसा (तृष्णा) को तृप्त नहीं कर सकते। लालसा आग में घी के समान है जो भोगने से और बढ़ती है। इसलिए शांति भोग से नहीं, बल्कि तृष्णा के त्याग से मिलती है।
ययाति द्वारा जरा वापस लेना और राज्याभिषेक का प्रसंग (1-79-17 से 1-79-22)
- मूल श्लोक:
पूरो प्रीतोऽस्मि भद्रं ते गृहाणेदं स्वयौवनम्। राज्यं चेदं गृहाण त्वं यावदिच्छसि यौवनम्।। 1-79-17 तावद्दीर्घायुषा भुङ्ख त्वं हि मे प्रियकृत्सुतः।। 1-79-17 वैशंपायन उवाच। 1-79-18 प्रतिपेदे जरां राजा ययातिर्नाहुषस्तदा। यौवनं प्रतिपेदे च पूरुः स्वं पुनरात्मवान्।। 1-79-18 अभिषेक्तुकामं नृपतिं पूरुं पुत्रं कनीयसम्। ब्राह्मणप्रमुखा वर्णा इदं वचनमब्रुवन्।। 1-79-19 कथं शुक्रस्य नप्तारं देवयान्याः सुतं प्रभो। ज्येष्ठं यदुमतिक्रम्य राज्यं पूरोः प्रयच्छसि।। 1-79-20 यदुर्ज्येष्ठस्तव सुतो जातस्तमनु तुर्वसुः। शर्मिष्ठायाः सुतो द्रुह्युस्ततोऽनुः पूरुरेव च।। 1-79-21 कथं ज्येष्ठानतिक्रम्य कनीयान्राज्यमर्हति। एतत्संबोधयामस्त्वां धर्मं त्वं प्रतिपालय।। 1-79-22
- हिन्दी अनुवाद: 'वत्स पूरु! मैं तुझ पर बहुत प्रसन्न हूँ, तुम्हारा कल्याण हो। तुम अपना यह यौवन वापस ले लो और यह राज्य भी ग्रहण करो। जब तक तुम्हारी इच्छा हो, तब तक दीर्घायु होकर इसका उपभोग करो, क्योंकि तुम मेरे सबसे प्रिय कार्य करने वाले पुत्र हो।' वैशंपायन जी कहते हैं—तब नहुष पुत्र राजा ययाति ने अपनी वृद्धावस्था (जरा) वापस ले ली और आत्मीय पूरु ने अपनी युवावस्था पुनः प्राप्त कर ली। जब राजा अपने सबसे छोटे पुत्र पूरु का राज्याभिषेक करना चाहते थे, तब ब्राह्मणों सहित सभी वर्णों के प्रमुख लोगों ने राजा से कहा—'प्रभो! शुक्राचार्य की दौहित्री और देवयानी के पुत्र ज्येष्ठ यदु का उल्लंघन करके आप सबसे छोटे पूरु को राज्य कैसे दे रहे हैं? यदु आपके सबसे बड़े पुत्र हैं, उनके बाद तुर्वसु, शर्मिष्ठा के पुत्र द्रुह्यु, अनु और फिर पूरु हैं। ज्येष्ठ पुत्रों को छोड़कर कनीयद (छोटा) पुत्र राज्य का अधिकारी कैसे हो सकता है? हम आपको सचेत करते हैं, आप अपने धर्म का पालन करें।'
- व्याख्या: ययाति अपने वचन के अनुसार पूरु को उसका युवापन और राज्य लौटा देते हैं और स्वयं अपनी वृद्धावस्था पुनः स्वीकार कर लेते हैं। किंतु जब वे सबसे छोटे पुत्र पूरु को राजा बनाने लगते हैं, तो समाज और धर्म के नियमों (ज्येष्ठ अधिकार) के अनुसार प्रजा और ब्राह्मण इसका विरोध करते हैं और ययाति से पूछते हैं कि वे ज्येष्ठ पुत्रों को छोड़कर सबसे छोटे को राजा क्यों बना रहे हैं।
ययाति का निर्णय (1-79-23)
- मूल श्लोक:
ययातिरुवाच। 1-79-23 ब्राह्मणप्रमुखा वर्णाः सर्वे शृण्वन्तु मे वचः। ज्येष्ठं प्रति यथा राज्यं न देयं मे कथंचन।। 1-79-23
- हिन्दी अनुवाद: ययाति ने उत्तर दिया—'ब्राह्मणों सहित सभी वर्णों के लोग मेरी बात ध्यान से सुनें कि मैं किस कारण से ज्येष्ठ पुत्रों को राज्य नहीं देना चाहता हूँ।'
- व्याख्या: यहाँ राजा ययाति प्रजा और ब्राह्मणों की सभा को संबोधित करने की शुरुआत करते हैं ताकि वे बता सकें कि उनके बड़े पुत्रों (यदु, तुर्वसु, द्रुह्यु और अनु) ने उनकी आज्ञा का उल्लंघन किया था और अपना युवापन देने से इंकार कर दिया था, जिसके कारण वे राज्य के अधिकारी नहीं रहे।
महाभारत के आदिपर्व (अध्याय 79, श्लोक 24-43) का पूर्ण क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या
श्लोक 24: ज्येष्ठ पुत्र यदु का अविनय
- मूल श्लोक:
मम ज्येष्ठेन यदुना नियोगो नानुपालितः। प्रतिकूलः पितुर्यश्च न स पुत्रः सतां मतः।। 1-79-24
- हिन्दी अनुवाद: ययाति ने कहा—'मेरे ज्येष्ठ पुत्र यदु ने मेरी आज्ञा (नियोग) का पालन नहीं किया। जो पुत्र पिता के प्रतिकूल आचरण करता है, वह सज्जनों की दृष्टि में सच्चा पुत्र नहीं माना जाता।'
- व्याख्या: राजा ययाति सभा में बताते हैं कि उनके सबसे बड़े पुत्र यदु ने पिता की आज्ञा (अपनी युवावस्था देने) को अस्वीकार कर दिया था, जो कि एक पुत्र का सबसे बड़ा कर्तव्य-भंग था।
श्लोक 25: सच्चे पुत्र का लक्षण
- मूल श्लोक:
मातापित्रोर्वचनकृद्धितः पथ्यश्च यः सुतः। स पुत्रः पुत्रवद्यश्च वर्तते पितृमातृषु।। 1-79-25
- हिन्दी अनुवाद: 'माता-पिता की आज्ञा का पालन करने वाला, उनका हित और कल्याण चाहने वाला तथा माता-पिता के प्रति पुत्रवत (सेवा भाव से) रहने वाला ही वास्तविक पुत्र है।'
- व्याख्या: यहाँ ययाति पुत्र की परिभाषा समझाते हैं कि केवल जन्म से कोई बड़ा या छोटा नहीं होता, बल्कि माता-पिता की आज्ञा और हित का पालन करने वाला ही असली पुत्र कहलाता है।
श्लोक 26: 'पुत्र' शब्द की व्युत्पत्ति और उसका अर्थ
- मूल श्लोक:
`पुदिति नरकस्याख्या दुःखं च नरकं विदुः। पुतस्त्राणात्ततः पुत्त्रमिहेच्छन्ति परत्र च।। 1-79-26
- हिन्दी अनुवाद: '‘पुद्’ नाम नरक का है और दुःख को ही नरक जानते हैं। जो (माता-पिता को) उस नरक से त्राण (रक्षा) दिलाता है, इसीलिए इस लोक और परलोक में लोग ‘पुत्र’ की कामना करते हैं।'
- व्याख्या: 'पुत्र' शब्द की प्राचीन वैयाकरणिक और धार्मिक परिभाषा दी गई है कि जो संतान माता-पिता को उनके दुखों और नरक जैसी कष्टदायक स्थितियों से बचा ले, वही सच्चा पुत्र है।
श्लोक 27: ज्येष्ठ पुत्र की वास्तविक पात्रता
- मूल श्लोक:
आत्मनः सदृशः पुत्रः पितृदेवर्षिपूजने। यो बहूनां गुणकरः स पुत्रो ज्येष्ठ उच्यते।। 1-79-27
- हिन्दी अनुवाद: 'जो अपने पिता के सदृश पितरों, देवताओं और ऋषियों के पूजन में तत्पर रहे तथा जो बहुत से गुणों को करने वाला (गुणवान) हो, वही पुत्र 'ज्येष्ठ' (श्रेष्ठ) कहा जाता है।'
- व्याख्या: केवल उम्र में पहले पैदा होने वाला ही ज्येष्ठ नहीं होता, बल्कि जिसके गुण, संस्कार और धर्मपरायणता उच्च कोटि की हो, असली ज्येष्ठ वही है।
श्लोक 28: दुर्गुण पुत्र ज्येष्ठ नहीं कहलाते
- मूल श्लोक:
मूकोऽन्धो बधिरः श्वित्री स्वधर्मं नानुतिष्ठति। चोरः किल्बिषिकः पुत्रो ज्येष्ठो न ज्येष्ठ उच्यते।। 1-79-28
- हिन्दी अनुवाद: 'मूक, अंधा, बहरा, श्वेतकुष्ठ रोग से ग्रसित, अपने स्वधर्म का पालन न करने वाला, चोर और पापी पुत्र—भले ही वह पहले उत्पन्न हुआ हो, किंतु वह 'ज्येष्ठ' (श्रेष्ठ) नहीं कहलाता।'
- व्याख्या: राजा ययाति स्पष्ट करते हैं कि शरीर से ज्येष्ठ होने से कोई श्रेष्ठ नहीं बनता यदि उसके आचरण और कर्म नीच या धर्मविरुद्ध हों।
श्लोक 29: श्रेष्ठ पुत्र और धर्म का विधान
- मूल श्लोक:
ज्येष्ठांशहारी गुणकृदिह लोके परत्र च। श्रेयान्पुत्रो गुणोपेतः स पुत्रो नेतरो वृथा। वदन्ति धर्मं धर्मज्ञाः पितॄणां पुत्रकारणात्।। 1-79-29
- हिन्दी अनुवाद: 'जो ज्येष्ठ अंश का अधिकारी और इस लोक तथा परलोक में गुण पैदा करने वाला हो, वही श्रेष्ठ और गुणसंपन्न पुत्र है; इसके अलावा दूसरा पुत्र व्यर्थ है। धर्म के ज्ञाता लोग पितरों की मुक्ति के लिए पुत्र के होने का ही विधान बताते हैं।'
- व्याख्या: शास्त्रों के अनुसार संतान का मुख्य उद्देश्य कुल का मान और पितृऋण से मुक्ति दिलाना है, जो केवल गुणी पुत्र से ही संभव है।
श्लोक 30: आत्मा ही पुत्र रूप में उत्पन्न होती है
- मूल श्लोक:
वेदोक्तं संभवं मह्यमनेन हृदयोद्भवम्। तस्य जातमिदं कृत्स्नमात्मा पुत्र इति श्रुतिः'।। 1-79-30
- हिन्दी अनुवाद: 'वेदों में कहा गया है कि यह शरीर हृदय से उत्पन्न होता है और पिता की आत्मा ही पुत्र के रूप में जन्म लेती है—ऐसा वेदों (श्रुति) का कथन है।'
- व्याख्या: यह वैदिक सिद्धांत है कि पुत्र और पिता की आत्मा भिन्न नहीं है, पुत्र पिता का ही प्रतिरूप होता है।
श्लोक 31: चारों बड़े पुत्रों द्वारा उपेक्षा
- मूल श्लोक:
यदुनाऽहमवज्ञातस्तथा तुर्वसुनापि च। द्रुह्युना चानुना चैव मय्यवज्ञ कृता भृशम्।। 1-79-31
- हिन्दी अनुवाद: 'यदु द्वारा, वैसे ही तुर्वसु द्वारा, द्रुह्यु और अनु द्वारा—इन चारों ने मेरी अत्यधिक अवमानना की और मेरी उपेक्षा की।'
- व्याख्या: ययाति सभा को याद दिलाते हैं कि उनके चारों बड़े पुत्रों ने संकट के समय पिता की सहायता करने से इनकार कर दिया था।
श्लोक 32: छोटे पुत्र पूरु का समर्पण
- मूल श्लोक:
पूरुणा तु कृतं वाक्यं मानितं च विशेषतः। कनीयान्मम दायादो धृता येन जरा मम।। 1-79-32
- हिन्दी अनुवाद: 'किंतु सबसे छोटे पुत्र पूरु ने मेरी बात रखी, मेरा विशेष सम्मान किया और मेरे उस छोटे (कनीय) उत्तराधिकारी ने ही मेरे बुढ़ापे को अपने ऊपर धारण किया।'
- व्याख्या: पूरु ने अपने पिता के आदेश का पालन करते हुए अपनी युवावस्था देकर पिता का बुढ़ापा खुशी-खुशी अपना लिया था।
श्लोक 33: पूरु का मित्रवत आचरण और शुक्र का वरदान
- मूल श्लोक:
मम कामः स च कृतः पूरुणा मित्ररूपिणा। शुक्रेण च वरोदत्तः काव्येनोशनसा स्वयम्।। 1-79-33
- हिन्दी अनुवाद: 'मित्र के रूप में पूरु ने मेरी सारी इच्छा पूरी कर दी है और स्वयं महाकवि शुक्राचार्य ने भी पहले ही वरदान दिया था।'
- व्याख्या: पूरु ने संकट की घड़ी में एक सच्चे मित्र और आज्ञाकारी पुत्र की भूमिका निभाई, और शुक्राचार्य का वरदान भी इसी बात का समर्थन करता था।
श्लोक 34: उत्तराधिकार का नियम
- मूल श्लोक:
पुत्रो यस्त्वाऽनुवर्तेत स राजा पृथिवीपतिः। `यो वानुवर्ती पुत्राणां स पुत्रो दायभाग्भवेत्'।। 1-79-34
- हिन्दी अनुवाद: 'जो पुत्र पिता की आज्ञा का अनुवर्तन (पालन) करे, वही पृथ्वी का राजा होने योग्य है। पुत्रों में जो आज्ञाकारी हो, वही राज्य के धन (दाय) का असली अधिकारी होता है।'
- व्याख्या: ज्येष्ठाधिकार से बढ़कर आज्ञापालन और पितृभक्ति को राज्य का अधिकार पाने की मुख्य शर्त बताया गया है।
श्लोक 35-37: प्रजा की सहमति और अनुमोदन
- मूल श्लोक:
भवतोऽनुनयाम्येवं पूरू राज्येऽभिषिच्यताम्। 1-79-35a प्रकृतय ऊचुः। 1-79-35b यः पुत्रो गुणसंपन्नो मातापित्रोर्हितः सदा।। 1-79-35c सर्वमर्हति कल्याणं कनीयानपि सत्तमः। `वेद धमार्थशास्त्रेषु मुनिभिः कथितं पुरा'।। 1-79-36 अर्हः पूरुरिदं राज्यं यः सुतः प्रियकृत्तव। वरदानेन शुक्रस्य न शक्यं वक्तुमुत्तरम्।। 1-79-37
- हिन्दी अनुवाद: 'अतः मैं आप सबका अनुरोध करता हूँ कि पूरु का राज्य पर अभिषेक किया जाए।' प्रजा (प्रकृतियाँ) ने कहा—'जो पुत्र गुणसंपन्न और माता-पिता का हितैषी हो, वह सबसे छोटा होने पर भी सभी कल्यालों और राज्य का अधिकारी है, जैसा कि प्राचीन काल में मुनियों ने धर्म और अर्थशास्त्रों में कहा है। पूरु आपके प्रिय कार्य करने वाले और इस राज्य के पूर्ण योग्य पुत्र हैं, तथा शुक्राचार्य के वरदान के बाद अब इसमें कोई दूसरा प्रतिवाद (उत्तर) नहीं दिया जा सकता।'
- व्याख्या: सभा में उपस्थित जनता और मंत्रीगण राजा ययाति के इन तर्कों से पूरी तरह संतुष्ट हो जाते हैं और सहर्ष पूरु को राजा बनाने का समर्थन करते हैं।
श्लोक 38-39: पूरु का राज्याभिषेक और बड़े पुत्रों का देशांतर प्रेषण
- मूल श्लोक:
वैशंपायन उवाच। 1-79-38 पौरजानपदैस्तुष्टैरित्युक्तो नाहुषस्तदा। अभ्यषिञ्चत्ततः पूरुं राज्ये स्वे सुतमात्मनः।। 1-79-38 `यदुं च तुर्वसुं चोभौ द्रुह्युं चैव सहानुजम्। अन्तेषु स विनिक्षिप्य नाहुषः स्वात्मजान्सुतान्'।। 1-79-39
- हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—नगर और देश के संतुष्ट नागरिकों द्वारा ऐसा कहे जाने पर राजा ययाति ने अपने छोटे पुत्र पूरु का अपने राज्य पर राज्याभिषेक कर दिया। इसके बाद नहुष पुत्र ययाति ने अपने चारों बड़े पुत्रों (यदु, तुर्वसु, द्रुह्यु और उनके छोटे भाई अनु) को देश की सीमाओं (अन्तेषु/दूरवर्ती म्लेच्छ प्रदेशों) में नियुक्त कर दिया।
- व्याख्या: जनता की सहमति मिलने पर पूरु को चक्रवर्ती सम्राट बना दिया जाता है और आज्ञा न मानने वाले बाकी चारों पुत्रों को साम्राज्य के सीमावर्ती या बाहरी क्षेत्रों का प्रभार दे दिया जाता है।
श्लोक 40-41: ययाति का वानप्रस्थ और तपस्या
- मूल श्लोक:
दत्त्वा च पूरवे राज्यं वनवासाय दीक्षितः। पुरात्स निर्ययौ राजा ब्राह्मणैस्तापसैः सह।। 1-79-40 `देवयान्या च सहितः शर्मिष्ठया च भारत। अकरोत्स वने राजा सभार्यस्तप उत्तमम्'।। 1-79-41
- हिन्दी अनुवाद: पूरु को राज्य सौंपकर राजा ययाति ने वनवास की दीक्षा ली और ब्राह्मणों तथा तपस्वियों के साथ नगर से बाहर प्रस्थान किया। हे भारत! राजा ययाति अपनी दोनों पत्नियों—देवयानी और शर्मिष्ठा—के साथ वन में गए और वहाँ अपनी पत्नियों सहित उत्तम तपस्या की।
- व्याख्या: अपने सभी पारिवारिक और राजनैतिक दायित्वों को पूरा करने के बाद ययाति मोह-माया का त्याग कर संन्यास/वानप्रस्थ अपनाते हैं और अपनी दोनों रानियों के साथ वन में तपस्या करने निकल जाते हैं।
श्लोक 42-43: विभिन्न राजवंशों की उत्पत्ति और अध्याय का उपसंहार
- मूल श्लोक:
यदोस्तु यादवा जातास्तुर्वसोर्यवनाः स्मृताः। द्रुह्योः सुतास्तु वै भोजा अनोस्तु म्लेच्छजातयः।। 1-79-42 पूरोस्तु पौरवो वंशो यत्र जातोऽसि पार्थिव। इदं वर्षसहस्राणि राज्यं कारयितुं वशी।। 1-79-43
- हिन्दी अनुवाद: यदु से 'यादव' वंश उत्पन्न हुआ, तुर्वसु से 'यवन' जाने गए, द्रुह्यु के पुत्र 'भोज' हुए और अनु से 'म्लेच्छ' जातियाँ उत्पन्न हुईं। हे पार्थिव! पूरु से 'पौरव' वंश चला, जिसमें आप (कुरु वंश के राजा जनमेजय) उत्पन्न हुए हैं। इस प्रकार अपने मन को वश में करके उन्होंने हजारों वर्षों तक राज्य का संचालन किया। यहाँ श्रीमन्महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत संभवपर्व का उन्यासीवाँ (79वाँ) अध्याय समाप्त होता है।
- व्याख्या: इस अंतिम श्लोक में ययाति के पाँचों पुत्रों से उत्पन्न होने वाले महान राजवंशों का विवरण दिया गया है। इसी पौरव वंश में आगे चलकर कुरुवंश और पांडव-कौरव प्रकट हुए, जिनसे महाभारत की मुख्य कथा आगे बढ़ती है।
