श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि अष्टसप्ततितमोऽध्यायः

श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि अष्टसप्ततितमोऽध्यायः

आदिपर्व (अध्याय 78, श्लोक 1-21) का हिन्दी अनुवाद और विस्तृत विवरण

ययाति का ज्येष्ठ पुत्र यदु से जरा (बुढ़ापा) मांगने का प्रसंग और यदु का उत्तर (1-78-1 से 1-78-9)

  • मूल श्लोक:

वैशंपायन उवाच। 1-78-1 जरां प्राप्य ययातिस्तु स्वपुरं प्राप्य चैव हि। पुत्रं ज्येष्ठं वरिष्ठं च यदुमित्यब्रويद्वचः।। 1-78-1 ययातिरुवाच। 1-78-2 जरावली च मां तात पलितानि च पर्यगुः। काव्यस्योशनसः शापान्न च तृप्तोऽस्मि यौवने।। 1-78-2 त्वं यदो प्रतिपद्यस्व पाप्मानं जरया सह। यौवनेन त्वदीयेन चरेयं विषयानहम्।। 1-78-3 यदुरुवाच। 1-78-5 जरायां बहवो दोषाः पानभोजनकारिताः। तस्माज्जरां न ते राजन्ग्रहीष्य इति मे मतिः।। 1-78-5 ययातिरुवाच। 1-78-9 यत्त्वं मे हृदयाज्जातो वयः स्वं न प्रयच्छसि। तस्मादराज्यभाक्तात प्रजा तव भविष्यति।। 1-78-9

  • हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा—वृद्धावस्था को प्राप्त होकर और अपने नगर में लौटकर राजा ययाति ने अपने सबसे बड़े और श्रेष्ठ पुत्र यदु से कहा—'हे तात यदु! शुक्राचार्य के शाप के कारण मेरे शरीर में झुर्रियाँ और बाल सफेद हो गए हैं, किंतु अभी मेरी यौवन की तृप्ति नहीं हुई है। अतः तुम मेरे इस बुढ़ापे (पापयुक्त जरा) को ग्रहण कर लो और अपने युवापन से मुझे सुसज्जित करो, जिससे मैं विषयों का भोग कर सकूँ। एक हजार वर्ष पूर्ण होने पर मैं तुम्हारा यौवन तुम्हें वापस लौटा दूंगा और अपना बुढ़ापा पुनः ले लूँगा।' यदु ने कहा—'बुढ़ापे में खान-पान और जीवन के कई दोष व कष्ट आ जाते हैं, इसलिए हे राजन्! मैं आपके इस बुढ़ापे को ग्रहण नहीं करूँगा, ऐसा मेरा दृढ़ निश्चय है।' इस पर क्रोधित होकर ययाति ने शाप दिया—'चूँकि तुम मेरे हृदय से उत्पन्न होकर भी अपना यौवन मुझे नहीं दे रहे हो, इसलिए हे तात! तुम्हारी प्रजा राज्य की अधिकारिणी नहीं होगी।'
  • व्याख्या: जब ययाति शुक्राचार्य के शाप से बूढ़े हो जाते हैं, तो वे अपने पुत्रों से उनका युवापन मांगते हैं। सबसे बड़े पुत्र यदु अपने पिता के इस प्रस्ताव को ठुकरा देते हैं, क्योंकि वे बुढ़ापे के कष्टों को अच्छी तरह समझते हैं। इससे नाराज होकर ययाति यदु को राज्य के अधिकार से वंचित होने का शाप दे देते हैं।

तुर्वसु और द्रुह्यु का अस्वीकार तथा उनके प्रति ययाति के शाप (1-78-10 से 1-78-20)

  • मूल श्लोक:

तुर्वसुरुवाच। 1-78-12 न कामये जरां तात कामभोगप्रणाशिनीम्। बलरूपान्तकरणीं बुद्धिप्राणप्रणाशिनीम्।। 1-78-12 ययातिरुवाच। 1-78-14 संकीर्णाचारधर्मेषु प्रतिलोमचरेषु च। पिशिताशिषु चान्त्येषु मूढ राजा भविष्यसि।। 1-78-14 द्रुह्युरुवाच। 1-78-19 न गजं न रथं नाश्वं जीर्णो भुङ्क्ते न च स्त्रियम्। वाग्भङ्गश्चास्य भवति तां जरां नाभिकामये।। 1-78-19 ययातिरुवाच। 1-78-20 यत्त्वं मे हृदयाज्जातो वयः स्वं न प्रयच्छसि। तस्माद्द्रुह्यो प्रियः कामो न ते संपत्स्यते क्वचित्।। 1-78-20

  • हिन्दी अनुवाद: (यदु के अस्वीकार करने पर राजा ने अपने दूसरे पुत्र तुर्वसु से कहा—) तुर्वसु ने उत्तर दिया—'हे तात! मैं काम-भोगों को नष्ट करने वाली, बल, रूप, बुद्धि और प्राण का नाश करने वाली इस जरा (बुढ़ापे) की कामना नहीं करता।' तब ययाति ने क्रोधित होकर तुर्वसु को शाप दिया—'तुम संकीर्ण आचरण करने वाले, प्रतिलोम धर्म का पालन करने वाले, मांस खाने वाले अंत्यजों और म्लेच्छों के राजा बनोगे और तुम्हारी प्रजा का उच्चेदन (विनाश) होगा।' इसके बाद शर्मिष्ठा के पुत्र द्रुह्यु से भी राजा ने यही बात कही। द्रुह्यु ने कहा—'वृद्ध मनुष्य न तो हाथी, रथ, घोड़े का सुख भोग सकता है और न ही स्त्रियों का; उसकी वाणी भी लड़खड़ाने लगती है, अतः मैं इस बुढ़ापे को नहीं चाहता।' तब ययाति ने द्रुह्यु को भी शाप दिया—'चूँकि तुमने अपना युवापन नहीं दिया, इसलिए तुम्हारी कोई भी प्रिय इच्छा कभी पूरी नहीं होगी और जहाँ घोड़ों, रथों तथा हाथियों का आवागमन कठिन हो, ऐसे दुर्गम क्षेत्रों में तुम्हारा निवास होगा।'
  • व्याख्या: ययाति अपने शुरुआती तीनों पुत्रों—यदु, तुर्वसु और द्रुह्यु—के पास अपनी वृद्धावस्था बदलने का प्रस्ताव रखते हैं। जब तीनों पुत्र अपने-अपने तर्कों के साथ इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर देते हैं, तो राजा क्रोध और मोह में आकर उन्हें कठोर शाप दे देते हैं।

आदिपर्व (अध्याय 78, श्लोक 21-37) का हिन्दी अनुवाद और विस्तृत विवरण

द्रुह्यु के शाप का विस्तार और अनु से बुढ़ापा माँगने का प्रसंग (1-78-21 से 1-78-23)

  • मूल श्लोक:

यत्राश्वरथमुख्यानामश्वानां स्याद्गतं न च। हस्तिनां पीठकानां च गर्दभानां तथैव च।। 1-78-21 बस्तानां च गवां चैव शिबिकायास्तथैव च। उडुपप्लवसंतारो यत्र नित्यं भविष्यति।। 1-78-22 ययातिरुवाच। 1-78-23 अनो त्वं प्रतिपद्यस्व पाप्मानं जरया सह। एकं वर्षसहस्रं तु चरेयं यौवनेन ते।। 1-78-23

  • हिन्दी अनुवाद: (द्रुह्यु को शाप देते हुए राजा ने कहा—) जहाँ उत्तम रथों, घोड़ों, हाथियों, ऊँटों (पीठक), गधों, बकरों, गायों और पालकियों की गति बिल्कुल न हो सके, और जहाँ लोगों को पार करने के लिए नित्य केवल नावों या बेड़ों (उडुपप्लव) का ही सहारा लेना पड़े, ऐसे दुर्गम जलमग्न या नदी-द्वीपों वाले क्षेत्रों में तुम्हारा निवास होगा। इसके बाद राजा ययाति ने अपने चौथे पुत्र 'अनु' के पास जाकर कहा—'हे अनु! तुम मेरे इस पापयुक्त बुढ़ापे को ग्रहण कर लो और एक हजार वर्ष तक अपने युवापन से मुझे सुसज्जित करो, जिससे मैं विषयों का उपभोग कर सकूँ।'
अनु का अस्वीकार और पूरु का अपनी युवावस्था पिता को सौंपना (1-78-24 से 1-78-37)
  • मूल श्लोक:

अनुरुवाच। 1-78-24 जीर्णः शिशुवदादत्ते कालेऽन्नमशुचिर्यथा। न जुहोति च कालेऽग्निं तां जरां नाभिकामये।। 1-78-24 पूरुर्वाच (वैशंपायन उवाच)। 1-78-31 एवमुक्तः प्रत्युवाच पूरुः पितरमज्जसा। यदात्थ मां महाराज तत्करिष्यामि ते वचः।। 1-78-31 ययातिरुवाच। 1-78-36 पूरो प्रीतोऽस्मि ते वत्स प्रीतश्चेदं ददामि ते। सर्वकामसमृद्धा ते प्रजा राज्ये भविष्यति।। 1-78-36

  • हिन्दी अनुवाद: (द्रुह्यु के बाद राजा ने अपने चौथे पुत्र 'अनु' से बुढ़ापा माँगते हुए कहा—) अनु ने कहा—'वृद्ध होने पर मनुष्य शिशु के समान अशुचि (मल-मूत्र आदि से अस्वच्छ) हो जाता है और समय पर भोजन ग्रहण करता है तथा ठीक समय पर अग्निहोत्र आदि कर्म भी नहीं कर पाता, इसलिए मैं इस बुढ़ापे की कामना नहीं करता।' इस पर ययाति ने अनु को भी शाप दिया कि तुम्हारी प्रजा यौवन को प्राप्त होकर भी नष्ट हो जाएगी और तुम अग्निप्रस्कंदन (अग्नि से जुड़े दोषों या विपरीत आचरण) से युक्त होगे।
  • तदनंतर, चारों बड़े पुत्रों (यदु, तुर्वसु, द्रुह्यु और अनु) द्वारा अस्वीकृत किए जाने पर राजा ययाति अपने सबसे छोटे और आज्ञाकारी पुत्र शर्मिष्ठा के गर्भ से उत्पन्न 'पूरु' के पास पहुँचे। पूरु ने तुरंत पिता से कहा—'महाराज! आपने मुझसे जो कुछ कहा है, मैं आपकी वह आज्ञा अवश्य पूरी करूँगा। गुरु (पिता) का वचन पुण्य, स्वर्ग और आयु देने वाला होता है। मैं आपकी इस जरा (बुढ़ापे) को ग्रहण करता हूँ। आप मेरा यौवन लेकर अपनी इच्छा के अनुसार विषयों का उपभोग करें।'
  • पुत्र पूरु की इस आज्ञाकारिता से अति प्रसन्न होकर राजा ययाति ने उसे आशीर्वाद दिया—'वत्स पूरु! मैं तुझ पर अत्यंत प्रसन्न हूँ। तेरी प्रजा सभी कामनाओं से समृद्ध होगी और तू ही संपूर्ण राज्य का अधिकारी बनेगा।' इसके बाद महातपा ययाति ने अपनी वृद्धावस्था (जरा) अपने महात्मा पुत्र पूरु को संक्रान्त (स्थानांतरित) कर दी और स्वयं युवा हो गए।
  • व्याख्या: यह प्रसंग महाभारत के आदिपर्व का एक अत्यंत नैतिक और नाटकीय मोड़ है। जहाँ बड़े चारों पुत्र (यदु, तुर्वसु, द्रुह्यु और अनु) अपने स्वार्थ और बुढ़ापे के कष्टों के भय से अपने पिता को युवावस्था देने से इंकार कर देते हैं, वहीं शर्मिष्ठा का सबसे छोटा पुत्र पूरु अपने पिता के प्रति संपूर्ण समर्पण और कर्तव्य-भाव दिखाते हुए अपना युवापन उन्हें सौंप देता है। इसी प्रसंग के परिणामस्वरूप राजा ययाति प्रसन्न होकर पूरु को अपना उत्तराधिकारी घोषित करते हैं, और आगे चलकर इसी पूरु के वंश से चक्रवर्ती सम्राटों (पौरव वंश) की उत्पत्ति होती है।

ययाति द्वारा पूरु में जरा (बुढ़ापा) संक्रान्त करने का प्रसंग (1-78-37)

  • मूल श्लोक:

वैशंपायन उवाच। 1-78-37 एवमुक्त्वा ययातिस्तु स्मृत्वा काव्यं महातपाः। संक्रामयामास जरां तदा पूरौ महात्मनि।। 1-78-37

  • हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा—महातपा राजा ययाति ने पूरु से ऐसा कहकर और शुक्राचार्य के (वरदान/विधान के) स्मरण करके, अपनी उस वृद्धावस्था (जरा) को उन महात्मा पुत्र पूरु के शरीर में संक्रान्त (स्थानांतरित) कर दिया।
।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि
संभवपर्वणि अष्टसप्ततितमोऽध्यायः।। 78 ।।