महाभारत के आदिपर्व (संभवपर्व) के 71वें अध्याय के इन श्लोकों में कच और देवयानी के प्रसिद्ध संवाद का वर्णन है, जब मृतसंजीवनी विद्या सीखने के बाद कच देवताओं के लोक लौटने लगते हैं।
वैशंपायन उवाच (श्लोक 1-4)
मूल श्लोक: समावृतव्रतं तं तु विसृष्टं गुरुणा कचम्। प्रस्थितं त्रिदशावासं देवयान्यब्रवीदिदम्।। ऋषेरङ्गिरसः पौत्र वृत्तेनाभिजनेन च। भ्राजसे विद्यया चैव तपसा च दमेन च।। ऋषिर्यथाङ्गिरा मान्यः पितुर्मम महायशाः। तथा प्रान्यश्च पूज्यश्च मम भूयो बृहस्पतिः।। एवं ज्ञात्वा विजानीहि यद्ब्रवीमि तपोधन। व्रतस्थे नियमोपेते यथा वर्ताम्यहं त्वयि।।
हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं कि अपने गुरु (शुक्रचार्य) से विदा लेकर, व्रत समाप्त कर चुके और देवताओं के लोक (स्वर्ग) जाने के लिए प्रस्थान कर रहे कच से देवयानी ने यह बात कही—हे अंगिरस ऋषि के पौत्र कच! तुम अपने कुल, आचरण, विद्या, तप और इंद्रिय निग्रह से बहुत सुशोभित हो रहे हो। जैसे महायशाषि अंगिरा ऋषि मेरे पिता (शुक्रचार्य) के लिए पूजनीय और मान्य हैं, वैसे ही तुम्हारे पिता बृहस्पति भी मेरे लिए अत्यंत पूजनीय और मान्य हैं। हे तपोधन! यह सब जानकर तुम मेरे उस कथन को समझना, जो मैं व्रत और नियमों का पालन करने वाले तुम्हारे प्रति कह रही हूँ।
व्याख्या: यहाँ देवयानी कच के प्रति अपने प्रेम और आकर्षण को प्रकट करने की भूमिका बनाती है। वह कच के महान वंश (अंगिरस कुल) और उनकी विद्या-तपस्या की प्रशंसा करती है। साथ ही, दोनों ऋषियों (अंगिरा और बृहस्पति, तथा शुक्र) के पारिवारिक व गुरुजनों के संबंधों का हवाला देकर अपने प्रस्ताव को उचित ठहराने का प्रयास करती है।
देवयानी उवाच (श्लोक 5)
मूल श्लोक: स समावृतविद्यो मां भक्तां भजितुमर्हसि। गृहाण पाणिं विधिवन्मम मन्त्रपुरस्कृतम्।।
हिन्दी अनुवाद: देवयानी ने कहा—तुम विद्या अध्ययन (व्रत) पूरा कर चुके हो। इसलिए तुम मुझ जैसी भक्त (प्रेम करने वाली) स्त्री को स्वीकार करो और विधि-विधान तथा मंत्रों के साथ मेरा पाणिग्रहण (विवाह) करो।
व्याख्या: देवयानी सीधे तौर पर कच के सामने अपने प्रेम का इज़हार करती है और उनसे विवाह करने का अनुरोध करती है। वह मानती है कि उनकी शिक्षा पूरी हो चुकी है और अब वे गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कर सकते हैं।
कच उवाच (श्लोक 6-8)
मूल श्लोक: पूज्यो मान्यश्च भगवान्यथा तव पिता मम। तथा त्वमनवद्याङ्गि पूजनीयतरा मम।। प्राणेभ्योऽपि प्रियतरा भार्गवस्य महात्मनः। त्वं भत्रे धर्मतः पूज्या गुरुपुत्री सदा मम।। यथा मम गुरुर्नित्यं मान्यः शुक्रः पिता तव। देवयानि तथैव त्वं नैवं मां वक्तुमर्हसि।।
हिन्दी अनुवाद: कच ने कहा—हे सुंदर अंगों वाली देवयानी! तुम्हारे पिता भगवान शुक्र जिस प्रकार मेरे लिए पूज्य और मान्य हैं, उससे भी अधिक पूजनीय तुम मेरे लिए हो। महात्मा भृगुवंशी (शुक्र) को तुम अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय हो। धर्म के अनुसार तुम मेरी गुरुपुत्री होने के कारण हमेशा मेरी पूजनीय हो। हे देवयानि! जिस प्रकार मेरे गुरु तुम्हारे पिता शुक्र मेरे लिए सर्वदा आदरणीय हैं, वैसे ही तुम भी हो। इसलिए तुम्हें मुझे ऐसा (विवाह का प्रस्ताव) नहीं कहना चाहिए।
व्याख्या: कच अपनी मर्यादा और धर्म का पालन करते हुए देवयानी के प्रस्ताव को अस्वीकार करते हैं। वे तर्क देते हैं कि शुक्रचार्य उनके गुरु हैं, और उस नाते देवयानी उनकी 'गुरुपुत्री' (बहन के समान) है। गुरु की पुत्री के साथ विवाह करना धर्म के विरुद्ध और अनैतिक है।
देवयानी उवाच (श्लोक 9-11)
मूल श्लोक: गुरुपुत्रस्य पुत्रो वै न त्वं पुत्रश्च मे पितुः। तस्मात्पूज्यश्च मान्यश्च ममापि त्वं द्विजोत्तम।। असुरैर्हन्यमाने च कच त्वयि पुनःपुनः। तदाप्रभृति या प्रीतिस्तां त्वमद्य स्मरस्व मे।। सौहार्दे चानुरागे च वेत्थ मे भक्तिमुत्तमाम्। न मामर्हसि धर्मज्ञ त्यक्तुं भक्तामनागसम्।।
हिन्दी अनुवाद: देवयानी ने कहा—हे द्विजोत्तम! तुम गुरुपुत्र (बृहस्पति) के पुत्र हो, मेरे पिता (शुक्र) के सीधे पुत्र नहीं हो (अर्थात हमारा खून का या सीधा भाई-बहन का संबंध नहीं है)। इसलिए तुम मेरे लिए पूजनीय और मान्य होने के साथ-साथ अन्य योग्य भी हो। असुरों द्वारा बार-बार मारे जाने पर जब-जब तुम्हारी रक्षा हुई, उस समय से मेरे मन में तुम्हारे प्रति जो प्रेम उत्पन्न हुआ था, आज तुम उसका स्मरण करो। हे धर्मज्ञ! तुम मेरे सौहार्द, अनुराग और उत्तम भक्ति को अच्छी तरह जानते हो। इसलिए मुझ जैसी निर्दोष और तुमसे प्रेम करने वाली को त्यागना तुम्हें शोभा नहीं देता।
व्याख्या: देवयानी कच के इस तर्क को खंडित करती है कि वे भाई-बहन हैं। वह कहती है कि कच गुरु के पुत्र के पुत्र (पौत्र तुल्य या वंशज) हैं, अतः प्रत्यक्ष भाई-बहन का बंधन नहीं है। वह असुरों द्वारा कच की हत्या के समय अपने द्वारा की गई चिंता और प्रेम को याद दिलाती है, जो उनके बीच गहरे भावनात्मक जुड़ाव का आधार था।
कच उवाच (श्लोक 12-15)
मूल श्लोक: अनियोज्ये नियोक्तुं मां देवयानि न चार्हसि। प्रसीद सुभ्रु त्वं मह्यं गुरोर्गुरुतरा शुभे।। यत्रोषितं विशालाक्षि त्वया चन्द्रनिभानने। तत्राहमुषितो भद्रे कुक्षौ काव्यस्य भामिनि।। भगिनी धर्मतः मे त्वं मैवं वोचः सुमध्यमे। सुखमस्म्युषितो भद्रे न मन्युर्विद्यते मम।। आपृच्छे त्वां गमिष्यामि शिवमाशंस मे पथि। अविरोधेन धर्मस्य स्मर्तव्योऽस्मि कथान्तरे। अप्रमत्तोत्थिता नित्यमाराधय गुरुं मम।।
हिन्दी अनुवाद: कच ने कहा—हे देवयानि! जिस कार्य में मुझे नहीं लगाना चाहिए, उसमें तुम मुझे नियुक्त (प्रेरित) करने के योग्य नहीं हो। हे शुभस्वभावे सुभ्रु! तुम मुझ पर प्रसन्न हो जाओ, क्योंकि तुम गुरु से भी बढ़कर (गुरुपुत्री होने के कारण आदरणीय) हो। हे विशालाक्षी चंद्रानने भामिनी! हे भद्रे! तुमने जिस प्रकार उदर (पेट) में वास किया था, उसी प्रकार मैं भी काव्य (शुक्र) के उदर में रहा हूँ। हे सुंदर कटिप्रदेश वाली भद्रे! धर्म की दृष्टि से तुम मेरी बहन हो, इसलिए ऐसा मत कहो। मैं वहाँ (शुक्र के पेट में) सुखपूर्वक रहा हूँ और मेरे मन में कोई द्वेष या क्रोध नहीं है। अब मैं तुमसे विदा मांगता हूँ, मैं जा रहा हूँ, मार्ग में मेरे लिए मंगलमय कामना करो। धर्म के अनुकूल रहते हुए कभी प्रसंगवश मेरा स्मरण करना और हमेशा सावधान रहकर मेरे गुरु (शुक्रचार्य) की आराधना करना।
व्याख्या: कच यहाँ एक बहुत ही महत्वपूर्ण और रोचक तर्क देते हैं—चूँकि कच को असुरों ने मारकर जला दिया था और शुक्रचार्य ने उन्हें अपने पेट (उदर) में संजीवनी विद्या से पुनर्जीवित किया था, और देवयानी भी शुक्रचार्य की पुत्री होने के नाते वहीं से जुड़ी रही हैं, इस प्रकार वे दोनों एक ही गुरु के उदर में निवास करने के कारण भाई-बहन (गर्भ-सहसंबध या आध्यात्मिक सहोदर) जैसे हो गए। कच अपने इस पवित्र और धर्मसम्मत रुख पर अडिग रहते हैं और देवयानी से विदा लेते हैं।
देवयानी उवाच (श्लोक 16)
मूल श्लोक: यदि मां धर्मकामार्थे प्रत्याख्यास्यसि याचितः। ततः कच न ते विद्या सिद्धिमेषा गमिष्यति।।
हिन्दी अनुवाद: देवयानी ने कहा—यदि मांगने पर भी तुम धर्म, काम और अर्थ के अनुरोध से मुझे इस प्रकार अस्वीकार करोगे, तो हे कच! तुम्हारी यह सीखी हुई विद्या कभी भी सिद्ध (फलित) नहीं होगी।
व्याख्या: अपने प्रेम और विवाह के प्रस्ताव के ठुकराए जाने से क्रोधित और आहत होकर देवयानी कच को कठोर शाप दे देती है कि उनकी वर्षों की तपस्या से अर्जित की गई मृतसंजीवनी विद्या निष्फल हो जाएगी और उनके काम नहीं आएगी।
कच उवाच (श्लोक 17-20)
मूल श्लोक: गुरुपुत्रीति कृत्वाऽहं प्रत्याचक्षे न दोषतः। गुरुणा चाननुज्ञातः काममेवं शपस्व माम्।। आर्षं धर्मं ब्रुवाणोऽहं देवयानि यथा त्वया। शप्तो ह्यनर्हः शापस्य कामतोऽद्य न धर्मतः।। तस्माद्भवत्या यः कामो न तथा स भविष्यति। ऋषिपुत्रो न ते कश्चिज्जातु पाणिं ग्रहीष्यति।। फलिष्यति न ते विद्या यत्त्वं मामात्थ तत्तथा। अध्यापयिष्यामि तु यं तस्य विद्या फलिष्यति।।
हिन्दी अनुवाद: कच ने कहा—मैंने तुम्हें दोष के कारण नहीं, बल्कि 'गुरुपुत्री' मानकर ही प्रस्ताव अस्वीकार किया है। गुरु की अनुमति के बिना मैं ऐसा नहीं कर सकता, अतः तुम्हारी इच्छा हो तो मुझे शाप दे दो। हे देवयानि! मैं ऋषि-धर्म का पालन कर रहा हूँ, फिर भी तुमने मुझ पर काम-वश होकर जो यह अनुचित शाप दिया है, इसके योग्य मैं नहीं था। इसलिए तुम्हारी जो कामना (विवाह की इच्छा) है, वैसी पूरी नहीं होगी—किसी भी ऋषि का पुत्र कभी भी तुम्हारा पाणिग्रहण (विवाह) नहीं करेगा। और जैसा तुमने मुझसे कहा है, वैसे ही तुम्हारी यह विद्या भी (तुम्हें स्वयं सिद्ध करने पर) फलित नहीं होगी; हाँ, तुम जिस किसी (अन्य शिष्य) को यह विद्या पढ़ाओगी, उसके लिए वह विद्या अवश्य फलित होगी।
व्याख्या: कच अपने धर्म पर अडिग रहते हैं और देवयानी के अन्यायपूर्ण शाप का प्रतिउत्तर (प्रतिकार) देते हुए उसे भी पलटकर शाप देते हैं। कच कहते हैं कि चूँकि देवयानी ने कामवासना के वशीभूत होकर एक धर्मनिष्ठ को शाप दिया है, इसलिए कोई भी ऋषिपुत्र उससे विवाह नहीं करेगा। साथ ही, वे यह भी वरदान-वचन देते हैं कि देवयानी स्वयं उस विद्या का उपयोग नहीं कर पाएगी, लेकिन जिसे वह सिखाएगी, उसके लिए वह विद्या जरूर काम करेगी (जो आगे चलकर राजा ययाति और उनके वंश के प्रसंग में प्रासंगिक बनता है)।
वैशंपायन उवाच (श्लोक 21-23) एवं देवा ऊचुः
मूल श्लोक: एवं मुक्त्वा द्विजश्रेष्ठो देवयानीं कचस्तदा। त्रिदशेशालयं शीघ्रं जगाम द्विजसत्तमः।। तमागतमभिप्रेक्ष्य देवा इन्द्रपुरोगमाः। बृहस्पतिं सभाज्येदं कचं वचनमब्रुवन्।। देवा ऊचुः। यत्त्वयास्मद्धितं कर्म कृतं वै परमाद्भुतम्। न ते यशः प्रणशिता भागभाक्व भविष्यसि।।
हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं कि द्विजश्रेष्ठ कच देवयानी से ऐसा कहकर शीघ्र ही देवताओं के लोक (स्वर्ग) चले गए। इंद्र आदि देवताओं ने उन श्रेष्ठ कच को वहाँ आया हुआ देखकर और उनके पिता बृहस्पति का अभिनंदन करके कच से ये वचन कहे—देवताओं ने कहा: हे कच! तुमने देवताओं के हित के लिए जो यह परम अद्भुत कार्य किया है, तुम्हारा वह यश कभी नष्ट नहीं होगा और तुम यज्ञों में भाग पाने के अधिकारी (हविष्य के भागी) बनोगे।
व्याख्या: कच अपनी परीक्षा में सफल होकर और संजीवनी विद्या लेकर सकुशल देवताओं के पास लौट आते हैं। देवता कच के इस महान त्याग, संयम और पराक्रम की सराहना करते हैं और उन्हें देवताओं के समान यज्ञों में हवि पाने का अधिकार प्रदान करने की घोषणा करते हैं।
।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि
संभवपर्वणि एकसप्ततितमोऽध्यायः।। 71 ।।
