🚩‼️ ओ३म् ‼️🚩
"मारा हुआ धर्म कहीं तुम्हें न मार दे!"
धर्म का वास्तविक स्वरूप, मनुस्मृति के प्रमाण और महर्षि दयानन्द का सत्य-दर्शन
"धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।" — मनुस्मृति 8.15
यह मनुस्मृति का केवल एक श्लोक नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानव सभ्यता के लिए चेतावनी है। आज संसार में धर्म के नाम पर जितने विवाद, संघर्ष, पाखण्ड, अन्धविश्वास और विभाजन दिखाई देते हैं, उनका मूल कारण धर्म का अभाव नहीं, बल्कि धर्म के वास्तविक स्वरूप को भूल जाना है। मनुष्य धर्म को मानता तो है, परन्तु उसे जीता नहीं; धर्म की चर्चा करता है, पर उसका आचरण नहीं करता; धर्म के नाम पर अभिमान करता है, पर धर्म के गुण अपने जीवन में धारण नहीं करता।
इसीलिए मनु का यह वचन आज भी उतना ही प्रासंगिक है—
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्।। (मनुस्मृति 8.15)
अर्थ: जो धर्म का नाश करता है, वही धर्म अन्ततः उसका नाश कर देता है। और जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। इसलिए धर्म का कभी परित्याग नहीं करना चाहिए।
धर्म क्या है?
आज सबसे बड़ा भ्रम यही है कि धर्म को किसी सम्प्रदाय, मत, पूजा-पद्धति, वेशभूषा या बाहरी पहचान तक सीमित कर दिया गया है।
किन्तु संस्कृत व्याकरण के अनुसार "धर्म" शब्द "धृ धारणे" धातु से बना है, जिसका अर्थ है—जो धारण करने योग्य है और जो संसार को धारण करे।
अतः धर्म का अर्थ किसी विशेष पंथ का नाम नहीं, बल्कि वह आचरण है जो व्यक्ति, समाज और विश्व का कल्याण करे।
वेदों में धर्म का आधार सत्य, न्याय, करुणा, संयम, विद्या और लोककल्याण है।
यदि किसी व्यक्ति के जीवन में सत्य नहीं, न्याय नहीं, करुणा नहीं, संयम नहीं, तो वह चाहे जितने धार्मिक अनुष्ठान करे, धर्म का वास्तविक स्वरूप उसमें नहीं है।
धर्म आचरण की वस्तु है
धर्म केवल सुनने, सुनाने, बहस करने या दूसरों को उपदेश देने की वस्तु नहीं है।
धर्म का प्रमाण यह नहीं कि किसी ने कितने शास्त्र पढ़े हैं, बल्कि यह है कि उसने अपने जीवन में कितना सत्य, कितना न्याय, कितना संयम और कितना परोपकार धारण किया है।
धर्म मनुष्य को पशुता से उठाकर मानवता तक और मानवता से देवत्व तक पहुँचाता है।
यदि किसी के जीवन में क्रोध, हिंसा, छल, लोभ, घृणा, असत्य और स्वार्थ ही बढ़ते जाएँ, तो समझना चाहिए कि धर्म का नहीं, केवल धार्मिक आडम्बर का विकास हुआ है।
मृत्यु के बाद कौन साथ जाता है?
मनु का उत्तर अत्यन्त स्पष्ट है—
नामुत्र हि सहायार्थं पितामाता च तिष्ठतः।न पुत्रदारं न ज्ञातिर्धर्मस्तिष्ठति केवलः।। (मनुस्मृति 4.239)
अर्थात् मृत्यु के बाद न माता-पिता, न पुत्र, न पत्नी, न बन्धु—कोई साथ नहीं जाता; केवल धर्म साथ जाता है।
इसी बात को आगे और स्पष्ट किया गया है—
एकः प्रजायते जन्तुरेक एव प्रलीयते।एकोऽनुभुङ्क्ते सुकृतमेक एव च दुष्कृतम्।। (मनुस्मृति 4.240)
मनुष्य अकेला जन्म लेता है, अकेला मरता है और अपने शुभ-अशुभ कर्मों का फल भी अकेला ही भोगता है।
यह कर्म-सिद्धान्त का अत्यन्त वैज्ञानिक और नैतिक स्वरूप है। कोई दूसरा व्यक्ति हमारे पापों का फल नहीं भोग सकता और न ही हमारे स्थान पर पुण्य का फल प्राप्त कर सकता है।
शरीर नहीं, धर्म साथ जाता है
मनु आगे कहते हैं—
मृतं शरीरमुत्सृज्य काष्ठलोष्ठसमं क्षितौ।विमुखा बान्धवा यान्ति धर्मस्तमनुगच्छति।। (मनुस्मृति 4.241)
मृत्यु के बाद सम्बन्धी भी शरीर को छोड़कर लौट जाते हैं। केवल धर्म ही आत्मा के साथ जाता है।
यह शिक्षा मनुष्य को बाहरी संग्रह से अधिक आन्तरिक चरित्र निर्माण की प्रेरणा देती है।
अधर्म का परिणाम
आज बहुत से लोग पूछते हैं—यदि अधर्म बुरा है, तो अधर्मी लोग सुखी क्यों दिखाई देते हैं?
मनु इसका उत्तर भी देते हैं—
नाधर्मश्चरितो लोके सद्यः फलति गौरिव।शनैरावर्तमानस्तु कर्तुर्मूलानि कृन्तति।। (मनुस्मृति 4.172)
अर्थात् अधर्म तत्काल फल नहीं देता, परन्तु धीरे-धीरे मनुष्य के जीवन की जड़ों को काट देता है।
आगे कहते हैं—
अधर्मेणैधते तावत्ततो भद्राणि पश्यति।ततः सपत्नाञ्जयति समूलस्तु विनश्यति।। (मनुस्मृति 4.174)
अधर्मी व्यक्ति प्रारम्भ में उन्नति करता हुआ प्रतीत हो सकता है, किन्तु अन्ततः उसका पतन निश्चित होता है।
इतिहास इस सिद्धान्त का साक्षी है। अन्याय पर बने साम्राज्य अधिक समय तक टिके नहीं।
धर्म के दस लक्षण
मनुस्मृति धर्म को केवल पूजा तक सीमित नहीं करती। वह धर्म के दस लक्षण बताती है—
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्।। (मनुस्मृति 6.92)
अर्थात्—
- धैर्य
- क्षमा
- मन का संयम
- चोरी न करना
- शुद्धता
- इन्द्रिय-निग्रह
- बुद्धि की पवित्रता
- विद्या
- सत्य
- क्रोध का त्याग
यदि कोई व्यक्ति इन दस गुणों को धारण करता है, वही वास्तव में धार्मिक है।
महर्षि दयानन्द का धर्म-दर्शन
महर्षि ने धर्म को अन्धविश्वास से मुक्त कर सत्य पर आधारित बनाया।
उनका प्रसिद्ध वाक्य है—
"सत्य के ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिए।"
इसका अर्थ है कि किसी बात को केवल परम्परा, भय, बहुमत या प्रसिद्धि के आधार पर सत्य न मान लिया जाए। उसे वेद, युक्ति, प्रत्यक्ष, अनुमान और आप्त प्रमाण की कसौटी पर परखा जाए।
जो सत्य सिद्ध हो, उसे स्वीकार किया जाए; जो असत्य सिद्ध हो, उसे छोड़ दिया जाए।
यही वैज्ञानिक दृष्टि है।
अन्धश्रद्धा कैसे उत्पन्न होती है?
आत्मा का स्वभाव सत्य को स्वीकार करना है, परन्तु जब मनुष्य लोभ, भय, मोह, प्रतिष्ठा या स्वार्थ के कारण असत्य में विश्वास कर लेता है, तो वही अन्धश्रद्धा बन जाती है।
अन्धश्रद्धा का आधार ज्ञान नहीं, बल्कि अज्ञान होता है।
जहाँ विवेक समाप्त होता है, वहीं पाखण्ड जन्म लेता है।
पाखण्ड क्यों फैलता है?
पाखण्ड वहीं फलता-फूलता है जहाँ लोग प्रश्न पूछना छोड़ देते हैं।
यदि प्रत्येक धार्मिक मान्यता को वेद, व्याकरण, तर्क और प्रमाण की कसौटी पर परखा जाए, तो अनेक भ्रान्तियाँ स्वतः समाप्त हो जाएँगी।
इसी कारण इतिहास में अनेक स्वार्थी लोगों ने जनसाधारण को ज्ञान से दूर रखने का प्रयास किया। क्योंकि जिस दिन मनुष्य स्वयं पढ़ने, सोचने और विवेक से निर्णय लेने लगेगा, उस दिन पाखण्ड का आधार कमजोर पड़ जाएगा।
सत्य की कसौटी
वैदिक परम्परा किसी भी मत को आँखें बन्द करके स्वीकार करने की शिक्षा नहीं देती।
सत्य की परीक्षा के प्रमुख आधार हैं—
- वेदसम्मत होना।
- युक्तिसंगत होना।
- प्रत्यक्ष और अनुभव से मेल खाना।
- न्याय और नैतिकता के अनुकूल होना।
- लोककल्याणकारी होना।
जो इन कसौटियों पर खरा उतरता है, वही धर्म है।
धर्म की रक्षा कैसे करें?
धर्म की रक्षा शस्त्रों से पहले चरित्र से होती है।
यदि व्यक्ति—
- सत्य बोले,
- न्याय करे,
- परिश्रम करे,
- विद्या प्राप्त करे,
- स्त्री-पुरुष सबको शिक्षा का अधिकार दे,
- किसी के साथ अन्याय न करे,
- समाज में प्रेम और सहयोग बढ़ाए,
तो वही धर्म की रक्षा है।
निष्कर्ष
धर्म किसी सम्प्रदाय का नाम नहीं, बल्कि सत्य और सदाचार का नाम है। धर्म का उद्देश्य मनुष्य को श्रेष्ठ बनाना है, न कि उसे अहंकारी, कट्टर या अन्धविश्वासी बनाना।
मनु का यह वचन आज भी उतना ही सत्य है—
"धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।"
यदि हम धर्म के वास्तविक स्वरूप—सत्य, न्याय, विद्या, संयम, करुणा और परोपकार—को छोड़ देंगे, तो उसका परिणाम व्यक्ति, समाज और राष्ट्र—तीनों को भुगतना पड़ेगा। किन्तु यदि हम धर्म को अपने जीवन में धारण करेंगे, तो वही धर्म हमारी रक्षा करेगा।
अतः आइए, हम धर्म का प्रदर्शन नहीं, धर्म का आचरण करें; मत का नहीं, सत्य का पक्ष लें; अन्धविश्वास का नहीं, विवेक का अनुसरण करें; और महर्षि दयानन्द के इस वाक्य को जीवन का सिद्धान्त बनाएँ—
"सत्य के ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिए।"
यही वैदिक धर्म है, यही मानव धर्म है, और यही समस्त मानवता के कल्याण का मार्ग है।

0 टिप्पणियाँ
If you have any Misunderstanding Please let me know