ऋग्वेद १०.६३.७ मन्त्र का भावार्थ एवं व्याख्या
मन्त्र:
ॐ येभ्यो होत्रां प्रथमामायेजे मनुः समिद्धाग्निर्मनसा सप्त होतृभिः।त आदित्या अभयं शर्म यच्छत सुगा नः कर्त सुपथा स्वस्तये॥(ऋग्वेद १०.६३.७)
शब्दार्थ
- येभ्यः — जिनके लिए।
- होत्राम् — यज्ञ, उपासना अथवा आहुति का कर्म।
- प्रथमाम् — सर्वप्रथम।
- आयेजे — सम्पन्न किया, आरम्भ किया।
- मनुः — आदि धर्मज्ञ मनुष्य, मनु।
- समिद्ध-अग्निः — प्रज्वलित अग्नि, जाग्रत ज्ञान और उत्साह।
- मनसा — मन से, श्रद्धापूर्वक।
- सप्त होतृभिः — सात होत्रों (यज्ञ के सात अंगों अथवा ज्ञान, इन्द्रियों और कर्तव्यों के समन्वय) के साथ।
- आदित्याः — न्यायकारी, प्रकाशस्वरूप, पालनकर्ता दिव्य शक्तियाँ; परमात्मा के नियमों के अधीन कार्य करने वाले।
- अभयम् — निर्भयता।
- शर्म — सुख, शान्ति, संरक्षण।
- सुगा — सुगम।
- सुपथा — उत्तम मार्ग।
- स्वस्तये — कल्याण के लिए।
भावार्थ
जिन परम दिव्य शक्तियों के निमित्त आदि पुरुष मनु ने प्रज्वलित अग्नि और एकाग्र मन से यज्ञ का प्रथम आयोजन किया, वे आदित्य हमें निर्भयता, सुरक्षा और सुख प्रदान करें। वे हमारे लिए कल्याणकारी मार्ग को सुगम बनाएँ, जिससे हम जीवन में धर्म, सत्य और मंगल के पथ पर अग्रसर हों।
व्याख्या
यह मन्त्र मानव सभ्यता के मूल वैदिक आदर्शों की ओर संकेत करता है। इसमें मनु को उस आदर्श मानव के रूप में प्रस्तुत किया गया है जिसने सबसे पहले ईश्वर की आज्ञा के अनुसार यज्ञ, उपासना और लोककल्याणकारी जीवन का मार्ग अपनाया।
यहाँ "यज्ञ" का अर्थ केवल अग्नि में आहुति देना नहीं, बल्कि ऐसा प्रत्येक श्रेष्ठ कर्म है जिससे ईश्वर-भक्ति, ज्ञान-वृद्धि, पर्यावरण की रक्षा, समाज की सेवा और आत्मोन्नति हो।
"सप्त होतृभिः" का तात्पर्य यह भी है कि मनुष्य अपने सम्पूर्ण व्यक्तित्व—मन, वाणी, कर्म, ज्ञान और इन्द्रियों—को अनुशासित करके ईश्वर की उपासना और लोकहित में लगाए।
मन्त्र में आदित्यों से प्रार्थना की गई है कि वे हमें:
- भय और अन्याय से मुक्त करें,
- आन्तरिक शान्ति प्रदान करें,
- और सत्य तथा धर्म के सरल मार्ग पर चलने की प्रेरणा दें।
जीवनोपयोगी संदेश
- प्रत्येक शुभ कार्य ईश्वर-स्मरण और पवित्र संकल्प से आरम्भ करना चाहिए।
- यज्ञ का वास्तविक स्वरूप परोपकार, सेवा, शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण और सदाचार है।
- निर्भय जीवन वही जी सकता है जो सत्य और धर्म का पालन करता है।
- समाज का कल्याण व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर है।
- जीवन का श्रेष्ठ मार्ग वही है जो स्वयं के साथ-साथ समस्त प्राणियों के हित का कारण बने।
वैदिक दृष्टि
यह मन्त्र स्पष्ट करता है कि वैदिक संस्कृति का आधार यज्ञ, ज्ञान, अनुशासन, निर्भयता और लोकमंगल है। मनुष्य को ऐसा जीवन जीना चाहिए जो ईश्वर की आज्ञा, सत्य और धर्म पर आधारित हो। तब उसका मार्ग सुगम होता है और उसका जीवन स्वयं तथा समाज—दोनों के लिए कल्याणकारी बनता है।
निष्कर्ष
ऋग्वेद का यह मन्त्र हमें प्रेरणा देता है कि हम मनु के आदर्शों का अनुसरण करते हुए ईश्वर की उपासना, श्रेष्ठ कर्म, सत्य, सेवा और लोककल्याण का मार्ग अपनाएँ। ऐसा जीवन ही "सुपथा स्वस्तये"—अर्थात् कल्याणकारी और मंगलमय मार्ग—की प्राप्ति कराता है।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।

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