श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः


महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत 132वें अध्याय के सभी श्लोकों का क्रमवार हिंदी अनुवाद और उनकी विस्तृत व्याख्या नीचे दी गई है:

श्लोक 1

वैशंपायन उवाच। जाते बलवतां श्रेष्ठे पाण्डुश्चिन्तापरोऽभवत्। कथमन्यो मम सुतो लोके श्रेष्ठो भवेदिति।।

  • हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा— बलवानों में श्रेष्ठ भीमसेन के उत्पन्न होने के बाद राजा पाण्डु चिंता में पड़ गए और सोचने लगे कि अब मेरा दूसरा पुत्र संसार में सबसे श्रेष्ठ कैसे हो सकता है?
  • व्याख्या: युधिष्ठिर और भीम के जन्म के बाद पाण्डु को यह चिंता सताने लगी थी कि भीम के समान ही उनका अगला पुत्र भी पराक्रमी और लोकोत्तर गुणों से युक्त होना चाहिए।

श्लोक 2

दैवे पुरुषकारे च लोकोऽयं संप्रतिष्ठितः। तत्र दैवं तु विधिना कालयुक्तेन लभ्यते।।

  • हिंदी अनुवाद: यह संपूर्ण संसार दैव (भाग्य) और पुरुषार्थ (कर्म)— इन दोनों पर टिका हुआ है। इनमें से भाग्य तो उचित समय आने पर विधि-विधान से प्राप्त होता है।
  • व्याख्या: पाण्डु भाग्य और पुरुषार्थ के संतुलन पर विचार कर रहे हैं। उनका मानना था कि श्रेष्ठ संतान पाने के लिए मनुष्य को अपने पुरुषार्थ (तपस्या) का सहारा लेना चाहिए।

श्लोक 3

इन्द्रो हि राजा देवानां प्रधान इति नः श्रुतम्। अप्रमेयबलोत्साहो वीर्यवानमितद्युतिः।।

  • हिंदी अनुवाद: हमने ऐसा सुना है कि देवराज इंद्र सभी देवताओं के प्रमुख और राजा हैं। उनका बल और उत्साह अप्रमेय (अमित) है, वे अत्यधिक पराक्रमी और असीम कांति वाले हैं।
  • व्याख्या: राजा पाण्डु अपने अगले पुत्र के रूप में साक्षात देवराज इंद्र जैसे पराक्रमी और तेजस्वी पुत्र की कामना करते हैं और इंद्र की महानता का स्मरण करते हैं।

श्लोक 4

तं तोषयित्वा तपसा पुत्रं लप्स्ये महाबलम्। यं दास्यति स मे पुत्रं स वीरयान्भविष्यति।।

  • हिंदी अनुवाद: मैं कठोर तपस्या के द्वारा उन देवराज इंद्र को प्रसन्न करके एक महाबली पुत्र प्राप्त करूँगा। वे मुझे जो पुत्र देंगे, वही समस्त वीरों में श्रेष्ठ होगा।
  • व्याख्या: पाण्डु ने यह दृढ़ निश्चय किया कि वे इंद्र को प्रसन्न करने के लिए तपस्या करेंगे ताकि उन्हें इंद्र के समान ही शक्तिशाली पुत्र प्राप्त हो सके।

श्लोक 5

अमानुषान्मानुषांश्च संग्रामे स हनिष्यति। कर्मणा मनसा वाचा तस्मात्तप्स्ये महत्तपः।।

  • हिंदी अनुवाद: वह पुत्र युद्ध में मनुष्य और दैत्य-दानवों दोनों का संहार कर सकेगा। इसलिए मैं अपने कर्म, मन और वाणी से महान तपस्या करूँगा।
  • व्याख्या: पाण्डु अपने भावी पुत्र के असाधारण सामर्थ्य की कल्पना करते हुए पूरी निष्ठा और पवित्रता के साथ तपस्या करने का संकल्प लेते हैं।

श्लोक 6

ततः पाण्डुर्महाराजो मन्त्रयित्वा महर्षिभिः। दिदेश कुन्त्याः कौरव्यो व्रतं सांवत्सरं शुभम्।।

  • हिंदी अनुवाद: तदनंतर कुरुवंश के श्रेष्ठ महाराज पाण्डु ने महर्षियों से विचार-विमर्श करके कुंती को एक वर्ष तक चलने वाले शुभ व्रत का आदेश दिया।
  • व्याख्या: महर्षियों की सलाह पर पाण्डु और कुंती ने इंद्र की आराधना के लिए एक वर्ष के विशेष व्रत और तपस्या का अनुष्ठान प्रारंभ किया।

श्लोक 7

आत्मना च महाबाहुरेकपादस्थितोऽभवत्। उग्रं स तप आस्थाय परमेण समाधिना।।

  • हिंदी अनुवाद: महाबाहु राजा पाण्डु ने स्वयं भी एकाग्र चित्त और परम समाधि में स्थित होकर एक पैर पर खड़े हो जाने जैसी उग्र तपस्या का आश्रय लिया।
  • व्याख्या: पाण्डु ने अपनी रानी कुंती के साथ स्वयं भी अत्यंत कठिन शारीरिक और मानसिक अनुशासन वाली तपस्या की।

श्लोक 8

आरिराधयिषुर्देवं त्रिदशानां तमीश्वरम्। सूर्येण सह धर्मात्मा पर्यतप्यत भारत।।

  • हिंदी अनुवाद: हे भरतवंशी जनमेजय! देवताओं के उन स्वामी (इन्द्र) को प्रसन्न करने की इच्छा रखने वाले धर्मात्मा पाण्डु सूर्य के साथ (कड़ी धूप और नियम में) बैठकर तपस्या करने लगे।
  • व्याख्या: पाण्डु की यह तपस्या इतनी तीव्र थी कि वे प्राकृतिक कष्टों को सहन करते हुए पूरी तन्मयता से देवराज की आराधना में लीन रहे।

श्लोक 9

तं तु कालेन महता वासवः प्रत्यपद्यत। शक्र उवाच। पुत्रं तव प्रदास्यामि त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्।।

  • हिंदी अनुवाद: बहुत लंबे समय तक तपस्या करने पर इंद्र ने उन्हें दर्शन दिए और कहा— मैं तुम्हें तीनों लोकों में प्रसिद्ध होने वाला पुत्र प्रदान करूँगा।
  • व्याख्या: पाण्डु की कठिन तपस्या से संतुष्ट होकर देवराज इंद्र ने प्रकट होकर उन्हें उनकी इच्छा के अनुसार वरदान देने की घोषणा की।

श्लोक 10

ब्राह्मणानां गवां चैव सुहृदां चार्थसाधकम्। दुर्हृदां शोकजननं सर्वबान्धवनन्दनम्।।

  • हिंदी अनुवाद: वह पुत्र ब्राह्मणों और गायों का तथा मित्रों का हित साधने वाला होगा, शत्रुओं के लिए शोक पैदा करने वाला और समस्त बंधु-बांधवों को आनंदित करने वाला होगा।
  • व्याख्या: इंद्र ने होने वाले पुत्र के चरित्र और उसके प्रभाव का वर्णन किया कि वह अपनों के लिए सुखद और शत्रुओं के लिए कालस्वरूप होगा।

श्लोक 11

सुतं तेऽग्र्यं प्रदास्यामि सर्वामित्रविनाशनम्। इत्युक्तः कारैवो राजा वासवेन महात्मना।।

  • हिंदी अनुवाद: मैं तुम्हें सब शत्रुओं का नाश करने वाला तुम्हारा वह उत्तम पुत्र दूँगा— जब महात्मा इंद्र ने कौरव राज पाण्डु से ऐसा कहा...
  • व्याख्या: इंद्र ने पाण्डु को पूर्ण रूप से आश्वस्त कर दिया कि उनका यह भावी पुत्र अजेय और शत्रु-विनाशक होगा।

श्लोक 12

उवाच कुन्तीं धर्मात्मा देवराजवचः स्मरन्। उदर्कस्तव कल्याणि तुष्टो देवगणेश्वरः।।

  • हिंदी अनुवाद: तब धर्मात्मा पाण्डु ने देवराज इंद्र के वचनों का स्मरण करते हुए कुंती से कहा— हे कल्याणि! देवताओं के स्वामी इंद्र तुमसे संतुष्ट हो गए हैं और तुम्हारा भविष्य उज्ज्वल है।
  • व्याख्या: पाण्डु ने प्रसन्न होकर कुंती को देवराज इंद्र के वरदान और उनके वचनों के बारे में विस्तार से बताया।

श्लोक 13

दातुमिच्छति ते पुत्रं यथा संकल्पितं त्वया। अतिमानुषकर्माणं यशस्विनमरिन्दमम्।।

  • हिंदी अनुवाद: जैसी तुम्हारी संकल्पना थी, वे तुम्हें ऐसा पुत्र देना चाहते हैं जो अलौकिक (अतिमानुष) कर्म करने वाला, यशस्वी और शत्रुओं का दमन करने वाला हो।
  • व्याख्या: पांती और पाण्डु की तपस्या का फल अब मिलने वाला था, जहाँ इंद्र ने उनकी इच्छा के अनुसार असाधारण गुणों वाले पुत्र का वरदान दिया।

श्लोक 14

नीतिमन्तं महात्मानमादित्यसमतेजसम्। दुराधर्षं क्रियावन्तमतीवाद्भुतदर्शनम्।।

  • हिंदी अनुवाद: नीतिवान, महात्मा, सूर्य के समान तेजस्वी, किसी से भी पराजित न होने वाले (दुराधर्ष), सदाचार से युक्त और अत्यंत अद्भुत रूप-सौंदर्य वाले...
  • व्याख्या: यहाँ होने वाले राजकुमार (अर्जुन) के दिव्य गुणों, रूप और उनके महान व्यक्तित्व की रूपरेखा प्रस्तुत की जा रही है।

श्लोक 15

पुत्रं जनय सुश्रोणि धाम क्षत्रियतेजसाम्। लब्धः प्रसादो देवेन्द्रात्तमाह्वय शुचिस्मिते।।

  • हिंदी अनुवाद: हे सुंदर अंगों वाली तथा पवित्र मुसकान वाली कुंती! तुम क्षत्रिय तेज के पुंज ऐसे पुत्र को उत्पन्न करो। देवेन्द्र की कृपा प्राप्त हो चुकी है, अब तुम उनका आह्वान करो।
  • व्याख्या: पाण्डु ने कुंती को प्रेरित किया कि वे देवेन्द्र का स्मरण और आह्वान करें ताकि उन्हें वह वरदान स्वरूप पुत्र प्राप्त हो सके।

श्लोक 16

वैशंपायन उवाच। एवमुक्ता ततः शक्रमाजुहाव यशस्विनी। अथाजगाम देवेन्द्रो जनयामास चार्जुनम्।।

  • हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा— पाण्डु द्वारा ऐसा कहे जाने पर यशस्विनी कुंती ने इंद्र का आह्वान किया। तब देवराज इंद्र वहाँ आए और उन्होंने अर्जुन को उत्पन्न किया।
  • व्याख्या: कुंती द्वारा आह्वान करने पर देवराज इंद्र प्रकट हुए और उनके अंश से पांडवों में तीसरे राजकुमार, महापराक्रमी अर्जुन का जन्म हुआ।

श्लोक 17

उत्तराभ्यां तु पूर्वाभ्यां फल्गुनीभ्यां ततो दिवा। जातस्तु फाल्गुने मासि तेनासौ फल्गुनःस्मृतः।।

  • हिंदी अनुवाद: उत्तरा फाल्गुनी और पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्रों के बीच दिन के समय फाल्गुन मास में इनका जन्म हुआ था, इसलिए इनका नाम 'फल्गुन' पड़ा।
  • व्याख्या: अर्जुन के जन्म के समय और नक्षत्र के आधार पर उनका एक नाम 'फल्गुन' भी रखा गया, जिसकी कथा यहाँ बताई गई है।

श्लोक 18

जातमात्रे कुमारे तु सर्वभूतप्रहर्षिणी। सूतके वर्तमानां तां वागुवाचाशरीरिणी। महागम्भीरनिर्घोषा नभो नादयती तदा।।

  • हिंदी अनुवाद: बालक के जन्म लेते ही वहाँ सभी प्राणियों को अत्यंत हर्षित करने वाली तथा आकाश को गुंजा देने वाली एक गंभीर गर्जना वाली अशरीरी (आकाशवाणी) हुई।
  • व्याख्या: अर्जुन के जन्म के समय प्राकृतिक और दिव्य उल्लास प्रकट हुआ और आकाशवाणी के माध्यम से उनके भविष्य की महानता की घोषणा की गई।

श्लोक 19

शृण्वतां सर्वभूतानां तेषां चाश्रमवासिनाम्। कुन्तीमाभाष्य विस्पष्टमुवाचेदं शुचिस्मिताम्।।

  • हिंदी अनुवाद: वहाँ उपस्थित सभी प्राणियों और आश्रमवासियों के सुनते-सुनते उस आकाशवाणी ने सुंदर मुसकान वाली कुंती को संबोधित करते हुए स्पष्ट रूप से यह बात कही।
  • व्याख्या: आकाशवाणी की यह घोषणा सभी ऋषियों, आश्रमवासियों और माता कुंती ने स्पष्ट रूप से सुनी, जिसमें अर्जुन के भावी यश का वर्णन था।

श्लोक 20

कार्तवीर्यसमः कुन्ति शिवतुल्यपराक्रमः। एष शक्र इवाजय्यो यशस्ते प्रथयिष्यति।।

  • हिंदी अनुवाद: आकाशवाणी ने कहा— हे कुंती! यह बालक कार्तवीर्य अर्जुन के समान, भगवान शिव के तुल्य पराक्रम वाला और देवराज इंद्र के समान अजेय होगा तथा तुम्हारे यश को चारों ओर फैलाएगा।
  • व्याख्या: आकाशवाणी ने अर्जुन की तुलना महान राजा कार्तवीर्य और भगवान शिव से करते हुए उनके अजेय होने की भविष्यवाणी की।

श्लोक 21

अदित्या विष्णुना प्रीतिर्यथाऽभूदभिवर्धिता। तथा विष्णुसमः प्रीतिं वर्धयिष्यति तेऽर्जुनः।।

  • हिंदी अनुवाद: माता अदिति और भगवान विष्णु के बीच जैसी प्रीति दिन-प्रतिदिन बढ़ी थी, वैसे ही यह अर्जुन भगवान विष्णु के समान तुम्हारी प्रसन्नता और प्रेम को बढ़ाएगा।
  • व्याख्या: अर्जुन के माता-पिता के प्रति प्रेम और उनकी महिमा की तुलना दिव्य संबंधों से करते हुए उनकी महानता को रेखांकित किया गया है।

श्लोक 22

एष मद्रान्वशे कृत्वा कुरूंश्च सह सोमकैः। चेदिकाशिकरूषांश्च कुरुलक्ष्मीं वहिष्यति।।

  • हिंदी अनुवाद: यह मद्र देश, कुरु वंश, सोमक, चेदि, काशि और करूष देशों को अपने वश में करके कुरु वंश की लक्ष्मी (शोभा और साम्राज्य) का वहन करेगा।
  • व्याख्या: इस श्लोक में अर्जुन के भावी दिग्विजया अभियानों और उनके द्वारा कुरु साम्राज्य के विस्तार व प्रतिष्ठा को बढ़ाने की बात कही गई है।

श्लोक 23

एतस्य भुजवीर्येण खाण्डवे हव्यवाहनः। मेदसा सर्वभूतानां तृप्तिं यास्यति वै पराम्।।

  • हिंदी अनुवाद: इसी की भुजाओं के बल से अग्नि देवता खाण्डव वन में सभी जीवों की चर्बी (आहुति) से परम तृप्ति को प्राप्त होंगे।
  • व्याख्या: यह महाभारत के प्रसिद्ध 'खाण्डव वन दहन' प्रसंग की ओर एक स्पष्ट संकेत है, जहाँ अर्जुन अग्निदेव को तृप्त करते हैं।

श्लोक 24

ग्रामणीश्च महीपालानेष जित्वा महाबलः। भ्रातृभिः सहितो वीरस्त्रीन्मेधानाहरिष्यति।।

  • हिंदी अनुवाद: यह महाबली वीर राजकुमार अन्य सभी राजाओं और आधिपत्य रखने वालों को जीतकर अपने भाइयों के साथ मिलकर तीन बड़े यज्ञ (जैसे राजसूय या अश्वमेध) संपन्न करेगा।
  • व्याख्या: पांडवों द्वारा भविष्य में किए जाने वाले महान यज्ञों (विशेषकर राजसूय यज्ञ) का संकेत इस आकाशवाणी में दिया गया है।

श्लोक 25

जामदग्न्यसमः कुन्ति विष्णुतुल्यपराक्रमः। एष वीर्यवतां श्रेष्ठो भविष्यति महायशाः।।

  • हिंदी अनुवाद: हे कुंती! यह परशुराम (जामदग्न्य) के समान तेजस्वी और भगवान विष्णु के तुल्य पराक्रम वाला होगा। यह समस्त वीरों में श्रेष्ठ और अत्यधिक यशस्वी बनेगा।
  • व्याख्या: अर्जुन के अस्त्र-शस्त्र ज्ञान और महान पराक्रम की तुलना सीधे भगवान परशुराम और विष्णु से की गई है।

श्लोक 26

एष युद्धे महादेवं तोषयिष्यति शङ्करम्। अस्त्रं पाशुपतं नाम तस्मात्तुष्टादवाप्स्यति।।

  • हिंदी अनुवाद: यह युद्ध में महादेव शंकर को प्रसन्न करेगा और उनके संतुष्ट होने पर उनसे 'पाशुपत अस्त्र' प्राप्त करेगा।
  • व्याख्या: किराताजुर्वीय प्रसंग का पूर्वाभास यहाँ दिया गया है, जहाँ अर्जुन शिवजी को युद्ध में प्रसन्न कर पाशुपत अस्त्र प्राप्त करते हैं।

श्लोक 27

निवातकवचा नाम दैत्या विबुधविद्विषः। शक्राज्ञया महाबाहुस्तान्वधिष्यति ते सुतः।।

  • हिंदी अनुवाद: देवताओं के शत्रु 'निवातकवच' नामक जो दैत्य हैं, इस महाबाहु पुत्र को इंद्र की आज़ाज्ञा से उन सबका वध करना है।
  • व्याख्या: अर्जुन द्वारा देवलोक के शत्रुओं (निवातकवचों) के संहार करने के पराक्रमी अभियान का यहाँ उल्लेख किया गया है।

श्लोक 28

तथा दिव्यानि चास्त्राणि निखिलेनाहरिष्यति। विप्रनष्टां श्रियं चायमाहर्ता पुरुषर्षभः।।

  • हिंदी अनुवाद: तथा यह पुरुषसिंह (अर्जुन) संपूर्ण दिव्य अस्त्रों को भली-भांति प्राप्त करेगा और नष्ट हो चुकी कुरु वंश की श्री-संपदा को पुनः वापस लेकर आएगा।
  • व्याख्या: अर्जुन के अस्त्र-विद्या में पारंगत होने और कौरवों/पांडवों के खोए हुए वैभव को पुनः प्रतिष्ठित करने के उनके कार्य का वर्णन है।

श्लोक 29

एतामत्यद्भुतां वाचं कुन्ती शुश्राव सूतके। वाचमुच्चरितामुच्चैस्तां निशम्य तपस्विनाम्।।

  • हिंदी अनुवाद: सूतिका गृह में बैठी हुई कुंती ने जब उच्च स्वर में प्रकट होने वाली इस अत्यंत अद्भुत वाणी को सुना...
  • व्याख्या: माता कुंती ने जब अपने नवजात शिशु के पास इन आकाशवाणी के वचनों को सुना, तो उनका हृदय गौरव से भर गया।

श्लोक 30

बभूव परमो हर्षः शतशृङ्गनिवासिनाम्। तथा देवमहर्षीणां सेन्द्राणां च दिवौकसाम्।।

  • हिंदी अनुवाद: तब शतशृङ्ग पर्वत पर निवास करने वाले तपस्वियों को तथा इंद्र सहित सभी देवगणों और महर्षियों को परम हर्ष प्राप्त हुआ।
  • व्याख्या: अर्जुन के जन्म और इस दिव्य आकाशवाणी से पृथ्वी और स्वर्ग दोनों लोकों के ऋषि-मुनि और देवता अत्यधिक आनंदित हुए।

श्लोक 31

आकाशे दुन्दुभीनां च बभूव तुमुलः स्वनः। उदतिष्ठन्महाघोरः पुष्पवृष्टिभिरावृतः।।

  • हिंदी अनुवाद: आकाश में नगाड़ों (दुन्दुभियों) की भारी आवाज गूंज उठी और पुष्पों की वर्षा के बीच एक महान, अद्भुत दृश्य उपस्थित हो गया।
  • व्याख्या: अर्जुन के जन्म पर देवताओं ने स्वर्ग से फूलों की वर्षा की और वाद्ययंत्र बजाकर अपनी प्रसन्नता व्यक्त की।

श्लोक 32

समवेत्य च देवानां गणाः पार्थमपूजयन्। काद्रवेया वैनतेया गन्धर्वाप्सरसस्तथा। प्रजानां पतयः सर्वे सप्त चैव महर्षयः।।

  • हिंदी अनुवाद: तदनंतर सभी देवताओं के गण एकत्र होकर पृथा (कुंती) के पुत्र अर्जुन की पूजा (अभिनंदन) करने लगे। उनके साथ नाग (काद्रवेय), गरुड़ (वैनतेय), गंधर्व, अप्सराएं, सभी प्रजापति और सातों महर्षि भी वहाँ उपस्थित हुए।
  • व्याख्या: इस श्लोक में ब्रह्मांड की समस्त दिव्य शक्तियों, नागों, पक्षियों के राजा गरुड़ और सप्तर्षियों द्वारा अर्जुन के जन्म पर उत्सव मनाने का वर्णन है।

श्लोक 33

भरद्वाजः कश्यपो गौतमश्च विश्वामित्रो जमदग्निर्वसिष्ठः। यश्चोदितो भास्करेऽभूत्प्रनष्टे सोऽप्यत्रात्रिर्भगवानाजगाम।।

  • हिंदी अनुवाद: भरद्वाज, कश्यप, गौतम, विश्वामित्र, जमदग्नि, वशिष्ठ— और जो भगवान अत्रि सूर्य के अस्त होने पर (या अंधकार में) प्रकट हुए थे, वे भगवान अत्रि भी वहाँ पधारे।
  • व्याख्या: इस अंतिम श्लोक में सप्तर्षियों और महान ऋषियों के नाम गिनाए गए हैं जो अर्जुन के जन्म के समय आशीर्वाद देने के लिए वहाँ आए थे।

महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत 132वें अध्याय के शेष श्लोकों (श्लोक 34 से 65) का क्रमवार हिंदी अनुवाद और उनकी विस्तृत व्याख्या नीचे दी गई है:

श्लोक 34

मरीचिरङ्गिराश्चैव पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः। दक्षः प्रजापतिश्चैव गन्धर्वाप्सरसस्तथा।।

  • हिंदी अनुवाद: मरीचि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, प्रजापति दक्ष तथा अन्य गंधर्व और अप्सराएँ भी वहाँ उपस्थित हुए।
  • व्याख्या: अर्जुन के जन्म के समय ब्रह्मांड के महान ऋषि (मानसब्रह्मा के पुत्र) तथा गंधर्व और अप्सराएं उत्सव मनाने के लिए एकत्र हुए थे।

श्लोक 35

दिव्यमाल्याम्बरधराः सर्वालङ्कारभूषिताः। उपगायन्ति बीभत्सुं नृत्यन्तेऽप्सरसां गणाः।।

  • हिंदी अनुवाद: वे सभी दिव्य मालाओं और वस्त्रों को धारण किए तथा समस्त आभूषणों से अलंकृत होकर 'बीभत्सु' (अर्जुन का एक नाम) का गान कर रहे थे और अप्सराओं के समूह नृत्य कर रहे थे।
  • व्याख्या: इस श्लोक में अर्जुन के एक अन्य नाम 'बीभत्सु' का उल्लेख है। देवता और गंधर्व उनके जन्म पर गीत गाकर और नृत्य करके आनंद मना रहे थे।

श्लोक 36

तथा महर्षयश्चापि जेपुस्तत्र समन्ततः। गन्धर्वैः सहितः श्रीमान्प्रागायत च तुम्बुरुः।।

  • हिंदी अनुवाद: तथा महर्षिगण चारों ओर बैठकर जप करने लगे और शोभायमान गंधर्वराज तुम्बुरु भी अन्य गंधर्वों के साथ वहाँ गान करने लगे।
  • व्याख्या: दिव्य संगीत और मंत्रोच्चार के साथ वातावरण पूरी तरह आध्यात्मिक और उत्सवी हो गया था।

श्लोक 37

भीमसेनोग्रसेनौ च ऊर्णायुरनघस्तथा। गोपतिर्धृतराष्ट्रश्च सूर्यवर्चास्तथाष्टमः।।

  • हिंदी अनुवाद: भीमसेन, उग्रसेन, ऊर्णायु, अनघ, गोपति, धृतराष्ट्र और आठवें सूर्यवर्चा— ये प्रमुख गंधर्व थे।
  • व्याख्या: यहाँ सभा में उपस्थित प्रसिद्ध गंधर्वों के नाम गिनाए जा रहे हैं जो अर्जुन के जन्मोत्सव में सम्मिलित हुए थे।

श्लोक 38

युगपस्तृणपः कार्ष्णिर्नन्दिश्चित्ररथस्तथा। त्रयोदशः शालिशिराः पर्जन्यश्च चतुर्दशः।।

  • हिंदी अनुवाद: युगप, तृणप, कार्ष्णि, नन्दि, चित्ररथ, तेरहवें शालिशिरा और चौदहवें पर्जन्य— ये गंधर्व भी उपस्थित थे।
  • व्याख्या: गंधर्वों की इस लंबी सूची से यह स्पष्ट होता है कि अर्जुन का जन्म लोक-लोकान्तर के लिए कितना बड़ा और महत्वपूर्ण उत्सव था।

श्लोक 39

कलिः पञ्चदशश्चैव नारदश्चात्र षोडशः। ऋत्वा बृहत्त्वा बृहकः करालश्च महामनाः।।

  • हिंदी अनुवाद: पंद्रहवें कलि और सोलहवें देवर्षि नारद थे। इसके अलावा ऋत, बृहत्त्व, बृहक, कराल और महामना— ये गंधर्व भी वहाँ आए थे।
  • व्याख्या: देवर्षि नारद सहित अनेक दिव्य गंधर्व इस महान अवसर पर अपनी कला और उपस्थिति से आनंद बढ़ा रहे थे।

श्लोक 40

ब्रह्मचारी बहुगुणः सुवर्णश्चेति विश्रुतः। विश्वावसुर्भुमन्युश्च सुचन्द्रश्च शरुस्तथा।।

  • हिंदी अनुवाद: ब्रह्मचारी, बहुगुण, सुवर्ण नाम से विख्यात, विश्वावसु, भुमन्यु, सुचन्द्र और शरु— ये गंधर्व भी उपस्थित थे।
  • व्याख्या: गंधर्वों के इन विभिन्न नामों से उस काल की दिव्य जातियों और उनके गणों का परिचय मिलता है।

श्लोक 41

गीतमाधुर्यसंपन्नौ विख्यातौ च हहाहुहू। इत्येते देवगन्धर्वा जग्मुस्तत्र नराधिप।।

  • हिंदी अनुवाद: गान की मधुरता से संपन्न विख्यात गंधर्व 'हहा' और 'हूहू' भी वहाँ आए थे। हे नराधिप! इस प्रकार ये सभी देवगंधर्व वहाँ पधारे थे।
  • व्याख्या: संगीत के धुरंधर गंधर्व हहा और हूहू अपनी सुमधुर गायकी से इस उत्सव को अलंकृत कर रहे थे।

श्लोक 42

तथैवाप्सरसो हृष्टाः सर्वालङ्कारभूषिताः। ननृतुर्वै महाभागा जगुश्चायतलोचनाः।।

  • हिंदी अनुवाद: उसी प्रकार विशाल नेत्रों वाली, महाभागा, समस्त आभूषणों से सुसज्जित और हर्षित अप्सराएँ वहाँ समूह बनाकर नृत्य करने और गाने लगीं।
  • व्याख्या: अप्सराओं के सौंदर्य और नृत्य से स्वर्ग और पृथ्वी का वह संगम स्थल अत्यंत रमणीय बन गया था।

श्लोक 43

अनूचानाऽनवद्या च गुणमुख्या गुणावरा। अद्रिका च तथा सोमा मिश्रकेशी त्वलम्बुषा।।

  • हिंदी अनुवाद: अनूचाना, अनवद्या, गुणमुख्या, गुणावरा, अद्रिका, सोमा, मिश्रकेशी और अलम्बुषा— ये अप्सराएँ थीं।
  • व्याख्या: यहाँ प्रमुख अप्सराओं के नामों की शृंखला शुरू होती है जो उस दिव्य समारोह में नृत्य-संगीत प्रस्तुत कर रही थीं।

श्लोक 44

मरीचिः शुचिका चैव विद्युत्पर्णा तिलोत्तमा। अम्बिका लक्षणा क्षेमा देवी रम्भा मनोरमा।।

  • हिंदी अनुवाद: मरीचि, शुचिका, विद्युत्पर्णा, तिलोत्तमा, अम्बिका, लक्षणा, क्षेमा, देवी रम्भा और मनोरमा— ये अप्सराएँ भी उपस्थित थीं।
  • व्याख्या: तिलोत्तमा और रम्भा जैसी प्रसिद्ध और परम सुंदर अप्सराएँ भी इस जन्मोत्सव की शोभा बढ़ा रही थीं।

श्लोक 45

असिता च सुबाहुश्च सुप्रिया च वपुस्तथा। पुण्डरीका सुगन्धा च सुरसा च प्रमाथिनी।।

  • हिंदी अनुवाद: असिता, सुबाहु, सुप्रिया, वपु, पुण्डरीका, सुगन्धा, सुरसा और प्रमाथिनी अप्सराएँ भी वहाँ थीं।
  • व्याख्या: इन सभी अप्सराओं के नाम महाभारत के विभिन्न पर्वों और कथाओं में प्रासंगिक हैं।

श्लोक 46

काम्या शारद्वती चैव ननृतुस्तत्र संघशः। मेनका सहजन्या च कर्णिका पुञ्जिकस्थला।।

  • हिंदी अनुवाद: काम्या और शारद्वती— ये सब वहाँ समूहों में नृत्य कर रही थीं। इनके अतिरिक्त मेनका, सहजन्या, कर्णिका और पुञ्जिकस्थला अप्सराएँ भी थीं।
  • व्याख्या: विश्वामित्र की तपस्या भंग करने वाली प्रसिद्ध अप्सरा मेनका भी इस समारोह में सम्मिलित थीं।

श्लोक 47

ऋतुस्थला घृताची च विश्वाची पूर्वचित्त्यपि। उम्लोचेति च विख्याता प्रम्लोचेति च ता दश।।

  • हिंदी अनुवाद: ऋतुस्थला, घृताची, विश्वाची, पूर्वचित्ति तथा विख्याता उम्लोचा और प्रम्लोचा— ये दस प्रमुख अप्सराएँ थीं।
  • व्याख्या: घृताची और विश्वाची जैसी महान अप्सराओं के नाम यहाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

श्लोक 48

उर्वश्येकादशी तासां जगुश्चायतलोचनाः। धाताऽर्यमा च मित्रश्च वरुणोंऽशो भगस्तथा।।

  • हिंदी अनुवाद: उन अप्सराओं में ग्याहरवीं उर्वशी थीं। वे सभी विशाल नेत्रों वाली अप्सराएँ गान कर रही थीं। इसके पश्चात धाता, अर्यमा, मित्र, वरुण, अंश और भग...
  • व्याख्या: यहाँ से बारह आदित्यों (सूर्य के विभिन्न रूपों) के नामों का क्रम प्रारंभ होता है।

श्लोक 49

इन्द्रो विवस्वान्पूषा च पर्जन्यो दशमः स्मृतः। ततस्त्वष्टा ततो विष्णुरजघन्यो जघन्यजः।।

  • हिंदी अनुवाद: इंद्र, विवस्वान, पूषा, दसवें पर्जन्य, तदनंतर त्वष्टा और सबसे छोटे विष्णु— ये सब बारह आदित्य हैं।
  • व्याख्या: इन श्लोक में बारह आदित्यों के पूरे नाम गिनाए गए हैं जो इस दिव्य सभा में उपस्थित होकर आशीर्वाद दे रहे थे।

श्लोक 50

इत्येते द्वादशादित्या ज्वलन्तः सूर्यवर्चसः।। मृगव्याधश्च सर्पश्च निर्ऋतिश्च महायशाः। अजैकपादहिर्बुध्न्यः पिनाकी च परंतप।।

  • हिंदी अनुवाद: सूर्य के समान तेजस्वी चमकने वाले ये बारह आदित्य हैं। इसके बाद एकादश रुद्रों के नाम हैं— मृगव्याध, सर्प, महायशा निर्ऋति, अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य, पिनाकी (परंतप)...
  • व्याख्या: आदित्यों के बाद अब भगवान शिव के विभिन्न स्वरूपों (एकादश रुद्रों) के नाम बताए जा रहे हैं।

श्लोक 51-52

दहनोऽथेश्वरश्चैव कपाली च विशांपते। स्थाणुर्भगश्च भगवान्रुद्रास्तत्रावतस्थिरे।।

  • हिंदी अनुवाद: हे विशांपते! दहन, ईश्वर, कपाली, स्थाणु और भगवान भग— ये रुद्रगण भी वहाँ विराजमान हुए।
  • व्याख्या: इस प्रकार रुद्रों और आदित्यों की उपस्थिति से यह सिद्ध होता है कि अर्जुन का जन्म देवताओं के प्रत्यक्ष संरक्षण में हुआ था।

श्लोक 53

अश्विनौ वसवश्चाष्टौ मरुतश्च महाबलाः। विश्वेदेवास्तथा साध्यास्तत्रासन्परितः स्थिताः।।

  • हिंदी अनुवाद: अश्विनीकुमार, आठों वसु, महाबली मरुत्गण, विश्वेदेव तथा साध्यगण भी वहाँ चारों ओर उपस्थित थे।
  • व्याख्या: समस्त देवी-देवता और गण इस महामानव (अर्जुन) के जन्म पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने आए थे।

श्लोक 54-55

कर्कोटकोऽथ सर्पश्च वासुकिश्च भुजङ्गमः। कच्छपश्चाथ कुण्डश्च तक्षकश्च महोरगः।। आययुस्तपसा युक्ता महाक्रोधा महाबलाः। एते चान्ये च बहवस्तत्र नागा व्यवस्थिताः।।

  • हिंदी अनुवाद: कर्कटक, सर्प, भुजंगम वासुकि, कच्छप, कुण्ड और महोरग तक्षक— तपस्या से युक्त, महाक्रोध वाले और महाबली नाग भी वहाँ आए। ये तथा अन्य अनेक नाग वहाँ स्थित थे।
  • व्याख्या: पाताल लोक के प्रमुख नागराज (जैसे वासुकि और तक्षक) भी अर्जुन के जन्म पर अपनी उपस्थिति देने पहुँचे थे।

श्लोक 56

तार्क्ष्यश्चारिष्टनेमिश्च गरुडश्चासितध्वजः। अरुणश्चारुणिश्चैव वैनतेया व्यवस्थिताः।।

  • हिंदी अनुवाद: तार्क्ष्य, अरिष्टनेमि, असितध्वज गरुड, अरुण और अरुण के पुत्र (वैनतेय) भी वहाँ सुस्थित थे।
  • व्याख्या: पक्षियों के राजा गरुड और उनके परिवार के सदस्य भी इस दिव्य उत्सव में सम्मिलित हुए।

श्लोक 57

तांश्च देवगणान्सर्वांस्तपःसिद्धा महर्षयः। विमानगिर्यग्रगतान्ददृशुर्नेतरे जनाः।।

  • हिंदी अनुवाद: विमानों और पर्वतों के शिखरों पर स्थित उन समस्त देवगणों और तपःसिद्ध महर्षियों को केवल तपस्वी लोग ही देख पा रहे थे, अन्य साधारण मनुष्य नहीं।
  • व्याख्या: यह दृश्य पूरी तरह दिव्य और अलौकिक था, जिसे सामान्य मानव आँखें नहीं देख सकती थीं, केवल उच्च ऋषि-मुनि ही इसके दर्शन कर पा रहे थे।

श्लोक 58

तद्दृष्ट्वा महदाश्चर्यं विस्मिता मुनिसत्तमाः।

  • अधिकां स्म ततो वृत्तिमवर्तन्पाण्डवं प्रति।।
  • हिंदी अनुवाद: उस महाआश्चर्य को देखकर श्रेष्ठ मुनिगण विस्मित हो गए और वे पांडु तथा कुंती के प्रति और अधिक आदर भाव रखने लगे।
  • व्याख्या: देवताओं और ऋषियों की इस अपार भीड़ और उत्सव को देखकर शतशृङ्ग पर्वत के मुनिगण पाण्डु का और अधिक सम्मान करने लगे।

श्लोक 59

पाण्डुः प्रीतेन मनसा देवतादीनपूजयत्। पाण्डुना पूजिता देवाः प्रत्यूचुर्नरसत्तमम्।।

  • हिंदी अनुवाद: प्रसन्नचित्त महाराज पाण्डु ने उन सभी देवताओं और ऋषियों की पूजा (आदर-सत्कार) की। तब पाण्डु द्वारा पूजित उन देवताओं ने नरेसत्तम पाण्डु से कहा...
  • व्याख्या: पाण्डु ने अतिथि रूप में पधारे सभी देवताओं और ऋषियों का यथोचित सत्कार किया, जिससे प्रसन्न होकर देवताओं ने उन्हें आशीर्वाद दिया।

श्लोक 60

प्रादुर्बूतो ह्ययं धर्मो देवतानां प्रसादतः। मातरिश्वा ह्ययं भीमो बलवानरिमर्दनः।।

  • हिंदी अनुवाद: देवताओं ने कहा— हे पाण्डु! देवताओं की कृपा से यह तुम्हारा पुत्र 'धर्म' (युधिष्ठिर) के समान और मातरिश्वा (वायु) के समान महाबली तथा शत्रुओं का मर्दन करने वाला भीम प्रकट हुआ है।
  • व्याख्या: देवताओं ने पाण्डु को उनके तीनों ज्येष्ठ पुत्रों (युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन) के दिव्य स्वरूप और उनके महत्व का स्मरण कराया।

श्लोक 61

साक्षादिन्द्रः स्वयं जातः प्रसादाच्च शतक्रतोः। पितृत्वाद्देवतानां हि नास्ति पुण्यतरस्त्वया।।

  • हिंदी अनुवाद: और यह तीसरा पुत्र स्वयं शतक्रतु (इन्द्र) के प्रसाद से साक्षात इंद्र का अंश ही उत्पन्न हुआ है। इस प्रकार देवताओं के पिता होने के कारण तुम्हारे समान पुण्यवान दूसरा कोई नहीं है।
  • व्याख्या: देवताओं ने पाण्डु को बताया कि वे इतने महान और यशस्वी पुत्रों के पिता बने हैं, इसलिए संसार में उनके जैसा पुण्यात्मा कोई नहीं है।

श्लोक 62

पितॄणामृणनिर्मुक्तः स्वर्गं प्राप्स्यसि पुण्यभाक्। इत्युक्त्वा देवताः सर्वा विप्रजग्मुर्यथागतम्।।

  • हिंदी अनुवाद: तुम पितरों के ऋण से पूरी तरह मुक्त हो चुके हो और इस पुण्य के प्रभाव से श्रेष्ठ लोक (स्वर्ग) को प्राप्त करोगे। ऐसा कहकर सभी देवता जैसे आए थे, वैसे ही अपने लोक को प्रस्थान कर गए।
  • व्याख्या: देवताओं ने पाण्डु को आश्वस्त किया कि वे पितृ ऋण से मुक्त हो चुके हैं और उनके कर्म तथा संतानें उन्हें उच्च गति प्रदान करेंगी। इतना कहकर देवता अंतर्ध्यान हो गए।

श्लोक 63

पाण्डुस्तु पुनरेवैनां पुत्रलोभान्महायशाः। प्रादिशद्दर्शनीयार्थी कुन्ती त्वेनमथाब्रवीत्।।

  • हिंदी अनुवाद: परंतु महायशस्वी महाराज पाण्डु ने पुत्र प्राप्ति के लोभ में पड़कर और अधिक सुंदर संतानों की इच्छा से एक बार फिर कुंती को आदेश (प्रेरित) किया। तब कुंती ने पाण्डु से यह बात कही...
  • व्याख्या: पाण्डु ने लोभ या अधिक संतान की इच्छा से कुंती को फिर से किसी अन्य देवता से पुत्र उत्पन्न करने के लिए कहा, जिस पर कुंती ने नीतिसंगत और शास्त्र सम्मत बात कही।

श्लोक 64

नातश्चतुर्थं प्रसवमापस्त्वपि वदन्त्युत। अतःपरं स्वैरिणी स्याद्बन्धकी पञ्चमे भवेत्।।

  • हिंदी अनुवाद: कुंती ने कहा— शास्त्रों के ज्ञाता ऋषि भी चौथे प्रसव (संतान) की अनुमति नहीं देते हैं। इसके बाद की संतान होने पर स्त्री 'स्वैरिणी' और पाँचवीं होने पर 'बन्धकी' (पतिव्रता धर्म से च्युत) कहलाती है।
  • व्याख्या: कुंती ने पाण्डु को धर्म और मर्यादा का पाठ पढ़ाया कि हिंदू धर्म और नीतिशास्त्र के अनुसार एक स्त्री अधिकतम तीन संताने ही नियोग या वरदान से प्राप्त कर सकती है, चौथी तक की अनुमति है, लेकिन पाँचवीं संतान होने पर समाज में उसकी मर्यादा खंडित हो जाती है।

श्लोक 65

स त्वं विद्वन्धर्ममिममधिगम्य कथं नु माम्। अपत्यार्थं समुत्क्रम्य प्रमादादिव भाषसे।।

  • हिंदी अनुवाद: हे विद्वन्! आप तो धर्म के मर्म को अच्छी तरह जानने वाले हैं। फिर भी आप धर्म की इस मर्यादा का उल्लंघन करके केवल संतान के मोह में इस प्रकार प्रमाद (अज्ञान या भूल) जैसी बातें क्यों कह रहे हैं?
  • व्याख्या: कुंती ने पाण्डु को याद दिलाया कि वे स्वयं धर्मज्ञ हैं, फिर भी मर्यादाओं का उल्लंघन करने वाली बात कहकर वे उचित नहीं कर रहे हैं। इस प्रकार कुंती ने और अधिक संतान प्राप्ति के प्रस्ताव को विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया।

।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः।। 132 ।।

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