श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः

 महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत 131वें अध्याय के सभी श्लोकों का क्रमवार हिंदी अनुवाद और उनकी विस्तृत व्याख्या नीचे दी गई है:

श्लोक 1

जनमेजय उवाच। ज्येष्ठाऽनुज्येष्ठातां तेषां नामानि च पृथक्पृथक्। धृतराष्ट्रस्य पुत्राणामानुपूर्व्यात्प्रकीर्तय।।

  • हिंदी अनुवाद: राजा जनमेजय ने पूछा— हे मुनिवर! धृतराष्ट्र के पुत्रों में कौन सबसे बड़ा है और उसके बाद छोटे-छोटे कौन हैं? उनके नाम और जन्म का क्रम (ज्येष्ठ से कनिष्ठ का अनुक्रम) अलग-अलग पृथक् रूप से मुझे बताइए।
  • व्याख्या: इस श्लोक में राजा जनमेजय महर्षि वैशंपायन से धृतराष्ट्र के सौ पुत्रों और उनकी पुत्री के जन्म-क्रम और नामों के बारे में जानने की जिज्ञासा प्रकट कर रहे हैं। कौरवों के नाम इतिहास में विशेष महत्व रखते हैं, क्योंकि वे महाभारत युद्ध के मुख्य पात्र थे।

श्लोक 2

वैशंपायन उवाच। दुर्योधनो युयुत्सुश्च राजन्दुःशासनस्तथा। दुःसहो दुःशलश्चैव जलसन्धः समः सहः।।

  • हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा— हे राजन्! धृतराष्ट्र के पुत्रों में सबसे पहले (ज्येष्ठ) दुर्योधन है, उसके बाद युयुत्सु, दुःशासन, दुःसह, दुःशल, जलसन्ध, सम और सह— ये राजकुमार हुए।
  • व्याख्या: यहाँ से कौरव भाइयों के नाम का क्रम शुरू होता है। सबसे ज्येष्ठ दुर्योधन था। वैशंपायन महाराज जनमेजय को एक-एक करके सभी भाइयों के नाम क्रमानुसार गिना रहे हैं।

श्लोक 3

विन्दानुविन्दौ दुर्धर्षः सुबाहुर्दुष्प्रधर्षणः। दुर्मर्षणो दुर्मुखश्च दुष्कर्णः कर्ण एव च।।

  • हिंदी अनुवाद: विन्दा, अनुविन्द, दुर्धर्ष, सुबाहु, दुष्प्रधर्षण, दुर्मर्षण, दुर्मुख, दुष्कर्ण और कर्ण— ये सभी धृतराष्ट्र के अन्य पुत्र थे।
  • व्याख्या: इस श्लोक में नाम आने वाला 'कर्ण' अंगराज कर्ण से भिन्न है, यह धृतराष्ट्र के पुत्रों में से एक राजकुमार का नाम है। ये सभी राजकुमार विभिन्न गुणों और पराक्रम वाले थे।

श्लोक 4

विविंशतिर्विकर्णश्च शलः सत्वः सुलोचनः। चित्रोपचित्रौ चित्राक्षश्चारुचित्रः शरासनः।।

  • हिंदी अनुवाद: विविंशति, विकर्ण, शल, सत्व, सुलोचन, चित्रोपचित्र (चित्र और उपचित्र), चित्राक्ष, चारुचित्र और शरासन— ये राजकुमार उत्पन्न हुए।
  • व्याख्या: विकर्ण कौरवों में एक ऐसा भाई था जो द्रोपदी चीरहरण के समय सभा में धर्म के पक्ष में बोला था और दुर्योधन के कुकर्मों का विरोध किया था।

श्लोक 5

दुर्मदो दुर्विगाहश्च विवित्सुर्विकटाननः। ऊर्णनाभः सुनाभश्च तथा नन्दोपनन्दकौ।।

  • हिंदी अनुवाद: दुर्मद, दुर्विगाह, विवित्सु, विकटानन, ऊर्णनाभ, सुनाभ तथा नन्द और उपनन्द— ये सब धृतराष्ट्र के पुत्र थे।
  • व्याख्या: इन राजकुमारों के नाम उनके शारीरिक या मानसिक स्वभाव तथा विशेषताओं के आधार पर रखे गए प्रतीत होते हैं, जो उस काल की नामकरण परंपरा को दर्शाते हैं।

श्लोक 6

चित्रबाणश्चित्रवर्मा सुवर्मा दुर्विमोचनः। अयोबाहुर्महाबाहुश्चित्राङ्गश्चित्रकुण्डलः।।

  • हिंदी अनुवाद: चित्रबाण, चित्रवर्मा, सुवर्मा, दुर्विमोचन, अयोबाहु, महाबाहु, चित्राङ्ग और चित्रकुण्डल— ये सभी धृतराष्ट्र के वीर पुत्र थे।
  • व्याख्या: यहाँ 'अयोबाहु' का अर्थ है जिसके बाहु (भुजाएं) लोहे के समान मजबूत हों, और 'महाबाहु' का अर्थ विशाल भुजाओं वाला है।

श्लोक 7

भीमवेगो भीमबलो बलाकी बलवर्धनः। उग्रायुधः सुषेणश्च कुण्डधारो महोदरः।।

  • हिंदी अनुवाद: भीमवेग, भीमबल, बलाकी, बलवर्धन, उग्रायुध, सुषेण, कुण्डधार और महोदर— ये राजकुमार धृतराष्ट्र के यहाँ उत्पन्न हुए।
  • व्याख्या: इन नामों (जैसे भीमवेग, भीमबल) से स्पष्ट होता है कि ये सभी राजकुमार बलवान और युद्धकला में पराक्रमी होने की संभावना रखते थे।

श्लोक 8

चित्रायुधो निषङ्गी च पाशी वृन्दारकस्तथा। दृढवर्मा दृढक्षत्रः सोमकीर्तिरनूदरः।।

  • हिंदी अनुवाद: चित्रायुध, निषङ्गी, पाशी, वृन्दारक, दृढवर्मा, दृढक्षत्र, सोमकीर्ति और अनूदर— ये सब धृतराष्ट्र के पुत्र थे।
  • व्याख्या: इन राजकुमारों के नाम भी उनकी वीरता, अस्त्र-शस्त्र संचालन और ओजस्वी व्यक्तित्व का परिचय देते हैं।

श्लोक 9

दृढसन्धो जरासन्धः सत्यसन्धः सदः सुवाक्। उग्रश्रवा उग्रसेनः सेनानीर्दुष्पराजयः।।

  • हिंदी अनुवाद: दृढसन्ध, जरासन्ध (मगध के राजा जरासन्ध से भिन्न धृतराष्ट्र का पुत्र), सत्यसन्ध, सद, सुवाक्, उग्रश्रवा, उग्रसेन, सेनानी और दुष्पराजय— ये राजकुमार थे।
  • व्याख्या: 'सत्यसन्ध' का अर्थ है जो अपनी प्रतिज्ञा या सत्य का पक्का हो। कौरवों में विभिन्न स्वभाव और प्रवृत्तियों के भाई थे।

श्लोक 10

अपराजितः कुण्डशायी विशालाक्षो दुराधरः। दृढहस्तः सुहस्तश्च वातवेगसुवर्चसौ।।

  • हिंदी अनुवाद: अपराजित, कुण्डशायी, विशालाक्ष, दुराधर, दृढहस्त, सुहस्त तथा वातवेग और सुवर्चस्— ये सभी धृतराष्ट्र के पुत्र थे।
  • व्याख्या: 'विशालाक्ष' का अर्थ बड़े नेत्रों वाला और 'दृढहस्त' का अर्थ अस्त्र चलाने में मजबूत हाथ वाला होता है।

श्लोक 11

आदित्यकेतुर्बह्वाशी नागदत्तोऽग्रयाय्यपि। कवची क्रथनः कुण्डी कुण्डधारो धनुर्धरः।।

  • हिंदी अनुवाद: आदित्यकेतु, बह्वाशी, नागदत्त, अग्रयायी, कवची, क्रथन, कुण्डी, कुण्डधार और धनुर्धर— ये राजकुमार धृतराष्ट्र के पुत्रों के रूप में जाने गए।
  • व्याख्या: इस श्लोक में भी कौरव भाइयों के नाम का यह क्रम जारी है जो उनकी विशाल संख्या और परिवार की व्यापकता को दिखाता है।

श्लोक 12

उग्रभीमरथौ वीरौ वीरबाहुरलोलुपः। अभयो रौद्रकर्मा च तथा दृढरथाश्रयः।।

  • हिंदी अनुवाद: उग्ररथ और भीमरथ— ये दोनों वीर भाई; तथा वीरबाहु, अलोलुप, अभय, रौद्रकर्मा और दृढरथाश्रय— ये सब धृतराष्ट्र के पुत्र थे।
  • व्याख्या: 'रौद्रकर्मा' और 'अभय' जैसे नाम युद्ध के मैदान में उनके भयानक और निडर स्वरूप की ओर संकेत करते हैं।

श्लोक 13

अनाधृष्यः कुण्डभेदी विरावी चित्रकुण्डलः। प्रमथश्च प्रमाथी च दीर्घरोमश्च वीर्यवान्।।

  • हिंदी अनुवाद: अनाधृष्य, कुण्डभेदी, विरावी, चित्रकुण्डल, प्रमथ, प्रमाथी, दीर्घरोम और वीर्यवान्— ये सभी धृतराष्ट्र के पराक्रमी पुत्र थे।
  • व्याख्या: 'अनाधृष्य' का अर्थ है जिसे आसानी से पराजित या अपमानित न किया जा सके। ये सभी भाई कौरव सेना की रीढ़ थे।

श्लोक 14

दीर्घबाहुर्महाबाहुर्व्यूढोराः कनकध्वजः। कुण्डाशी विराजाश्चैव दुःशला च शताधिका।।

  • हिंदी अनुवाद: दीर्घबाहु, महाबाहु, व्यूढोरस्क (चौड़ी छाती वाले), कनकध्वज, कुण्डाशी, विराजा और इन सबके अतिरिक्त सौ भाइयों से अधिक एक बहन दुःशला थी।
  • व्याख्या: धृतराष्ट्र के सौ पुत्रों के साथ-साथ उनकी एक इकलौती पुत्री भी थी, जिनका नाम दुःशला था। यहाँ सौ से अधिक का तात्पर्य सौ पुत्रों और एक पुत्री की कुल संख्या से है।

श्लोक 15

इति पुत्रशतं राजन्कन्या चैव शताधिका। नामधेयानुपूर्व्येण विद्धि जन्मक्रमं नृप।।

  • हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा— हे राजन! इस प्रकार धृतराष्ट्र के सौ पुत्र और एक कन्या (दुःशला) हैं। इनके नाम मैंने तुम्हें क्रम से बता दिए हैं, इन्हें जन्म के क्रम के अनुसार ही समझो।
  • व्याख्या: यहाँ महर्षि वैशंपायन जनमेजय को आश्वस्त करते हैं कि उन्होंने धृतराष्ट्र की संतान का पूरा विवरण और क्रम बता दिया है।

श्लोक 16

सर्वे त्वतिरथाः शूराः सर्वे युद्धविशारदाः। सर्वे वेदविदश्चैव सर्वे सर्वास्त्रकोविदाः।।

  • हिंदी अनुवाद: वे सभी पुत्र अतिरथी थे, शूरवीर थे, युद्धकला में अत्यंत कुशल (विशारद) थे, संपूर्ण वेदों के ज्ञाता थे और सभी प्रकार के अस्त्र-शस्त्र चलाने की विद्या में पारंगत थे।
  • व्याख्या: यद्यपि महाभारत में कौरवों को खलनायक के रूप में चित्रित किया गया है, किंतु वे कुरु वंश के राजकुमार होने के कारण उत्तम शिक्षा, वेदों के अध्ययन और सभी अस्त्र-शस्त्रों की विद्या में पूरी तरह प्रशिक्षित थे।

श्लोक 17

सर्वेषामनुरूपाश्च कृता दारा महीपते। धृतराष्ट्रेण समये परीक्ष्य विविवन्नृप।।

  • हिंदी अनुवाद: हे पृथ्वीनाथ! धृतराष्ट्र ने समय और कुल की मर्यादा का पूरा ध्यान रखकर तथा भली-भांति जाँच-परखकर उन सभी पुत्रों के योग्य कुल की कन्याओं के साथ विवाह किए थे।
  • व्याख्या: राजा धृतराष्ट्र ने अपने सभी पुत्रों के लिए उनके अनुकूल और उच्च कुलों से सुयोग्य वधुओं का चयन कर उनका विवाह संपन्न कराया था।

श्लोक 18

दुःशलां चापि समये धृतराष्ट्रो नराधिपः। जयद्रथाय प्रददौ विधिना भरतर्षभ।।

  • हिंदी अनुवाद: हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ जनमेजय! राजा धृतराष्ट्र ने अपनी इकलौती पुत्री दुःशला का विवाह भी उचित समय और विधि-विधान के साथ सिंधु देश के राजा जयद्रथ के साथ कर दिया था।
  • व्याख्या: कौरवों की एकमात्र बहन दुःशला का विवाह सिंधुराज जयद्रथ से हुआ था, जिनकी आगे चलकर महाभारत युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका रही।

श्लोक 19

इति पुत्रशतं राजन्युयुत्सुश्च शताधिकः। कन्यका दुःशला चैव यथावत्कीर्तितं मया।।

  • हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा— हे राजन्! इस प्रकार धृतराष्ट्र के सौ पुत्र, सौ से ऊपर गिने जाने वाले युयुत्सु (जो दासी पुत्र थे) और कन्या दुःशला— इन सबका मैंने यथावत वर्णन कर दिया है।
  • व्याख्या: यह इस अध्याय का उपसंहार श्लोक है, जिसमें वैशंपायन जी सारांश रूप में बताते हैं कि उन्होंने धृतराष्ट्र के पूरे परिवार (सौ पुत्र, युयुत्सु और पुत्री दुःशला) का परिचय दे दिया है।
।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः।। 131 ।।

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