श्लोक 1-4
वैशंपायन उवाच। गतान्मुनिगणान्दृष्ट्वा पुत्रं संगृह्य पाणिना। मातापितृभ्यां रहिता यथा शोचन्ति दारकाः।। (1-97-1) तथा शोकपरीताङ्गी धृतिमालम्ब्य दुःखिता। गतेषु तेषु विप्रेषु राजमार्गेण भामिनी।। (1-97-2) पुत्रेणैव सहायेन सा जगाम शनैः शनैः। अदृष्टपूर्वान्पश्यन्वै राजमार्गेण पौरवः।। (1-97-3) हर्म्यप्रसादचैत्यांश्च सभा दिव्या विचित्रिताः। कौतूहलसमाविष्टो दृष्ट्वा विस्मयमागतः।। (1-97-4)
हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा— मुनिगणों को वापस लौटते देख, माता-पिता से बिछड़े हुए बालकों की भाँति, हाथ से पुत्र का हाथ पकड़े हुए शकुंतला विलाप करने लगीं। उन विप्रों के चले जाने पर शोक से संतप्त अंगों वाली, दुःखी और भामिनी शकुंतला ने धैर्य धारण किया तथा एकमात्र पुत्र को ही अपना सहायक बनाकर वे धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगीं। मार्ग में अद्भुत और पहले कभी न देखे हुए महलों, राजप्रसादों, चैत्यों और विचित्र व दिव्य सभाओं को देखकर पौरव (सर्वदमन) भारी कौतूहल से भर गया और विस्मय में डूब गया।
व्याख्या: मुनियों के लौटने से एकाकी हुई शकुंतला अपने पुत्र का हाथ थामे शोकाकुल मन से राजमार्गो पर आगे बढ़ती हैं। दूसरी ओर, बालक सर्वदमन नगर के भव्य महलों और अजूबों को देखकर विस्मय और जिज्ञासा से भर जाता है।
श्लोक 5-9
सर्वे ब्रुवन्ति तां दृष्ट्वा पद्महीनामिव श्रियम्। गत्या च संहीसदृशीं कोकिलेन स्वरे समाम्।। (1-97-5) मुखेन चन्द्रसदृशीं श्रिया पद्मालयासमाम्। स्मितेन कुन्दसदृशीं पद्मगर्भसमत्वचम्।। (1-97-6) पद्मपत्रविशालाक्षीं तप्तजाम्बूनदप्रभाम्। करान्तमितमध्यैषा सुकेशी संहतस्तनी।। (1-97-7) जघनं सुविशालं वै ऊरू करिकरोपमौ। रक्ततुङ्गतलौ पादौ धरण्यां सुप्रतिष्ठितौ।। (1-97-8) एवं रूपसमायुक्ता स्वर्गलोकादिवागता। इति स्म सर्वेऽमन्यन्त दुष्यन्तनगरे जनाः।। (1-97-9)
हिंदी अनुवाद: नगर के सभी लोग शकुंतला को देखकर कहने लगे— "यह ऐसी प्रतीत हो रही है मानो कमल के बिना प्रत्यक्ष लक्ष्मी हों। इनकी चाल सिंह के समान, स्वर कोयल के जैसा, मुख चंद्रमा के समान और श्री (शोभा) लक्ष्मी जैसी है। इनकी मुस्कान कुंद के पुष्प के समान और त्वचा कमल के भीतरी भाग जैसी कोमल है। इनके नेत्र कमल के पत्ते के समान विशाल हैं और इनकी कांति तपाये हुए स्वर्ण (सोने) जैसी है। इनकी कमर हाथ से नापी जा सके इतनी पतली है, केश सुंदर हैं और वक्षस्थल सुसंगठित है। इनका जघन (कटि प्रदेश) अत्यंत विशाल है, दोनों जांघें हाथी की सूँड के समान हैं तथा इनके दोनों पैर लाल, ऊँचे और पृथ्वी पर दृढ़ता से टिकने वाले हैं।" इस प्रकार के दिव्य रूप से युक्त, मानो स्वर्गलोक से उतर कर आई हुई कोई देवी हों— ऐसा दुष्यंत नगर के सभी नागरिक मानने लगे।
व्याख्या: यहाँ शकुंतला के शारीरिक सौंदर्य, दैवीय कांति और उत्तम लक्षणों का अत्यंत सूक्ष्म और सजीव वर्णन किया गया है। नगरवासी उनके रूप-प्रसंग को देखकर मुग्ध हो जाते हैं और उन्हें किसी अप्सरा या देवी के समान मानते हैं।
श्लोक 10-15
पुनः पुनरवोचंस्ते शाकुन्तलगुणानपि। सिंहेक्षणः सिंहदंष्ट्रः सिंहस्कन्धो महाभुजः।। (1-97-10) सिंहोरस्कः सिंहबलः सिंहविक्रान्तगाम्ययम्। पृथ्वंसः पृथुवक्षाश्च छत्राकारशिरा महान्।। (1-97-11) पाणिपादतले रक्तो रक्तास्यो दुन्दुभिस्वनः। राजलक्षणयुक्तश्च राजश्रीश्चास्य लक्ष्यते।। (1-97-12) आकारेण च रूपेण शरीरेणापि तेजसा। दुष्यन्तेन समो ह्येष कस्य पुत्रो भविष्यति।। (1-97-13) एवं ब्रुवन्तस्ते सर्वे प्रशशंसुः सहस्रशः। युक्तिवादानवोचन्त सर्वाः प्राणभृतः स्त्रियः।। (1-97-14) बान्धवा इव सस्नेहा अनुजग्मुः शकुन्तलाम्। पौराणां तद्वचः श्रुत्वा तूष्णींभूता शकुन्तला।। (1-97-15)
हिंदी अनुवाद: वे नागरिक बार-बार शाकुंतल (सर्वदमन) के गुणों की भी चर्चा करने लगे— "इस बालक के नेत्र सिंह जैसे, दाँत सिंह जैसे, कंधे सिंह जैसे और भुजाएँ महान हैं। इसकी छाती सिंह जैसी, बल सिंह के समान और इसकी चाल सिंह के जैसी पराक्रमी है। इसके कंधे चौड़े, वक्षस्थल विस्तृत और सिर छत्र के आकार का विशाल है। इसके हाथ और पैर के तलवे लाल हैं, मुख लालिमायुक्त है और इसकी वाणी दुंदुभि (नगाड़े) के समान गंभीर है। यह सभी राजलक्षणों से युक्त है और इसके चेहरे पर राजश्री झलकती है। अपने आकार, रूप, शरीर और तेज से यह बिल्कुल राजा दुष्यंत के समान है; अतः यह किसका पुत्र हो सकता है?" इस प्रकार कहते हुए हजारों नागरिक उसकी प्रशंसा करने लगे और वहाँ की सभी स्त्रियाँ भी युक्तिसंगत बातें बोलने लगीं। वे सब सगे संबंधियों की तरह स्नेहपूर्वक शकुंतला के पीछे-पीछे चल पड़े। नागरिकों के ऐसे वचनों को सुनकर शकुंतला चुपचाप शांत हो गईं।
व्याख्या: नगरवासी बालक सर्वदमन के सिंह के समान पराक्रमी लक्षणों और उसके राजसी स्वरूप को देखकर अचंभित होते हैं। वे उसकी बनावट और तेज को राजा दुष्यंत से मिलता हुआ पाते हैं और स्नेहपूर्वक उनके पीछे चलने लगते हैं।
श्लोक 16
वेश्मद्वारं समासाद्य विह्वला सा नृपात्मजा। चिन्तयामास सहसा कार्यगौरवकारणात्।। (1-97-16)
हिंदी अनुवाद: राजमहल के द्वार पर पहुँचकर वे नृपात्मजा (राजकुमारी/शकुंतला) विह्वल हो उठीं और कार्य की गुरुता (गंभीरता) तथा महत्ता को देखते हुए अचानक गंभीर चिंता में डूब गईं।
व्याख्या: शकुंतला राजा दुष्यंत के राजमहल के द्वार पर पहुँच तो जाती हैं, किंतु अपने पति के सामने जाने, अपने अधिकारों को स्थापित करने और भविष्य की अनिश्चितता के कारण अचानक गहरी चिंता और संकोच से घिर जाती हैं।
श्लोक 17-20
लज्जया च परीताङ्गी राजन्राजसमक्षतः। अघृणा किं नु वक्ष्यामि दुष्यन्तं मम कारणात्।। (1-97-17) एवमुक्त्वा तु कृपणा चिन्तयन्ती शकुन्तला।' अभिसृत्य च राजानं वेदिता सा प्रवेशिता।। (1-97-18) सह तेन कुमारेण तरुणादित्यवर्चसा। सिंहासनस्थं राजानं महेन्द्रसदृशद्युतिम्।। (1-97-19) शकुन्तला नतशिराः परं हर्षमवाप्य च।' पूजयित्वा यथान्यायमब्रवीत्तं शकुन्तला।। (1-97-20)
हिंदी अनुवाद: लज्जा से घिरे अंगों वाली शकुंतला विचार करने लगीं— "राजाओं की सभा के बीच मैं इन राजा दुष्यंत से अपने विषय में क्या कहूँगी?" ऐसा कहकर दीन भाव से सोचती हुई शकुंतला आगे बढ़ीं और सूचना देकर राजदरबार में प्रवेश पा गईं। उगते हुए सूर्य के समान तेजस्वी उस कुमार के साथ, महेंद्र (इन्द्र) के समान कांति वाले और सिंहासन पर बैठे हुए राजा के पास वे गईं। सिर झुकाए हुए और मन में अत्यधिक हर्ष प्राप्त करती हुई शकुंतला ने यथान्यय पूजा करके राजा से बात कही।
व्याख्या: सभा के बीच पहुँचकर शकुंतला लज्जा और संकोच का अनुभव करती हैं, किंतु अपने पुत्र को साथ लेकर वे सभासदों के माध्यम से राजा दुष्यंत के दरबार में प्रवेश करती हैं और सिंहासन पर आसीन राजा के सम्मुख उपस्थित होती हैं।
श्लोक 21-24
अभिवादय राजानं पितरं ते दृढव्रतम्। एवमुक्त्वा सुतं तत्र लज्जानतमुखी स्थिता।। (1-97-21) स्तम्भमालिङ्ग्य राजानं प्रसीदस्वेत्युवाच सा। शाकुन्तलोपि राजानमभिवाद्य कृताञ्जलिः।। (1-97-22) हर्षेणोत्फुल्लनयनो राजानं चान्ववैक्षत। दुष्यन्तो धर्मबुद्ध्या तु चिन्तयन्नेव सोब्रवीत्।। (1-97-23) किमागमनकार्यं ते ब्रूहि त्वं वरवर्णिनि। करिष्यामि न संदेहः सपुत्राया विशेषतः।। (1-97-24)
हिंदी अनुवाद: शकुंतला ने अपने पुत्र से कहा— "इन दृढव्रती राजा का, जो तुम्हारे पिता हैं, अभिवादन करो।" ऐसा पुत्र से कहकर वे लज्जा से नीचे मुख करके खड़ी हो गईं और राजमहल के एक खंभे का आलिंगन करके बोलीं— "महाराज, प्रसन्न होइए।" शाकुंतल (सर्वदमन) ने भी हाथ जोड़कर राजा का अभिवादन किया और हर्ष से खिले हुए नेत्रों से राजा की ओर देखने लगा। राजा दुष्यंत ने धर्मबुद्धि से विचार करते हुए कहा— "हे वरवर्णिनि! यहाँ तुम्हारे आने का क्या प्रयोजन है? कहो, मैं उसे अवश्य करूँगा, इसमें कोई संदेह नहीं है, विशेषकर पुत्र के साथ आई हुई तुम्हारे लिए तो मैं सब कुछ करूँगा।"
व्याख्या: शकुंतला अपने पुत्र सर्वदमन को उसके पिता (दुष्यंत) के प्रति सम्मान व्यक्त करने को कहती हैं। बालक भी पिता को देखकर आनंदित होता है। राजा दुष्यंत शिष्टाचार का परिचय देते हुए उनका स्वागत करते हैं और आने का कारण पूछते हैं।
श्लोक 25-27
शकुन्तलोवाच। प्रसीदस्व महाराज वक्ष्यामि पुरुषोत्तम। एष पुत्रो हि ते राजन्मय्युत्पन्नः परंतप।। (1-97-25) तस्मात्पुत्रस्त्वया राजन्यौवराज्येऽभिषिच्यताम्। यथोक्तमाश्रमे तस्मिन्वर्तस्व पुरुषोत्तम।। (1-97-26) मया समागमे पूर्वं कृतः स समयस्त्वया। तत्त्वं स्मर महाबाहो कण्वाश्रमपदं प्रति।। (1-97-27)
हिंदी अनुवाद: शकुंतला बोलीं— "हे महाराज! हे पुरुषोत्तम! प्रसन्न होइए, मैं आपसे कहती हूँ। हे राजन्! हे परंतप! यह पुत्र मुझसे ही उत्पन्न हुआ है। इसलिए हे राजन्, इस पुत्र का आप यौवराज्य पर अभिषेक कीजिए और कण्वाश्रम में दिए गए अपने वचनों को सत्य कीजिए। हे महाबाहो! कण्वाश्रम के उस प्रसंग में आपने मुझसे जो समय (प्रतिज्ञा) किया था, उसे आप स्मरण कीजिए।"
व्याख्या: शकुंतला राजा दुष्यंत को उनके पूर्व वचनों की याद दिलाती हैं और स्पष्ट करती हैं कि यह बालक उन्हीं का पुत्र है। वे राजा से आग्रह करती हैं कि वे अपने पुत्र को यौवराज्य का पद प्रदान करें और आश्रम में दिए गए वचनों का पालन करें।
श्लोक 28-32
वैशंपायन उवाच। तस्योपभोगसक्तस्य स्त्रीषु चान्यासु भारत। शकुन्तला सपुत्रा च मनस्यन्तरधीयत।। (1-97-28) स धारयन्मनस्येनां सपुत्रां सस्मितां तदा। तदोपगृह्य मनसा चिरं सुखमवाप सः।। (1-97-29) सोऽथ श्रुत्वापि तद्वाक्यं तस्या राजा स्मरन्नपि। अब्रवीन्न स्मरामीति त्वया भद्रे समागमम्।। (1-97-30) मैथुनं च वृथा नाहं गच्छेयमिति मे मतिः। नाभिजानामि कल्याणि त्वया सह समागमम्।। (1-97-31) धर्मार्थकामसंबन्धं न स्मरामि त्वया सह। गच्छ वा तिष्ठ वा कामं यद्वापीच्छसि तत्कुरु।। (1-97-32)
हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा— हे भारत! अन्य स्त्रियों के उपभोग में आसक्त रहने के कारण राजा दुष्यंत के मन से शकुंतला और उनका पुत्र ओझल (स्मृति से दूर) हो चुके थे। हालांकि मन में पुत्र सहित उन मुस्कुराती हुई शकुंतला को धारण करते हुए उन्होंने मन ही मन उनका आलिंगन किया और चिरकाल तक सुख का अनुभव किया था, फिर भी राजा ने उनके उस वचन को सुनकर और सब कुछ याद होने पर भी यह कह दिया— "हे भद्रे! मैं तुम्हारे साथ किसी भी प्रकार के समागम को नहीं जानता (मुझे याद नहीं है)। मेरा यह मत है कि मैं कभी भी व्यर्थ में मैथुन (संबंध) नहीं करता। हे कल्याणि! मैं तुम्हारे साथ किसी भी समागम को नहीं पहचानता। तुम्हारे साथ मेरा धर्म, अर्थ या काम का कोई संबंध है, यह मुझे याद नहीं है। इसलिए तुम इच्छा हो तो जाओ, या रहो, अथवा जो चाहती हो वह करो!"
व्याख्या: यद्यपि राजा दुष्यंत अंतःकरण से शकुंतला और उनके प्रसंग को भली-भांति याद कर रहे थे, किंतु राजनैतिक कारणों, लोक-लाज या अन्य स्त्रियों में आसक्ति के चलते वे सबके सामने शकुंतला और उनके पुत्र को अपनाने से इनकार कर देते हैं और कठोर वचन कहते हैं। महाभारत का यह अत्यंत नाटकीय और मर्मस्पर्शी मोड़ है।
।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि सप्तनवतितमोऽध्यायः।। 97 ।।
