श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि एकोनशततमोऽध्यायः

श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि एकोनशततमोऽध्यायः

श्लोक 1-4

शकुन्तलोवाच। राजन्सर्षपमात्राणि परच्छिद्राणि पश्यसि। आत्मनो बिल्वमात्राणि पश्यन्नपि न पश्यसि।। (1-99-1) मेनका त्रिदशेष्वेव त्रिदशाश्चानु मेनकाम्। ममैवोद्रिच्यते जन्म दुष्यन्त तव जन्मतः।। (1-99-2) क्षितौ चरसि राजंस्त्वमन्तरिक्षे चराम्यहम्। आवयोरन्तरं पश्य मेरुसर्षपयोरिव।। (1-99-3) महेन्द्रस्य कुबेरस्य यमस्य वरुणस्य च। भवनान्यनुसंयामि प्रभावं पश्य मे नृप।। (1-99-4)

हिंदी अनुवाद: शकुंतला बोलीं— "हे राजन्! आप दूसरों के सरसों के दाने के समान छोटे दोषों को भी देखते हैं, किंतु अपने स्वयं के बेल (बिल्व) के फल के समान विशाल दोषों को देखते हुए भी नहीं देखते हैं। मेनका देवताओं में प्रतिष्ठित हैं और देवता मेनका के अधीन हैं; इस प्रकार हे दुष्यंत! मेरा जन्म तुम्हारे जन्म से श्रेष्ठ ही है। हे राजन्! तुम पृथ्वी पर चलते हो और मैं आकाश में विचरण करती हूँ; हम दोनों के बीच का अंतर ऐसा है जैसे सुमेरु पर्वत और सरसों के दाने का अंतर हो! हे नृप! मेरे प्रभाव को देखो कि मैं महान इंद्र, कुबेर, यम और वरुण के भवनों तक में आवागमन करती हूँ।"

व्याख्या: शकुंतला दुष्यंत के अहंकार और पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण पर करारा कटाक्ष करती हैं। वे राजा को उनके अपने दोषों की याद दिलाती हैं और अपनी दिव्य वंशावली (अप्सरा मेनका की पुत्री होने) का हवाला देकर सिद्ध करती हैं कि उनका कुल और प्रभाव राजा से किसी भी प्रकार कम नहीं है।

श्लोक 5-10

पुरा नरवरः पुत्र उर्वश्यां जनितस्तदा। आयुर्नाम महाराज तव पूर्वपितामहः।। (1-99-5) महर्षयश्च बहवः क्षत्रियाश्च परन्तपाः। अप्सरःसु ऋषीणां च मातृदोषो न विद्यते।। (1-99-6) सत्यश्चापि प्रवादोऽयं प्रवक्ष्यामि च ते नृप। निदर्शनार्थं न द्वेषाच्छ्रुत्वा तत्क्षन्तुमर्हसि।। (1-99-7) विरूपो यावदादर्शे नात्मनो वीक्षते मुखम्। मन्यते तावदात्मानमन्येभ्यो रूपवत्तरम्।। (1-99-8) यदा तु रूपमादर्शे विरूपं सोऽभिवीक्षते। तदा ह्रीमांस्तु जानीयादन्तरं नेतरं जनम्।। (1-99-9) अतीव रूपसंपन्नो न कंचिदवमन्यते। अतीव जल्पन्दुर्वाचो भवतीह विहेतुकः।। (1-99-10)

हिंदी अनुवाद: "हे महाराज! पूर्वकाल में श्रेष्ठ नृवरों (राजाओं) में आपके पूर्वपितामह 'आयु' का जन्म अप्सरा उर्वशी से ही हुआ था। इसी प्रकार और भी अनेक महर्षि तथा पराक्रमी क्षत्रिय अप्सराओं से उत्पन्न हुए हैं, अतः अप्सराओं और ऋषियों के प्रसंग में कोई मातृदोष नहीं माना जाता। हे नृप! यह एक सत्य प्रवाद (कथा) है, जिसे मैं केवल दृष्टांत के लिए कह रही हूँ, द्वेष के कारण नहीं; इसे सुनकर आप क्षमा करने की कृपा करें। जब तक कोई कुरूप व्यक्ति दर्पण में अपना मुख नहीं देखता, तब तक वह यही मानता है कि वह अन्य सभी से अधिक सुंदर है; किंतु जब वह दर्पण में अपने विकृत रूप को देख लेता है, तब वह स्वयं लज्जित होता है, दूसरों को नहीं। जो व्यक्ति वास्तव में अत्यधिक रूप और गुणों से संपन्न होता है, वह कभी किसी का अपमान नहीं करता, जबकि बहुत अधिक अनर्गल और कठोर वचन बोलने वाला व्यक्ति हीनता और बिना कारण के दुष्टता से ग्रस्त होता है।"

व्याख्या: शकुंतला राजवंश के ही इतिहास का उदाहरण देकर राजा के उस तर्क का खंडन करती हैं जिसमें उन्होंने अप्सरा की संतान होने पर उंगली उठाई थी। वे दर्पण का दृष्टांत देकर समझाती हैं कि जो व्यक्ति स्वयं के दोषों से अनजान होता है, वही दूसरों पर झूठे आरोप लगाता है।

श्लोक 11-14

पांसुपातेन हृष्यन्ति कुञ्जरा मदशालिनः। तथा परिवदन्नन्यान्हृष्टो भवति दुर्मतिः।। (1-99-11) सत्यधर्मच्युतात्पुंसः क्रुद्धादाशीविषादिव। सुनास्तिकोप्युद्विजते जनः किं पुनरास्तिकः।। (1-99-12) स्वयमुत्पाद्य पुत्रं वै सदृशं योऽवमन्यते। तस्य देवाः श्रियं घ्नन्ति तत्रैनं कलिराविशेत्।। (1-99-13) अभव्येऽप्यनृतेऽशुद्धे नास्तिके पापकर्मणि। दुराचारे कलिर्ह्याशु न कलिर्धर्मचारिषु।। (1-99-14)

हिंदी अनुवाद: "जैसे मतवाले हाथी अपने ऊपर धूल पड़ने पर प्रसन्न होते हैं, वैसे ही दुर्मति (दुष्ट बुद्धि वाले) लोग दूसरों की निंदा करके और उन्हें कोसकर प्रसन्न होते हैं। सत्य और धर्म से भ्रष्ट हुए तथा क्रोधित मनुष्य से तो नास्तिक मनुष्य भी ऐसे डरता है जैसे विषैले साँप से, फिर आस्तिक जनों की तो बात ही क्या है! जो व्यक्ति अपने ही समान उत्पन्न हुए अपने पुत्र का स्वयं ही अपमान करता है, देवता उसके ऐश्वर्य और लक्ष्मी को नष्ट कर देते हैं और उस पर कलियुग (अशुभ प्रभाव) का वास हो जाता है। अभव्य, असत्यवादी, अशुद्ध, नास्तिक, पापकर्म और दुराचारी व्यक्ति को कलि (अशुभता) बहुत जल्दी आ घेरती है, किंतु धर्म का आचरण करने वालों के पास कलि नहीं फटकती।"

व्याख्या: शकुंतला राजा दुष्यंत के इस अन्यायी और क्रूर आचरण को अधर्म और पाप का प्रतीक बताती हैं। वे चेतावनी देती हैं कि अपने ही रक्त और पुत्र का अपमान करने वाले राजा का भाग्य और ऐश्वर्य देवता स्वयं नष्ट कर देते हैं।

श्लोक 15-20

मूर्खो हि जल्पतां पुंसां श्रुत्वा वाचः शुभाशुभाः। अशुभं वाक्यमादत्ते पुरीषमिव सूकरः।। (1-99-15) प्राज्ञस्तु जल्पतां पुंसां श्रुत्वा वाचः शुभाशुभाः। गुणवद्वाक्यमादत्ते हंसः क्षीरमिवाम्भसि।। (1-99-16) आत्मनो दुष्टभावत्वं जानन्नीचोऽप्रसन्नधीः। परेषामपि जानाति स्वधर्मसदृशान्गुणान्।। (1-99-17) दह्यमानास्तु तीव्रेण नीचाः परयशोग्निना। अशक्तास्तद्गतिं गन्तुं ततो निन्दां प्रकुर्वते।। (1-99-18) अन्यान्परिवदन्साधुर्यथा हि परितप्यते। तथा परिवदन्नन्यान्हृष्टो भवति दुर्जनः।। (1-99-19) अपवादरता मूर्खा भवन्ति हि विशेषतः। नापवादरताः सन्तो भवन्ति स्म विशेषतः।। (1-99-20)

हिंदी अनुवाद: "मूर्ख मनुष्य लोगों की शुभ और अशुभ दोनों प्रकार की बातें सुनकर सूअर की तरह केवल अशुभ (मलिन) बातों को ही ग्रहण करता है; किंतु बुद्धिमान (प्राज्ञ) पुरुष लोगों की बातों में से ऐसे गुणवान वचनों को ग्रहण करता है जैसे हंस जल में से केवल दूध को चुन लेता है। नीच और अप्रसन्न बुद्धि वाला मनुष्य स्वयं के भीतर के दुष्ट भाव को अच्छी तरह जानता हुआ भी दूसरों के गुणों को अपने धर्म के विपरीत समझता है। नीच लोग दूसरों के यश रूपी अग्नि से तीव्र रूप से जलते रहते हैं और जब वे स्वयं उस महान गति को पाने में असमर्थ होते हैं, तब वे दूसरों की निंदा करने लगते हैं। सज्जन पुरुष दूसरों की निंदा होते देख कर दुखी होता है, किंतु दुर्जन व्यक्ति दूसरों की निंदा करने में हर्ष का अनुभव करता है। विशेष रूप से मूर्ख लोग ही दूसरों के अपवाद (दोषारोपण) में लगे रहते हैं, जबकि संत पुरुष कभी भी अपवाद या निंदा में रुचि नहीं रखते।"

व्याख्या: यहाँ शकुंतला मूर्ख और ज्ञानी, तथा दुर्जन और सज्जन के स्वभाव का स्पष्ट भेद बताती हैं। वे दुष्यंत के व्यवहार को दुर्जन और निंदनीय बताती हैं जो दूसरों के गुणों को न देखकर केवल अहंकार और ईर्ष्यावश निंदा कर रहे हैं।

श्लोक 21-24

अभिवाद्य यथा वृद्धान्साधुर्गच्छति निर्वृतिम्। एवं सज्जनमाक्रुश्य मूर्खो भवति निर्वृतः।। (1-99-21) सुखं जीवन्त्यदोषज्ञा मूर्खा दोषानुदर्शिनः। यथा वाच्याः परैः सन्तः परानाहुस्तथाविधान्।। (1-99-22) अतो हास्यतरं लोके किंचिदन्यन्न विद्यते। यदि दुर्जन इत्याहुः सज्जनं दुर्जनाः स्वयम्।। (1-99-23) दारुणाल्लोकसंक्लेशाद्दुःखमाप्नोत्यसंशयम्।। कुलवंशप्रतिष्ठां हि पितरः पुत्रमब्रुवन्।। (1-99-24)

हिंदी अनुवाद: "जैसे कोई साधु पुरुष वृद्धों का अभिवादन करके परम शांति प्राप्त करता है, वैसे ही मूर्ख व्यक्ति किसी सज्जन को अपशब्द कहकर संतुष्टि पाता है। दोषों को न जानने वाले और दूसरों में केवल दोष देखने वाले मूर्ख लोग ही इस संसार में सुखी जीवन का भ्रम पालते हैं, और जैसे संत पुरुष दूसरों को देखते हैं, वैसे हीन लोग भी दूसरों को समझते हैं। अतः इस संसार में इससे बढ़कर हास्यस्पद और कुछ नहीं हो सकता कि दुर्जन लोग स्वयं किसी सज्जन को 'दुर्जन' कहें! इस प्रकार के दारुण लोक-संक्लेश (कष्ट) से मनुष्य निस्संदेह महान दुःख को प्राप्त होता है, क्योंकि पितृगणों ने पुत्र को ही कुल और वंश की प्रतिष्ठा कहा है।"

व्याख्या: शकुंतला अपने अंतिम तर्कों में यह सिद्ध करती हैं कि सत्य और धर्म अपनी जगह अडिग हैं। राजा दुष्यंत द्वारा उन्हें या उनके पुत्र को दुर्जन या असत्यवादी कहना वैसा ही उपहास का विषय है जैसे कोई दुर्जन किसी सज्जन पर लांछन लगाए। वंश और कुल की सच्ची प्रतिष्ठा पुत्र से ही है, जिसे राजा अज्ञानतावश ठुकरा रहे हैं।

श्लोक 25-29

उत्तमं सर्वधर्माणां तस्मात्पुत्रं तु न त्यजेत। स्वपत्नीप्रभवाँल्लब्धान्कृतान्समयवर्धितान्।। (1-99-25) क्रीतान्कन्यासु चोत्पんだन्पुत्रान्वै मनुरब्रवीत्। ते च षड्वन्धुदायादाः षडदायादबान्धवाः।। (1-99-26) धर्मकृत्यवहा नॄणां मनसः प्रीतिवर्धनाः। त्रायन्ते नरकाज्जाताः पुत्रा धर्मप्लवाः पितॄन्।। (1-99-27) स त्वं नृपतिशार्दूल न पुत्रं त्यक्तुमर्हसि। तस्मात्पुत्रं च सत्यं च पालयस्व महीपते।। (1-99-28) उभयं पालयस्वैतन्नानृतं वक्तुमर्हसि। आत्मानं सत्यधर्मौ च पालयेथा महीपते। नरेन्द्रसिंह कपटं न हि वोढुं त्वमर्हसि।। (1-99-29)

हिंदी अनुवाद: "पुत्र की प्राप्ति सभी धर्मों में उत्तम है, इसलिए अपनी पत्नी से उत्पन्न हुए, या अन्य विधियों से प्राप्त, समय द्वारा पाले गए अथवा शास्त्रोक्त पुत्रों का कभी त्याग नहीं करना चाहिए। मनुजी ने अपनी पत्नी, कन्या आदि से उत्पन्न विभिन्न प्रकार के पुत्रों का वर्णन किया है— वे छह प्रकार के पुत्र बन्धुओं के दायसाद (उत्तराधिकारी) और छह प्रकार के दायसाद बन्धुओं के सहायक होते हैं। मनुष्यों के लिए धर्मकृत्यों का वहन करने वाले, मन को प्रसन्नता देने वाले और नरक से रक्षा करने वाले ये पुत्र पितरों के लिए धर्म की नौका के समान हैं। हे नृपतिशार्दूल! ऐसे में आपको अपने पुत्र का त्याग करना कदापि उचित नहीं है। इसलिए हे महीपते! आप अपने पुत्र और सत्य दोनों की रक्षा कीजिए। इन दोनों का ही पालन कीजिए, आपको असत्य बोलना शोभा नहीं देता। हे महीपते! आप अपनी आत्मा, सत्य और धर्म की रक्षा करें। हे नरेन्द्रसिंह! आप इस प्रकार के कपट (छल) का भार ढोने योग्य नहीं हैं।"

व्याख्या: शकुंतला मनुस्मृति और धर्मशास्त्रों का हवाला देते हुए पुत्र के महत्त्व को समझाती हैं। वे राजा दुष्यंत को चेतावनी देती हैं कि वे अपने राजधर्म, सत्य और पितृ-ऋण का पालन करते हुए इस कपट को छोड़ें और अपने पुत्र को स्वीकार करें।

श्लोक 30-34

वरं कूपशताद्वापी वरं वापीशतात्क्रतुः। वरं क्रतुशतात्पुत्रः सत्यं पुत्रशताद्वरम्।। (1-99-30) अश्वमेधसहस्रं च सत्यं च तुलया धृतम्। अश्वमेधसहस्राद्धि सत्यमेव विशिष्यते।। (1-99-31) सर्ववेदाधिगमनं सर्वतीर्थावगाहनम्। सत्यस्यैव च राजेन्द्र कलां नार्हति षोडशीम्।। (1-99-32) नास्ति सत्यसमो धर्मो न सत्याद्विद्यते परम्। न हि तीव्रतरं पापमनृतादिह विद्यते।। (1-99-33) राजन्सत्यं परो धर्मः सत्याच्च समयः परः। मात्याक्षीः समयं राजन्सत्यं सङ्गतमस्तु ते।। (1-99-34)

हिंदी अनुवाद: "सौ कूपों (कुओं) से एक वापी (बड़ा जलाशय) श्रेष्ठ है, सौ वापियों से एक क्रतु (यज्ञ) श्रेष्ठ है, सौ यज्ञों से एक पुत्र श्रेष्ठ है और सौ पुत्रों से भी 'सत्य' श्रेष्ठ है! यदि एक पलड़े पर हजार अश्वमेध यज्ञ रखे जाएं और दूसरे पलड़े पर सत्य को रखा जाए, तो हजार अश्वमेध यज्ञों से भी सत्य का पलड़ा ही भारी (श्रेष्ठ) ठहरता है। संपूर्ण वेदों का अध्ययन और समस्त तीर्थों में स्नान करना— ये सब मिलकर भी सत्य की सोलहवीं कला के बराबर भी नहीं हो सकते। सत्य के समान कोई धर्म नहीं है, सत्य से बढ़कर कुछ भी नहीं है और इस संसार में असत्य (झूठ) से बढ़कर कोई तीव्र पाप नहीं है। हे राजन्! सत्य ही परम धर्म है और सत्य से ही प्रतिज्ञा (समय) की रक्षा होती है। इसलिए हे राजन्! अपनी उस प्रतिज्ञा का उल्लंघन मत करो, तुम्हारा सत्य के साथ ही मिलन (मंगल) हो।"

व्याख्या: यहाँ सत्य की महिमा का चरम उत्कर्ष प्रस्तुत किया गया है। शकुंतला वेदों, यज्ञों और तीर्थों से भी ऊपर सत्य को स्थान देती हैं और दुष्यंत को याद दिलाती हैं कि उन्होंने जो गंधर्व विवाह के समय वचन (समय) दिया था, उसका पालन करना ही उनका सबसे बड़ा धर्म है।

श्लोक 35-42

यः पापो न विजानीयात्कर्म कृत्वा नराधिप। न हि तादृक्परं पापमनृतादिह विद्यते।। (1-99-35) यस्य ते हृदयं वेद सत्यस्यैवानृतस्य च। कल्याणावेक्षणं तस्मात्कर्तुमर्हसि धर्मतः।। (1-99-36) यो न कामान्न च क्रोधान्न द्रोहादतिवर्तते। अमित्रं वापि मित्रं वा स एवोत्तमपूरुषः।। (1-99-37) अनृतश्चेत्प्रसङ्गस्ते श्रद्दधासि न चेत्स्वयम्। आश्रमं गन्तुमिच्छामि त्वादृशो नास्ति सङ्गतं।। (1-99-38) पुत्रत्वे शङ्कमानस्य त्वं बुद्ध्या निश्चयं कुरु। गतिः स्वरः स्मृतिः सत्वं शीलं विद्या च विक्रमः।। (1-99-39) धृष्णुप्रकृतिभावौ च आवर्ता रोमराजयः। समा यस्य यदा स्युस्ते तस्य पुत्रो न संशयः।। (1-99-40) सादृश्येनोद्धऋतं बिम्बं तव देहाद्विशांपते। तातेति भाषमाणं वै मा स्म राजन्वृथा कृथाः।। (1-99-41) ऋते च गर्दभीक्षीरात्पयः पास्यति मे सुतः। ऋतेपि त्वां च दुष्यन्त शैलराजावतंसिकाम्। चतुरन्तामिमामुर्वीं पुत्रो मे पालयिष्यति।। (1-99-42)

हिंदी अनुवाद: "हे नराधिप! जो पापी मनुष्य छिपकर बुरे कर्म करके यह सोचता है कि कोई नहीं जानता, उसके लिए असत्य से बढ़कर दूसरा कोई पाप नहीं है। आपका हृदय सत्य और असत्य दोनों को अच्छी तरह जानता है, इसलिए आपको धर्मानुसार कल्याणकारी मार्ग का ही आचरण करना चाहिए। जो व्यक्ति न तो काम के वश में, न क्रोध से और न द्रोह के कारण— मित्र या अमित्र किसी के प्रति भी सत्य से विचलित नहीं होता, वही उत्तम पुरुष कहलाता है। यदि आपको मेरे वचनों पर विश्वास नहीं है और आप असत्य में ही प्रवृत्त हैं, तो मैं आश्रम वापस जाना चाहती हूँ; आप जैसे व्यक्ति के साथ रहना उचित नहीं है। इस बालक के पुत्र होने में जो आपको शंका है, उसके लिए आप अपनी बुद्धि से स्वयंनिश्चय कर लीजिए— इस बालक की चाल, स्वर, स्मरणशक्ति, सत्त्व (तेज), शील, विद्या, विक्रम, निर्भय प्रकृति, शरीर के आवर्त और रोमराजयें— जब ये सब आपके समान ही हैं, तो इसमें कोई संशय नहीं है कि यह आपका ही पुत्र है। हे विशांपते! यह बालक आपके शरीर से ही साक्षात् बिंब के समान उतरा हुआ है (आपकी प्रतिकृति है), इसलिए 'तात' (पिता) कहकर पुकारने वाले इस बालक के वचनों को हे राजन्! व्यर्थ मत कीजिए। गदही के दूध को छोड़कर मेरा यह पुत्र समस्त पेयों (उत्तम दूध) को पिएँगे। हे दुष्यन्त! यदि आप इसे न भी अपनाएँ, तो भी पर्वतों से सुशोभित यह चारों समुद्रों तक फैली हुई संपूर्ण पृथ्वी मेरा यह पुत्र अवश्य पालयिष्यति (పాల करेगा)।"

व्याख्या: शकुंतला राजा को चुनौती देती हैं कि वे बालक के शारीरिक लक्षणों (चाल, स्वर, रूप आदि) को देखकर स्वयं परीक्षा कर लें कि यह उन्हीं का अंश है। साथ ही वे भविष्यवाणी करती हैं कि यह बालक भविष्य में चक्रवर्ती सम्राट बनेगा और संपूर्ण पृथ्वी पर शासन करेगा, चाहे दुष्यंत इसे अभी अपनाएँ या न अपनाएँ।

श्लोक 43-47

शकुन्तले तव सुतश्चक्रवर्ती भविष्यति। एवमुक्तं महेन्द्रेण भविष्यति न चान्यथा।। (1-99-43) साक्षित्वे बहवो ह्युक्ता देवदूतादयो मया। न ब्रुवन्ति तथा सत्यमुताहो नानृतं किल।। (1-99-44) असाक्षिणी मन्दबाग्या गमिष्यामि यथागतम्।। वैशंपायन उवाच। एतावदुक्त्वा वचनं प्रातिष्ठत शकुन्तला। तस्याः क्रोधसमुत्थोग्निः सधूमो मूर्ध्न्यदृश्यत।। (1-99-46) संनियम्यात्मनोऽङ्गेषु ततः क्रोधाग्निमात्मजम्। प्रस्थितैवानवद्याङ्गी सह पुत्रेण वै वनम्।। (1-99-47)

हिंदी अनुवाद: "'हे शकुंतले! तुम्हारा यह पुत्र चक्रवर्ती सम्राट होगा'— देवराज इंद्र ने ऐसा कहा है, अतः यह बात अन्यथा नहीं हो सकती। मैंने साक्षियों के रूप में देवदूतादि कई शक्तियों का उल्लेख किया है, जो सत्य के अलावा कभी असत्य नहीं बोलतीं। अब मैं अभागिन, बिना किसी प्रत्यक्ष साक्षी के, जैसे आई थी वैसे ही वापस जा रही हूँ।" वैशंपायन जी ने कहा— ऐसा वचन कहकर शकुंतला वहाँ से प्रस्थान करने लगीं। उस समय उनके क्रोध से उत्पन्न हुआ धुएँ सहित अग्नि उनके मस्तक पर प्रकट होता हुआ दिखाई दिया। किंतु उस अनवद्याङ्गी (निर्दोष अंगों वाली) शकुंतला ने अपने शरीर के भीतर ही उस क्रोधाग्नि को नियंत्रित (शांत) कर लिया और अपने पुत्र के साथ वन की ओर प्रस्थान कर गईं।

व्याख्या: शकुंतला का यह प्रसंग महाभारत के सबसे अधिक नाटकीय और मर्मस्पर्शी दृश्यों में से एक है। जब राजा दुष्यंत तमाम प्रमाणों और तर्कों के बाद भी अपनी हठधर्मिता नहीं छोड़ते, तब शकुंतला अपमानित और विरक्त होकर अपने पुत्र के साथ वापस आश्रम की ओर लौट जाती हैं। उनके भीतर का तप और क्रोध उनके मस्तक पर तेज के रूप में दिखाई देता है, जिसे वे संयमित कर लेती हैं।

।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि एकोनशततमोऽध्यायः।। 99 ।।

संभवपर्वणि अष्टनवतितमोऽध्यायः

संभवपर्वणि शततमोऽध्यायः