गर्भस्थ चेतना का श्रवण विज्ञान
ऋग्वेद मण्डल १, सूक्त ४४, मन्त्र १३ का अक्षरात्मक विच्छेद और अंतर्गर्भाशयी होश (Intrauterine Consciousness) का साक्ष्य
पिछले मन्त्र में जब हमने देखा कि किस प्रकार अंतरिक्षीय तरंग रूपी जीवात्मा वर्षा और अन्न श्रृंखला के माध्यम से माता-पिता के वीर्य-परमाणुओं (शुक्राणु-अण्डाणु) में रूपांतरित होकर गर्भ के भीतर परमात्मा की अर्चना करती है, तब संसार के मन में यह संशय उठ सकता है कि क्या गर्भ के अंधकार में पल रहा जीव सचमुच होश में रहता है? क्या वह बाहरी दुनिया से संपर्क करने में सक्षम है?
ऋग्वेद के इसी सूक्त का त्रयोदश मन्त्र आधुनिक भ्रूण विज्ञान (Modern Embryology) के सारे भ्रमों को छिन्न-भिन्न कर देता है। महर्षि प्रस्कण्व काण्व की ऋत-दृष्टि प्रमाणित करती है कि माता के उदर में स्थित वह नन्हा पिंड कोई बेजान लोथड़ा नहीं है, बल्कि वह पूर्णतः जाग्रत, अत्यंत समझदार और आनुवंशिक संदेशों को ग्रहण करने वाला एक परम योद्धा है।
॥ ऋग्वेद सूक्त ४४ मन्त्र १३ ॥
श्रुधि श्रुत्कर्ण वह्निभिर्देवैरग्ने सयावभिः ।
आ सीदन्तु बर्हिषि मित्रो अर्यमा प्रातर्यावाणो अध्वरम् ॥१३॥
१. श्रुधि श्रुत्कर्ण: गर्भ के भीतर 'अभिमन्यु और प्रह्लाद' का साक्ष्य
ऋषि कहते हैं कि गर्भस्थ जीव 'श्रुत्कर्ण' है। श्रद्धा की चरम तन्मयता और पूर्ण एकाग्रता के साथ वह जीव माता के उदर के भीतर रहते हुए भी अपने माता-पिता के आचार-विचार, उनके संवाद और गुप्त से गुप्त ध्वनियों को सूक्ष्म तरंगों के रूप में सुनता और सीधे अपनी चेतना में अंकित करता है। इतिहास और शास्त्र इसके साक्षात गवाह हैं।
॥ महाभारत इतिहास साक्ष्य ॥
गर्भस्थ एव वीरः सन् चक्रव्यूहविभेदनम् ।
श्रुतवान् स सुभद्रायाः पितुर्मुखादनिन्दितः ॥
अर्थ: वह परम वीर अनिन्दित अभिमन्यु जब माता सुभद्रा के गर्भ में ही था, तभी उसने अपने पिता अर्जुन के मुख से चक्रव्यूह को भेदने (प्रवेश करने) की गुप्त विद्या को पूरी तरह सुन और सीख लिया था। माता के सो जाने के कारण वह बाहर निकलने की विद्या नहीं सुन सका था, जिससे सिद्ध होता है कि गर्भस्थ जीव का श्रवण-तंत्र और बुद्धि साक्षात जाग्रत रहती है।
॥ श्रीमद्भागवत महापुराण साक्ष्य (७.७.१६) ॥
श्रावितं कालतोन्यत्वात् प्रमदायाः प्रनष्टमपि ।
ऋषेः अनुग्रहाद् भूयः ममापि अद्यापि अनुस्मृतिः ॥
अर्थ: देवर्षि नारद द्वारा माता कयाधू को दिया गया परम ब्रह्मज्ञान, स्त्री-स्वभाव और समय बीत जाने के कारण माता तो भूल गईं, लेकिन गर्भ में एकाग्रचित्त होकर सुनने के कारण भक्त प्रह्लाद को वह ज्ञान जन्म के बाद भी (अद्यापि) पूरी तरह याद रहा।
२. वह्निभिर्देवैरग्ने सयावभिः: अक्षरों में छिपा 'सयाना' जीव
जब हम मन्त्र के शब्दों का सूक्ष्मतम अक्षरात्मक विच्छेद करते हैं, तो जीव की गर्भस्थ शारीरिक और मानसिक स्थिति का विस्मयकारी सत्य प्रकट होता है:
- व-ह्-इ-न (वह्निभिः - हिन/कमजोर): गर्भ के भीतर भौतिक रूप से जीव अत्यंत असहाय, पराश्रित और 'हिन' (निर्बल) अवस्था में है। वह स्वतंत्र रूप से कोई भौतिक कर्म या गति नहीं कर सकता।
- देवैरग्ने: इस दैहिक और भौतिक अक्षमता के बावजूद, वह अपनी सूक्ष्म जैविक 'कारण शरीर' (Genetic & Astral Body) के माध्यम से अपने मन और ज्ञानेन्द्रियों को सक्रिय रखने में पूर्ण समर्थ होता है।
- सयावभिः (सयाना/जाग्रत): भौतिक रूप से पराश्रित होने पर भी वह जीव आंतरिक रूप से निश्चित रूप से 'सयाना' (परम बुद्धिमान, होश से भरा और समझदार) होता है, जो गर्भ की हर हलचल के प्रति जाग्रत रहता है।
| मन्त्र का पद | अक्षरात्मक मर्मभेद | गर्भस्थ जैविक एवं वैज्ञानिक यथार्थ |
|---|---|---|
| श्रुत्कर्ण | सूक्ष्म तरंग श्रवण प्रणाली | आँखें बंद होने पर भी ध्वनि और विचारों को पूर्ण स्मृति में दर्ज करने की क्षमता। |
| वह्निभिः | व-ह्-इ-न (हिन/पराश्रित) | शारीरिक रूप से निर्बल परंतु चेतना के धरातल पर पूर्ण क्रियाशील। |
| सयावभिः | सयाना जीव | गर्भ के अंधकार में भी सुप्त न होकर, जाग्रत और बोधयुक्त अवस्था में रहना। |
| बर्हिषि | ब्रह्म-ऋषि की समाधि अवस्था | बाहरी कोलाहल से मुक्त, गर्भाशय के आसन (Uterine Bed) पर जीव की समाधि स्थिति। |
३. बर्हिषि मित्रो अर्यमा: नवीन काया का दैवीय निर्माण
गर्भ के एकांत में जीव किसी कारागार में बंद कैदी की तरह केवल पीड़ित नहीं है, बल्कि वह बाहरी जगत के कोलाहल से दूर 'बर्हिषि' अर्थात् एक ब्रह्म-ऋषि की भाँति अपनी ही आत्मा (आ) के मूल स्वरूप में स्थित (सीदन्तु) होकर समाधिस्थ रहता है।
इस परम एकांत साधना के समय ब्रह्मांड के सूक्ष्म भौतिक तत्व—'मित्र' (कोशिकाओं को आपस में जोड़ने वाला बल - Cellular Cohesion) और 'अर्यमा' (माता के रक्त से पोषण खींचकर जीव को देने वाला नियम)—उसके सहयोगी बनते हैं। ये दिव्य शक्तियाँ मिलकर उस 'सयाने' जीव के चारों ओर आनुवंशिक कोड के अनुसार नौ महीने तक एक सुंदर, पूर्ण और नवीन भौतिक शरीर का ताना-बाना बुनती हैं।
४. प्रातर्यावाणो अध्वरम्: अदम्य पराक्रम और प्रकटन
जैसे रात्रि के घोर, अभेद्य और डरावने अंधकार को बीच से चीरकर सूर्य की तेजस्वी किरणें बाहर निकलती हैं और एक दिव्य प्रभातकालीन बेला (प्रातर्यावाणः) को जन्म देती हैं, ठीक वैसी ही घटना जन्म के क्षण घटित होती है।
नौ महीने की तपस्या पूर्ण होते ही, वह जीव अपनी उस 'हिन' (निर्बल) काया में होने के बावजूद, अपने भीतर छिपे **अदम्य साहस, पुरुषार्थ और प्राण-शक्ति के पराक्रम** से माता के गर्भ के कड़े बंधनों को फाड़कर, अपनी नई तेजस्वी भौतिक काया के साथ इस संसार के पटल पर साक्षात प्रकट हो जाता है। शिशु का यह कड़कड़ाती ध्वनि के साथ रोते हुए बाहर आना ही, प्रकृति के उस अहिंसक, शाश्वत और निरंतर गतिमान जीवन-यज्ञ (अध्वरम्) की साक्षात पूर्णाहुति है।

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