Vedic Science of Reincarnation Hindi
* ऋग्वेद मंडल १ सूक्त ४४ मंत्र १२
* Vedic Quantum Genetics in Hindi
* जीवात्मा का गमन पथ अंतरिक्ष
* अद्य स्वर्दृशः जीवात्मा विज्ञान
* Gyan Vigyan Brahmgyan Reincarnation
* Ancient Science of Soul Transfer
पुनर्जन्म का क्वांटम आनुवंशिकी विज्ञान
ऋग्वेद मण्डल १, सूक्त ४४, मन्त्र १२ की वैज्ञानिक मीमांसा — अंतरिक्ष से गर्भ तक जीवात्मा का गमन-पथ
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और भौतिकी (Modern Physics) जहाँ आकर घुटने टेक देती है, वहीं से वेदों का अनादिकालीन अक्षर-विज्ञान शुरू होता है। विज्ञान आज तक यह गुत्थी नहीं सुलझा पाया है कि मृत्यु के क्षण और नए गर्भ के धारण के बीच वह चैतन्य सत्ता (Information & Consciousness) कहाँ और किस रूप में निवास करती है। क्या मृत्यु के साथ ही सब कुछ समाप्त हो जाता है?
ऋग्वेद के प्रथम मण्डल के ४४वें सूक्त के १२वें मन्त्र में महर्षि प्रस्कण्व काण्व ने इसी परम गुप्त गूँज को डिकोड किया है। यह पोस्ट किसी परलोक की काल्पनिक गाथा नहीं है, बल्कि "प्रत्यक्षदर्शनं किम् प्रमाणम्" के अकाट्य धरातल पर आधारित अंतरिक्षीय परिवहन और आनुवंशिकी (Exobiology and Interstellar Genetic Transport) का साक्षात वैज्ञानिक घोषणापत्र है।
॥ ऋग्वेद सूक्त ४४ मन्त्र १२ ॥
यद्देवानां मित्रमहः पुरोहितोऽन्तरो यासि दूत्यम् ।
सिन्धोरिव प्रस्वनितास ऊर्मयोऽग्नेर्भ्राजन्ते अर्चयः ॥१२॥
१. यद्देवानां मित्रमहः: मृत्यु के क्षण 'संस्कारों का निचोड़ा जाना'
जब यह स्थूल हाड़-मांस का शरीर (Dead Matter) अपनी अंतिम सांस लेता है, तो उसमें से क्या मुक्त होता है? ऋषि प्रस्कण्व कहते हैं—"यद्देवानां"। यह जीव के वे नाम, रूप, और संचित कर्मों के आनुवंशिक संस्कार (Genetic Software) हैं, जो अविनाशी हैं।
मृत्यु के तत्क्षण बाद, जीव के इस सूक्ष्म कोडिंग को वे प्राकृतिक शक्तियाँ (देवता) मृत शरीर से 'निचोड़' लेती हैं जो जीवन भर उसकी काया को चला रही थीं। ये देवता जीवात्मा के शत्रु नहीं, बल्कि "मित्रमहः" (परम मित्र और सहयोगी ऊर्जा) हैं। चूँकि इसी चैतन्य जीव के द्वारा ही ब्रह्मांड के 'ऋत' (Ecosystem) का कल्याण होना है, इसलिए ये प्राकृतिक देव उस महान जीव (महः) के सूक्ष्म संस्कारों को अपने आश्रय में तब तक पूरी तरह सुरक्षित और संरक्षित रखते हैं, जब तक वह अपनी कोडिंग के अनुकूल उपयुक्त माता-पिता और गर्भ की खोज नहीं कर लेता।
२. अन्तरो यासि दूत्यम्: अंतरिक्षीय यात्री निवास
जब जीवात्मा न तो मृत देह में है और न ही नए जीवित शरीर में, तो वह संधिकाल में कहाँ ठहरती है? मन्त्र का उत्तर है—"अन्तरः यासि दूत्यम्"। ये देव शक्तियाँ अपने आंतरतम की गहराई में उस गमन करती हुई जीवात्मा को एक क्षणिक विश्राम स्थल, एक 'ट्रांजिट स्टेशन' (Transit Station) प्रदान करती हैं।
यह चेतना ही मृत पदार्थ और जीवित पदार्थ के ठीक मध्य का सेतु है। यही कारण है कि इसे "दूत्यम्" (The Cosmic Messenger) कहा गया है। यह वह अद्वितीय दूत है जो स्थूल पदार्थ के नष्ट होने पर भी उसके भीतर के चैतन्य संदेश (Information Block) को नष्ट नहीं होने देता और उसे आगे बढ़ा देता है।
| मन्त्र का सुत्रीय पद | सूक्ष्म परमाण्विक और जैविक विच्छेद | ब्रह्मांडीय एवं आनुवंशिक विज्ञान (Cosmic Genetics) |
|---|---|---|
| यद्देवानां | नाम-रूप-संस्कारों का समुच्चय | मृत शरीर से बाहर निकलने वाला अविनाशी 'डाटा बैंक'। |
| मित्रमहः | चेतना के अनुकूल प्राकृतिक रक्षक बल | संस्कारों को बिखरने से बचाने वाली अंतरिक्षीय संरक्षण प्रणाली। |
| यासि दूत्यम् | संक्रमण काल का गमन और संदेश-वाहन | मृत्यु और पुनर्जन्म के बीच सूचनाओं का बिना क्षरण के स्थानांतरण। |
| सिन्धोरिव | अंतरिक्ष का अगाध तरंग महासागर | भौतिक अंतरिक्ष (Cosmic Space) में तरंग रूप (Wave Form) में तैरना। |
३. सिन्धोरिव प्रस्वनितास ऊर्मयो: अंतरिक्ष में तरंग रूप और समाधान की व्याकुलता
आकाश या अंतरिक्ष कोई शून्य वैक्यूम नहीं है, वह तरंगों का महासागर है। ऋषि उपमा देते हैं—"सिन्धोरिव", जैसे महासागर में उत्ताल तरंगें उठती हैं, वैसे ही वह जीवात्मा अपने आनुवंशिकी गुणधर्मों के साथ भौतिक अंतरिक्ष में एक अदृश्य तरंग (Frequency Wave) की भाँति तैरती रहती है। जैसे आकाश में बिना दिखाई दिए रेडियो या ध्वनि तरंगें विद्यमान रहती हैं, यह ठीक वैसा ही यथार्थ है।
इस अवस्था में वह चेतना शांत नहीं बैठती, वह "प्रस्वनितास" है। वह अपने पिछले जीवन की अधूरी समस्याओं, कामनाओं और कर्मों के समाधान के लिए, नए शरीर की खोज में पूरे अंतरिक्षीय वितान में स्पंदित और व्याकुल रहती है।
मन्त्र का गुप्त आनुवंशिक सूत्र कहता है—'तास'। जब अंतरिक्ष में मँडराते हुए मेघ (बादल) इस पृथ्वी पर बरसते हैं, तो वह अंतरिक्षीय चेतना जल की उन बूंदों के साथ, 'ऊर्मयो' (रश्मि या सूक्ष्म प्रकाश तरंग) की भाँति इस पृथ्वी के धरातल पर अवतरित हो जाती है। पानी की हर बूंद प्रकृति का वह सॉफ्टवेयर है जो अंतरिक्ष से चेतना को नीचे लाता है।
४. अग्नेर्भ्राजन्ते अर्चयः: वनस्पतियों से वीर्य और गर्भ की प्रार्थना
धरती पर आने के बाद यह चेतना सीधे किसी गर्भ में नहीं कूदती। यह प्रकृति की सुव्यवस्थित भोजन श्रृंखला (Food Chain) के माध्यम से आगे बढ़ती है:
वर्षा के जल के माध्यम से वह सूक्ष्म जीव पृथ्वी की मिट्टी से उगने वाली वनस्पतियों और अन्नों के भीतर प्रवेश कर जाता है। जब इन वनस्पतियों को स्त्री और पुरुष आहार के रूप में ग्रहण करते हैं, तो पेट की जैविक भट्टी (Metabolic Fire) में पककर वह अन्न क्रमिक रूप से रूपांतरित होता है:
अन्न रस → खून → मांस → मेद → मज्जा → हड्डी → और अंततः वीर्य (शुक्राणु और अण्डाणु)।
जब यही शुक्राणु और अण्डाणु माता के गर्भ में संयुक्त होते हैं, तब वह जीव पुनः एक स्थूल पिंड का रूप धारण करने लगता है। वहाँ पहुँचकर वह जीव "भ्राजन्ते अर्चयः" की स्थिति में आता है। वह उस माता के उदर में स्थित 'मल-मूत्र के भंडार' (अंधकारमयी कारागार) से त्रस्त होकर, उस परमपिता परमात्मा की 'अर्चयः' (अर्चना और स्तुति) करने लगता है कि—"हे प्रभु! मुझे इस बंधन से मुक्त करो, मुझे बाहर निकालो ताकि मैं इस नए शरीर के माध्यम से सत्य के पथ पर आगे बढ़ सकूं!"
महा-निष्कर्ष: प्रत्यक्षदर्शनं किम् प्रमाणम्
महर्षि प्रस्कण्व का यह १२वां मन्त्र चिल्ला-चिल्ला कर गवाही दे रहा है कि जीवन कभी मरता नहीं। अंतरिक्ष से वर्षा की बूंदों में आना, अन्न से वीर्य बनना और गर्भ में पुनः आकार लेना—यह चक्र आज, अभी, इसी वर्तमान क्षण में हमारे सामने साक्षात घटित हो रहा है। इसके लिए किसी अन्य गवाही की आवश्यकता नहीं है।
"काण्व ऋषि की उस त्रिकालदर्शी ऋत-दृष्टि को और इस अनंत, सांस लेती जीवंत प्रकृति को हमारा कोटि-कोटि साष्टांग दंडवत नमन!"


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