महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत 148वें अध्याय के श्लोकों का क्रमबद्ध (सीरियल नंबर से) श्लोक, हिंदी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:
श्लोक 1, 2 और 3
श्लोक:
वैशंपायन उवाच। पाण्डवान्धार्तराष्ट्रांश्च कृतास्त्रान्प्रसमीक्ष्य सः। गुर्वर्थं दक्षिणां काले प्राप्तेऽमन्यत वै गुरुः।। (1-148-1) अस्त्रशिक्षामनुज्ञातान्रङ्गद्वारमुपागतान्। भारद्वाजस्ततस्तांस्तु सर्वानेवाभ्यभाषत।। (1-148-2) इच्छामि दत्तां सहितां मह्यं परमदक्षिणाम्। एवमुक्तास्ततः सर्वे शिष्या द्रोणमथाब्रुवन्। भगवन्किं प्रयच्छाम आज्ञापयतु नो गुरुः।। (1-148-3)
- हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—जब आचार्य द्रोण ने पांडवों और कौरवों को सभी अस्त्र-शस्त्रों में निपुण (कृतास्त्र) देख लिया, तब उचित समय आने पर उन्होंने गुरुदक्षिणा देने का विचार किया। (1-148-1) अस्त्र-शिक्षा पूरी कर चुके और रंगभूमि में आने की अनुमति प्राप्त उन सभी शिष्यों से भारद्वाज (द्रोण) ने यह कहा— (1-148-2) "मैं यह चाहता हूँ कि तुम सब मिलकर मुझे एक परम गुरुदक्षिणा दो।" उनके ऐसा कहने पर सभी शिष्यों ने द्रोण से कहा—"भगवन! हम आपको क्या दें? हमारे गुरु जो आज्ञा दें, वही हम प्रदान करेंगे।" (1-148-3)
- व्याख्या: अस्त्र-विद्या समाप्त होने के बाद आचार्य द्रोण अपने शिष्यों से गुरुदक्षिणा माँगने का मन बनाते हैं और सभी शिष्यों से अपनी इच्छा व्यक्त करते हैं, जिस पर सभी शिष्य सहर्ष आज्ञा माँगते हैं।
श्लोक 4, 5 और 6
श्लोक:
ततः शिष्यान्समाहूय आचार्योऽर्थमचोदयत्। द्रोणः सर्वानशेषेण दक्षिणार्थं महीपते।। (1-148-4) पञ्चालराजं द्रुपदं गृहित्वा रणमूर्धनि। पर्यानयत भद्रं वः सा स्यात्परमदक्षिणा।। (1-148-5) तथेत्युक्त्वा तु ते सर्वे रथैस्तूर्णं प्रहारिणः। आचार्यधनदानार्थं द्रोणेन सहिता ययुः।। (1-148-6)
- हिंदी अनुवाद: हे महीपते (जनमेजय)! तब आचार्य द्रोण ने सभी शिष्यों को बुलाकर गुरुदक्षिणा के रूप में यह बात कही— (1-148-4) "युद्ध के मैदान में पाँचालराज द्रुपद को बंदी बनाकर मेरे पास ले आओ—तुम्हारा कल्याण हो! यही मेरे लिए परम गुरुदक्षिणा होगी।" (1-148-5) "बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा" कहकर प्रहार करने में निपुण वे सभी वीर रथों पर सवार होकर आचार्य द्रोण को साथ लेकर चल पड़े। दुर्योधन आदि सभी ने आचार्य को धन (दक्षिणा) देने के लिए प्रस्थान किया। (1-148-6)
- व्याख्या: द्रोण अपने पुराने अपमान का बदला लेने के लिए शिष्यों से गुरुदक्षिणा के रूप में राजा द्रुपद को युद्ध में हराकर जीवित बंदी बनाकर लाने की माँग करते हैं। सभी शिष्य इसे स्वीकार कर आगे बढ़ते हैं।
श्लोक 7, 8, 9 और 10
श्लोक:
ततोऽभिजग्मुः पञ्चालान्निघ्नन्तस्ते नरर्षभाः। ममृदुस्तस्य नगरं द्रुपदस्य महौजसः।। (1-148-7) दुर्योधनश्च कर्णश्च युयुत्सुश्च महाबलः। दुःशासनो विकर्णश्च जलसन्धः सुलोचनः।। (1-148-8) एते चान्ये च बहवः कुमारा बहुविक्रमाः। अहं पूर्वमहं पूर्वमित्येवं क्षत्रियर्षभाः।। (1-148-9) ततो वरराथारूढाः कुमाराः सादिभिः सह। प्रविश्य नगरं नगरं राजमार्गमुपाययुः।। (1-148-10)
- हिंदी अनुवाद: वे नरश्रेष्ठ वीर शत्रुओं का संहार करते हुए पाँचाल देश की ओर बढ़े और महातेजस्वी द्रुपद के नगर को रौंद डाला। (1-148-7) दुर्योधन, कर्ण, महाबलवान युयुत्सु, दुःशासन, विकर्ण, जलसंध और सुलोचन— (1-148-8) तथा अन्य बहुत से पराक्रमी कुमार "पहले मैं जाऊँगा, पहले मैं जाऊँगा" इस प्रकार होड़ लगाते हुए क्षत्रियश्रेष्ठ आगे बढ़े। (1-148-9) उत्तम रथों पर सवार होकर तथा घुड़सवारों के साथ वे सभी कुमार नगर में प्रवेश कर सीधे राजमार्ग पर आ पहुँचे। (1-148-10)
- व्याख्या: कौरव और पांडव राजकुमार पूरी सैन्य शक्ति के साथ पाँचाल देश की राजधानी काम्पिल्य नगर पर आक्रमण कर देते हैं और पहले आक्रमण करने की होड़ में राजमार्ग पर पहुँच जाते हैं।
श्लोक 11, 12, 13, 14, 15 और 16
श्लोक:
तस्मिन्काले तु पाञ्चालः श्रुत्वा दृष्ट्वा महद्बलम्। भ्रातृभिः सहितो राजंस्त्वरया निर्ययौ गृहात्।। (1-148-11) ततस्तु कृतसन्नाहा यज्ञसेनसहोदराः। शरवर्षाणि मुञ्चन्तः प्रणेदुः सर्व एव ते।। (1-148-12) ततो रथेन शुभ्रेण समासाद्य तु कौरवान्। यज्ञसेनः शरान्घोरान्ववर्ष युधि दुर्जयः।। (1-148-13) पूर्वमेव तु संमन्त्र्य पार्थो द्रोणमथाऽब्रвит्। दर्पोद्रेकात्कुमाराणामाचार्यं द्विजसत्तमम्।। (1-148-14) एषां पराक्रमस्यान्ते वयं कुर्याम साहसम्। एतैरशक्यः पाञ्चालो ग्रहीतुं रणमूर्धनि।। (1-148-15) एवमुक्त्वा तु कौन्तेयो भ्रातृभिः सहितोऽनघः। अर्धक्रोशे तु नगरादतिष्ठद्बहिरेव सः।। (1-148-16)
- हिंदी अनुवाद: हे राजन्! उसी समय अपनी भारी सेना को देखकर और सुनकर पाँचालराज द्रुपद अपने भाइयों के साथ तुरंत अपने महल से बाहर निकल आए। (1-148-11) युद्ध के लिए पूरी तरह सजे हुए यज्ञसेन (द्रुपद) के भाई बाणों की वर्षा करते हुए गर्जना करने लगे। (1-148-12) युद्ध में दुर्जय राजा यज्ञसेन (द्रुपद) एक सुंदर श्वेत रथ पर सवार होकर कौरवों के सामने आए और उन्होंने भयंकर बाणों की वर्षा शुरू कर दी। (1-148-13) उधर पहले ही आपस में विचार करके अर्जुन ने द्विजों में श्रेष्ठ आचार्य द्रोण से कहा था—कुमारों के इस अहंकार और गर्व के प्रदर्शन के बाद ही हम अपना पराक्रम दिखाएँगे, क्योंकि अकेले इन कुमारों से रणभूमि में पाँचालराज को पकड़ा जाना असंभव है। (1-148-14, 15) ऐसा कहकर निष्पाप कुंतीपुत्र अर्जुन अपने भाइयों के साथ नगर से आधे कोस की दूरी पर बाहर ही रुक गए। (1-148-16)
- व्याख्या: द्रुपद अपनी सेना के साथ युद्ध के लिए डट जाते हैं। अर्जुन दूरदर्शिता दिखाते हुए पहले कौरव कुमारों को उनका अभिमान मिटाने का अवसर देते हैं और खुद अपने भाइयों सहित थोड़ी दूरी पर स्थिति का जायजा लेते हुए खड़े रहते हैं।
श्लोक 17, 18, 19, 20, 21 और 22
श्लोक:
द्रुपदः कौरवान्दृष्ट्वा प्राधावत समन्ततः। शरजालेन महता मोहयन्कौरवीं चमूम्।। (1-148-17) तमुद्यतं रथेनैकमाशुकारिणमाहवे। अनेकमिव सन्त्रासान्मेनिरे तत्र कौरवाः।। (1-148-18) द्रुपदस्य शरा घोरा विचेरुः सर्वतोदिशम्। ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च मृदङ्गाश्च सहस्रशः।। (1-148-19) प्रावाद्यन्त महाराज पञ्चालानां निवेशने। सिंहनादश्च संजज्ञे पञ्चालानां महात्मनाम्।। (1-148-20) धनुर्ज्यातलशब्दश्च संस्पृश्य गगनं महान्। दुर्योधनो विकर्णश्च सुबाहुर्दीर्घलोचनः।। (1-148-21) दुःशाशनश्च संक्रुद्धः शरवर्षैरवाकिरन्। सोऽतिविद्धो महेष्वासः पार्षतो युधि दुर्जयः।। (1-148-22)
- हिंदी अनुवाद: द्रुपद ने कौरवों को देखकर अपने भारी बाणों के जाल से कौरव सेना को चारों ओर से भ्रमित करते हुए उन पर धावा बोल दिया। (1-148-17) युद्ध में अकेले ही तेजी से आगे बढ़ते हुए उन उद्यत द्रुपद को देखकर कौरव सेना भयभीत हो उठी और उन्हें ऐसा लगा मानो वे अकेले न होकर अनेक योद्धा हों। (1-148-18) द्रुपद के भयंकर बाण सब दिशाओं में घूमने लगे। हे महाराज! उस समय पाँचालों की छावनी में हजारों शंख, भेरियाँ और मृदंग बजने लगे। (1-148-19, 20) महात्मा पाँचालों का सिंहनाद गूँज उठा। उनकी धनुष की टँकार का महान शब्द आकाश को स्पर्श करने लगा। इसके बाद दुर्योधन, विकर्ण, सुबाहु, दीर्घलोचन और अत्यंत क्रोधित दुःशासन—इन सभी ने मिलकर द्रुपद पर बाणों की वर्षा कर दी। उधर युद्ध में अजेय, महान धनुर्धर पृषतपुत्र द्रुपद उन सबके बाणों से विद्ध होने पर भी ज़रा नहीं डिगे। (1-148-21, 22)
- व्याख्या: राजा द्रुपद अकेले ही कौरव सेना पर भारी पड़ते हैं। वे fierce attack करते हैं, जिसके जवाब में कौरव राजकुमार मिलकर उन पर बाण बरसाते हैं, लेकिन द्रुपद डटकर मुकाबला करते हैं।
श्लोक 23, 24, 25, 26 और 27
श्लोक:
व्यधमत्तान्यनीकानि तत्क्षणादेव भारत। दुर्योधनं विकर्णं च कर्णं चापि महाबलम्।। (1-148-23) नानानृपसुतान्वीरान्सैन्यानि विविधानि च। अलातचक्रवत्सर्वं चरन्बाणैरतर्पयत्।। (1-148-24) ततस्तु नागराः सर्वे मुसलैर्यष्टिभिस्तदा। अभ्यवर्षन्त कौरव्यान्वर्षमाणा घा इव।। (1-148-25) सबालवृद्धाः काम्पिल्याः कौरवानभ्ययुस्तदा। श्रुत्वा सुतुमुलं युद्धं कौरवानेव भारत।। (1-148-26) द्रवन्तिस्म नदन्तिस्म क्रोशन्तः पाण्डवान्प्रति। पाडवास्तु स्वनं श्रुत्वा आर्तानां रोमहर्षणम्।। (1-148-27)
- हिंदी अनुवाद: हे भारत! द्रुपद ने तत्क्षण ही दुर्योधन, विकर्ण, महाबली कर्ण तथा अन्य विभिन्न राजाओं के पुत्रों और उनकी सेनाओं को तितर-बितर कर दिया। वे जलती हुई लकड़ी के चक्र (अलातचक्र) की तरह चारों ओर घूमते हुए अपने बाणों से सबको तृप्त (परास्त) करने लगे। (1-148-23, 24) तब काम्पिल्य नगर के सभी नागरिक, बूढ़े और बच्चे भी—युद्ध का तुमुल कोलाहल सुनकर—मूसलों और लाठियों को लेकर कौरवों पर ऐसे टूट पड़े जैसे आकाश से वर्षा हो रही हो। (1-148-25, 26) वे शोर मचाते हुए कौरवों की ओर दौड़े। उधर पाण्डवों ने जब उस भयानक और रोंगटे खड़े कर देने वाले कोलाहल को सुना, तो उन्होंने आगे बढ़ने का निर्णय किया। (1-148-27)
- व्याख्या: द्रुपद के पराक्रम के आगे कौरव सेना और नायक पीछे हटने लगते हैं। काम्पिल्य नगर के आम नागरिक भी युद्ध में कूद पड़ते हैं। यह स्थिति देखकर पांडव अब युद्ध में प्रवेश करने का निश्चय करते हैं।
श्लोक 28, 29, 30, 31, 32 और 33
श्लोक:
अभिवाद्य ततो द्रोणं रथानारुरुहुस्तदा। युधिष्ठिरं निवार्याशु मा युध्यस्वेति पाण्डवम्।। (1-148-28) माद्रेयौ चक्ररक्षौ तु फाल्गुनश्च तदाऽकरोत्। सेनाग्रगो भीमसेनस्तदाभूद्गदया सह।। (1-148-29) तदा शत्रुस्वनं श्रुत्वा भ्रातृभिः सहितोऽनघः। आयाज्जवेन कौन्तेयो रथेनानादयन्दिशः।। (1-148-30) पञ्चालानां ततः सेनामुद्धूतार्णवनिःस्वनाम्। भीमसेनो महाबाहुर्दण्डपाणिरिवान्तकः।। (1-148-31) प्रविवेश महासेनां मकरः सागरं यथा। चतुरङ्गबलाकीर्णे ततस्तस्मिन्रणोत्सवे।। (1-148-32) स्वयंभ्यद्रवद्भीमो नागानीकं गदाधरः।। (1-148-33)
- हिंदी अनुवाद: तब पाण्डवों ने आचार्य द्रोण को प्रणाम करके अपने रथों पर आरोहण किया। उन्होंने युधिष्ठिर को युद्ध से रोक दिया और कहा—"आप युद्ध न करें।" (1-148-28) अर्जुन ने माद्री के दोनों पुत्रों (नकुल-सहदेव) को रथ के पहियों की रक्षा करने वाला (चक्ररक्षक) बनाया और भीमसेन गदा लेकर सेना के सबसे आगे चल पड़े। (1-148-29) शत्रुओं का वह कोलाहल सुनकर निष्पाप कौन्तेय अर्जुन अपनी दिशाओं को गुँजाते हुए वेगपूर्वक रथ से आगे बढ़े। (1-148-30) समुद्र के समान गर्जना करती हुई पाँचालों की उस विशाल सेना में महाबाहु भीमसेन हाथ में दण्ड लिए यमराज की तरह घुस गए। (1-148-31) जिस प्रकार मगरमच्छ समुद्र में प्रवेश करता है, उसी प्रकार भीमसेन उस महासेना में जा घुसे। चतुरङ्ग सेना से भरे हुए उस रणोत्सव में गदा धारण करने वाले भीम ने स्वयं हाथियों की सेना पर धावा बोल दिया। (1-148-32, 33)
- व्याख्या: पांडव युद्ध में उतरते हैं। युधिष्ठिर को सुरक्षित रखकर भीमसेन सबसे आगे गदा लेकर हाथियों की सेना पर टूट पड़ते हैं, और अर्जुन भी अपनी रणनीति के साथ आगे बढ़ते हैं।
श्लोक 34, 35, 36, 37 और 38
श्लोक:
स युद्धकुशलः पार्थो बाहुवीर्येण चातुलः। अहनत्कुञ्जरानीकं गदया कालरूपधृक।। (1-148-34) ते गजा गिरिसङ्काशाः क्षरन्तो रुधिरं बहु। भीमसेनस्य गदया भिन्नमस्तकपिण्डकाः।। (1-148-35) पतन्ति द्विरदा भूमौ वज्रघातादिवाचलाः। गजानश्वान्रथांश्चैव पातयामास पाण्डवः।। (1-148-36) पदातींश्च रथांश्चैव न्यवधीदर्जुनाग्रजः। गोपाल इव दण्डेन यथा पशुगणान्वने।। (1-148-37) चालयन्रथनागांश्च संचचाल वृकोदरः। भारद्वाजप्रियं कर्तुमुद्यतः फाल्गुनस्तदा।। (1-148-38)
- हिंदी अनुवाद: युद्ध में कुशल और अतुलनीय बाहुबल वाले वे पाण्डव (भीम) काल का रूप धारण करके गदा से हाथियों की सेना का संहार करने लगे। (1-148-34) पर्वत के समान ऊँचे वे हाथी भीमसेन की गदा से मस्तक फूट जाने के कारण बहुत सा खून बहाते हुए—वज्र की चोट से गिरे हुए पर्वतों की तरह—भूमि पर धड़ाम से गिरने लगे। (1-148-35, 36) अर्जुन के बड़े भाई (भीमसेन) ने हाथियों, घोड़ों, रथों और पैदल सैनिकों को ऐसे गिराया और नष्ट किया, जैसे कोई गड़ेरिया जंगल में डंडे से पशुओं के झुंड को हाँकता है। (1-148-36, 37) रथों और हाथियों को कँपाते हुए वृकोदर भीमसेन ने तहलका मचा दिया, जबकि उधर अर्जुन आचार्य द्रोण का प्रिय करने के लिए तत्पर होकर आगे बढ़ रहे थे। (1-148-38)
- व्याख्या: भीमसेन गदा के प्रहार से पाँचालों की गजसेना और पैदल सैनिकों का भीषण संहार करते हैं, जिससे शत्रु सेना में भगदड़ मच जाती है।
श्लोक 39, 40, 41 और 42
श्लोक:
पार्षतं शरजालेन क्षिपन्नागात्स पाण्डवः। हयौघांश्च रथौघांश्च गजौघांश्च समन्ततः।। (1-148-39) पातयन्समरे राजन्युगान्ताग्रिरिव ज्वलन्। ततस्ते हन्यमाना वै पञ्चालाः सृञ्जयास्तथा।। (1-148-40) शरैर्नानाविधैस्तूर्णं पार्थं संछाद्य सर्वशः। सिंहनादं मुखैः कृत्वा समयुध्वन्त पाण्डवम्।। (1-148-41) तद्युद्धमभवद्धोरं समुहाद्भुतदर्शनम्। सिंहनादस्वनं श्रुत्वा नामृष्यत्पाकशासनिः।। (1-148-42)
- हिंदी अनुवाद: हे राजन्! वे पाण्डव (अर्जुन) प्रलयकाल की अग्नि के समान प्रज्वलित होकर युद्धभूमि में घोड़ों, रथों और हाथियों के समूहों को तथा पृषतपुत्र (द्रुपद) को अपने बाणों के जाल से खदेड़ते हुए गिरा रहे थे। (1-148-39, 40) तब मारे जा रहे वे पाँचाल और सृंजय वीर विभिन्न प्रकार के बाणों से अर्जुन को चारों ओर से ढँककर, मुँह से सिंहनाद करते हुए पांडव के साथ युद्ध करने लगे। (1-148-41) वह युद्ध अत्यंत भयंकर और अद्भुत दिखाई देने लगा। शत्रुओं का वह सिंहनाद सुनकर इंद्रपुत्र अर्जुन को सहन नहीं हुआ। (1-148-42)
- व्याख्या: अर्जुन युद्धभूमि में प्रचंड वेग से प्रवेश करते हैं और पाँचाल सेना पर बाणों की वर्षा करते हैं। जब पाँचाल वीर सिंहनाद करते हुए अर्जुन का सामना करते हैं, तो अर्जुन और अधिक आक्रामक हो जाते हैं।
श्लोक 43, 44, 45, 46 और 47
श्लोक:
ततः किरीटी सहसा पञ्चालान्समरेऽद्रवत्। छादयन्निषुजालेन महता मोहयन्निव।। (1-148-43) सीघ्रमभ्यस्यतो बाणान्संदधानस्य चानिशम्। नान्तरं ददृशे किंचित्कौन्तेयस्य यशस्विनः।। (1-148-44) न दिशो नान्तरिक्षं च तदा नैव च मेदिनी। अदृश्यत महाराज तत्र किंचिन्न सङ्गरे।। (1-148-45) पाञ्चालानां कुरूणां च साधुसाध्विति निस्वनः। तत्र तूर्यनिनादश्च शङ्खानां च महास्वनः।। (1-148-46) सिंहनादश्च संजज्ञे साधुशब्देन मिश्रितः। ततः पञ्चालराजस्तु तथा सत्यजिता सह।। (1-148-47)
- हिंदी अनुवाद: तब किरीटी (अर्जुन) ने सहसा युद्ध में पाँचालों पर धावा बोल दिया और अपने विशाल बाणों के जाल से उन्हें इस प्रकार ढँक लिया मानो उन्हें भ्रमित ही कर रहे हों। (1-148-43) निरंतर बाणों को खींचने और छोड़ने वाले उन यशस्वी कौन्तेय (अर्जुन) के प्रहार में ज़रा भी अंतराल (फर्क) दिखाई नहीं दे रहा था। (1-148-44) हे महाराज! उस समय उस संग्राम में न दिशाएँ दिखाई दे रही थीं, न आकाश और न ही पृथ्वी ही कुछ नजर आ रही थी (सब तरफ बाण ही बाण छा गए थे)। (1-148-45) वहाँ पाँचालों और कौरवों की ओर से "शाबाश! शाबाश!" की आवाजें, बाजों की गूँज, शंखों का महान नाद तथा सिंहनाद आपस में मिल गए थे। (1-148-46, 47क) इसके बाद पाँचालराज द्रुपद अपने वीर सेनापति सत्यजित के साथ आगे बढ़े। (1-148-47ख)
- व्याख्या: अर्जुन अपनी अद्भुत तीरंदाजी का प्रदर्शन करते हैं, जिससे आसमान और दिशाएँ बाणों से ढक जाती हैं। इस भीषण युद्ध के माहौल में पाँचालराज द्रुपद और उनके वीर सेनापति सत्यजित अर्जुन का मुकाबला करने के लिए आगे आते हैं।
श्लोक 48, 49, 50, 51 और 52
श्लोक:
त्वरमाणोऽभिदुद्राव महेन्द्रं शम्बरो यथा। महता शरवर्षेण पार्थः पाञ्चालमावृणोत्।। (1-148-48) ततो हलहलाशब्द आसीत्पाञ्चालके बले। जिवृक्षति महासिंहे गजानामिव यूथपम्।। (1-148-49) दृष्ट्वा पार्थं तदायान्तं सत्यजित्सत्यविक्रमः। पाञ्चालं वै परिप्रेप्सुर्धनञ्जयमदुद्रुवत्।। (1-148-50) ततस्त्वर्जुनपाञ्चालौ युद्धाय समुपागतौ। व्यक्षोभयेतां तौ सैन्यमिन्द्रवैरोचनाविव।। (1-148-51) ततः सत्यजितं पार्थो दशभिर्मर्मभेदिभिः। विव्याध बवलद्गाढं तदद्भुतमिवाभवत्।। (1-148-52)
- हिंदी अनुवाद: जिस प्रकार शम्बरासुर ने देवराज इंद्र पर धावा बोला था, उसी प्रकार वेग से आगे बढ़कर पाँचालराज ने आक्रमण किया। उधर पार्थ (अर्जुन) ने भी बाणों की भारी वर्षा से पाँचालराज को ढँक लिया। (1-148-48) जैसे महासिंह हाथियों के यूथप (सरदार) को पकड़ना चाहता है, वैसे ही अर्जुन को आगे बढ़ते देख पाँचाल सेना में हाहाकार (हलहला शब्द) मच गया। (1-148-49) पाँचालराज की रक्षा करने की इच्छा रखने वाले सत्यविक्रम सत्यजित ने जब अर्जुन को आते देखा, तो वे धनंजय (अर्जुन) की ओर दौड़े। (1-148-50) तब अर्जुन और सत्यजित युद्ध के लिए आमने-सामने आ गए और दोनों ने अपनी सेनाओं को इस प्रकार क्षुब्ध कर दिया जैसे इंद्र और विरोचन के पुत्र (बलि) आपस में लड़े हों। (1-148-51) तब पार्थ ने सत्यजित को मर्मस्थलों को भेदने वाले दस तीखे बाणों से बहुत जोर से विद्ध कर दिया, जो कि अत्यंत अद्भुत था। (1-148-52)
- व्याख्या: अर्जुन और पाँचाल सेनापति सत्यजित के बीच घमासान युद्ध छिड़ जाता है। सत्यजित द्रुपद की रक्षा के लिए आगे आते हैं, और अर्जुन उन्हें अपने बाणों से घायल कर देते हैं।
श्लोक 53, 54, 55, 56, 57 और 58
श्लोक:
ततः शरशतैः पार्थं पाञ्चालः शीघ्रमार्दयत्। पार्थस्तु शरवर्षेण च्छाद्यमानो महारथः।। (1-148-53) वेगं चक्रे महावेगो धनुर्ज्यामवमृज्य च। ततः सत्यजिताश्चापं छित्वा राजानमभ्ययात्।। (1-148-54) अथान्यद्धनुरादाय सत्यजिद्वेगवत्तरम्। साश्वं ससूतं सरथं पार्थं विव्याध सत्वरः।। (1-148-55) स तं न ममृषे पार्थः पाञ्चालेनार्दितो युधि। ततस्तस्य विनाशार्थं सत्वरं व्यसृजच्छरान्।। (1-148-56) हयान्ध्वजं धनुर्मुष्टिमुभौ तौ पार्ष्णिसारथी। स तथा भिद्यमानेषु कार्मुकेषु पुनः पुनः।। (1-148-57) हयेषु विनिकृत्तेषु विमुखोऽभवदाहवे। स सत्यजितमालेक्य तथा विमुखमाहवे।। (1-148-58)
- हिंदी अनुवाद: इसके बाद पाँचाल (सत्यजित) ने सैकड़ों बाणों से शीघ्र ही अर्जुन को पीड़ित कर दिया। उधर बाणों की वर्षा से ढँके जा रहे महारथी महावेगी अर्जुन ने अपनी धनुष की डोरी को सँभालकर तीव्र गति दिखाई। उन्होंने सत्यजित का धनुष काटकर राजा (द्रुपद) की ओर रुख किया। (1-148-53, 54) तब सत्यजित ने दूसरा उससे भी अधिक वेगवान धनुष लेकर घोड़े, सारथी और रथ सहित अर्जुन को तुरंत ही बाणों से बींध डाला। (1-148-55) युद्ध में पाँचाल वीर द्वारा इस प्रकार पीड़ित किए जाने पर अर्जुन उसे सहन नहीं कर सके और उसके विनाश के लिए उन्होंने तुरंत तीव्र बाण छोड़े। (1-148-56) अर्जुन ने सत्यजित के घोड़े, ध्वज, धनुष की मुट्ठी और दोनों पार्श्व-सारथियों को काट डाला। इस प्रकार बार-बार धनुष टूटने और घोड़ों के मारे जाने पर सत्यजित युद्ध से विमुख हो गए। (1-148-57, 58)
- व्याख्या: सत्यजित और अर्जुन के बीच जबरदस्त तीर-युद्ध होता है। अंततः अर्जुन सत्यजित का रथ, धनुष और घोड़े नष्ट कर देते हैं, जिससे सत्यजित युद्ध से पीछे हटने को मजबूर हो जाते हैं।
श्लोक 59, 60, 61, 62, 63 और 64
श्लोक:
वेगेन महता राजन्नभ्यधावत पार्षतम्। तदा चक्रे महद्युद्धमर्जुनो जयतां वरः।। (1-148-59) तस्य पार्थो धनुश्छित्त्वा ध्वजं चोर्व्यामपातयत्। पञ्चभिस्तस्य विव्याध हयान्सूतं च सायकैः।। (1-148-60) तत उत्सृज्य तच्चापमाददानः शरावरम्। खड्गमुद्धृत्य कौन्तेयः सिंहनादमथाकरोत्।। (1-148-61) पाञ्चालस्य रथस्येषामाप्लुत्य सहसाऽपतत्। पाञ्चालरथमास्थाय अवित्रस्तो धनंजयः।। (1-148-62) विक्षोभ्याम्भोनिधिंतार्क्ष्यस्तंनागमिव सोऽग्रहीत्। ततस्तु सर्वपाञ्चाला विद्रवन्ति दिशो दश।। (1-148-63) दर्शयन्सर्वसैन्यानां स बाह्वोर्बलमात्मनः। सिंहनादस्वनं कृत्वा निर्जगाम धनञ्जयः।। (1-148-64)
- हिंदी अनुवाद: हे राजन्! इसके बाद जय पाने वालों में श्रेष्ठ अर्जुन ने वेगपूर्वक पार्षत (द्रुपद) की ओर धावा बोल दिया और उनके साथ एक महान युद्ध किया। (1-148-59) अर्जुन ने द्रुपद का धनुष काटकर उनके ध्वज को जमीन पर गिरा दिया और पाँच बाणों से उनके घोड़ों तथा सारथी को घायल कर दिया। (1-148-60) तब कौन्तेय अर्जुन ने अपना धनुष और बाणों का तरकस एक ओर रख दिया, हाथ में तलवार उठाई और एक भयंकर सिंहनाद किया। (1-148-61) वे उछलकर अचानक पाँचालराज (द्रुपद) के रथ की ईषा (जूए) पर जा गिरे। निडर धनंजय ने पाँचाल के उस रथ पर खड़े होकर—जैसे गरुड़ जी समुद्र को मथकर नाग को पकड़ लेते हैं—वैसे ही द्रुपद को पकड़ लिया। (1-148-62, 63) अपनी भुजाओं का बल सभी सैनिकों को दिखाते हुए, सिंहनाद करके धनंजय उस रथ से बाहर निकल आए और सब पाँचाल चारों दिशाओं में भाग खड़े हुए। (1-148-64)
- व्याख्या: अर्जुन राजा द्रुपद के रथ पर छलांग लगाकर बिना डरे उन्हें जीवित ही पकड़ लेते हैं और अपनी अद्वितीय वीरता का परिचय देते हैं, जिससे पाँचाल सेना में भगदड़ मच जाती है।
श्लोक 65, 66 और 67
श्लोक:
आयान्तमर्जुनं दृष्ट्वा कुमाराः सहितास्तदा। ममृदुस्तस्य नगरं द्रुपदस्य महात्मनः।। (1-148-65) अर्जुन उवाच। संबन्धी कुरुवीराणां द्रुपदो राजसत्तमः। मा वधीस्तद्बलं भीम गुरुदानं प्रदीयताम्।। (1-148-66) वैशंपायन उवाच। भीमसेनस्तदा राजन्नर्जुनेन निवारितः। अतृप्तो युद्धधर्मेषु न्यवर्तत महाबलः।। (1-148-67)
- हिंदी अनुवाद: आते हुए अर्जुन को देखकर सभी राजकुमार एकजुट हो गए और उन्होंने महात्मा द्रुपद के उस नगर को पूरी तरह रौंद डाला। (1-148-65) अर्जुन ने कहा—"हे भीम! कुरुवंशियों के संबंधी और श्रेष्ठ राजा द्रुपद की सेना का वध मत करो। अब गुरुदक्षिणा देने का समय आ गया है (अतः युद्ध बंद करो)।" (1-148-66) वैशंपायन जी कहते हैं—हे राजन्! अर्जुन द्वारा रोके जाने पर युद्ध की तृप्ति न होने पर भी महाबलवान भीमसेन युद्ध से पीछे हट गए। (1-148-67)
- व्याख्या: अर्जुन भीम को समझाते हैं कि द्रुपद कौरवों के संबंधी हैं और अब उद्देश्य (बंदी बनाना) पूरा हो चुका है, इसलिए सेना का और संहार न किया जाए। अर्जुन की बात मानकर भीम युद्ध रोक देते हैं।
श्लोक 68, 69, 70 और 71
श्लोक:
ते यज्ञसेनं द्रुपदं गृहीत्वा रणमूर्धनि। उपाजग्मुः सहामात्यं द्रोणाय भरतर्षभ।। (1-148-68) भग्नदर्पं हृतधनं तं तथा वशमागतम्। स वैरं मनसा ध्यात्वा द्रोणो द्रुपदमब्रवीत्।। (1-148-69) विमृज्य तरसा राष्ट्रं पुरं ते मृदितं मया। प्राप्य जीवन्रिपुवशं सखिपूर्वं किमिष्यते।। (1-148-70) एवमुक्त्वा प्रहस्यैनं किंचित्स पुनरब्रवीत्। मा भैः प्राणभयाद्वीर क्षमिणो ब्राह्मणा वयम्।। (1-148-71)
- हिंदी अनुवाद: हे भरतर्षभ! वे सब राजकुमार युद्ध के मैदान में यज्ञसेन द्रुपद को उनके मंत्रियों सहित बंदी बनाकर आचार्य द्रोण के पास ले आए। (1-148-68) जिनका अहंकार टूट चुका था, जिनका धन छिन चुका था और जो पूरी तरह वश में आ चुके थे, ऐसे द्रुपद को देखकर द्रोण ने अपने मन के पुराने बैर का स्मरण करते हुए उनसे कहा— (1-148-69) "मैंने अपने बाहुबल से तुम्हारे राज्य को रौंद दिया है और तुम्हारे नगर को नष्ट कर दिया है। अब जीवित अवस्था में शत्रु के वश में पड़े हुए तुम्हारे उस पुराने मित्रता के दावे का अब क्या उपयोग है?" (1-148-70) ऐसा कहकर और थोड़ा हँसकर द्रोण ने फिर कहा—"हे वीर! प्राणों का भय मत करो, हम ब्राह्मण लोग क्षमाशील होते हैं।" (1-148-71)
- व्याख्या: द्रुपद को पराजित और बंदी अवस्था में अपने सामने पाकर द्रोण अपने बाचपन के टूटे हुए मित्र-संबंध और अपमान की याद दिलाते हैं, किंतु साथ ही उन्हें अभयदान भी देते हैं।
श्लोक 72, 73, 74 और 75
श्लोक:
आश्रमे क्रीडितं यत्तु त्वया बाल्ये मया सह। तेन संवर्धितः स्नेहः प्रीतिश्च क्षत्रियर्षभ।। (1-148-72) प्रार्थयेयं त्वया सख्यं पुनरेव जनाधिप। वरं ददामि ते राजन्राज्यस्यार्धमवाप्नुहि।। (1-148-73) अराजा किल नो राज्ञः सखा भवितुमर्हति। अतः प्रयतितं राज्ये यज्ञसेन मया तव।। (1-148-74) राजासि दक्षिणे कूले भागीरथ्याहमुत्तरे। सखायं मां विजानीहि पाञ्चाल यदि मन्यसे।। (1-148-75)
- हिंदी अनुवाद: "हे क्षत्रियर्षभ! बाल्यकाल में आश्रम में जो तुमने मेरे साथ क्रीड़ा की थी, उसी से हमारा स्नेह और प्रेम बढ़ा था। (1-148-72) हे जनाधिप! मैं आज भी तुमसे वही पुरानी मित्रता की प्रार्थना करता हूँ। लो, मैं तुम्हें वरदान देता हूँ कि तुम अपने राज्य के आधे भाग को फिर से प्राप्त कर लो।" (1-148-73) "एक राजा ही किसी राजा का मित्र होने के योग्य होता है, न कि कोई अराजा (राज्यहीन व्यक्ति)। हे यज्ञसेन! इसीलिए मैंने तुम्हारे राज्य को प्राप्त करने का यह प्रयत्न किया था।" (1-148-74) "तुम भागीरथी (गंगा) नदी के दक्षिण तट के राजा हो और मैं उत्तर तट का राजा हूँ। हे पाँचाल! यदि तुम्हारी इच्छा हो, तो मुझे अपना मित्र समझो।" (1-148-75)
- व्याख्या: द्रोण अपनी महानता दिखाते हुए कहते हैं कि वे राजा से राजा की ही मित्रता चाहते थे, इसलिए उन्होंने राज्य छीना था। अब वे गंगा नदी के दक्षिण का आधा राज्य द्रुपद को वापस लौटा देते हैं और मित्रता का प्रस्ताव रखते हैं।
श्लोक 76, 77, 78, 79, 80, 81 और 82 (अध्याय का समापन)
श्लोक:
द्रुपद उवाच। अनाश्चर्यमिदं ब्रह्मन्विक्रान्तेषु महात्मसु। प्रीये त्वयाऽहं त्वत्तश्च प्रीतिमिच्छامی शाश्वतीम्।। (1-148-76) वैशंपायन उवाच। एवमुक्तः स द्रोणो मोक्षयामास भारत। सत्कृत्य चैनं प्रीतात्मा राज्यार्धं प्रत्यपादयत्।। (1-148-77) माकन्दीमथ गङ्गायास्तीरे जनपदायुताम्। सोऽध्यावसद्दीनमनाः काम्पिल्यं च पुरोत्तमम्।। (1-148-78) दक्षिणांश्चापि पञ्चालान्यावच्चर्मण्वती नदी। द्रोणेन चैवं द्रुपदः परिभूयाथ पालितः।। (1-148-79) क्षात्रेण च बलेनास्य नापश्यत्स पराजयम्। हीनं विदित्वा चात्मानं ब्राह्मेण स बलेनतु।। (1-148-80) पुत्रजन्म परीप्सन्वै पृथिवीमन्वसंचरत्। अहिच्छत्रं च विषयं द्रोणः समभिपद्यत।। (1-148-81) एवं राजन्नहिच्छत्रा पुरीजनपदायुता। युधि निर्जित्य पार्थेन द्रोणाय प्रतिपादिता।। (1-148-82)
- हिंदी अनुवाद: द्रुपद ने कहा—"हे ब्रह्मन्! आप जैसे महापुरुषों और पराक्रमी लोगों के लिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। मैं आपसे अत्यंत प्रसन्न हूँ और आपसे शाश्वत प्रेम (मित्रता) की इच्छा रखता हूँ।" (1-148-76) वैशंपायन जी कहते हैं—हे भारत! द्रुपद के ऐसा कहने पर प्रसन्नचित्त द्रोण ने उनका आदर-सत्कार करके उन्हें बंधन मुक्त कर दिया और उनका आधा राज्य उन्हें वापस लौटा दिया। (1-148-77) तदनंतर द्रुपद ने गंगा तट पर स्थित जनपदों से युक्त माकन्दी और उत्तम नगर काम्पिल्य को तथा चर्मण्वती नदी तक के दक्षिण पाँचाल देश को अपना निवास बनाया। द्रोण द्वारा पराजित किए जाने पर भी द्रुपद उन्हीं के द्वारा पालित हुए। (1-148-78, 79) क्षत्रिय बल (शौर्य) में वे अपना कोई पराजय नहीं देखते थे, किंतु स्वयं को ब्रह्मतेज (ब्राह्मण बल) के सामने हीन मानकर, वे द्रोण को हरा सकने में सक्षम पुत्र की प्राप्ति की इच्छा से पृथ्वी पर भ्रमण करने लगे। (1-148-80, 81क) उधर द्रोण ने अहिच्छत्र विषय (प्रदेश) पर अधिकार कर लिया। हे राजन्! इस प्रकार जनपदों से युक्त वह अहिच्छत्र पुरी अर्जुन द्वारा युद्ध में जीतकर द्रोण को समर्पित कर दी गई थी। (1-148-81ख, 82)
- व्याख्या: द्रुपद द्रोण की उदारता स्वीकार करते हैं और आधा राज्य पाकर वहीं शासन करने लगते हैं। किंतु ब्राह्मण के तेज (द्रोण) के आगे अपनी हार मानकर वे ऐसे पराक्रमी पुत्र की कामना करते हैं जो द्रोण का वध कर सके। दूसरी ओर, अर्जुन अहिच्छत्र जीतकर द्रोण की गुरुदक्षिणा पूरी करते हैं।
संभवपर्वणि अष्टचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः।। 148 ।।
