महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत 147वें अध्याय के श्लोकों का क्रमबद्ध (सीरियल नंबर से) श्लोक, हिंदी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:
श्लोक 1, 2, 3 और 4
श्लोक:
वैशंपायन उवाच। ततः स्रस्तोत्तरपटः सप्रस्वेदः सवेपथुः। विवेशधिरथो रङ्गं यष्टिप्राणो ह्वयन्निव।। (1-147-1) तमालोक्य धनुस्त्यक्त्वा पितृगौरवयन्त्रितः। कर्णोऽभिषेकार्द्रशिराः शिरसा समवन्दत।। (1-147-2) ततः पादाववच्छाद्य पटान्तेन ससंभ्रमः। पुत्रति परिपूर्णार्थमब्रवीद्रथसारथिम्।। (1-147-3) परिष्वज्य च तस्याथ मूर्धानं स्नेहविक्लवः। अङ्गराज्याभिषेकार्द्रमश्रुभिः सिषिचे पुनः।। (1-147-4)
- हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—तदनंतर जिनके ऊपर का वस्त्र खिसक रहा था, जो पसीने से लथपथ थे और काँप रहे थे, ऐसे वृद्ध अधिरथ (कर्ण के पालक पिता) लाठी के सहारे प्राणों को सँभालते हुए, मानो कर्ण को पुकारते हुए रंगभूमि में प्रविष्ट हुए। (1-147-1) उन्हें देखकर और पिता के प्रति आदरभाव से बँधे हुए कर्ण ने अपने हाथ से धनुष छोड़ दिया। उस समय उनके सिर पर राज्याभिषेक का जल लगा हुआ था और उन्होंने झुककर अपने पिता के चरणों में सिर नवाया। (1-147-2) फिर अत्यंत संभ्रम के साथ अपने वस्त्र के आँचल से उनके पैरों की धूल को पोंछा और परिपूर्ण स्नेह के साथ उन्हें "पिताजी!" कहकर पुकारा। (1-147-3) स्नेह से विह्वल होकर कर्ण ने उनके मस्तक को गले लगाया और अपने राज्याभिषेक के जल से भीगे हुए मस्तक पर उनके आँसुओं से फिर से उनका अभिषेक किया। (1-147-4)
- व्याख्या: रंगभूमि में कर्ण के पालक पिता अधिरथ के आने पर कर्ण ने बिना किसी संकोच के सबके सामने उन्हें गले लगाया और अपने पिता का चरण-कमल में वंदन कर अपने संस्कारों का परिचय दिया।
श्लोक 5, 6 और 7
श्लोक:
तं दृष्ट्वा सूतपुत्रोऽयमिति संचिन्त्य पाण्डवः। भीमसेनस्तदा वाक्यमब्रवीत्प्रहसन्निव।। (1-147-5) न त्वमर्हसि पार्थेन सूतपुत्र रणे वधम्। कुलस्य सदृशस्तूर्णं प्रतोदो गृह्यतां त्वया।। (1-147-6) अङ्गराज्यं च नार्हस्त्वमुपभोक्तुं नराधम। श्वा हुताशसमीपस्थं पुरोडाशमिवाध्वरे।। (1-147-7)
- हिंदी अनुवाद: उन्हें देखकर "यह सूतपुत्र है" ऐसा सोचकर पाण्डुपुत्र भीमसेन ने हँसते हुए से यह वचन कहा— (1-147-5) "हे सूतपुत्र! तुम पार्थ (अर्जुन) के हाथों रणक्षेत्र में मारे जाने योग्य नहीं हो। तुम अपने कुल के अनुकूल शीघ्र ही घोड़ों को हाँकने वाला कोड़ा (प्रतोद) ग्रहण करो।" (1-147-6) "हे नराधम! यज्ञ में अग्नि के पास रखे हुए हविष्य (पुरोडाश) को जिस प्रकार कुत्ता खाने का अधिकारी नहीं होता, उसी प्रकार तुम इस अंगराज्य का उपभोग करने के योग्य नहीं हो।" (1-147-7)
- व्याख्या: भीमसेन ने सारथी के पुत्र होने के कारण कर्ण पर कटाक्ष किया और कहा कि वे अर्जुन से युद्ध करने के योग्य नहीं हैं, बल्कि उन्हें अपना पैतृक सारथी का कार्य ही करना चाहिए।
श्लोक 8 और 9
श्लोक:
वैशंपायन उवाच। एवमुक्तस्ततः कर्णः किंचित्प्रस्फुरिताधरः। गगनस्थं विनिःश्वस्य दिवाकरमुदैक्षत।। (1-147-8) ततो दुर्योधनः कोपादुत्पपात महाबलः। भ्रातृपद्मवनात्तस्मान्मदोत्कट इव द्विपः।। (1-147-9)
- हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—भीम के ऐसा कहने पर कर्ण के ओठ थोड़े फड़फड़ाए और उन्होंने लंबी साँस लेकर आकाश की ओर देखते हुए सूर्यदेव (अपने पिता) की तरफ दृष्टि डाली। (1-147-8) तब महाबली दुर्योधन क्रोध से ऐसे उठ खड़े हुए, मानो भाइयों रूपी कमल के वन से कोई मतवाला हाथी बाहर निकल आया हो। (1-147-9)
- व्याख्या: भीम के अपमानजनक वचनों से कर्ण को क्षोभ हुआ और उन्होंने सूर्य की ओर देखा, जबकि उनके मित्र दुर्योधन को इस अपमान पर तीव्र क्रोध आ गया।
श्लोक 10, 11, 12, 13, 14 और 15
श्लोक:
सोऽब्रवीद्भीमकर्माणं भीमसेनमवस्थितम्। वृकोदर न युक्तं ते वचनं वक्तुमीदृशम्।। (1-147-10) क्षत्रियाणां बलं ज्यष्ठं योक्तव्यं क्षत्रबन्धुना। शूराणां च नदीनां च प्रभवो दुर्विभावनः।। (1-147-11) सलिलादुत्थितो वह्निर्येन व्याप्तं चराचरम्। दधीचस्यास्थितो वज्रं कृतं दानवसूदनम्।। (1-147-12) आग्नेयः कृत्तिकापुत्रो रौद्रो गाङ्गेय इत्यपि। श्रूयते भगवान्देवः सर्वगुह्यमयो गुहः।। (1-147-13) क्षत्रियेभ्यश्च ये जाता ब्राह्मणास्ते च ते श्रुताः। विश्वामित्रप्रभृतयः प्राप्ता ब्रह्मत्वमव्ययम्।। (1-147-14) आचार्यः कलशाज्जातो द्रोणः शस्त्रभृतां वरः। गौतमस्यान्ववाये च शरस्तम्बाच्च गौतमः।। (1-147-15)
- हिंदी अनुवाद: वहाँ खड़े भयानक पराक्रमी भीमसेन से दुर्योधन ने कहा—"हे वृकोदर! तुम्हारा यह इस प्रकार का वचन कहना बिल्कुल उचित नहीं है।" (1-147-10) "क्षत्रिया राजाओं का सबसे बड़ा बल उनका पराक्रम होता है। शूरावीरों और नदियों का उद्गम स्थल (मूल) दुर्विभावन (रहस्यमयी और अज्ञात) होता है।" (1-147-11) "जल से अग्नि उत्पन्न हुई, जिससे यह चराचर जगत व्याप्त है; और महर्षि दधीचि की हड्डियों से वज्र बनकर दानवों का संहार किया गया।" (1-147-12) "कृत्तिकाओं के पुत्र कार्तिकेय (आग्नेय/सुब्रह्मण्य), रुद्र के पुत्र गंगापुत्र (देवव्रत भीष्म), और भगवान गुह (कार्तिकेय)—इन सबका जन्म भी रहस्यमयी है।" (1-147-13) "क्षत्रिय कुलों से उत्पन्न होकर जो ब्राह्मण हुए हैं, जैसे विश्वामित्र आदि, उन्होंने भी अव्यय ब्रह्मत्व को प्राप्त किया है, यह तुमने सुना ही होगा।" (1-147-14) "शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ आचार्य द्रोण कलश (घड़े) से उत्पन्न हुए हैं और गौतम कुल में शरस्तम्ब (कानस की झाड़ियों) से गौतम ऋषि उत्पन्न हुए हैं।" (1-147-15)
- व्याख्या: दुर्योधन ने भीम के तंज का करारा जवाब देते हुए कहा कि महान पुरुषों और शूरवीरों के जन्म के स्रोत और कुल की सीमाएँ नहीं देखी जातीं, बल्कि उनका तेज और पराक्रम ही सर्वप्रधान होता है। इसके समर्थन में उन्होंने द्रोण, कृप, विश्वामित्र आदि महान पात्रों के जन्म के उदाहरण दिए।
श्लोक 16, 17 और 18
श्लोक:
भवतां च यथा जन्म तदप्यागमितं मया। सकुण्डलं सकवचं सर्वलक्षणलक्षितम्। कथamआदित्यसदृशं मृगी व्याघ्रं जनिष्यति।। (1-147-16) पृथिवीराज्यमर्होऽयं नाङ्गराज्यं नरेश्वरः। अनेन बाहुवीर्येण मया चाज्ञानुवर्तिना।। (1-147-17) यस्य वा मनुजस्येदं न क्षान्तं मद्विचेष्टितम्। रथमारुह्य पद्भ्यां स विनामयतु कार्मुकम्।। (1-147-18)
- हिंदी अनुवाद: "और स्वयं आप लोगों (पाण्डवों) का जैसा जन्म हुआ है, उसे भी मैंने अच्छी तरह जान रखा है।" (1-147-16क) "कुंडल और कवच से सुसज्जित तथा सभी उत्तम लक्षणों से युक्त, सूर्य के समान तेजस्वी इस वीर को क्या कोई मृगी (हिरणी) व्याघ्र (बाघ) को जन्म दे सकती है? (अर्थात यह साधारण माता-पिता की संतान नहीं हो सकता)" (1-147-16ख-ग) "ये केवल अंगराज्य के नहीं, बल्कि संपूर्ण पृथ्वी के राज्य के योग्य नरेश्वर हैं। मेरे इस बाहुबल और मेरी आज्ञा का पालन करने से यह सिद्ध है।" (1-147-17) "यदि किसी भी मनुष्य को मेरे द्वारा किया गया यह कार्य सहन नहीं होता, तो वह रथ पर चढ़े या पैदल ही, आगे आए और अपना धनुष चढ़ाकर मुझसे मुकाबला करे।" (1-147-18)
- व्याख्या: दुर्योधन ने पाण्डवों के असाधारण जन्म का परोक्ष स्मरण कराते हुए कर्ण के उच्च दिव्य तेज की वकालत की और खुली चुनौती दी कि यदि किसी को कर्ण का राजा बनना या उनका पराक्रम खटकता है, तो वह युद्ध के मैदान में आकर उनसे मुकाबला कर ले।
श्लोक 19, 20, 21 और 22
श्लोक:
ततः सर्वस्य रङ्गस्य हाहाकारो महानभूत्। साधुवादानुसंबद्धः सूर्यश्चास्तमुपागमत।। (1-147-19) ततो दुर्योधनः कर्णमालम्ब्याग्रकरे नृपः। दीपिकाभिः कृतालोकस्तस्माद्रङ्गाद्विनिर्ययौ।। (1-147-20) पाण्डवाश्च सहद्रोणाः सकृपाश्च विशांपते। भीष्मेण सहिताः सर्वे ययुः स्वं स्वं निवेशनम्।। (1-147-21) अर्जुनेति जनः कश्चित्कश्चित्कर्णेति भारत। कश्चिद्दुर्योधनेत्येवं ब्रुवन्तः प्रस्थितास्तदा।। (1-147-22)
- हिंदी अनुवाद: तदनंतर संपूर्ण रंगभूमि में साधुवाद (प्रशंसा) के साथ एक महान हाहाकार (कोलाहल) मच गया और उसी समय सूर्य भी अस्त हो गए। (1-147-19) इसके बाद राजा दुर्योधन ने आगे बढ़कर कर्ण का हाथ पकड़कर सहारा दिया और मशालों (दीपिकाओं) के प्रकाश में उस रंगभूमि से बाहर प्रस्थान किया। (1-147-20) हे विशांपते (जनमेजय)! द्रोणाचार्य, कृप और भीष्म पितामह के साथ सभी पाण्डव भी अपने-अपने निवास स्थान को लौट गए। (1-147-21) हे भारत! उस समय जाते हुए लोग कहीं "अर्जुन!", कहीं "कर्ण!" और कहीं "दुर्योधन!" इस प्रकार उनकी प्रशंसा में चर्चा करते हुए अपने घरों को गए। (1-147-22)
- व्याख्या: दुर्योधन की चुनौती और माहौल की गरमागरमी के बीच संध्या होने पर सभा समाप्त हुई। दुर्योधन कर्ण का हाथ थामकर रंगभूमि से बाहर निकले, और सभी लोग अलग-अलग योद्धाओं के पराक्रम की चर्चा करते हुए अपने घर लौटे।
श्लोक 23, 24 और 25 (अध्याय का समापन)
श्लोक:
कुन्त्याश्च प्रत्यभिज्ञाय दिव्यलक्षणसूचितम्। पुत्रमङ्गेश्वरं स्नेहाच्छन्ना प्रीतिरजायत।। (1-147-23) दुर्योधनस्यापि तदा कर्णमासाद्य पार्थिव। भयमर्जुनसंजातं क्षिप्रमन्तरधीयत।। (1-147-24) स चापि वीरः कृतशस्त्रनिश्रमः परेण साम्नाऽभ्यवदत्सुयोधनम्। युधिष्ठिरस्याप्यभवत्तदा मति- र्न कर्णतुल्योऽस्ति धनुर्धरः क्षितौ।। (1-147-25)
- हिंदी अनुवाद: उधर कुंती ने दिव्य लक्षणों से सूचित होने वाले अपने पुत्र (कर्ण) को अंगदेश का राजा बना हुआ पहचान लिया, जिससे उनके मन में गुप्त (छिपा हुआ) मातृस्नेह उमड़ पड़ा। (1-147-23) हे पार्थिव! कर्ण का साथ पाकर दुर्योधन के मन में अर्जुन से उत्पन्न हुआ जो थोड़ा भी भय था, वह तुरंत समाप्त हो गया। (1-147-24) शस्त्र-अध्ययन का परिश्रम पूरा कर चुके वे वीर कर्ण ने अत्यंत मधुर वचनों से सुयोधन (दुर्योधन) का अभिनंदन किया। उस समय युधिष्ठिर के मन में भी ऐसा विचार आया कि "इस पृथ्वी पर कर्ण के समान कोई दूसरा श्रेष्ठ धनुर्धर नहीं है।" (1-147-25)
- व्याख्या: कुंती ने अपने पुत्र कर्ण को पहचानकर आंतरिक प्रेम अनुभव किया, दुर्योधन को कर्ण का साथ मिलने से आंतरिक बल मिला, और स्वयं युधिष्ठिर ने भी मन ही मन कर्ण की अद्वितीय धनुर्विद्या का लोहा मान लिया।
