श्रीरामायण पाठ — अयोध्याकाण्डे विंशः सर्गः ॥२-२०॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के अयोध्याकाण्ड के एकविंश (२१वें) सर्ग (२-२१) के सभी ६४ श्लोकों का क्रमवार हिंदी एवं अंग्रेजी अनुवाद व व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:
श्लोक १-५
तथा तु विलपन्तीं तां कौसल्यां राममातरम्। उवाच लक्ष्मणो दीनस्तत्कालसदृशं वचः॥ १॥ न रोचते ममाप्येतदार्ये यद् राघवो वनम्। त्यक्त्वा राज्यश्रियं गच्छेत् स्त्रिया वाक्यवशंगतः॥ २॥ विपरीतश्च वृद्धश्च विषयैश्च प्रधर्षितः। नृपः किमिव न ब्रूयाच्चोद्यमानः समन्मथः॥ ३॥ नास्यापराधं पश्यामि नापि दोषं तथाविधम्। येन निर्वास्यते राष्ट्राद् वनवासाय राघवः॥ ४॥ न तं पश्याम्यहं लोके परोक्षमपि यो नरः। स्वमित्रोऽपि निरस्तोऽपि योऽस्य दोषमुदाहरेत्॥ ५॥
- हिंदी व्याख्या: श्रीराम की माता कौसल्या को इस प्रकार विलाप करते देख, दुखी हुए लक्ष्मण ने उस समय के अनुकूल वचन कहे—"हे पूज्ये! एक स्त्री के वचनों के वश में होकर राघव राज्यलक्ष्मी का त्याग करके वन चले जाएँ, यह मुझे भी तनिक पसंद नहीं है। वृद्ध, बुद्धि से विपरीत, कामासक्त और विषयों के वश में हुए राजा कैकेयी के उकसाने पर भला क्या नहीं कह सकते? मैं श्रीराम का कोई ऐसा अपराध या दोष नहीं देखता, जिसके कारण उन्हें राज्य से दण्डकारण्य के वनवास हेतु निष्कासित किया जाए। मैं संसार में ऐसा कोई व्यक्ति (चाहे उनका शत्रु हो या मित्र) नहीं देखता, जो श्रीराम के परोक्ष में भी उनके किसी दोष का उल्लेख कर सके।"
- English Translation: Beholding Rama's mother Kausalya thus lamenting, the distressed Lakshmana spoke words fitting for that occasion: "O Noble Lady, that Raghava should relinquish the royal fortune and depart for the forest at the behest of a woman does not please me either. The king—aged, perverted in judgment, overcome by sensual desires, and driven by lust—what might he not utter when impelled by Kaikeyi? I perceive no fault or wrongdoing in Raghava for which He should be banished from the realm into forest exile. I see no person in this world, even behind His back—be he an enemy or a rejected friend—who could point out a single flaw in Him."
श्लोक ६-१०
देवकल्पमृजुं दान्तं रिपूणामपि वत्सलम्। अवेक्षमाणः को धर्मं त्यजेत् पुत्रमकारणात्॥ ६॥ तदिदं वचनं राज्ञः पुनर्बाल्यमुपेयुषः। पुत्रः को हृदये कुर्याद् राजवृत्तमनुस्मरन्॥ ७॥ यावदेव न जानाति कश्चिदर्थमिमं नरः। तावदेव मया सार्धमात्मस्थं कुरु शासनम्॥ ८॥ मया पार्श्वे सधनुषा तव गुप्तस्य राघव। कः समर्थोऽधिकं कर्तुं कृतान्तस्येव तिष्ठतः॥ ९॥ निर्मनुष्यामिमां सर्वामयोध्यां मनुजर्षभ। करिष्यामि शरैस्तीक्ष्णैर्यदि स्थास्यति विप्रिये॥ १०॥
- हिंदी व्याख्या: "जो देवतुल्य, सरल, जितेन्द्रिय और शत्रुओं पर भी दया करने वाले हैं, धर्म का ज्ञान रखने वाला कौन मनुष्य ऐसे पुत्र को बिना किसी कारण के त्याग सकता है? पुनः बाल्यावस्था (बचपन जैसी मूर्खता) को प्राप्त हुए राजा के इस वचन को राजधर्म को जानने वाला कौन पुत्र अपने हृदय में स्थान देगा? हे राघव! जब तक नगर का कोई भी मनुष्य इस समाचार को न जान पाए, तब तक आप मेरे साथ मिलकर इस राज्य-शासन को अपने हाथ में ले लीजिए। जब धनुष धारण किए हुए और साक्षात यमराज की भाँति स्थित मेरे द्वारा आपकी रक्षा की जा रही हो, तब भला कौन आपके विरुद्ध खड़े होने में समर्थ हो सकता है? हे पुरुषश्रेष्ठ! यदि यह संपूर्ण अयोध्या नगरी आपके विरुद्ध खड़ी होगी, तो मैं अपने तीक्ष्ण बाणों से इसे जनहीन बना दूँगा।"
- English Translation: "What righteous person, beholding a son god-like, straightforward, self-controlled, and compassionate even toward enemies, would abandon Him without cause? What son, bearing in mind the duties of kingship, would take to heart the command of a king who has relapsed into childhood? O Raghava, before anyone in the city comes to know of this matter, take the governance of the state into Your own hands along with me. When You are protected by me standing at Your side with bow in hand like Yamaraja Himself, who would dare to oppose You? O best of men, if all अयोध्या stands in opposition to You, I shall render it utterly devoid of humans with my sharp arrows!"
श्लोक ११-१५
भरतस्याथ पक्ष्यो वा यो वास्य हितमिच्छति। सर्वांस्तांश्च वधिष्यामि मृदुर्हि परिभूयते॥ ११॥ प्रोत्साहितोऽयं कैकेय्या संतुष्टो यदि नः पिता। अमित्रभूतो निःसङ्गं वध्यतां वध्यतामपि॥ १२॥ गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः। उत्पथं प्रतिपन्नस्य कार्यं भवति शासनम्॥ १३॥ बलमेष किमाश्रित्य हेतुं वा पुरुषोत्तम। दातुमिच्छति कैकेय्यै उपस्थितमिदं तव॥ १४॥ त्वया चैव मया चैव कृत्वा वैरमनुत्तमम्। कास्य शक्तिः श्रियं दातुं भरतायारिशासन॥ १५॥
- हिंदी व्याख्या: "भरत का पक्ष लेने वाले या उनका हित चाहने वाले जितने लोग भी होंगे, मैं उन सभी का वध कर दूँगा, क्योंकि कोमल स्वभाव वाले व्यक्ति का ही तिरस्कार होता है। यदि कैकेयी द्वारा उकसाए जाने पर हमारे पिता ही हमारे शत्रु बन गए हैं, तो ऐसे पिता को भी बिना किसी संकोच के दंडित/वध कर देना चाहिए। जो गुरु (पिता/श्रेष्ठ पुरुष) घमंडी हो जाए, जिसे कार्य और अकार्य का विवेक न रहे और जो कुमार्ग पर चलने लगे, उसका दमन करना (उसे दंड देना) शास्त्र सम्मत कर्तव्य है। हे पुरुषोत्तम! किस बल या कारण का आश्रय लेकर राजा आपका यह उपस्थित राज्य कैकेयी को देना चाहते हैं? हे शत्रुओं का दमन करने वाले! आपके और मेरे साथ महान वैर मोल लेकर भरत को यह राज्यलक्ष्मी देने की सामर्थ्य भला किसमें है?"
- English Translation: "I shall slay all those who take Bharata's side or wish him well, for the mild-mannered are ever trodden upon! If our father, prompted by Kaikeyi, has turned into an enemy, he too deserves to be struck down without hesitation. Even a guru or elder who is arrogant, ignorant of right and wrong, and set upon an evil path ought to be punished according to scriptural ordinance. O Best of Men, relying on what strength or logic does he wish to give away this kingdom—which is rightfully Yours—to Kaikeyi? O Chastiser of Foes, who possesses the power to bestow this royal fortune upon Bharata after provoking supreme enmity with You and me?"
श्लोक १६-१९
अनुरक्तोऽस्मि भावेन भ्रातरं देवि तत्त्वतः। सत्येन धनुषा चैव दत्तेनेष्टेन ते शपे॥ १६॥ दीप्तमग्निमरण्यं वा यदि रामः प्रवेक्ष्यति। प्रविष्टं तत्र मां देवि त्वं पूर्वमवधारय॥ १७॥ हरामि वीर्याद् दुःखं ते तमः सूर्य इवोदितः। देवी पश्यतु मे वीर्यं राघवश्चैव पश्यतु॥ १८॥ हनिष्ये पितरं वृद्धं कैकेय्यासक्तमानसम्। कृपणं च स्थितं बाल्ये वृद्धभावेन गर्हितम्॥ १९॥
- हिंदी व्याख्या: "हे देवि! मैं अपने भाई राम से सच्चे हृदय से अनुरक्त हूँ। मैं अपने सत्य, धनुष और आपके द्वारा दी गई इष्ट वस्तुओं की सौगंध खाकर कहता हूँ कि यदि राम प्रज्वलित अग्नि या भयानक वन में प्रवेश करेंगे, तो आप मुझको उनसे भी पहले उसमें प्रविष्ट हुआ मानिए। जिस प्रकार उदित हुआ सूर्य अंधकार को दूर कर देता है, उसी प्रकार मैं अपने पराक्रम से आपके इस दुख को दूर कर दूँगा। हे देवि! आप और राघव दोनों मेरे पराक्रम को देखें। जो वृद्ध राजा कैकेयी में आसक्तचित्त होकर नीच, बाल्य-बुद्धि और वृद्धावस्था से गर्हित स्थिति में आ पहुँचे हैं, मैं उनका वध/दमन कर दूँगा।"
- English Translation: "O Queen, I am truly and deeply devoted to my brother. By my truth, my bow, and the cherished gifts given by you, I swear: if Rama enters a blazing fire or the forest, consider me as having entered there before Him! As the rising sun dispels darkness, so shall I remove your sorrow by my prowess. Let the Queen witness my valor, and let Raghava witness it too! I shall strike down this aged king, whose mind is attached to Kaikeyi, who has become wretched, childish, and censurable in his dotage."
श्लोक २०-२४
एतत् तु वचनं श्रुत्वा लक्ष्मणस्य महात्मनः। उवाच रामं कौसल्या रुदती शोकलालसा॥ २०॥ भ्रातुस्ते वदतः पुत्र लक्ष्मणस्य श्रुतं त्वया। यदत्रानन्तरं तत्त्वं कुरुष्व यदि रोचते॥ २१॥ न चाधर्म्यं वचः श्रुत्वा सपत्न्या मम भाषितम्। विहाय शोकसंतप्तां गन्तुमर्हसि मामितः॥ २२॥ धर्मज्ञ इति धर्मिष्ठ धर्मं चरितुमिच्छसि। शुश्रूष मामिहस्थस्त्वं चर धर्ममनुत्तमम्॥ २३॥ शुश्रूषुर्जननीं पुत्र स्वगृहे नियतो वसन्। परेण तपसा युक्तः काश्यपस्त्रिदिवं गतः॥ २४॥
- हिंदी व्याख्या: महात्मा लक्ष्मण के इस वचन को सुनकर शोक में डूबी कौसल्या रोती हुई श्रीराम से बोलीं—"हे पुत्र! तुमने अपने भाई लक्ष्मण की बात सुनी? इसके बाद जो तुम्हें उचित और श्रेयस्कर लगे, वही करो। मेरी सौत (कैकेयी) द्वारा कहे गए उस अधर्मयुक्त वचन को मानकर, शोक से संतप्त मुझे छोड़कर तुम्हारा यहाँ से जाना उचित नहीं है। हे धर्मिष्ठ! यदि तुम धर्म का आचरण करना चाहते हो, तो यही रहकर मेरी सेवा करो और इस सर्वोत्तम धर्म का पालन करो। हे पुत्र! कश्यप के पुत्र (कश्यपमुनि/तपस्वी) अपने घर में ही रहकर संयमपूर्वक अपनी माता की सेवा करते हुए महान तप से युक्त होकर स्वर्ग लोक को प्राप्त हुए थे।"
- English Translation: Hearing these words of the high-souled Lakshmana, Kausalya, weeping and immersed in grief, said to Rama: "O Son, you have heard what your brother Lakshmana has spoken. Do whatever seems proper and true to you after this. Hearing the unrighteous words spoken by my co-wife, it is not fitting for you to leave me here tormented by grief. O most righteous One, if you wish to practice virtue, stay right here, serve me, and fulfill this highest duty. O Son, the ascetic son of Kashyapa, remaining dutifully in his own house serving his mother, attained heaven through his supreme penance."
श्लोक २५-२८
यथैव राजा पूज्यस्ते गौरवेण तथा ह्यहम्। त्वां साहं नानुजानामि न गन्तव्यमितो वनम्॥ २५॥ त्वद्वियोगान्न मे कार्यं जीवितेन सुखेन च। त्वया सह मम श्रेयस्तृणानामपि भक्षणम्॥ २६॥ यदि त्वं यास्यसि वनं त्यक्त्वा मां शोकलालसाम्। अहं प्रायमिहासिष्ये न च शक्ष्यामि जीवितुम्॥ २७॥ ततस्त्वं प्राप्स्यसे पुत्र निरयं लोकविश्रुतम्। ब्रह्महत्यामिवाधर्मात् समुद्रः सरितां पतिः॥ २८॥
- हिंदी व्याख्या: "जैसे राजा गौरव के कारण तुम्हारे लिए पूजनीय हैं, वैसे ही मैं भी पूजनीय हूँ। इसलिए मैं तुम्हें आज्ञा नहीं देती, तुम्हें यहाँ से वन नहीं जाना चाहिए। तुम्हारे वियोग में मुझे न जीवन से प्रयोजन है और न सुख से; तुम्हारे साथ रहकर घास-पात खाना भी मेरे लिए परम कल्याणकारी है। यदि तुम शोक से संतप्त मुझे छोड़कर वन चले जाओगे, तो मैं यही प्रायोपवेशन (अन्न-जल त्यागकर प्राण त्यागना) करूँगी, मैं जीवित नहीं रह सकती। तत्पश्चात हे पुत्र! जिस प्रकार सरिताओं के स्वामी समुद्र को पाप प्राप्त हुआ था, उसी प्रकार तुम्हें भी इस अधर्म से ब्रह्महत्या के समान लोकविख्यात नरक की प्राप्ति होगी।"
- English Translation: "Just as the king is worshipful to you out of reverence, so am I equally worshipful. Therefore I do not grant you permission; you must not go to the forest from here. Separated from you, I have no use for life or happiness; eating even grass in your company is supreme bliss for me. If you go to the forest abandoning me submerged in sorrow, I shall fast unto death right here, for I cannot survive. Thereupon, my son, you will attain notorious hell for this unrighteousness, just as the ocean, lord of rivers, incurred sin akin to the killing of a Brahmin."
श्लोक २९-३३
विलपन्तीं तथा दीनां कौसल्यां जननीं ततः। उवाच रामो धर्मात्मा वचनं धर्मसंहितम्॥ २९॥ नास्ति शक्तिः पितुर्वाक्यं समतिक्रमितुं मम। प्रसादये त्वां शिरसा गन्तुमिच्छामि अहं वनम्॥ ३०॥ ऋषिणा च पितुर्वाक्यं कुर्वता वनचारिणा। गौर्हता जानताधर्मं कण्डुना च विपश्चिता॥ ३१॥ अस्माकं तु कुले पूर्वं सगरस्याज्ञया पितुः। खनद्भिः सागरैर्भूमिमवाप्तः सुमहान् वधः॥ ३२॥ जामदग्न्येन रामेण रेणुका जननी स्वयम्। कृत्ता परशुनारण्ये पितुर्वचनकारणात्॥ ३३॥
- हिंदी व्याख्या: इस प्रकार विलाप करती हुई अपनी दीन माता कौसल्या से धर्मात्मा श्रीराम ने धर्मयुक्त वचन कहे—"माताजी! पिता की आज्ञा का उल्लंघन करने की सामर्थ्य मुझमें नहीं है। मैं सिर झुकाकर आपको प्रसन्न करता हूँ, मैं वन जाना चाहता हूँ। विद्वान एवं धर्मज्ञ कण्डु ऋषि ने वन में रहते हुए पिता की आज्ञा का पालन करते हुए गौ का वध किया था। हमारे ही कुल में पूर्वकाल में सगर के पुत्रों (सागरों) ने अपने पिता की आज्ञा से पृथ्वी को खोदते हुए अत्यंत महान विनाश/वध को प्राप्त किया था। जमदग्नि के पुत्र परशुराम जी ने अपने पिता की आज्ञा के कारण वन में स्वयं अपनी माता रेणुका का सिर फरसे से काट दिया था।"
- English Translation: To his mother Kausalya thus lamenting in distress, the righteous-souled Rama spoke words aligned with virtue: "I have no power to override my father's command. I appease you with bowed head; I wish to depart for the forest. The learned and righteous sage Kandu, dwelling in the forest, slaughtered a cow at his father's command knowing full well the duty. In our own lineage previously, the sons of Sagara, digging the earth at the command of their father, met with a colossal destruction. Parashurama, son of Jamadagni, severed the head of his own mother Renuka in the forest solely to obey his father's words."
श्लोक ३४-३७
एतैरन्यैश्च बहुभिर्देवि देवसमैः कृतम्। पितुर्वचनमक्लीबं करिष्यामि पितुर्हितम्॥ ३४॥ न खल्वेतन्मयैकेन क्रियते पितृशासनम्। एतैरपि कृतं देवि ये मया परिकीर्तिताः॥ ३५॥ नाहं धर्ममपूर्वं ते प्रतिकूलं प्रवर्तये। पूर्वैरयमभिप्रेतो गतो मार्गोऽनुगम्यते॥ ३६॥ तदेतत् तु मया कार्यं क्रियते भुवि नान्यथा। पितुर्हि वचनं कुर्वन् न कश्चिन्नाम हीयते॥ ३७॥
- हिंदी व्याख्या: "हे देवि! इन तथा अन्य अनेक देवतुल्य महापुरुषों ने पिता के वचन का पालन किया है; अतः मैं भी बिना किसी कातरता (कायरता) के पिता का हित/वचन पूरा करूँगा। पिता की आज्ञा का पालन केवल मैं अकेला ही नहीं कर रहा हूँ, अपितु जिन महापुरुषों का मैंने उल्लेख किया है, उन्होंने भी इसका पालन किया था। मैं आपके प्रतिकूल किसी नवीन या अभूतपूर्व धर्म को नहीं चला रहा हूँ; हमारे पूर्वजों द्वारा स्वीकृत और चले गए मार्ग का ही मैं अनुगमन कर रहा हूँ। इसलिए इस पृथ्वी पर मेरे द्वारा यह कार्य अवश्य किया जाएगा, इसे अन्यथा नहीं किया जा सकता; क्योंकि पिता की आज्ञा का पालन करने वाला कोई भी मनुष्य कभी पतित या भ्रष्ट नहीं होता।"
- English Translation: "O Queen, by these and many other god-like personalities, the father's command was fearlessly executed; I too shall firmly accomplish my father's welfare. I am not the sole person obeying a father's mandate; it was performed by all those whom I have glorified. I am not inaugurating any novel or contradictory virtue opposed to you; I am merely following the path approved and trodden by our ancestors. Therefore this duty shall unfailingly be performed by me on earth and not otherwise, for no one who fulfills a father's command ever falls from righteousness."
श्लोक ३८-४२
तामेवमुक्त्वा जननीं लक्ष्मणं पुनरब्रवीत्। वाक्यं वाक्यविदां श्रेष्ठः श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम्॥ ३८॥ तव लक्ष्मण जानामि मयि स्नेहमनुत्तमम्। विक्रमं चैव सत्त्वं च तेजश्च सुदुरासदम्॥ ३९॥ मम मातुर्महद् दुःखमतुलं शुभलक्षण। अभिप्रायं न विज्ञाय सत्यस्य च शमस्य च॥ ४०॥ धर्मो हि परमो लोके धर्मे सत्यं प्रतिष्ठितम्। धर्मसंश्रितमप्येतत् पितुर्वचनमुत्तमम्॥ ४१॥ संश्रुत्य च पितुर्वाक्यं मातुर्वा ब्राह्मणस्य वा। न कर्तव्यं वृथा वीर धर्ममाश्रित्य तिष्ठता॥ ४२॥
- हिंदी व्याख्या: अपनी माता से ऐसा कहकर, वक्ताओं में श्रेष्ठ और सर्वधनुर्धारियों में श्रेष्ठ श्रीराम ने पुनः लक्ष्मण से कहा—"हे लक्ष्मण! मेरे प्रति तुम्हारे अनन्य स्नेह, तुम्हारे पराक्रम, बल और दुर्धर्ष तेज को मैं भली-भांति जानता हूँ। हे शुभलक्षण! मेरी माता को जो यह अनुपम दुख हो रहा है, वह सत्य और शांति (शम) के वास्तविक अभिप्राय को न समझने के कारण हो रहा है। संसार में धर्म ही परम तत्व है और धर्म में ही सत्य प्रतिष्ठित है। पिता का यह उत्तम वचन भी धर्म पर ही आश्रित है। हे वीर! धर्म में स्थित रहने वाले पुरुष को पिता, माता या ब्राह्मण के मुख से सुने गए वचन को प्रतिज्ञाबद्ध होने के बाद कभी व्यर्थ (निष्फल) नहीं करना चाहिए।"
- English Translation: Having spoken thus to His mother, Rama—the best among speakers and foremost among archers—addressed Lakshmana again: "O Lakshmana, I know full well your incomparable affection for Me, as also your prowess, strength, and formidable brilliance. O auspicious One, this immense and matchless grief of my mother is born from not understanding the true import of truth and inner peace. Virtue is the supreme entity in this world, and truth is established in virtue. This supreme command of our father is likewise rooted in virtue. O Hero, one who abides in righteousness must never render void a word pledged to a father, mother, or Brahmin."
श्लोक ४३-४६
सोऽहं न शक्ष्यामि पुनर्नियोगमतिवर्तितुम्। पितुर्हि वचनाद् वीर कैकेय्याहं प्रचोदितः॥ ४३॥ तदेतां विसृजानार्यां क्षत्रधर्माश्रितां मतिम्। धर्ममाश्रय मा तैक्ष्ण्यं मद्बुद्धिरनुगम्यताम्॥ ४४॥ तमेवमुक्त्वा सौहार्दाद् भ्रातरं लक्ष्मणाग्रजः। उवाच भूयः कौसल्यां प्राञ्जलिः शिरसा नतः॥ ४५॥ अनुमन्यस्व मां देवि गमिष्यन्तमितो वनम्। शापितासि मम प्राणैः कुरु स्वस्त्ययनानि मे॥ ४६॥
- हिंदी व्याख्या: "इसलिए हे वीर! पिता के वचनों के कारण कैकेयी द्वारा दिए गए इस आदेश का उल्लंघन करने में मैं समर्थ नहीं हूँ। अतः क्षत्रिय धर्म के आश्रित इस अनर्थकारी (कठोर) विचार को त्याग दो; तीक्ष्णता/क्रोध का त्याग कर धर्म का आश्रय लो और मेरी बुद्धि/विचार का अनुगमन करो।" लक्ष्मण के बड़े भाई श्रीराम ने भ्रातृ-स्नेहवश उनसे ऐसा कहकर, पुनः हाथ जोड़कर और मस्तक नवाकर कौसल्या से कहा—"हे देवि! यहाँ से वन जाने के लिए मुझे अनुमति प्रदान कीजिए। आपको मेरे प्राणों की सौगंध है, आप मेरे लिए मंगल-पाठ (स्वस्त्ययन) कीजिए।"
- English Translation: "Therefore, O Hero, I cannot transgress this order prompted by Kaikeyi in accordance with my father's word. Hence relinquish this ignoble intellect rooted in harsh Kshatriya doctrine; embrace pure virtue, abandon fierce wrath, and follow My reasoning." Having thus addressed his brother out of affection, the elder brother of Lakshmana once more spoke to Kausalya with joined palms and bowed head: "O Queen, grant me permission to depart hence to the forest. I adjure you by my life—perform auspicious rites of blessing for my journey!"
श्लोक ४७-५०
तीर्णप्रतिज्ञश्च वनात् पुनरेष्याम्यहं पुरीम्। ययातिरिव राजर्षिः पुरा हित्वा पुनर्दिवम्॥ ४७॥ शोकः संधार्यतां मातर्हृदये साधु मा शुचः। वनवासादिहैष्यामि पुनः कृत्वा पितुर्वचः॥ ४८॥ त्वया मया च वैदेह्या लक्ष्मणेन सुमित्रया। पितुर्नियोगे स्थातव्यमेष धर्मः सनातनः॥ ४९॥ अम्ब सम्भृत्य सम्भारान् दुःखं हृदि निगृह्य च। वनवासकृता बुद्धिर्मम धर्म्यानुवर्त्यताम्॥ ५०॥
- हिंदी व्याख्या: "अपनी प्रतिज्ञा पूरी करके मैं वन से पुनः इस नगरी में लौट आऊँगा, जैसे प्राचीन काल में राजर्षि ययाति स्वर्ग का त्याग करके पुनः स्वर्ग में लौट गए थे। हे मातः! अपने हृदय में शोक का निवारण कीजिए, दुख मत कीजिए; पिता के वचन को पूरा करके मैं वनवास से पुनः यहाँ आऊँगा। आपके द्वारा, मेरे द्वारा, वैदेही, लक्ष्मण और सुमित्रा द्वारा—हम सभी को पिता की आज्ञा में स्थिर रहना चाहिए, यही सनातन धर्म है। हे अम्ब! अपने हृदय में दुख को दबाकर, मंगल सम्भारों को जुटाकर मेरे वनवास के इस धर्मानुकूल निश्चय का समर्थन कीजिए।"
- English Translation: "Fulfilling my vow, I shall return from the forest to this city once more, just as in ancient times the royal sage Yayati, leaving heaven briefly, returned to heaven again. O Mother, restrain grief in your heart, do not mourn; fulfilling my father's command, I shall return here from forest residency. By you, by me, by Vaidehi, by Lakshmana, and by Sumitra—we must all abide by father's mandate; this indeed is eternal virtue. O Mother, suppressing sorrow in your heart and gathering ceremonial blessings, support my virtuous resolve for forest residence."
श्लोक ५१-५५
एतद् वचस्तस्य निशम्य माता सुधर्म्यमव्यग्रमविक्लवं च। मृतेव संज्ञां प्रतिलभ्य देवी समीक्ष्य रामं पुनरित्युवाच॥ ५१॥ यथैव ते पुत्र पिता तथाहं गुरुः स्वधर्मेण सुहृत्तया च। न त्वानुजानामि न मां विहाय सुदुःखितामर्हसि पुत्र गन्तुम्॥ ५२॥ किं जीवितेनेह विना त्वया मे लोकेन वा किं स्वधयामृतेन। श्रेयो मुहूर्तं तव संनिधानं ममैव कृत्स्नादपि जीवलोकात्॥ ५३॥ नरैरिवोल्काभिरपोह्यमानो महागजो ध्वान्तमभिप्रविष्टः। भूयः प्रजज्वाल विलापमेवं निशम्य रामः करुणं जनन्याः॥ ५४॥ स मातरं चैव विसंज्ञकल्पा- मार्तं च सौमित्रिमभिप्रतप्तम्। धर्मे स्थितो धर्म्यमुवाच वाक्यं यथा स एवार्हति तत्र वक्तुम्॥ ५५॥
- हिंदी व्याख्या: श्रीराम के इस अत्यंत धर्मानुकूल, शांत और अविक्लव (अडिग) वचन को सुनकर, मृतप्राय देवी कौसल्या चेतना प्राप्त कर राम की ओर देखकर पुनः बोलीं—"हे पुत्र! अपने धर्म और वात्सल्य के कारण जैसे तुम्हारे पिता तुम्हारे गुरु हैं, वैसे ही मैं भी तुम्हारी गुरु हूँ। मैं तुम्हें अनुमति नहीं देती, अतः अत्यंत दुखी मुझे छोड़कर तुम्हारा जाना उचित नहीं है। तुम्हारे बिना मुझे इस जीवन से, इस लोक से, अथवा पित्र तर्पण (स्वधा) और अमृत से क्या प्रयोजन? इस संपूर्ण जीवलोक की अपेक्षा तुम्हारा एक मुहूर्त का सानिध्य ही मेरे लिए परम श्रेयस्कर है।" अपनी माता के इस प्रकार के करुण विलाप को सुनकर श्रीराम—जैसे जलती मशाले लिए मनुष्यों द्वारा खदेड़ा गया महान हाथी अंधकार में प्रविष्ट होकर उद्वेलित होता है—अंदर ही अंदर पुनः प्रज्वलित (व्यथित) हो उठे। किंतु धर्म में स्थिर रहने वाले श्रीराम ने अपनी अचेतप्राय माता और संताप से जलते हुए आर्त लक्ष्मण से वही धर्मयुक्त बात कही, जो उस समय केवल उन्हीं के कहने योग्य थी।
- English Translation: Hearing those deeply righteous, composed, and firm words of Rama, Queen Kausalya, like one resurrected, regained consciousness, looked at Rama, and spoke again: "O Son, just as your father is your guru, so am I your guru through my innate duty and affection. I do not permit you; it is not right for you to depart leaving me so utterly distressed. Without you, what use have I for life, for this world, for ancestral offerings, or for nectar? Your presence for even a single moment is superior for me to the entire realm of living beings!" Hearing this piteous lamentation of his mother, Rama—like a mighty elephant driven by men wielding torches entering deep darkness—was internally inflamed with distress once more. Yet, firmly established in virtue, he addressed his unconscious-like mother and the tormented Lakshmana with righteous words that only He was suited to speak on that occasion.
श्लोक ५६-५८
अहं हि ते लक्ष्मण नित्यमेव जानामि भक्तिं च पराक्रमं च। मम त्वभिप्रायमसंनिरीक्ष्य मात्रा सहाभ्यर्दसि मा सुदुःखम्॥ ५६॥ धर्मार्थकामाः खलु जीवलोके समीक्षिता धर्मफलोदयेषु। ये तत्र सर्वे स्युरसंशयं मे भार्येव वश्याभिमता सपुत्रा॥ ५७॥ यस्मिंस्तु सर्वे स्युरसंनिविष्टा धर्मो यतः स्यात् तदुपक्रमेत। द्वेष्यो भवत्यर्थपरो हि लोके कामात्मता खल्वपि न प्रशस्ता॥ ५८॥
- हिंदी व्याख्या: "हे लक्ष्मण! मैं तुम्हारे अनन्य भक्ति-भाव और पराक्रम को नित्य जानता हूँ; किंतु मेरे गूढ़ अभिप्राय को न समझकर तुम माता के साथ मिलकर मुझे और अधिक दुख पहुँचा रहे हो। इस जीवलोक में धर्म, अर्थ और काम—इन तीनों का फल धर्म के उदय होने पर ही प्राप्त होता है, जैसे एक अनुकूल, पुत्रवती और आज्ञाकारिणी भार्या धर्म, अर्थ और काम तीनों का साधन होती है। किंतु जहाँ तीनों (धर्म, अर्थ, काम) एक साथ प्राप्त न हों, वहाँ केवल उसी कार्य का आरंभ करना चाहिए जिससे केवल 'धर्म' की सिद्धि हो; क्योंकि केवल धन का लोभी मनुष्य लोक में द्वेष का पात्र बनता है और केवल कामासक्त होना भी प्रशंसनीय नहीं है।"
- English Translation: "O Lakshmana, I ever know your devotion and prowess; yet without perceiving my true intent, alongside mother you are afflicting me with immense grief. In this living world, Dharma (righteousness), Artha (wealth), and Kama (pleasure) are all realized through the fruition of Dharma alone, just as a devoted, beloved wife with a son yields all three. But where all three cannot coexist together, one should undertake that action from which pure Dharma arises; for one intent solely on wealth becomes hateful in the world, and being driven solely by lust is likewise never praised."
श्लोक ५९-६१
गुरुश्च राजा च पिता च वृद्धः क्रोधात् प्रहर्षादथवापि कामात्। यद् व्यादिशेत् कार्यमवेक्ष्य धर्मं कस्तं न कुर्यादनृशंसवृत्तिः॥ ५९॥ न तेन शक्नोमि पितुः प्रतिज्ञा- मिमां न कर्तुं सकलां यथावत्। स ह्यावयोस्तात गुरुर्नियोगे देव्याश्च भर्ता स गतिश्च धर्मः॥ ६०॥ तस्मिन् पुनर्जीवति धर्मराजे विशेषतः स्वे पथि वर्तमाने। देवी मया सार्धमितोऽभिगच्छेत् कथंस्विदन्या विधवेव नारी॥ ६१॥
- हिंदी व्याख्या: "जो गुरु हैं, राजा हैं, पिता हैं और वृद्ध हैं, वे क्रोध से, प्रसन्नता से अथवा कामवश भी धर्म को ध्यान में रखकर जिस कार्य की आज्ञा दें, भला कौन सा अनृशंस (निर्दयी न होने वाला/सज्जन) मनुष्य उसे पूरा नहीं करेगा? इसलिए मैं अपने पिता की इस संपूर्ण प्रतिज्ञा को यथावत पूरा न करूँ, ऐसा नहीं हो सकता। हे तात! हम दोनों को आज्ञा देने में वे गुरु हैं, माता कौसल्या के भर्ता हैं, और वे ही हमारी परम गति तथा धर्म हैं। और फिर जब वे धर्मराज पिता जीवित हैं और अपने (सत्य के) मार्ग पर चल रहे हैं, तब मेरी माता कौसल्या किसी अन्य विधवा नारी की भाँति मेरे साथ यहाँ से कैसे जा सकती हैं?"
- English Translation: "When one who is a guru, a king, a father, and an elder commands an action—whether out of anger, delight, or desire—considering it to be duty, what non-cruel person would fail to perform it? Hence I cannot fail to carry out this promise of my father in its entirety as pledged. O Brother, he is our master in commanding us, he is the husband of Queen Kausalya, and he is our ultimate refuge and duty. Furthermore, while that righteous king is alive and walking his own path of truth, how could my mother depart from here with me like an unprotected widow?"
श्लोक ६२-६४
सा मानुमन्यस्व वनं व्रजन्तं कुरुष्व नः स्वस्त्ययनानि देवि। यथा समाप्ते पुनराव्रजेयं यथा हि सत्येन पुनर्ययातिः॥ ६२॥ यशो ह्यहं केवलराज्यकारणा- न्न पृष्ठतः कर्तुमलं महोदयम्। अदीर्घकालेन तु देवि जीविते वृणेऽवरामद्य महीमधीराम्॥ ६३॥ (तथा अधर्मतः) प्रसादयन्नरवृषभः स मातरं पराक्रमाज्जिगमिषुरेव दण्डकान्। अथानुजं भृशमनुशास्य दर्शनं चकार तां हृदि जननीं प्रदक्षिणम्॥ ६४॥
- हिंदी व्याख्या: "इसलिए हे देवि! वन जाते हुए मुझे अनुमति दीजिए और हमारे लिए मंगल-पाठ (स्वस्त्ययन) कीजिए, ताकि चौदह वर्ष समाप्त होने पर मैं पुनः लौट सकूँ, जैसे राजा ययाति अपने सत्य के कारण पुनः स्वर्ग लौट गए थे। केवल राज्य पाने के कारण मैं अपने महान यश और महोदय (धर्म) को पीछे नहीं छोड़ सकता। हे देवि! इस अल्पकालिक जीवन में अधर्मपूर्वक इस क्षणभंगुर पृथ्वी के राज्य को मैं स्वीकार नहीं कर सकता।" इस प्रकार पुरुषों में वृषभ के समान श्रेष्ठ श्रीराम अपनी माता को प्रसन्न करते हुए अपने पराक्रम से दण्डकारण्य जाने हेतु कटिबद्ध रहे। फिर अपने छोटे भाई लक्ष्मण को भली-भांति समझाकर-सिखाकर, उन्होंने माता कौसल्या को हृदय से प्रणाम करते हुए उनकी प्रदक्षिणा की।
- English Translation: "Therefore, O Queen, permit me as I depart for the forest, and perform auspicious blessings for us, so that upon completing the tenure I may return once more, just as Yayati returned to heaven through his truthfulness. For the sake of mere kingdom, I cannot cast behind my great fame and spiritual exaltation. O Queen, in this fleeting lifetime, I shall never choose this lower earth through unrighteousness." Thus pleasing His mother, that bull among men, resolved in His valor to depart for Dandaka, firmly instructed His younger brother Lakshmana, and keeping His mother in His heart, circumambulated her with reverence.
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे एकविंशः सर्गः ॥२-२१॥ (इस प्रकार महर्षि वाल्मीकि रचित आदिकाव्य श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के अयोध्याकाण्ड का इक्कीसवाँ सर्ग पूर्ण हुआ।)
