श्रीरामायण पाठ — अयोध्याकाण्डे विंशः सर्गः ॥२-२०॥
श्रीमद्वाल्मीकियरामायणे अयोध्याकाण्डे विंशः सर्गः ॥२-२०॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के अयोध्याकाण्ड के विंश (२०वें) सर्ग (२-२०) के सभी ५५ श्लोकों का क्रमवार हिंदी एवं अंग्रेजी अनुवाद व व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:
श्लोक १-३
तस्मिंस्तु पुरुषव्याघ्रे निष्क्रामति कृताञ्जलौ। आर्तशब्दो महान् जज्ञे स्त्रीणामन्तःपुरे तदा॥ १॥ कृत्येष्वचोदितः पित्रा सर्वस्यान्तःपुरस्य च। गतिश्च शरणं चासीत् स रामोऽद्य प्रवत्स्यति॥ २॥ कौसल्यायां यथा युक्तो जनन्यां वर्तते सदा। तथैव वर्ततेऽस्मासु जन्मप्रभृति राघवः॥ ३॥
- हिंदी व्याख्या: पुरुषों में व्याघ्र के समान श्रेष्ठ उन श्रीराम के हाथ जोड़े हुए अंतःपुर से बाहर निकलते ही वहाँ की स्त्रियों में एक महान आर्तनाद (रुदन और विलाप का शब्द) गूँज उठा। वे स्त्रियाँ कहने लगीं—"जिन्हें पिता द्वारा बिना कहे ही अंतःपुर के समस्त कार्यों का पूरा ध्यान रहता था और जो हम सबकी एकमात्र गति तथा शरण थे, वे राम आज वन को प्रस्थान कर रहे हैं। जिस प्रकार राघव अपनी जननी कौसल्या के प्रति सदा आदरयुक्त व्यवहार करते हैं, वैसे ही जन्म से लेकर आज तक हम सब के प्रति उनका समान रूप से स्नेहमय व्यवहार रहा है।"
- English Translation: As that tiger among men departed with joined palms, a mighty cry of distress arose among the women within the inner apartments. They lamented: "He who, unprompted by His father, attended to all the duties of the entire inner palace and was the sole refuge and protector for us all—that Rama is departing for exile today. Just as Raghava ever behaves toward His mother Kausalya, so has He behaved toward all of us ever since His birth."
श्लोक ४-६
न क्रुध्यत्यभिशप्तोऽपि क्रोधनीयानि वर्जयन्। क्रुद्धान् प्रसादयन् सर्वान् स इतोऽद्य प्रवत्स्यति॥ ४॥ अबुद्धिर्बत नो राजा जीवलोकं चरत्ययम्। यो गतिं सर्वभूतानां परित्यजति राघवम्॥ ५॥ इति सर्वा महिष्यस्ता विवत्सा इव धेनवः। पतिमाचुक्रुशुश्चापि सस्वनं चापि चुक्रुशुः॥ ६॥
- हिंदी व्याख्या: "जो क्रोध योग्य बातें होने पर भी कभी क्रोध नहीं करते, अभिशाप दिए जाने पर भी कभी कोप नहीं करते और सभी क्रुद्ध जनों को शांत करते हैं, वे राम आज यहाँ से वन को जा रहे हैं। सचमुच हमारे राजा बुद्धिहीन हैं जो इस जीवलोक में ऐसे विचर रहे हैं, क्योंकि वे समस्त प्राणियों की गति (आश्रय) राम का परित्याग कर रहे हैं।" इस प्रकारन वे सभी रानियाँ अपने बछड़े से बिछड़ी हुई गायों की तरह विलाप करने लगीं और शब्द करते हुए उच्च स्वर से राजा को कोसने तथा रोने लगीं।
- English Translation: "Even when provoked, He never gets angry, avoiding all causes of wrath, and pacifies everyone who is enraged—such a Rama is departing from here today. Alas, truly foolish is our king, who wanders this living world abandoning Raghava, who is the refuge of all beings." Thus all those queens, like cows bereft of their calves, wailed aloud, weeping and loudly reproaching the king.
श्लोक ७-९
स हि चान्तःपुरे घोरमार्तशब्दं महीपतिः। पुत्रशोकाभिसंतप्तः श्रुत्वा व्यालीयतासने॥ ७॥ रामस्तु भृशमायस्तो निःश्वसन्निव कुञ्जरः। जगाम सहितो भ्रात्रा मातुरन्तःपुरं पुरं गतः॥ ८॥ (तथा ৮) सोऽपश्यत् पुरुषं तत्र वृद्धं परमपूजितम्। उपविष्टं गृहद्वारि तिष्ठतश्चापरान् बहून्॥ ९॥
- हिंदी व्याख्या: पुत्रशोक से संतप्त हुए महाराज दशरथ अंतःपुर के उस भयानक आर्तशब्द को सुनकर अपने आसन पर ही सुध-बुध खोकर ढसक गए (मूर्च्छितप्राय हो गए)। उधर श्रीराम हाथी के समान लंबी-लंबी साँसें लेते हुए, भाई लक्ष्मण के साथ अपनी माता के अंतःपुर की ओर चल पड़े। वहाँ गृहद्वार पर उन्होंने एक वृद्ध, अत्यंत पूज्य पुरुष को बैठे हुए देखा और पास ही अन्य कई लोगों को खड़े देखा।
- English Translation: Hearing that dreadful cry of distress within the inner apartments, the monarch, scorched by grief for his son, sank down upon his seat. Meanwhile Rama, sighing heavily like an elephant, proceeded along with His brother toward His mother's inner apartment. There at the entrance of the mansion He beheld an aged and highly revered man seated, along with many others standing about.
श्लोक १०-१३
दृष्ट्वैव तु तदा रामं ते सर्वे समुपस्थिताः। जयेन जयतां श्रेष्ठं वर्धयन्ति स्म राघवम्॥ १०॥ प्रविश्य प्रथमां कक्ष्यां द्वितीयायां ददर्श सः। ब्राह्मणान् वेदसम्पन्नान् वृद्धान् राज्ञाभिसत्कृतान्॥ ११॥ प्रणम्य रामस्तान् वृद्धांस्तृतीयायां ददर्श सः। स्त्रियो बालाश्च वृद्धाश्च द्वाररक्षणतत्पराः॥ १२॥ वर्धयित्वा प्रहृष्टास्ताः प्रविश्य च गृहं स्त्रियः। न्यवेदयन्त त्वरितं राममातुः प्रियं तदा॥ १३॥
- हिंदी व्याख्या: श्रीराम को देखते ही वे सभी लोग तुरंत खड़े हो गए और विजेताओं में श्रेष्ठ उन राघव को जय-घोष के साथ आशीर्वाद देने लगे। पहली कक्ष्या को पार करके जब वे दूसरी कक्ष्या में पहुँचे, तो उन्होंने राजा द्वारा सम्मानित, वेद-सम्पन्न वृद्ध ब्राह्मणों को देखा। उन वृद्धों को प्रणाम करके जब वे तीसरी कक्ष्या में पहुँचे, तो उन्होंने द्वार की रक्षा में तत्पर स्त्रियों, बालकों और वृद्धों को देखा। वे स्त्रियाँ अत्यंत प्रसन्न होकर श्रीराम की जय-जयकार करने लगीं और घर के भीतर जाकर उन्होंने तुरंत राम की माता कौसल्या को इस प्रिय समाचार की सूचना दी।
- English Translation: Beholding Rama, they all immediately approached Him and joyfully offered victorious blessings to Raghava, the best among conquerors. Entering the first courtyard and passing to the second, He beheld aged Brahmins well-versed in the Vedas, highly honored by the king. Bowing to those elders, in the third courtyard He saw women, children, and elderly attendants engaged in guarding the gates. Delighted, those women cheered Him, and hastening inside the mansion, promptly announced the auspicious news to Rama's mother.
श्लोक १४-१९
कौसल्यापि तदा देवी रात्रिं स्थित्वा समाहिता। प्रभाते चाकरोत् पूजां विष्णोः पुत्रहितैषिषिणी॥ १४॥ सा क्षौमवसना हृष्टा नित्यं व्रतपरायणा। अग्निं जुहोति स्म तदा मन्त्रवत् कृतमङ्गला॥ १५॥ प्रविश्य तु तदा रामो मातुरन्तःपुरं शुभम्। ददर्श मातरं तत्र हावयन्तीं हुताशनम्॥ १६॥ देवकार्यनिमित्तं च तत्रापश्यत् समुद्यतम्। दध्यक्षतघृतं चैव मोदकान् हविषस्तथा॥ १७॥ लाजान् माल्यानि शुक्लानि पायसं कृसरं तथा। समिधः पूर्णकुम्भांश्च ददर्श रघुनन्दनः॥ १८॥ तां शुक्लक्षौमसंवीतां व्रतयोगेन कर्शिताम्। तर्पयन्तीं ददर्शाद्भिर्देवतां वरवर्णिनीम्॥ १९॥
- हिंदी व्याख्या: उधर महारानी कौसल्या ने भी रात भर समाहित (शांत और व्रतस्थ) रहकर प्रभातकाल में अपने पुत्र (राम) के हित की कामना से भगवान विष्णु की पूजा की थी। रेशमी वस्त्र धारण करने वाली, व्रत-परायणा और प्रसन्न चित्त वे देवी मन्त्रोच्चार के साथ पवित्र अग्नि में आहुति दे रही थीं। जब श्रीराम अपनी माता के उस शुभ अंतःपुर में प्रविष्ट हुए, तो उन्होंने देखा कि माता हुताशन (अग्नि) में आहुति दे रही हैं। रघुनंदन श्रीराम ने वहाँ देव-कार्य के लिए तैयार की गई सामग्रियाँ देखीं—दही, अक्षत, घी, मोदक, हविष्य, लावा (लाजा), सफेद मालाएँ, खीर (पायसं), कृसर (चावल-तिल की खिचड़ी), समिधाएँ और पूर्णकलश (भरे हुए घड़े)। सफेद रेशमी वस्त्र पहने, व्रत के उपवासों से कृश (पतली) हुई तथा जल से देवताओं को तृप्त करती हुई उन वरवर्णिनी माता को उन्होंने देखा।
- English Translation: Queen Kausalya too, having spent the night in concentrated devotion, performed morning worship to Lord Vishnu at dawn, desiring the welfare of her son. Clad in silk garments, joyful and ever devoted to sacred vows, she was offering oblations into the sacrificial fire with sacred chants. Entering His mother's auspicious inner apartment, Rama beheld her offering oblations to the sacred fire. Raghavanandana saw the items prepared for divine worship: curd, unbroken rice, ghee, sweetmeats, sacrificial butter, parched grain, white garlands, milk-rice, rice-sesame porridge, sacrificial fuel, and full pitchers. He beheld that noble lady clad in white silk, emaciated by rigorous vows, offering water libations to the deities.
श्लोक २०-२४
सा चिरस्यात्मजं दृष्ट्वा मातृनन्दनमागतम्। अभिचक्राम संहृष्टा किशोरं वडवा यथा॥ २०॥ स मातरमुपक्रान्तामुपसंगृह्य राघवः। परिष्वक्तश्च बाहुभ्यामवघ्रातश्च मूर्धनि॥ २१॥ तमुवाच दुराधर्षं राघवं सुतमात्मनः। कौसल्या पुत्रवात्सल्यादिदं प्रियहितं वचः॥ २२॥ वृद्धानां धर्मशीलानां राजर्षीणां महात्मनाम्। प्राप्नुह्यायुश्च कीर्तिं च धर्मं चाप्युचितं कुले॥ २३॥ सत्यप्रतिज्ञं पितरं राजानं पश्य राघव। अद्यैव त्वां स धर्मात्मा यौवराज्येऽभिषेक्ष्यति॥ २४॥
- हिंदी व्याख्या: चिरकाल के बाद माता को आनंद देने वाले अपने पुत्र को आया हुआ देखकर वे हर्ष से भरकर उसकी ओर ऐसे बढ़ीं जैसे घोड़ी अपने बछड़े की ओर दौड़ती है। राघव ने पास जाकर अपनी माता के चरणों का स्पर्श किया और उन्होंने दोनों बाहों से अपने पुत्र को गले लगाकर उसके मस्तक को सूँघा (चुम्बन किया)। पुत्र-वात्सल्य के कारण कौसल्या ने अपने दुराधर्ष (वीर) पुत्र राम से यह प्रिय और हितकारी वचन कहा—"वत्स! वृद्ध, धर्मशील और महात्मा राजर्षियों के समान आयु, कीर्ति और अपने कुल के अनुकूल धर्म को प्राप्त करो। हे राघव! सत्यप्रतिज्ञ पिता राजा दशरथ के पास जाओ, वे धर्मात्मा महाराज आज ही तुम्हारा युवराज के पद पर अभिषेक करेंगे।"
- English Translation: Beholding her son—the joy of his mother—arrive after a long while, she rushed toward him joyfully just like a mare toward her foal. Raghava approached his mother, embraced her feet, and she clasped him in her arms and kissed his head. Out of maternal affection, Kausalya spoke these loving and beneficial words to her invincible son Rama: "My child, attain long life, renown, and the righteousness appropriate to our lineage, like the aged, pious, and high-souled royal sages. Go to your father, the king true to his promise, O Raghava; that righteous monarch will consecrate you to the crown princedom this very day."
श्लोक २५-२९
दत्तमतमालभ्य भोजनेन निमन्त्रितः। मातरं राघवः किंचित् प्रसार्याञ्जलिमब्रवीत्॥ २५॥ स स्वभावविनीतश्च गौरवाच्च तथानतः। प्रस्थितो दण्डकारण्यमाप्रष्टुमुपचक्रमे॥ २६॥ देवि नूनं न जानीषे महद् भयमुपस्थितम्। इदं तव च दुःखाय वैदेह्या लक्ष्मणस्य च॥ २७॥ गिष्ये दण्डकारण्यं किमनेनासनेन मे। विष्टरासनयोग्यो हि कालोऽयं मामुपस्थितः॥ २८॥ चतुर्दश हि वर्षाणि वत्स्याम विजने वने। कन्दमूलफलैर्जीवन् हित्वा मुनिवदामिषम्॥ २९॥
- हिंदी व्याख्या: माता द्वारा आसन ग्रहण करने और भोजन करने का निमंत्रण दिए जाने पर, स्वभाव से ही विनम्र और माता के प्रति आदरभाव से झुके हुए राघव ने हाथ जोड़कर अपनी माता से यह कहना आरंभ किया—"हे देवि! शायद आपको यह ज्ञात नहीं है कि एक बहुत बड़ा संकट आ उपस्थित हुआ है, जो आपके लिए, वैदेही (सीता) के लिए और लक्ष्मण के लिए अत्यंत दुखदायी है। अब मुझे दण्डकारण्य जाना है, अतः इस आसन और राज्य से मेरा क्या प्रयोजन? अब तो मेरे लिए कुशा के आसन (विष्टर) पर बैठने का समय आ गया है। मैं कंद, मूल और फल खाते हुए, मुनियों की भाँति आमिष (मांस) का त्याग करके इस सूने वन में चौदह वर्ष तक निवास करूँगा।"
- English Translation: Invited by his mother to take a seat and partake of food, Rama, naturally humble and bowing out of reverence, joined his palms and began to address her: "O Queen, surely you do not know that a great peril has arisen, which will cause immense grief to you, to Vaidehi, and to Lakshmana. I am departing for the Dandaka forest; what use have I for this seat? The time has arrived for me to use a seat of kusa grass. I shall dwell for fourteen years in the desolate forest, subsisting on roots, tubers, and fruits, abandoning all meat like a sage."
श्लोक ३०-३४
भरताय महाराजो यौवराज्यं प्रयच्छति। मां पुनर्दण्डकारण्यं विवासयति तापसम्॥ ३०॥ स षट् चाष्टौ च वर्षाणि वत्स्यामि विजने वने। आसेवमानो वन्यानि फलमूलैश्च वर्तयन्॥ ३१॥ सा निकृत्तेव सालस्य यष्टिः परशुना वने। पपात सहसा देवी देवतेव दिवश्च्युता॥ ३२॥ तामदुःखोचितां दृष्ट्वा पतितां कदलीमिव। रामस्तूत्थापयामास मातरं गतचेतसम्॥ ३३॥ उपावृत्योत्थितां दीनां वडवामिव वाहिताम्। पांसुगुण्ठितसर्वाङ्गीं विममर्श च पाणिना॥ ३४॥
- हिंदी व्याख्या: "महाराज भरत को युवराज्य प्रदान कर रहे हैं और मुझे तापस (मुनि) के रूप में दण्डकारण्य भेज रहे हैं। इस प्रकार मैं छह और आठ (चौदह) वर्षों तक विजने वन में रहकर जंगली कंद-मूल-फलों का उपभोग करता हुआ निवास करूँगा।" यह सुनते ही कुल्हाड़ी से काटे गए साल वृक्ष की टहनी की तरह अथवा स्वर्ग से गिरी हुई किसी देवी की भाँति वे माता कौसल्या सहसा पृथ्वी पर गिर पड़ीं। कभी दुख न देखने वाली कदली के पेड़ की तरह गिरी हुई अपनी अचेत माता को श्रीराम ने तुरंत उठाया। वे दीन अवस्था में उठीं, उनके संपूर्ण अंगों पर धूल लिपट गई थी और वे थकी हुई घोड़ी के समान लग रही थीं; राम ने अपने हाथों से उनके अंगों की धूल साफ की।
- English Translation: "The Great King is bestowing the crown princedom upon Bharata, while exiling me as an ascetic to the Dandaka forest. Thus shall I dwell for six and eight (fourteen) years in the solitary forest, partaking solely of wild fruits and roots." Hearing this, like the branch of a sala tree severed by an axe, or like a goddess fallen from heaven, Queen Kausalya suddenly collapsed upon the earth. Seeing his mother—unaccustomed to sorrow—fallen like a plantain tree, Rama raised her from her unconscious state. As she arose in distress, her entire body covered with dust, resembling an exhausted mare, he gently wiped her limbs with his hand.
श्लोक ३५-३९
सा राघवमुपासीनमसुखार्ता सुखोचिता। उवाच पुरुषव्याघ्रमुपशृण्वति लक्ष्मणे॥ ३५॥ यदि पुत्र न जायेथा मम शोकाय राघव। न स्म दुःखमतो भूयः पश्येयमहमप्रजाः॥ ३६॥ एक एव हि वन्ध्यायाः शोको भवति मानसः। अप्रजास्मीति संतापो न ह्यन्यः पुत्र विद्यते॥ ३७॥ न दृष्टपूर्वं कल्याणं सुखं वा पतिपौरुषे। अपि पुत्रे विपश्येयमिति रामास्थितं मया॥ ३८॥ सा बहून्यमनोज्ञानि वाक्यानि हृदयच्छिदाम्। अहं श्रोष्ये सपत्नीनामवराणां परा सती॥ ३९॥
- हिंदी व्याख्या: सदा सुख भोगने की आदी और इस समय असुख (दुख) से पीड़ित उन माता कौसल्या ने पास ही बैठे पुरुषसिंह राम से—जिन्हें लक्ष्मण भी सुन रहे थे—कहा—"हे पुत्र राघव! यदि तुम मेरे शोक के लिए उत्पन्न ही न होते, तो संतानहीन होने पर भी मैं इससे बढ़कर कोई दूसरा दुख न देखती। वन्ध्या (संतानहीन) स्त्री को तो केवल यही मानसिक शोक होता है कि 'मैं संतानहीन हूँ', उसके सिवा उसे दूसरा कोई भौतिक संताप नहीं होता। मैंने पति के घर में कभी कोई कल्याण या सुख नहीं देखा था, राघव! मैंने यही सोचकर धैर्य रखा था कि 'शायद मैं अपने पुत्र के मुख से सुख देख सकूँगी'। अब मुझे छोटी सौतों के भी अनेक असह्य और हृदय को चीर देने वाले कटु वचन सुनने पड़ेंगे।"
- English Translation: Afflicted by misery, though accustomed to happiness, Kausalya spoke to the tiger among men, Rama, while Lakshmana listened: "O son Raghava, had you not been born to cause me such grief, even being childless I would never have witnessed sorrow greater than this. A barren woman suffers only one mental grief—the anguish of being childless; no other torment exists for her. I never beheld any welfare or happiness through my husband's valor, O Rama, consoling myself with the thought: 'Perhaps I shall witness happiness through my son.' Now I shall have to endure numerous unpleasant and heart-piercing words from junior co-wives."
श्लोक ४०-४४
अतो दुःखतरं किं नु प्रमदानां भविष्यति। मम शोको विलापश्च यादृशोऽयमनन्तकः॥ ४०॥ त्वयि संनिहितेऽप्येवमहमासं निराकृता। किं पुनः प्रोषिते तात ध्रुवं मरणमेव हि॥ ४१॥ अत्यन्तं निगृहीतास्मि भर्तुर्नित्यमसम्मता। परिवारेण कैकेय्याः समा वाप्यथवावरा॥ ४२॥ यो हि मां सेवते कश्चिदपि वाप्यनुवर्तते। कैकेय्याः पुत्रमन्वीक्ष्य स जनो नाभिभाषते॥ ४३॥ नित्यक्रोधतया तस्याः कथं नु खरवादि तत्। कैकेय्या वदनं द्रष्टुं पुत्र शक्ष्यामि दुर्गता॥ ४४॥
- हिंदी व्याख्या: "स्त्रियों के लिए इससे बढ़कर और क्या दुख होगा, जैसा कि मेरा यह अनंत शोक और विलाप है? तुम्हारे पास रहते हुए भी मैं सदा उपेक्षित और निराकृता रही हूँ, फिर हे तात! तुम्हारे वन चले जाने पर तो मेरा मर जाना ही निश्चित है। मैं पति द्वारा अत्यंत प्रताड़ित और हमेशा अस्वीकृत रही हूँ; कैकेयी के परिवार की दासी के समान, अथवा उससे भी हीन स्थिति में रही हूँ। जो कोई भी सेवक मेरी सेवा करता है या मेरा अनुगमन करता है, वह भी कैकेयी के पुत्र (भरत) का पक्ष देखकर मुझसे बात तक नहीं करता। उस कैकेयी का स्वभाव हमेशा क्रोधी और कठोर वचन बोलने वाला है; हे पुत्र! ऐसी दुर्दशा में मैं उस कैकेयी का मुख कैसे देख पाऊँगी?"
- English Translation: "What could be more miserable for women than this endless grief and lamentation of mine? Even while you were near, I remained disregarded; what then when you have departed, my child? Assuredly death alone awaits me. I have been utterly subjugated, ever unvalued by my husband, treated equal to or even lower than the maidservants of Kaikeyi's household. Whoever serves or attends upon me, upon seeing Kaikeyi's son, dares not even speak to me. Given her constant wrath and harsh speech, O son, how shall I, wretched as I am, endure to look upon the face of that Kaikeyi?"
श्लोक ४५-४९
दश सप्त च वर्षाणि जातस्य तव राघव। अतीतानि प्रकांक्षन्त्या मया दुःखपरिक्षयम्॥ ४५॥ तदक्षयं महद्दुःखं नोत्सहे सहितुं चिरात्। विप्रकारं सपत्नीनाएमवं जीर्णापि राघव॥ ४६॥ अपश्यन्ती तव मुखं परिपूर्णशशिप्रभम्। कृपणा वर्तयिष्यामि कथं कृपणजीविका॥ ४७॥ उपवासैश्च योगैश्च बहुभिश्च परिश्रमैः। दुःखसंवर्धितो मोघं त्वं हि दुर्गतया मया॥ ४८॥ स्थिरं नु हृदयं मन्ये ममेदं न दीर्यते। प्रावृषीव महानद्याः स्पृष्टं कूलं नवाम्भसा॥ ४९॥
- हिंदी व्याख्या: "हे राघव! तुम्हारे जन्म से लेकर अब तक सत्रह वर्ष बीत चुके हैं, और मैं यही प्रतीक्षा कर रही थी कि कब मेरे दुखों का अंत होगा। किंतु अब इस वृद्धावस्था में भी मैं सौतों के इस महान और कभी न क्षय होने वाले अपमान को और अधिक सहने में असमर्थ हूँ। पूर्ण चंद्रमा के समान कांतिमान तुम्हारा मुख देखे बिना मैं दीनतापूर्ण यह कृपण जीवन कैसे बिता पाऊँगी? मैंने उपवासों, योगों और अनेक प्रकार के परिश्रमों से दुखी रहते हुए भी तुम्हारा पालन-पोषण किया था, किंतु मेरा वह सब प्रयास व्यर्थ हो गया। मैं अपने इस हृदय को वज्र के समान कठोर मानती हूँ, जो वर्षा ऋतु में नई बाढ़ से घिरी महान नदी के तट की तरह अभी तक विदीर्ण (टूटकर बिखर) नहीं हुआ है!"
- English Translation: "Seventeen years have passed since your birth, O Raghava, while I eagerly awaited the termination of my sorrows. Yet even now in my old age, I have no strength left to endure this immense, unending humiliation inflicted by my co-wives. Not beholding your face, radiant like the full moon, how shall I, wretched as I am, sustain this miserable existence? Though reared by me amidst fasting, spiritual practices, and immense toil through my wretchedness, you are now lost to me in vain. Firm indeed I deem this heart of mine, for it does not shatter, just like a riverbank touched by fresh floodwaters in the rainy season!"
श्लोक ५०-५५
ममैव नूनं मरणं न विद्यते न चावकाशोऽस्ति यमक्षये मम। यदन्तकोऽद्यैव न जिहीर्षति प्रसह्य सिंहो रुदतीं मृगीमिव॥ ५०॥ स्थिरं हि नूनं हृदयं ममायसं न भिद्यते यद् भुवि नो विदीर्यते। अनेन दुःखेन च देहमर्पितं ध्रुवं ह्यकाले मरणं न विद्यते॥ ५१॥ इदं तु दुःखं यदनर्थकानि मे व्रतानि दानानि च संयमाश्च हि। तपश्च तप्तं यदपत्यकाम्यया सुनिष्फलं बीजमिवोप्तमूषरे॥ ५२॥ यदि ह्यकाले मरणं यदृच्छया लभेत कश्चिद् गुरुदुःखकर्शितः। गताहमद्यैव परेतसंसदं विना त्वया धेनुरिवात्मजेन वै॥ ५३॥ अथापि किं जीवितमद्य मे वृथा त्वया विना चन्द्रनिभाननप्रभ। अनुव्रजिष्यामि वनं त्वयैव गौः सुदुर्बला वत्समिवाभिकांक्षया॥ ५४॥ भृशमसुखममर्षिता तदा बहु विललाप समीक्ष्य राघवम्। व्यसनमुपनिशाम्य सा महत् सुतमिव बद्धमवेक्ष्य किंनरी॥ ५५॥
- हिंदी जैसे व्याख्या: "निश्चित ही मेरा भाग्य ऐसा है कि मेरी मृत्यु ही नहीं लिखी है और न ही यमराज के यहाँ मेरे लिए कोई स्थान है, तभी तो अंतक (मृत्यु) रोती हुई मृगी को सिंह जैसे जबरन खींच ले जाता है, वैसे आज मुझे खींचकर नहीं ले जा रहा है। मेरा यह हृदय लोहे के समान कठोर है जो इस पृथ्वी पर विदीर्ण नहीं हो रहा है। इस भारी दुख से मेरा शरीर भी जीर्ण हो चुका है, किंतु यह अकाले मरण (असमय मृत्यु) भी प्राप्त नहीं होता। सबसे बड़ा दुख तो यह है कि संतान की इच्छा से जो मैंने व्रत, दान, संयम और तपस्या किए थे, वे सब ऊसर भूमि में बोए गए बीज की तरह निष्फल हो गए। यदि घोर दुखों से पीड़ित मनुष्य को स्वेच्छा से असमय मृत्यु मिल सकती, तो मैं बछड़े से बिछड़ी हुई गाय की भाँति आज ही यमलोक चली जाती! हे चंद्रमा के समान मुख वाले पुत्र! तुम्हारे बिना अब मेरा यह जीवन व्यर्थ है, मैं भी बछड़े की आकांक्षा करती हुई दुबली गाय की तरह तुम्हारे साथ ही वन को जाऊँगी।" इस प्रकार असह्य दुख और रोष से पीड़ित तथा अपने पुत्र पर आए इस महान संकट को देखकर, बछड़े से बिछड़ी हुई किन्नरी की भाँति माता कौसल्या ने श्रीराम के सामने बहुत विलाप किया।
- English Translation: "Assuredly death is not meant for me, nor is there any space for me in the realm of Yama, since Antaka (Death) does not forcibly snatch me away today like a lion seizing a weeping doe. Firm indeed is this iron heart of mine, that it does not break or shatter upon the earth. Though my body is wracked with this grief, untimely death is simply not to be found. The greatest sorrow is that my vows, charities, restraints, and the penances I performed desiring offspring have all gone as fruitless as seeds sown in barren soil. If one weighed down by supreme grief could find death at will, I would have departed to the assembly of the departed this very day, just like a cow separated from her calf, O son! Yet what use is this life of mine today without you, whose face shines like the moon? Just as an emaciated cow follows her calf out of yearning, I too shall accompany you to the forest!" Thus deeply distressed and indignant, beholding Raghava and realizing the great calamity, she lamented extensively like a Kinnari whose young one had been bound.
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे विंशः सर्गः ॥२-२०॥ (इस प्रकार महर्षि वाल्मीकि रचित आदिकाव्य श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के अयोध्याकाण्ड का बीसवाँ सर्ग पूर्ण हुआ।)
