श्रीमद्वाल्मीकियरामायणे अयोध्याकाण्डे द्वात्रिंशः सर्गः ॥२-३२॥

श्रीरामायण पाठ — अयोध्याकाण्डे द्वात्रिंशः सर्गः ॥२-३२॥

 श्रीमद्वाल्मीकियरामायणे अयोध्याकाण्डे द्वात्रिंशः सर्गः ॥२-३२॥

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के अयोध्याकाण्ड के द्वात्रिंश (३२वें) सर्ग (२-३२) के सभी ४५ श्लोकों का क्रमवार हिंदी एवं अंग्रेजी अनुवाद तथा व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:

श्लोक १-५

ततः शासनमाज्ञाय भ्रातुः प्रियकरं हितम्। गत्वा स प्रविवेशाशु सुयज्ञस्य निवेशनम्॥ १॥ तं विप्रमग्न्यगारस्थं वन्दित्वा लक्ष्मणोऽब्रवीत्। सखेऽभ्यागच्छ पश्य त्वं वेश्म दुष्करकारिणः॥ २॥ ततः संध्यामुपास्थाय गत्वा सौमित्रिणा सह। ऋद्धं स प्राविशल्लक्ष्म्या रम्यं रामनिवेशनम्॥ ३॥ जातरूपमयैर्मुख्यैरङ्गदैः कुण्डलैः शुभैः। सहेमसूत्रैर्मणिभिः केयूरैर्वलयैरपि॥ ५॥ (श्लोक ४ पाठान्तर/अंतर्भूत)

  • हिंदी व्याख्या: अपने बड़े भाई श्रीराम की प्रिय और हितकारी आज्ञा को मानकर, लक्ष्मण तुरंत जाकर सुयज्ञ जी के भवन में प्रविष्ट हुए। अग्निशाला में बैठे हुए उन श्रेष्ठ ब्राह्मण (सुयज्ञ) को प्रणाम करके लक्ष्मण बोले—"हे सखे! चलिए, दुष्कर कर्म करने वाले श्रीराम के भवन को देखिए।" तत्पश्चात संध्या-वंदन संपन्न करके वे सुयज्ञ जी सौमित्रि के साथ चले और लक्ष्मी से समृद्ध श्रीराम के रमणीय भवन में प्रविष्ट हुए। तब काकुत्स्थ श्रीराम ने सुप्रसिद्ध स्वर्णमयी मुख्य अँगद (बाजूबंद), शुभ कुंडल, स्वर्णसूत्रों से जड़े मणियों के हार, केयूर, कंगन और अन्य बहुत से रत्नों से सुयज्ञ जी का अभ्यर्चन (पूजन) किया।
  • English Translation: Receiving the pleasing and beneficial command of his elder brother, Lakshmana departed and swiftly entered the residence of Suyajna. Saluting that Brahmin seated in his fire-sanctuary, Lakshmana said: "O friend, come along and behold the mansion of Him who accomplishes arduous deeds!" Thereupon, finishing his evening prayers, Suyajna proceeded along with Saumitri and entered the charming residence of Rama, resplendent with royal fortune. Kaakutstha Rama then honored Suyajna with principal gold armlets, auspicious earrings, jewel-adorned golden necklaces, keyuras, bracelets, and numerous other precious gems.

श्लोक ६-१०

अन्यैश्च रत्नैर्बहुभिः काकुत्स्थः प्रत्यपूजयत्। सुयज्ञं स तदोवाच रामः सीताप्रचोदितः॥ ६॥ हारं च हेमसूत्रं च भार्यायै सौम्य हारय। रशनां चाथ सा सीता दातुमिच्छति ते सखी॥ ७॥ अङ्गदानि च चित्राणि केयूराणि शुभानि च। प्रयच्छति सखी तुभ्यं भार्यायै गच्छती वनम्॥ ८॥ पर्यङ्कमग्र्यास्तरणं नानारत्नविभूषितम्। तमपीच्छति वैदेही प्रतिष्ठापयितुं त्वयि॥ ९॥ नागः शत्रुंजयो नाम मातुलोऽयं ददौ मम। तं ते निष्कसहस्रेण ददामि द्विजपुङ्गव॥ १०॥

  • हिंदी व्याख्या: सीता जी से प्रेरित होकर श्रीराम ने तब सुयज्ञ जी से कहा—"हे सौम्य! यह मुक्ताहार और स्वर्णसूत्र अपनी पत्नी के लिए ले जाइए। आपकी सखी यह सीता अपनी करधनी (रशना) भी आपकी पत्नी को देना चाहती है। वन को प्रस्थान कर रही आपकी यह सखी अनेक चित्र-विचित्र अंगद (बाजूबंद) तथा शुभ केयूर आपकी पत्नी हेतु भेंट कर रही है। इसके अतिरिक्त, उत्तम बिछौने से युक्त तथा विविध रत्नों से विभूषित इस पलंग को भी वैदेही आपके यहाँ स्थापित करवाना चाहती है। मेरे मामा ने मुझे 'शत्रुंजय' नाम का एक विशाल गजराज दिया था; हे द्विजश्रेष्ठ! एक हजार निष्क (स्वर्णमुद्राओं) सहित मैं वह विशाल हाथी आपको समर्पित करता हूँ।"
  • English Translation: Prompted by Sita, Rama then addressed Suyajna: "O gentle one, take this necklace and gold thread for your wife; your friend Sita wishes to bestow her jeweled girdle upon your wife. As she departs for the forest, your friend presents exquisite armlets and auspicious keyuras to your wife. Vaidehi also desires to bestow upon you this couch, draped with superior coverings and adorned with diverse gems. My maternal uncle presented me a great elephant named 'Shatrunjaya'; O foremost of Brahmins, I present that elephant to you along with a thousand gold coins (nishkas)."

श्लोक ११-१६

इत्युक्तः स तु रामेण सुयज्ञः प्रतिगृह्य तत्। रामलक्ष्मणसीतानां प्रयुयोजाशिषः शिवाः॥ ११॥ अथ भ्रातरमव्यग्रं प्रियं रामः प्रियंवदम्। सौमित्रिं तमुवाचेदं ब्रह्मेव त्रिदशेश्वरम्॥ १२॥ अगस्त्यं कौशिकं चैव तावुभौ ब्राह्मणोत्तमौ। अर्चयाहूय सौमित्रे रत्नैः सस्यमिवाम्बुभिः॥ १३॥ तर्पयस्व महाबाहो गोसहस्रेण राघव। सुवर्णरजतैश्चैव मणिभिश्च महाधनैः॥ १४॥ कौसल्यां च य आशीर्भिर्भक्तः पर्युपतिष्ठति। आचार्यस्तैत्तिरीयाणामभिरूपश्च वेदवित्॥ १५॥ तस्य यानं च दासीश्च सौमित्रे सम्प्रदापय। कौशेयानि च वस्त्राणि यावत् तुष्यति स द्विजः॥ १६॥

  • हिंदी व्याख्या: श्रीराम द्वारा ऐसा कहे जाने पर सुयज्ञ जी ने उन सब दानों को स्वीकार किया और राम, लक्ष्मण तथा सीता जी को परम कल्याणकारी आशीर्वाद प्रदान किए। तदनंतर, जैसे ब्रह्मा जी इंद्र से कहते हैं, वैसे ही श्रीराम ने अपने प्रिय, शांत और प्रियवादी भाई सौमित्रि से कहा—"हे सौमित्रे! तुम महर्षि अगस्त्य और विश्वामित्र (कौशिक)—इन दोनों ब्राह्मणश्रेष्ठों को बुलाकर रत्नों से उसी प्रकार तृप्त करो जैसे वर्षा का जल फसलों को तृप्त करता है। हे महाबाहो राघव! उन्हें एक-एक हजार गाएँ, सुवर्ण, चाँदी और बहुमूल्य मणियाँ भेंट कर संतुष्ट करो। तैत्तिरीय शाखा के जो आचार्य, सुंदर रूप वाले, वेदज्ञ और भक्त होकर अपनी आशीर्वचनों द्वारा कौसल्या जी की नित्य सेवा करते हैं, उन द्विजश्रेष्ठ को रथ-वाहन, दासियाँ तथा रेशमी वस्त्र प्रदान करवाओ, जब तक वे पूरी तरह संतुष्ट न हो जाएँ।"
  • English Translation: Thus addressed by Rama, Suyajna accepted all those gifts and bestowed auspicious, divine blessings upon Rama, Lakshmana, and Sita. Then Rama addressed His calm, beloved, and sweet-spoken brother Saumitri, just as Brahma addresses Indra: "O Saumitri, summon both eminent Brahmins—Agastya and Kaushika—and honor them with gems as water nourishes crops. O mighty-armed Raghava, satisfy them with a thousand cows, gold, silver, and precious jewels. To that scholar of the Taittiriya branch, handsomely learned in the Vedas, who devotedly ministers to Kausalya with blessings, bestow vehicles, maidservants, and silk garments until that Brahmin is fully satisfied."

श्लोक १७-२१

सूतश्चित्ररथश्चार्यः सचिवः सुचिरोषितः। तोषयैनं महार्हैश्च रत्नैर्वस्त्रैर्धनैस्तथा॥ १७॥ पशुकाभिश्च सर्वाभिर्गवां दशशतेन च। ये चेमे कठकालापा बहवो दण्डमाणवाः॥ १८॥ नित्यस्वाध्यायशीलत्वान्नान्यत् कुर्वन्ति किंचन। अलसाः स्वादुकामाश्च महतां चापि सम्मताः॥ १९॥ तेषामशीतियानानि रत्नपूर्णानि दापय। शालिवाहसहस्रं च द्वे शते भद्रकांस्तथा॥ २०॥ व्यञ्जनार्थं च सौमित्रे गोसहस्रमुपाकुरु। मेखलीनां महासङ्घः कौसल्यां समुपस्थितः। तेषां सहस्रं सौमित्रे प्रत्येकं सम्प्रदापय॥ २१॥

  • हिंदी व्याख्या: "हमारे आर्य सचिव और सूत चित्ररथ, जो बहुत समय से हमारे साथ रहे हैं, उन्हें बहुमूल्य रत्नों, वस्त्रों, धन, विविध पशुओं तथा एक हजार गायों से संतुष्ट करो। और ये जो कठ तथा कालाप शाखा के अनेक ब्रह्मचारी (दण्डमाणव) हैं, जो नित्य स्वाध्याय में ही संलग्न रहते हैं और दूसरा कोई काम नहीं करते—जो अन्य लौकिक कार्यों में आलसी, केवल स्वादिष्ट भोजन चाहने वाले किंतु महापुरुषों द्वारा सम्मानित हैं—उन्हें रत्नों से भरी अस्सी गाड़ियाँ (यान), एक हजार धान (शालि) से लदे हुए बैल तथा दो सौ उत्तम सांड प्रदान करवाओ। इसके अलावा, हे सौमित्रे! उनके भोजन (व्यंजन) हेतु दूध-दही के लिए एक हजार गाएँ समर्पित करो। माता कौसल्या की सेवा में स्थित ब्रह्मचारियों (मेखलियों) के बहुत बड़े संघ को प्रति व्यक्ति एक-एक हजार निष्क/मुद्राएँ प्रदान करो।"
  • English Translation: "To our noble minister and charioteer Chitraratha, who has long served us, satisfy him with precious gems, garments, wealth, diverse cattle, and a thousand cows. As for these many young celibate students (dandamanavas) of the Katha and Kalapa schools, who are solely devoted to daily Vedic recitation and perform no other labor—who are indifferent to worldly chores, fond of good food, yet respected by the great—grant them eighty carts filled with jewels, a thousand bullocks laden with rice, and two hundred prime bulls. O Saumitri, assign a thousand cows for their daily dairy nourishment. To the large assembly of celibate ascetics serving mother Kausalya, grant a thousand pieces of wealth to each individually."

श्लोक २२-२६

अम्बा यथा नो नन्देच्च कौसल्या मम दक्षिणाम्। तथा द्विजातींस्तान् सर्वाल्ँलक्ष्मणार्चय सर्वशः॥ २२॥ ततः पुरुषशार्दूलस्तद् धनं लक्ष्मणः स्वयम्। यथोक्तं ब्राह्मणेन्द्राणामददाद् धनदो यथा॥ २३॥ अथाब्रवीद् बाष्पगलांस्तिष्ठतश्चोपजीविनः। स प्रदाय बहुद्रव्यमेकैकस्योपजीवनम्॥ २४॥ लक्ष्मणस्य च यद् वेश्म गृहं च यदिदं मम। अशून्यं कार्यमेकैकं यावदागमनं मम॥ २५॥ इत्युक्त्वा दुःखितं सर्वं जनं तमुपजीविनम्। उवाचेदं धनाध्यक्षं धनमानीयतां मम॥ २६॥

  • हिंदी व्याख्या: "हे लक्ष्मण! तुम उन सभी ब्राह्मणों का सब प्रकार से ऐसा सत्कार करो, जिससे मेरी इस दान-दक्षिणा से हमारी माता कौसल्या प्रसन्न हों।" इसके बाद पुरुषसिंह लक्ष्मण ने कुबेर (धनद) की भाँति स्वयं वह सारा धन श्रीराम की आज्ञानुसार श्रेष्ठ ब्राह्मणों में बाँट दिया। तत्पश्चात, रोते हुए अपने अश्रुपूर्ण कंठ वाले आश्रितों और सेवकों को श्रीराम ने भरपूर द्रव्य और जीविका प्रदान करके कहा—"मेरे लौटने तक लक्ष्मण का भवन और मेरा यह गृह—दोनों ही तुम सेवकों द्वारा शून्य न रखे जाएँ (अर्थात तुम सब यहाँ सुखपूर्वक रहो)।" अपने उस दुखी आश्रित जनसमुदाय से ऐसा कहकर श्रीराम ने कोषाध्यक्ष (धनाध्यक्ष) से कहा—"मेरा सारा कोष-धन यहाँ ले आओ।"
  • English Translation: "O Lakshmana, honor all those Brahmins in every way so that our mother Kausalya may rejoice in my bestowal of gifts." Thereupon Lakshmana, that tiger among men, personally distributed all that wealth among the foremost Brahmins as instructed, like Kubera himself. Then, granting ample wealth and livelihood to each of His weeping, tearful-throated dependents and servants, Rama said: "Until my return, let both Lakshmana's dwelling and this mansion of mine not remain empty; dwell here comfortably." Having spoken thus to His sorrowful dependents, He instructed His treasurer: "Bring forth my entire treasure here!"

श्लोक २७-३२

ततोऽस्य धनमाजह्रुः सर्व एवोपजीविनः। स राशिः सुमहांस्तत्र दर्शनीयो ह्यदृश्यत॥ २७॥ ततः स पुरुषव्याघ्रस्तद् धनं सहलक्ष्मणः। द्विजेभ्यो बालवृद्धेभ्यः कृपणेभ्यो ह्यदापयत्॥ २८॥ तत्रासीत् पिङ्गलो गार्ग्यस्त्रिजटो नाम वै द्विजः। क्षतवृत्तिर्वने नित्यं फालकुद्दाललाङ्गली॥ २९॥ तं वृद्धं तरुणी भार्या बालानादाय दारकान्। अब्रवीद् ब्राह्मणं वाक्यं स्त्रीणां भर्ता हि देवता॥ ३०॥ अपास्य फालं कुद्दालं कुरुष्व वचनं मम। रामं दर्शय धर्मज्ञं यदि किंचिदवाप्स्यसि॥ ३१॥ स भार्याया वचः श्रुत्वा शाटीमाच्छाद्य दुश्छदाम्। स प्रातिष्ठत पन्थानं यत्र रामनिवेशनम्॥ ३२॥

  • हिंदी व्याख्या: तब उनके सभी सेवकों ने उनका सारा धन लाकर एकत्र कर दिया। वहाँ धन का वह विशाल और दर्शनीय ढेर लग गया। तत्पश्चात पुरुषव्याघ्र श्रीराम ने लक्ष्मण के साथ मिलकर वह सारा धन ब्राह्मणों, बालकों, वृद्धों तथा दीन-दुखियों में बँटवा दिया। वहीं गार्ग्य गोत्र के पिङ्गल वर्ण वाले 'त्रिजट' नाम के एक वृद्ध ब्राह्मण रहते थे, जो कुल्हाड़ी, फावड़ा और हल लेकर नित्य वन में परिश्रम करके जीविका चलाते थे। उस वृद्ध ब्राह्मण से उनकी युवा पत्नी ने अपने छोटे-छोटे बालकों को साथ लेकर कहा—"स्त्रियों के लिए तो पति ही देवता होते हैं। आप इस फाल और कुद्दाल को छोड़कर मेरी बात मानिए; धर्मात्मा श्रीराम के पास जाकर दर्शन कीजिए, शायद आपको कुछ धन प्राप्त हो जाए।" अपनी पत्नी के वचन सुनकर, अपने फटे-पुराने वस्त्र (शाटी) से शरीर को ढककर वे उस मार्ग पर चल पड़े जहाँ श्रीराम का भवन था।
  • English Translation: Thereupon all His attendants brought forth His wealth. A colossal and wondrous heap of treasure was displayed there. Then that tiger among men, along with Lakshmana, had that wealth distributed among Brahmins, children, the elderly, and the needy. Now there lived a Brahmin named Trijata of the Gargya lineage, reddish-brown in complexion, who earned a hard living daily in the forest using a plow, spade, and axe. His young wife, bringing along her small children, addressed that aged Brahmin: "A husband is indeed a deity to women! Cast aside this plowshare and spade and heed my words: present yourself to the righteous Rama, and perhaps you may obtain something." Hearing his wife's words, covering his body with a tattered garment, he set out along the path leading to Rama's residence.

श्लोक ३३-३८

भृग्वङ्गिरःसमं दीप्त्या त्रिजटं जनसंसदि। आपञ्चमायाः कक्ष्याया नैतं कश्चिदवारयत्॥ ३३॥ स राममासाद्य तदा त्रिजटो वाक्यमब्रवीत्। निर्धनो बहुपुत्रोऽस्मि राजपुत्र महाबल॥ ३४॥ क्षतवृत्तिर्वने नित्यं प्रत्यवेक्षस्व मामिति। तमुवाच ततो रामः परिहाससमन्वितम्॥ ३५॥ गवां सहस्रमप्येकं न च विश्राणितं मया। परिक्षिपसि दण्डेन यावत्तावदवाप्स्यसे॥ ३६॥ स शाटीं परितः कट्यां सम्भ्रान्तः परिवेष्ट्य ताम्। आविध्य दण्डं चिक्षेप सर्वप्राणेन वेगतः॥ ३७॥ स तीर्त्वा सरयूपारं दण्डस्तस्य कराच्च्युतः। गोव्रजे बहुसाहस्रे पपातोक्षणसंनिधौ॥ ३८॥

  • हिंदी व्याख्या: भृगु और अंगिरा के समान दीप्तिमान त्रिजट मुनि जब राजसभा/जनसभा में पहुँचे, तो पाँचवीं कक्ष्या (ड्योढ़ी) तक किसी ने भी उन्हें नहीं रोका। श्रीराम के पास पहुँचकर त्रिजट बोले—"हे महाबली राजपुत्र! मैं निर्धन हूँ, मेरे बहुत से पुत्र हैं और मैं वन में परिश्रम करके जीविका चलाता हूँ; मुझ पर अपनी कृपा-दृष्टि कीजिए।" तब श्रीराम ने उनसे परिहास (विनोद) करते हुए कहा—"मैंने अभी एक हजार गाएँ किसी को नहीं दी हैं; आप अपनी लाठी (दण्ड) को जितनी दूर फेंक सकेंगे, वहाँ तक की गाएँ आपको मिल जाएँगी।" यह सुनते ही त्रिजट ने शीघ्रता से अपनी धोती को कमर में कसकर बाँधा और अपनी लाठी को घुमाकर पूरी शक्ति और वेग से फेंका। उनके हाथ से छूटी हुई वह लाठी सरयू नदी के उस पार जाकर, हज़ारों गायों के झुंड में एक श्रेष्ठ बैल (उक्षन) के पास जा गिरी।
  • English Translation: Resplendent like Bhrigu or Angiras, as Trijata traversed the royal assembly up to the fifth courtyard, no one barred his way. Approaching Rama, Trijata said: "O mighty prince, I am destitute with many children, sustaining myself with daily forest toil; do look upon me with favor!" Thereupon Rama spoke to him in jest: "I have not yet distributed a certain herd of a thousand cows; as far as you can hurl your staff, so many cows shall you receive!" Hearing this, Trijata hastily tucked his garment securely around his waist, whirled his staff, and cast it with all his strength and velocity. Released from his hand, the staff crossed to the opposite bank of the Sarayu River and landed right beside a prime bull amidst a herd of many thousand cows.

श्लोक ३९-४२

तं परिष्वज्य धर्मात्मा आ तस्मात् सरयूतटात्। आनयामास ता गावस्त्रिजटस्याश्रमं प्रति॥ ३९॥ उवाच च तदा रामस्तं गार्ग्यमभिसान्त्वयन्। मन्युर्न खलु कर्तव्यः परिहासो ह्ययं मम॥ ४०॥ इदं हि तेजस्तव यद् दुरत्ययं तदेव जिज्ञासितुमिच्छता मया। इमं भवानर्थमभिप्रचोदितो वृणीष्व किंचेदपरं व्यवस्यसि॥ ४१॥ ब्रवीमि सत्येन न ते स्म यन्त्रणां धनं हि यद्यन्मम विप्रकारणात्। भवत्सु सम्यक्प्रतिपादनेन मयार्जितं चैव यशस्करं भवेत्॥ ४२॥

  • हिंदी व्याख्या: धर्मात्मा श्रीराम ने उन महर्षि को गले लगाया और सरयू तट के उस पार तक की उन समस्त गायों को त्रिजट के आश्रम भिजवा दिया। फिर श्रीराम ने गार्ग्य मुनि को सांत्वना देते हुए कहा—"हे भगवन्! आप तनिक भी बुरा न मानें (क्रोध न करें), यह तो केवल मेरा परिहास था। आपका जो यह अलंघनीय (अद्भूत) तेज है, उसी को जानने की इच्छा से मैंने आपको ऐसा करने के लिए प्रेरित किया था। इसके अतिरिक्त यदि आपकी और भी कोई इच्छा हो, तो निसंकोच माँग लीजिए। मैं सत्य कहता हूँ, आपके लिए कोई संकोच नहीं है; क्योंकि मेरे पास जो कुछ भी धन है, वह सब आप जैसे ब्राह्मणों के लिए ही है। आप जैसे श्रेष्ठ पात्रों में दिया गया मेरा यह अर्जन ही मेरे यश को बढ़ाने वाला होगा।"
  • English Translation: The righteous Rama embraced that sage and had all those cows up to that bank of the Sarayu brought to Trijata's hermitage. Comforting the Gargya sage, Rama said: "O revered one, do not harbor any anger; this was merely in jest on my part. Desiring only to witness your formidable inner power, I impelled you to this act. Choose whatever else you desire! I speak in truth, feel no hesitation; for whatever wealth I possess exists for the sake of Brahmins like you. Bestowing my gains properly upon worthy souls like you brings true glory to me."

श्लोक ४३-४५

ततः सभार्यस्त्रिजटो महामुनि- र्गवामनीकं प्रतिगृह्य मोदितः। यशोबलप्रीतिसुखोपबृंहिणी- स्तदाशिषः प्रत्यवदन्महात्मनः॥ ४३॥ स चापि रामः प्रतिपूर्णपौरुषः महाधनं धर्मबलैरुपार्जितम्। नियोजयामास सुहृज्जने चिराद् यथार्हसम्मानवचः प्रचोदितः॥ ४४॥ द्विजः सुहृद् भृत्यजनोऽथवा तदा दरिद्रभिक्षाचरणश्च यो भवेत्। न तत्र कश्चिन्न बभूव तर्पितो यथार्हसम्माननदानसम्भ्रमैः॥ ४५॥

  • हिंदी व्याख्या: तब अपनी पत्नी के साथ महामुनि त्रिजट गायों के उस विशाल समूह को पाकर अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने महात्मा श्रीराम को यश, बल, प्रीति और सुख को बढ़ाने वाले महान आशीर्वाद दिए। अपने पौरुष से परिपूर्ण श्रीराम ने धर्मबल से अर्जित उस विशाल धन को यथायोग्य सम्मानपूर्ण वचनों के साथ अपने मित्रों, आश्रितों और याचकों में वितरित कर दिया। उस समय वहाँ उपस्थित कोई भी ब्राह्मण, मित्र, भृत्य (सेवक) अथवा दरिद्र भिक्षुक ऐसा नहीं था, जो उचित सम्मान, आदर और प्रचुर दान द्वारा पूरी तरह संतुष्ट न हुआ हो।
  • English Translation: Thereupon the great sage Trijata, along with his wife, joyfully accepted that vast herd of cattle and bestowed upon the high-souled Rama abundant blessings enhancing His fame, strength, affection, and happiness. Rama, endowed with complete prowess, distributed His vast wealth earned through righteous means among His friends and dependents with fitting words of honor. At that time, no Brahmin, friend, servant, or destitute beggar present there remained unsatisfied, all being fully gratified through appropriate honor, respect, and generous gifts.

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे द्वात्रिंशः सर्गः ॥२-३२॥ (इस प्रकार महर्षि वाल्मीकि रचित आदिकाव्य श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के अयोध्याकाण्ड का बत्तीसवाँ सर्ग पूर्ण हुआ।)

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे द्वात्रिंशः सर्गः ॥२-३२॥