श्रीमद्वाल्मीकियरामायणे अयोध्याकाण्डे त्रयस्त्रिंशः सर्गः ॥२-३३॥

श्रीरामायण पाठ — अयोध्याकाण्डे त्रयस्त्रिंशः सर्गः ॥२-३३॥

 श्रीमद्वाल्मीकियरामायणे अयोध्याकाण्डे त्रयस्त्रिंशः सर्गः ॥२-३३॥

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के अयोध्याकाण्ड के त्रयस्त्रिंश (३३वें) सर्ग (२-३३) के सभी ३१ श्लोकों का क्रमवार हिंदी एवं अंग्रेजी अनुवाद तथा व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:

श्लोक १-४

दत्त्वा तु सह वैदेह्या ब्राह्मणेभ्यो धनं बहु। जग्मतुः पितरं द्रष्टुं सीतया सह राघवौ॥ १॥ ततो गृहीते प्रेष्याभ्यामशोभेतां तदायुधे। मालादामभिरासक्ते सीतया समलंकृते॥ २॥ ततः प्रासादहर्म्याणि विमानशिखराणि च। अभिरुह्य जनः श्रीमानुदासीनो व्यलोकयत॥ ३॥ न हि रथ्याः सुशक्यन्ते गन्तुं बहुजनाकुलाः। आरुह्य तस्मात् प्रासादाद् दीनाः पश्यन्ति राघवम्॥ ४॥

  • हिंदी व्याख्या: वैदेही (सीता जी) के साथ ब्राह्मणों को प्रचुर धन दान करने के पश्चात, दोनों राघव (राम और लक्ष्मण) सीता जी के साथ अपने पिता (दशरथ जी) के दर्शन के लिए चल पड़े। उस समय सेवकों द्वारा पकड़े गए और सीता जी द्वारा पुष्पमालाओं से सुसज्जित किए गए वे दोनों दिव्य अस्त्र-शस्त्र शोभायमान हो रहे थे। तदनंतर, नगर के श्रीमान् लोग प्रासादों, महलों और विमान जैसी ऊँची शिखरों पर चढ़कर उदासीन (दुखी मन से) होकर यह दृश्य देखने लगे। अत्यधिक जनसमूह से आकुल होने के कारण राजमार्गों पर चलना संभव नहीं हो रहा था, इसलिए दीन हुए वे नागरिक प्रासादों पर चढ़कर ही राघव को देख रहे थे।
  • English Translation: Having bestowed abundant wealth upon Brahmins along with Vaidehi, the two scions of Raghu (Rama and Lakshmana), accompanied by Sita, set forth to see their father. Thereupon, bearing their weapons held by attendants and adorned by Sita with strings of fragrant flower garlands, the two brothers shone brilliantly. Then the citizens, mounting palaces, mansions, and temple spires, looked on with heavy, sorrowful hearts. Since the crowded highways were impassable due to the vast throngs of people, the distressed citizens climbed atop the palaces to gaze upon Raghava.

श्लोक ५-८

पदातिं सानुजं दृष्ट्वा ससीतं च जनास्तदा। ऊचुर्बहुजना वाचः शोकोपहतचेतसः॥ ५॥ यं यान्तमनुयाति स्म चतुरङ्गबलं महत्। तमेकं सीतया सार्धमनुयाति स्म लक्ष्मणः॥ ६॥ ऐश्वर्यस्य रसज्ञः सन् कामानां चाकरो महान्। नेच्छत्येवानृतं कर्तुं वचनं धर्मगौरवात्॥ ७॥ या न शक्या पुरा द्रष्टुं भूतैराकाशगैरपि। तामद्य सीतां पश्यन्ति राजमार्गगता जनाः॥ ८॥

  • हिंदी व्याख्या: भाई (लक्ष्मण) और सीता जी के साथ पैदल ही जाते हुए राम को देखकर, शोक से आहत चित्त वाले वे नागरिक अनेक प्रकार की बातें कहने लगे—"जिनके आगे-आगे जाने पर चतुरङ्गिणी विशाल सेना उनका अनुसरण करती थी, आज उन्हीं अकेले राम के साथ केवल सीता और लक्ष्मण चल रहे हैं। जो ऐश्वर्य के मर्म को जानने वाले और महान भोगों के आड़े (अधिकार) थे, वे ही राम धर्म के गौरव के कारण अपने पिता के वचन को असत्य नहीं होने देना चाहते। आकाश में विचरने वाले भूत (आकाशचारी जीव) भी जिन्हें पहले कभी देख नहीं सके थे, आज राजमार्ग पर चल रही उन्हीं सीता को नगर के साधारण जन खुलेआम देख रहे हैं।"
  • English Translation: Beholding Rama traveling on foot accompanied by His younger brother and Sita, the citizens, their minds stricken with grief, uttered diverse lamentations: "He behind whose moving chariot a mighty four-fold army used to march—today that very Rama is followed only by Sita and Lakshmana. Though knowing the essence of royal fortune and being the supreme master of all enjoyments, out of reverence for righteousness, He refuses to render His father's word a falsehood. She who of yore could not be beheld even by celestial beings traversing the skies—today the people walking the royal highway are gazing upon that very Sita!"

श्लोक ९-१२

अङ्गरागोचितां सीतां रक्तचन्दनसेविनीम्। वर्षमुष्णं च शीतं च नेष्यत्याशु विवर्णताम्॥ ९॥ अद्य नूनं दशरथः सत्त्वमाविश्य भाषते। नहि राजा प्रियं पुत्रं विवासयितुमर्हति॥ १०॥ निर्गुणस्यापि पुत्रस्य कथं स्याद् विनिवासनम्। किं पुनर्यस्य लोकोऽयं जितो वृत्तेन केवलम्॥ ११॥ आनृशंस्यमनुक्रोशः श्रुतं शीलं दमः शमः। राघवं शोभयन्त्येते षड्गुणाः पुरुषर्षभम्॥ १२॥

  • हिंदी व्याख्या: "जो सीता उत्तम अंगों के उबटन (अङ्गराग) और लाल चंदन की सेवा की योग्य थीं, अब वर्षा, धूप और ठंड उन्हें शीघ्र ही विवर्ण (अथवा उनके कोमल अंगों को कष्ट) कर देगी। आज निश्चित रूप से दशरथ जी आवेश या किसी विवशता (सत्त्व) के वश में होकर बोल रहे हैं, अन्यथा राजा अपने ऐसे प्रिय पुत्र को वनवास देने के योग्य नहीं हैं। यदि पुत्र निर्गुण भी हो, तो भी उसका निष्कासन कैसे हो सकता है? फिर उस पुत्र के लिए तो प्रश्न ही नहीं उठता, जिसने केवल अपने उत्तम आचरण (वृत्त) से इस संपूर्ण लोक को जीत रखा है। दयालुता (आनृशंस्य), करुणा (अनुक्रोश), वेदों का ज्ञान, शील, इंद्रियनिग्रह (दम) और मन की शांति (शम)—ये छह गुण पुरुषों में श्रेष्ठ राम की शोभा बढ़ाते हैं।"
  • English Translation: "Sita, who is accustomed to fine cosmetic unguents and red sandalwood paste, will soon have her complexion marred by rain, heat, and cold. Assuredly Dasharatha is speaking today possessed by some compelling force or anguish, for a king would never deserve to exile such a beloved son. How could even a graceless son be banished—let alone one who has conquered this entire world purely through his righteous conduct? Compassion, tenderness, scriptural learning, good character, self-control, and tranquility—these six virtues adorn Raghava, the best of men."

श्लोक १३-१६

तस्मात् तस्योपघातेन प्रजाः परमपीडिताः। औदकानीव सत्त्वानि ग्रीष्मे सलिलसंक्षयात्॥ १३॥ पीडया पीडितं सर्वं जगदस्य जगत्पतेः। मूलस्येवोपघातेन वृक्षः पुष्पफलोपगः॥ १४॥ मूलं ह्येष मनुष्याणां धर्मसारो महाद्युतिः। पुष्पं फलं च पत्रं च शाखाश्चास्येतरे जनाः॥ १५॥ ते लक्ष्मण इव क्षिप्रं सपत्न्यः सहबान्धवाः। गच्छन्तमनुगच्छामो येन गच्छति राघवः॥ १६॥

  • हिंदी व्याख्या: "इसलिए उनके (राम के) इस प्रकार उपहत (कष्टित) किए जाने से समस्त प्रजा ऐसे अत्यंत पीड़ित हो रही है, जैसे ग्रीष्म ऋतु में जल के सूख जाने पर जलचर जीव पीड़ित हो जाते हैं। जगत्पति राम के इस प्रकार पीड़ित होने से संपूर्ण जगत वैसे ही पीड़ित हो गया है, जैसे वृक्ष के मूल (जड़) के नष्ट हो जाने पर फूल-फलों से युक्त पूरा वृक्ष सूख जाता है। ये महातेजस्वी राम ही मनुष्यों के मूल हैं और धर्म के सार हैं; अन्य सभी लोग तो इस वृक्ष के फूल, फल, पत्ते और शाखाएँ हैं। अतः आइए, जिस प्रकार लक्ष्मण जी जा रहे हैं, उसी प्रकार हम सब भी अपनी पत्नियों और बन्धु-बान्धवों सहित तुरंत राम के पीछे-पीछे चलें, जिधर राघव जा रहे हैं।"
  • English Translation: "Therefore, through His affliction, the subjects are utterly tormented, just like aquatic creatures during summer when water dries up. The entire world of this lord of the universe is afflicted by His suffering, just as a tree laden with flowers and fruits withers when its roots are severed. For He is the very root of mankind, the essence of righteousness, and supremely radiant; all other people are merely the flowers, fruits, leaves, and branches of this tree. Therefore, like Lakshmana, let us forthwith follow along with our wives and kinsfolk wherever Raghava goes!"

श्लोक १७-२१

उद्यानानि परित्यज्य क्षेत्राणि च गृहाणि च। एकदुःखसुखा राममनुगच्छाम धार्मिकम्॥ १७॥ समुद‍्धृतनिधानानि परिध्वस्ताजिराणि च। उपात्तधनधान्यानि हृतसाराणि सर्वशः॥ १८॥ रजसाभ्यवकीर्णानि परित्यक्तानि दैवतैः। मूषकैः परिधावद्भिरुद‍‍्बिलैरावृतानि च॥ १९॥ अपेतोदकधूमानि हीनसम्मार्जनानि च। प्रणष्टबलिकर्मेज्यामन्त्रहोमजपानि च॥ २०॥ दुष्कालेनेव भग्नानि भिन्नभाजनवन्ति च। अस्मत्त्यक्तानि कैकेयी वेश्मानि प्रतिपद्यताम्॥ २१॥

  • हिंदी व्याख्या: "हम अपने बगीचे, खेत और घर-बार सब छोड़कर, राम के साथ सुख-दुख को समान रूप से बाँटते हुए उन धार्मिक राम का अनुसरण करें। हमारे द्वारा त्यागे गए और कैकेयी के लिए छोड़े गए ये घर ऐसे हो जाएँ—जहाँ के धन-निधान उखाड़ लिए गए हों, जिनके आँगन धूल-धूसरित हो गए हों, जिनका सारा धन-धान्य समेट लिया गया हो, सारा सार ले लिया गया हो, जो धूल से पट गए हों, जिन्हें देवताओं (गृहदेवताओं) ने छोड़ दिया हो, जहाँ चूहों के बिलों से चूहे दौड़ रहे हों, जहाँ जल और चूल्हे का धुआँ बंद हो गया हो, जिनकी सफाई न होती हो, जहाँ बलि कर्म, यज्ञ, मन्त्र, होम और जप आदि सब नष्ट हो चुके हों, और जो बुरे समय से टूटे हुए तथा टूटे-फूट बर्तन जैसे हो चुके हों—इन हमारे द्वारा त्यागे गए घरों को कैकेयी जाकर अपनाए!"
  • * English Translation: "Abandoning our gardens, fields, and homes, sharing a common sorrow and joy, let us follow the righteous Rama. Let Kaikeyi take possession of these houses abandoned by us—houses whose buried treasures have been uprooted, whose courtyards are ruined, whose wealth and grain have been plundered, whose essence has been completely stripped, covered in dust, forsaken by household deities, overrun by scurrying mice emerging from holes, devoid of water and hearth-smoke, uncleaned, where daily oblations, sacrifices, Vedic chants, homas, and silent prayers have all ceased, broken as if by an evil era and resembling shattered vessels!"

श्लोक २२-२५

वनं नगरमेवास्तु येन गच्छति राघवः। अस्माभिश्च परित्यक्तं पुरं सम्पद्यतां वनम्॥ जि... (तथा २२) बिलानि दंष्ट्रिणः सर्वे सानूनि मृगपक्षिणः। त्यजन्त्वस्मद्भयाद्भीता गजाः सिंहा वनान्यपि॥ २३॥ अस्मत्त्यक्तं प्रपद्यन्तु सेव्यमानं त्यजन्तु च। तृणमांसफलादानां देशं व्यालमृगद्विजम्॥ २४॥ प्रपद्यतां हि कैकेयी सपुत्रा सह बान्धवैः। राघवेण वयं सर्वे वने वत्स्याम निर्वृताः॥ २५॥

  • हिंदी व्याख्या: "जिधर से राघव जा रहे हैं, वही वन (मार्ग) हमारे लिए नगर बन जाए, और हमारे द्वारा त्यागा हुआ यह नगर वन बन जाए! दाँतों वाले सभी भयानक जीव अपने बिलों को, तथा पर्वत-शिखरों पर रहने वाले मृग और पक्षी तथा हाथी-सिंह आदि वनों को हमारे भय से छोड़ दें। हमारे द्वारा छोड़े गए स्थानों को वे (हिंसक जीव) अपना लें, और जिन स्थानों का हम सेवन करते थे, उन्हें वे छोड़ दें। घास, मांस और फल खाने वाले हिंसक पशु, मृग और पक्षियों से भरे उस देश (वन) को पुत्र और बन्धु-बान्धवों सहित कैकेयी ही अपनाए; और हम सब तो राघव के साथ उस वन में शांतिपूर्वक निवास करेंगे।"
  • * English Translation: "Let the forest through which Raghava travels become our city, and let this city abandoned by us become a forest! Let all fanged beasts abandon their lairs, and deer, birds, elephants, and lions flee the forests in terror of us. Let them occupy the places abandoned by us, and abandon those we frequented. Let Kaikeyi, along with her son and kinsfolk, take possession of that region inhabited by fierce beasts, deer, and birds, subsisting on grass, flesh, and fruits; as for us, we shall dwell happily with Raghava in the forest!"

श्लोक २६-२९

इत्येवं विविधा वाचो नानाजनसमीरिताः। शुश्राव राघवः श्रुत्वा न विचक्रेऽस्य मानसम्॥ २६॥ स तु वेश्म पुनर्मातुः कैलासशिखरप्रभम्। अभिचक्राम धर्मात्मा मत्तमातङ्गविक्रमः॥ २७॥ विनीतवीरपुरुषं प्रविश्य तु नृपालयम्। ददर्शावस्थितं दीनं सुमन्त्रमविदूरतः॥ २८॥ प्रतीक्षमाणोऽभिजनं तदार्त- अनार्तरूपः प्रहसन्निवाथ। जगाम रामः पितरं दिदृक्षुः पितुर्निदेशं विधिवच्चिकीर्षुः॥ २९॥

  • हिंदी व्याख्या: भिन्न-भिन्न नागरिकों द्वारा कही जा रही इस प्रकार की विविध बातों को राघव ने सुना, किंतु सुनने पर भी उनके मन में कोई विकार (विचलित भाव) उत्पन्न नहीं हुआ। मत्त हाथी के समान पराक्रमी और धर्मात्मा श्रीराम कैलास पर्वत के शिखर के समान कांति वाले अपनी माता के भवन की ओर आगे बढ़े। विनीत वीर पुरुषों से युक्त उस राजमहल में प्रवेश करके उन्होंने सुमन्त्र जी को पास ही दीन भाव से खड़े हुए देखा। जनता के उस आर्त (दुखी) समूह को देखते हुए भी स्वयं अनात रूप वाले (प्रसन्नवदन) और मानो मुसकाते हुए से, पितृ-निर्देश का विधिपूर्वक पालन करने की इच्छा रखने वाले श्रीराम अपने पिता के दर्शन के लिए आगे बढ़े।
  • * English Translation: Such diverse utterances, spoken by various citizens, were heard by Raghava, yet upon hearing them His mind remained completely unperturbed. That righteous-souled hero, possessing the gait of a rutting elephant, proceeded once more toward His mother's mansion, which shone like the peak of Mount Kailasa. Entering the royal palace, populated by modest and valiant men, He beheld Sumantra standing dejected not far away. Awaiting the gathered populace, Himself untouched by grief and seemingly smiling, desirous of fulfilling His father's mandate in due form, Rama went forth to see His father.

श्लोक ३०-३१

तत्पूर्वमैक्ष्वाकसुतो महात्मा रामो गमिष्यन् नृपमार्तरूपम्। व्यतिष्ठत प्रेक्ष्य तदा सुमन्त्रं पितुर्महात्मा प्रतिहारणार्थम्॥ ३०॥ पितुर्निदेशेन तु धर्मवत्सलो वनप्रवेशे कृतबुद्धिनिश्चयः। स राघवः प्रेक्ष्य सुमन्त्रमब्रवी- न्निवेदयस्वागमनं नृपाय मे॥ ३१॥

  • हिंदी व्याख्या: तदनंतर, वन जाने वाले महात्मा इक्ष्वाकुनंदन राम ने दुखी अवस्था में बैठे हुए राजा के पास प्रवेश करने के लिए द्वार पर सुमन्त्र जी को देखा। पिता की आज्ञा के कारण वन में प्रवेश करने का जिनका बुद्धि-निश्चय पक्का हो चुका था, वे धर्मवत्सल राघव सुमन्त्र जी को देखकर बोले—"सुमन्त्र जी! महाराज को मेरे आने की सूचना निवेदन कीजिए।"
  • English Translation: Thereupon the high-souled Raghava, scion of Ikshvaku, about to depart, paused to look upon Sumantra standing near the king, who appeared stricken with grief, in order to gain entry. With His mind firmly resolved upon entering the forest in obedience to His father's command, that virtue-loving Raghava looked at Sumantra and said: "Announce my arrival to the king."

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे त्रयस्त्रिंशः सर्गः ॥२-३३॥ (इस प्रकार महर्षि वाल्मीकि रचित आदिकाव्य श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के अयोध्याकाण्ड का तेतीसवाँ सर्ग पूर्ण हुआ।)

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे त्रयस्त्रिंशः सर्गः ॥२-३३॥