श्रीमद्वाल्मीकियरामायणे अयोध्याकाण्डे चतुस्त्रिंशः सर्गः ॥२-३४॥

श्रीरामायण पाठ — अयोध्याकाण्डे चतुस्त्रिंशः सर्गः ॥२-३४॥

 श्रीमद्वाल्मीकियरामायणे अयोध्याकाण्डे चतुस्त्रिंशः सर्गः ॥२-३४॥

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के अयोध्याकाण्ड के चतुस्त्रिंश (३४वें) सर्ग (२-३४) के सभी ६१ श्लोकों का क्रमवार हिंदी एवं अंग्रेजी अनुवाद तथा व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:

श्लोक १-४

ततः कमलपत्राक्षः श्यामो निरुपमो महान्। उवाच रामस्तं सूतं पितुराख्याहि मामिति॥ १॥ स रामप्रेषितः क्षिप्रं संतापकलुषेन्द्रियम्। प्रविश्य नृपतिं सूतो निःश्वसन्तं ददर्श ह॥ २॥ उपरक्तमिवादित्यं भस्मच्छन्नमिवानलम्। तटाकमिव निस्तोयमपश्यज्जगतीपतिम्॥ ३॥ आबोध्य च महाप्राज्ञः परमाकुलचेतनम्। राममेवानुशोचन्तं सूतः प्राञ्जलिरब्रवीत्॥ ४॥

  • हिंदी व्याख्या: तदनंतर, कमल के समान नेत्रों वाले, श्यामवर्ण, निरूपम (अद्वितीय) और महान तेजस्वी श्रीराम ने उस सूत (सुमन्त्र) से कहा—"तुम जाकर पिता जी से मेरे आने की सूचना दो।" श्रीराम द्वारा भेजे गए वे सूत सुमन्त्र शीघ्रता से भीतर गए और उन्होंने संताप से व्याकुल इंद्रियों वाले राजा को लंबी साँसें लेते हुए देखा। उस समय जगतीपति (राजा दशरथ) ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानो राहु से ग्रस्त सूर्य हों, राख से ढकी हुई अग्नि हों, अथवा जलहीन तालाब हो। महाप्राज्ञ सूत ने अत्यंत आकुल चित्त वाले और राम के लिए ही शोक करते हुए राजा को सँभालकर हाथ जोड़कर यह बात कही—
  • English Translation: Thereafter, the lotus-eyed, dark-complexioned, peerless, and mighty Rama said to the charioteer: "Go and announce my arrival to my father." Promptly dispatched by Rama, the charioteer entered and beheld the monarch whose senses were clouded with anguish, sighing heavily. He saw the lord of the earth looking like the sun eclipsed, fire covered by ashes, or a lake devoid of water. Approaching the highly wise king whose mind was profoundly agitated and who was grieving solely for Rama, the charioteer addressed Him with joined palms:

श्लोक ५-८

तं वर्धयित्वा राजानं पूर्वं सूतो जयाशिषा। भयविक्लवया वाचा मन्दया श्लक्ष्णयाब्रवीत्॥ ५॥ अयं स पुरुषव्याघ्रो द्वारि तिष्ठति ते सुतः। ब्राह्मणेभ्यो धनं दत्त्वा सर्वं चैवोपजीविनाम्॥ ६॥ स त्वां पश्यतु भद्रं ते रामः सत्यपराक्रमः। सर्वान् सुहृद आपृच्छ्य त्वां हीदानीं दिदृक्षते॥ ७॥ गमिष्यति महारण्यं तं पश्य जगतीपते। वृतं राजगुणैः सर्वैरादित्यमिव रश्मिभिः॥ ८॥

  • हिंदी व्याख्या: सूत ने पहले 'जय' का आशीर्वाद देकर राजा का अभिनंदन किया और फिर भय से काँपती हुई, धीमी और कोमल वाणी में कहा—"हे राजन्! ब्राह्मणों तथा अपने सभी आश्रितों को प्रचुर धन दान करके पुरुषों में व्याघ्र के समान श्रेष्ठ आपके वे सत्यपराक्रमी पुत्र राम इस समय द्वार पर खड़े हैं। आपका कल्याण हो, सत्यपराक्रमी राम अपने सभी सुहृदजनों से विदा लेकर अब केवल आपके दर्शन करना चाहते हैं और आपको देखना चाहते हैं। हे जगतीपति! वे महान अरण्य (वन) के लिए प्रस्थान करने वाले हैं, आप किरणों से घिरे हुए सूर्य के समान समस्त राजगुओं से सुशोभित उन राम के दर्शन कीजिए।"
  • English Translation: First offering the blessing of victory to the king, the charioteer spoke with a voice trembling with fear, soft and gentle: "This is that tiger among men, your son, standing at the door after bestowing ample wealth upon Brahmins and all his dependents. May auspiciousness attend you; that Rama of true prowess, having bided farewell to all His friends and well-wishers, now desires to behold you. He is about to depart for the great forest, O lord of the world; do look upon Him, surrounded by all royal virtues just like the sun encircled by its rays."

श्लोक ९-१३

स सत्यवाक्यो धर्मात्मा गाम्भीर्यात् सागरोपमः। आकाश इव निष्पङ्को नरेन्द्रः प्रत्युवाच तम्॥ ९॥ सुमन्त्रानय मे दारान् ये केचिदिह मामकाः। दारैः परिवृतः सर्वैर्द्रष्टुमिच्छामि राघवम्॥ १०॥ सोऽन्तःपुरमतीत्यैव स्त्रियस्ता वाक्यमब्रवीत्। आर्यो ह्वयति वो राजा गम्यतां तत्र मा चिरम्॥ ११॥ एवमुक्ताः स्त्रियः सर्वाः सुमन्त्रेण नृपाज्ञया। प्रचक्रमुस्तद् भवनं भर्तुराज्ञाय शासनम्॥ १२॥ अर्धसप्तशतास्तत्र प्रमदास्ताम्रलोचनाः। कौसल्यां परिवार्याथ शनैर्जग्मुर्धृतव्रताः॥ १३॥

  • हिंदी व्याख्या: सत्यवादी, धर्मात्मा, गंभीरता के कारण समुद्र के समान और आकाश की भाँति निष्कलंक उन नरेन्द्र (राजा दशरथ) ने सूत से उत्तर दिया—"हे सुमन्त्र! मेरे जितने भी अंतःपुर के जन (रामारियाँ/महिषियाँ) हैं, उन सबको यहाँ ले आओ। मैं अपनी सभी रानियों से घिरकर राघव के दर्शन करना चाहता हूँ।" तब सुमन्त्र ने अंतःपुर में जाकर उन स्त्रियों से कहा—"आर्य (राजा) आप सबको बुला रहे हैं, आप लोग बिना देर किए वहाँ चलिए।" राजा की आज्ञा पाकर सुमन्त्र के ऐसे वचनों को सुनकर वे सभी स्त्रियाँ अपने पति की आज्ञा का पालन करते हुए उस भवन की ओर चल पड़ीं। व्रत का पालन करने वाली वे साढ़े तीन सौ (अर्धसप्तशत - तीन सौ पचास) स्त्रियाँ, जिनके नेत्र रोने के कारण ताँबे के समान लाल हो रहे थे, कौसल्या को आगे और अपने बीच में लेकर धीरे-धीरे आगे बढ़ीं।
  • English Translation: That truthful, righteous, and deep-souled monarch, resembling the ocean in profundity and the sky untainted by mud, replied to him: "O Sumantra, bring hither all my wives whosoever belong to my household; surrounded by all my consorts, I desire to behold Raghava." Thereupon, crossing into the inner apartments, the charioteer spoke to those women: "His Reverence the king calls you; go thither without delay." Thus addressed by Sumantra by royal command, all the women set forth toward that palace, acknowledging their husband's decree. Three hundred and fifty ladies, their eyes red with weeping, surrounding Kausalya, proceeded slowly, steadfast in their sorrowful vows.

श्लोक १४-१९

आगतेषु च दारेषु समवेक्ष्य महीपतिः। उवाच राजा तं सूतं सुमन्त्रानय मे सुतम्॥ १४॥ स सूतो राममादाय लक्ष्मणं मैथिलीं तथा। जगामाभिमुखस्तूर्णं सकाशं जगतीपतेः॥ १५॥ स राजा पुत्रमायान्तं चारात् कृताञ्जलिम्। उत्पपातासनात् तूर्णमार्तः स्त्रीजनसंवृतः॥ १६॥ सोऽभिदुद्राव वेगेन रामं दृष्ट्वा विशाम्पतिः। तमसम्प्राप्य दुःखार्तः पपात भुवि मूर्च्छितः॥ १७॥ तं रामोऽभ्यपतत् क्षिप्रं लक्ष्मणश्च महारथः। विसंज्ञमिव दुःखेन सशोकं नृपतिं तथा॥ ८१॥ (तथा १८) स्त्रीसहस्रनिनादश्च संजज्ञे राजवेश्मनि। हा हा रामेति सहसा भूषणध्वनिमिश्रितः॥ १९॥

  • हिंदी व्याख्या: रानियों के आ जाने पर राजा ने भली-भाँति देखकर सूत से कहा—"हे सुमन्त्र! मेरे पुत्र को यहाँ ले आओ।" तब वे सूत सुमन्त्र श्रीराम, लक्ष्मण और मैथिली (सीता जी) को साथ लेकर तुरंत जगतीपति राजा के समीप पहुँचे। हाथ जोड़े हुए दूर से ही अपने पुत्र को आते देखकर, शोक से आर्त और स्त्री-समूह से घिरे हुए वे राजा अपने आसन से तेजी से उठ खड़े हुए। राजा दशरथ राम को देखते ही वेग से उनकी ओर दौड़े, किंतु उन तक पहुँचने से पहले ही दुखों से आर्त होकर वे पृथ्वी पर मूर्च्छित होकर गिर पड़े। महारथी लक्ष्मण और श्रीराम ने तुरंत दौड़कर उस शोक-संतप्त एवं अचेतप्राय राजा को सँभाला। उस समय राजमहल में आभूषणों की खनक के साथ 'हा! हा! राम!' ऐसा कहकर रोती हुई हजारों स्त्रियों का एक महान आर्तनाद गूँज उठा।
  • English Translation: When the consorts had arrived, the king, observing them, said to the charioteer: "O Sumantra, bring my son hither." Thereupon the charioteer, taking Rama, Lakshmana, and Maithili, swiftly proceeded to the presence of the lord of the earth. Beholding His son approaching from afar with joined palms, the grief-stricken king, surrounded by his women, sprang up hastily from his seat. Seeing Rama, the lord of the people rushed toward Him with speed, but before reaching Him, stricken with grief, he collapsed unconscious upon the ground. Rama and the mighty-arched Lakshmana swiftly ran to catch the unconscious and sorrow-laden monarch. Suddenly a tumultuous wail of a thousand women arose in the royal palace—"Alas, alas, Rama!"—mingled with the clinking of their ornaments.

श्लोक २०-२४

तं परिष्वज्य बाहुभ्यां तावुभौ रामलक्ष्मणौ। पर्यङ्के सीतया सार्धं रुदन्तः समवेशयन्॥ २०॥ अथ रामो मुहूर्तस्य लब्धसंज्ञं महीपतिम्। उवाच प्राञ्जलिर्बाष्पशोकार्णवपरिप्लुतम्॥ २१॥ आपृच्छे त्वां महाराज सर्वेषामीश्वरोऽसि नः। प्रस्थितं दण्डकारण्यं पश्य त्वं कुशलेन माम्॥ २२॥ लक्ष्मणं चानुजानीहि सीता चान्वेतु मां वनम्। कारणैर्बहुभिस्तथ्यैर्वार्यमाणौ न चेच्छतः॥ २३॥ अनुजानीहि सर्वान् नः शोकमुत्सृज्य मानद। लक्ष्मणं मां च सीतां च प्रजापतिरिवात्मजान्॥ ४२॥ (तथा २४)

  • हिंदी व्याख्या: दोनों भाइयों—राम और लक्ष्मण ने अपनी बाहों में भरकर उस राजा को उठाया और रोते हुए सीता जी के साथ उन्हें पलंग पर लिटा दिया। तत्पश्चात, एक मुहूर्त के बाद जब राजा की चेतना लौटी, तो आँसुओं और शोक के समुद्र में डूबे हुए महीपति से हाथ जोड़कर श्रीराम बोले—"हे महाराज! आप हम सबके सर्वेश्वर हैं, मैं आपसे विदा लेने आया हूँ। दण्डकारण्य के लिए प्रस्थित मुझको आप सकुशल देखिए। आप लक्ष्मण को भी अनुमति दीजिए, और सीता जी भी मेरे साथ वन जाना चाहती हैं; यद्यपि मैंने सत्य और प्रबल कारणों से इन्हें बहुत रोका, किंतु ये नहीं मानतीं। हे मानद! प्रजापति जिस प्रकार अपनी संतानों की रक्षा करते हैं, उसी प्रकार आप अपना शोक त्यागकर हम सबको—लक्ष्मण, मुझको और सीता को—वन जाने की अनुमति प्रदान कीजिए।"
  • English Translation: Embracing Him with their arms, both Rama and Lakshmana, weeping, laid Him upon the couch along with Sita. Thereafter, after a brief moment when the monarch regained consciousness, Rama, with joined palms, addressed the lord of the earth who was submerged in an ocean of tears and grief: "I take my leave of you, O Maharaja; you are the sovereign master of us all. Behold me safe as I set out for the Dandaka forest. Grant your permission to Lakshmana as well, and let Sita follow me to the forest; though dissuaded by me with various true and weighty arguments, they refuse to stay. Grant your consent to us all, abandoning your grief, O bestower of honor—to Lakshmana, myself, and Sita—just as Prajapati grants leave to his offspring."

श्लोक २५-२९

प्रतीक्षमाणमव्यग्रमनुज्ञां जगतीपतेः। उवाच राजा सम्प्रेक्ष्य वनवासाय राघवम्॥ २५॥ अहं राघव कैकेय्या वरदानेन मोहितः। अयोध्यायां त्वमेवाद्य भव राजा निगृह्य माम्॥ २६॥ एवमुक्तो नृपतिना रामो धर्मभृतां वरः। प्रत्युवाचाञ्जलिं कृत्वा पितरं वाक्यकोविदः॥ २७॥ भवान् वर्षसहस्राय पृथिव्या नृपते पतिः। अहं त्वरण्ये वत्स्यामि न मे राज्यस्य कांक्षिता॥ २८॥ नव पञ्च च वर्षाणि वनवासे विहृत्य ते। पुनः पादौ ग्रहीष्यामि प्रतिज्ञान्ते नराधिप॥ २९॥

  • हिंदी व्याख्या: जगतीपति राजा की अनुमति की प्रतीक्षा करते हुए शांत खड़े राघव को देखकर राजा ने वनवास के लिए तत्पर राम से कहा—"हे राघव! मैं कैकेयी को वरदान देने के कारण मोहग्रस्त हो गया था। तुम आज ही मुझे बंदी बनाकर अयोध्या के राजा बन जाओ।" राजा द्वारा ऐसा कहे जाने पर, धर्म को धारण करने वालों में श्रेष्ठ और वचनकुशल श्रीराम ने हाथ जोड़कर अपने पिता से उत्तर दिया—"हे नृपते! आप हजारों वर्षों तक इस पृथ्वी के स्वामी बने रहें। मैं तो अरण्य (वन) में निवास करूँगा, मुझे राज्य की कोई अभिलाषा नहीं है। हे नराधिप! वनवास के चौदह वर्ष (नौ और पाँच वर्ष) पूरे करके, प्रतिज्ञा की समाप्ति पर मैं पुनः आकर आपके चरणों में वंदना करूँगा।"
  • English Translation: Beholding Raghava calmly awaiting the sovereign's permission for forest exile, the king looked at Him and said: "O Rama, I was deluded by granting boons to Kaikeyi. Do you seize me and become the king of Ayodhya this very day!" Thus addressed by the monarch, Rama—the foremost among the upholders of righteousness and skilled in speech—replied to His father with joined palms: "May you remain the lord of this earth for a thousand years, O king. As for me, I shall dwell in the wilderness; I have no desire for sovereignty. Having spent fourteen years in forest exile, O ruler of men, I shall return at the end of my vow to touch your feet once more."

श्लोक ३०-३४

रुदन्नार्तः प्रियं पुत्रं सत्यपाशेन संयुतः। कैकेय्या चोद्यमानस्तु मिथो राजा तमब्रवीत्॥ ३०॥ श्रेयसे वृद्धये तात पुनरागमनाय च। गच्छस्वारिष्टमव्यग्रः पन्थानमकुतोभयम्॥ ३१॥ न हि सत्यात्मनस्तात धर्माभिमनसस्तव। संनिवर्तयितुं बुद्धिः शक्यते रघुनन्दन॥ ३२॥ अद्य त्विदानीं रजनीं पुत्र मा गच्छ सर्वथा। एकाहं दर्शनेनापि साधु तावच्चराम्यहम्॥ ३३॥ मातरं मां च सम्पश्यन् वसेमामद्य शर्वरीम्। तर्पितः सर्वकामैस्त्वं श्वः काल्ये साधयिष्यसि॥ ३४॥

  • हिंदी व्याख्या: सत्य के पाश में बँधे हुए, कैकेयी द्वारा बार-बार उकसाए जा रहे और शोकातुर राजा ने रोते हुए अपने प्रिय पुत्र से एकांत में कहा—"हे तात! तुम्हारी भलाई हो, तुम्हारी वृद्धि हो, और तुम्हारा पुनः सकुशल आगमन हो—तुम बिना किसी उद्वेग के निर्भय होकर अकुतोभय मार्ग से जाओ। हे तात! सत्यस्वरूप और धर्माभिमानी रघुनंदन तुम्हारी इस बुद्धि को पीछे मोड़ने में कोई भी समर्थ नहीं है। किंतु हे पुत्र! आज कम से कम इस रात भर तो तुम मत जाओ। केवल एक दिन और तुम्हारे दर्शन करके मैं जी भर कर तृप्त हो जाऊँगा। आज की यह रात तुम अपनी माता (कौसल्या) और मुझे देखते हुए यहीं बिताओ। सभी प्रकार की कामनाओं से तृप्त होकर कल प्रातःकाल तुम प्रस्थान कर देना।"
  • English Translation: Bound by the cords of truth, urged on by Kaikeyi, the grieving king wept and spoke in confidence to his beloved son: "My child, for your welfare, your prosperity, and your safe return, go forth unperturbed along a path free from peril. O Raghava, since your soul is rooted in truth and devoted to righteousness, your resolve can never be turned back, my child. Yet today, for this very night, do not depart just yet, my son; let me find solace by gazing upon you for just one more day. Spend this single night here, beholding your mother and me. Sated with every comfort, tomorrow at dawn you shall set out."

श्लोक ३५-३९

दुष्करं क्रियते पुत्र सर्वथा राघव प्रिय। त्वया हि मत्प्रियार्थं तु वनमेवमुपाश्रितम्॥ ३५॥ न चैतन्मे प्रियं पुत्र शपे सत्येन राघव। छन्नया चलितस्त्वस्मि स्त्रिया भस्माग्निकल्पया॥ ३६॥ वञ्चना या तु लब्धा मे तां त्वं निस्तर्तुमिच्छसि। अनया वृत्तसादिन्या कैकेय्याभिप्रचोदितः॥ ३७॥ न चैतदाश्चर्यतमं यत् त्वं ज्येष्ठः सुतो मम। अपानृतकथं पुत्र पितरं कर्तुमिच्छसि॥ ३८॥ अथ रामस्तदा श्रुत्वा पितुरार्तस्य भाषितम्। लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा दीनो वचनमब्रवीत्॥ ३९॥ अथ रामस्तदा श्रुत्वा पितुरार्तस्य भाषितम्। (द्विरुक्ति/पाठभेद)

  • हिंदी व्याख्या: "हे पुत्र राघव! तुम मेरे प्रिय कार्य के लिए ही इस प्रकार वन का आश्रय ले रहे हो, अतः तुम्हारे द्वारा यह अत्यंत दुष्कर कार्य किया जा रहा है। हे राघव! मैं सत्य की शपथ लेकर कहता हूँ कि यह सब मुझे बिल्कुल प्रिय नहीं है। भस्म से ढकी हुई अग्नि के समान उस कपटी स्त्री (कैकेयी) ने मुझे छल से विचलित कर दिया है। आचरण को कलंकित करने वाली इस कैकेयी के उकसाने पर जो मुझ पर यह वज्रपात (वंचना) आया है, तुम उसी संकट से मुझे तारना (उद्धार करना) चाहते हो। तुम मेरे ज्येष्ठ पुत्र हो, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है; किंतु हे पुत्र! क्या तुम अपने पिता को झूठा (अनृतकथन करने वाला) बनाना चाहते हो?" तब दुखी हुए राम ने अपने भाई लक्ष्मण के साथ, पिता की उस आर्त वाणी को सुनकर दीन भाव से उत्तर दिया—
  • English Translation: "An exceedingly difficult deed is being performed by you in every way, O beloved Rama, since for my sake you are thus taking refuge in the forest. I swear by the truth, O Raghava, that this does not please me at all; I have been led astray by that deceptive woman who is like fire hidden beneath ashes. You wish to rescue me from the deception that has befallen me, incited by this destroyer of good conduct, Kaikeyi. It is no wonder that you, being my eldest son, act thus; but my son, do you truly wish to make your father a liar?" Then, hearing those distressed words of His father, Rama, along with His brother Lakshmana, spoke with a sorrowful mien:

श्लोक ४०-४४

प्राप्स्यामि यानद्य गुणान् को मे श्वस्तान् प्रदास्यति। अपक्रमणमेवातः सर्वकामैरहं वृणे॥ ४०॥ इयं सराष्ट्रा सजना धनधान्यसमाकुला। मया विसृष्टा वसुधा भरताय प्रदीयताम्॥ ४१॥ वनवासकृता बुद्धिर्न च मेऽद्य चलिष्यति। यस्तु युद्धे वरो दत्तः कैकेय्यै वरद त्वया॥ ४२॥ दीयतां निखिलेनैव सत्यस्त्वं भव पार्थिव। अहं निदेशं भवतो यथोक्तमनुपालयन्॥ ४३॥ चतुर्दश समा वत्स्ये वने वनचरैः सह। मा विमर्शो वसुमती भरताय प्रदीयताम्॥ ४४॥

  • हिंदी व्याख्या: "आज जो गुण (राज्याधिकार) मुझे प्राप्त होने वाले हैं, कल उन्हें मुझे कौन प्रदान करेगा? इसलिए मैं सभी प्रकार की कामनाओं (राजसुखों) को छोड़कर यहाँ से जाना ही बेहतर समझता हूँ। राष्ट्र, जनों और धन-धान्य से परिपूर्ण यह मेरी छोड़ी हुई पृथ्वी भरत को प्रदान की जाए। वनवास के लिए जो मेरी बुद्धि निश्चित हो चुकी है, वह आज टलने वाली नहीं है। हे वरद! आपने युद्ध में कैकेयी को जो दो वर दिए थे, उन्हें आप पूर्णतः प्रदान करें और सत्यवादी राजा बनें। मैं आपकी आज्ञा का यथोचित पालन करते हुए वनचरों के साथ चौदह वर्षों तक वन में निवास करूँगा। आप तनिक भी संकोच न करें, यह पृथ्वी भरत को दे दी जाए।"
  • English Translation: "Whatever virtues/privileges I am to attain today, who will grant them to me tomorrow? Hence I choose departure far above all worldly comforts. Let this earth—complete with its country, people, wealth, and corn—be bestowed upon Bharata, relinquished by me. My resolve for forest exile shall not waver today, O bestower of boons. Whatever boons you granted to Kaikeyi of yore in battle, fulfill them in their entirety and remain true to your word, O monarch. Carrying out your command precisely as enjoined, I shall dwell in the forest with the denizens of the woods for fourteen years. Hesitate not; let the earth be given to Bharata."

श्लोक ४५-४९

नहि मे कांक्षितं राज्यं सुखमात्मनि वा प्रियम्। यथानिदेशं कर्तुं वै तवैव रघुनन्दन॥ ४५॥ अपगच्छतु ते दुःखं मा भूर्बाष्पपरिप्लुतः। नहि क्षुभ्यति दुर्धर्षः समुद्रः सरितां पतिः॥ ४६॥ नैवाहं राज्यमिच्छामि न सुखं न च मेदिनीम्। नैव सर्वानिमान् कामान् न स्वर्गं न च जीवितुम्॥ ४७॥ त्वामहं सत्यमिच्छामि नानृतं पुरुषर्षभ। प्रत्यक्षं तव सत्येन सुकृतेन च ते शपे॥ ४८॥ न च शक्यं मया तात स्थातुं क्षणमपि प्रभो। स शोकं धारयस्वेमं नहि मेऽस्ति विपर्ययः॥ ४९॥

  • हिंदी व्याख्या: "मुझे न तो राज्य की इच्छा है, न अपने लिए किसी सुख या प्रिय वस्तु की चाह है; मेरी एकमात्र अभिलाषा केवल आपकी आज्ञा का पालन करने की है, हे रघुनंदन! आपका दुख दूर हो, आप आँसुओं में मत डूबिए; नदियों के स्वामी दुर्दर्ष समुद्र कभी क्षुब्ध नहीं होते (मर्यादा नहीं छोड़ते)। न तो मैं राज्य चाहता हूँ, न सुख, न पृथ्वी, न समस्त भोग, न स्वर्ग और न ही अपने प्राणों को। हे पुरुषश्रेष्ठ! मैं केवल आपकी सत्यता चाहता हूँ, असत्य नहीं। मैं प्रत्यक्ष आपके सत्य और आपके पुण्यकर्मों की सौगंध खाकर कहता हूँ—हे तात! हे प्रभो! अब मैं एक क्षण भी यहाँ रुकने में असमर्थ हूँ। आप इस शोक को धारण करें (धैर्य रखें), मेरे निश्चय में कोई परिवर्तन नहीं होगा।"
  • English Translation: "I desire neither sovereignty, nor personal happiness, nor any dear object; my sole wish, O scion of Raghu, is simply to fulfill your command. Let your grief depart; be not overwhelmed in tears. The lord of rivers, the unassailable ocean, never breaks its bounds. I desire neither kingdom, nor happiness, nor the earth, nor all these pleasures, nor heaven, nor even life itself. I desire your truth alone, O bull among men, and not falsehood. I swear to you by your own truth and by your pious deeds. O father, O lord, I cannot linger here even for a single moment; do bear this sorrow, for my resolve shall never change."

श्लोक ५०-५४

अर्थितो ह्यस्मि कैकेय्या वनं गच्छेति राघव। मया चोक्तं व्रजामीति तत्सत्यमनुपालये॥ ५०॥ मा चोत्कण्ठां कृथा देव वने रंस्यामहे वयम्। प्रशान्तहरिणाकीर्णे नानाशकुनिनादिते॥ ५१॥ पिता हि दैवतं तात देवतानामपि स्मृतम्। तस्माद् दैवतमित्येव करिष्यामि पितुर्वचः॥ ५२॥ चतुर्दशसु वर्षेषु गतेषु नृपसत्तम। पुनर्द्रक्ष्यसि मां प्राप्तं संतापोऽयं विमुच्यताम्॥ ५३॥ येन संस्तम्भनीयोऽयं सर्वो बाष्पकलो जनः। स त्वं पुरुषशार्दूल किमर्थं विक्रियां गतः॥ ५४॥

  • हिंदी व्याख्या: "हे राघव! कैकेयी जी ने मुझसे प्रार्थना की है कि तुम वन जाओ, और मैंने भी उनसे कह दिया है कि मैं जाता हूँ; अतः उनके उस वचन (और आपकी प्रतिज्ञा) का मुझे पालन करना चाहिए। हे देव! आप शोक मत कीजिए, हम शांत हिरणों से भरे तथा भाँति-भाँति के पक्षियों के कलरव से गूँजने वाले उस वन में भी आनंदपूर्वक रहेंगे। हे तात! पिता तो देवताओं के भी देवता माने गए हैं, इसलिए मैं 'वे मेरे प्रत्यक्ष देवता हैं' ऐसा मानकर ही पिता के इस वचन का पालन करूँगा। हे नृपसत्तम! चौदह वर्ष बीत जाने पर आप मुझे पुनः यहाँ आया हुआ देखेंगे, अतः इस संताप को त्याग दीजिए। आप तो वह व्यक्ति हैं जो इस समस्त रोते हुए बाष्पयुक्त जनसमूह को ढाँधस बंधा सकते हैं; हे पुरुषश्रेष्ठ! आप स्वयं क्यों विकार को प्राप्त हो रहे हैं?"
  • * English Translation: "I have been besought by Kaikeyi to go to the forest, O Raghava, and I have replied that I am going; hence I must uphold that truth. Do not yield to anguish, O lord; we shall sport happily in the forest, which is filled with tranquil deer and resounding with the calls of diverse birds. A father, my child, is esteemed as a deity even unto the gods; therefore, regarding him as my supreme deity, I shall fulfill my father's command. When the fourteen years have elapsed, O best of kings, you shall see me returned; let this anguish be cast aside. You are the one who should restrain and comfort all this weeping populace; why then, O tiger among men, have you fallen into such distress?"

श्लोक ५५-५९

पुरं च राष्ट्रं च मही च केवला मया विसृष्टा भरताय दीयताम्। अहं निदेशं भवतोऽनुपालयन् वनं गमिष्यामि चिराय सेवितुम्॥ ५५॥ मया विसृष्टां भरतो महीमिमां सशैलखण्डां सपुरोपकाननाम्। शिवासु सीमास्वनुशास्तु केवलं त्वया यदुक्तं नृपते तथास्तु तत्॥ ५६॥ न मे तथा पार्थिव धीयते मनो महत्सु कामेषु न चात्मनः प्रिये। यथा निदेशे तव शिष्टसम्मते व्यपैतु दुःखं तव मत्कृतेऽनघ॥ ५७॥ तदद्य नैवानघ राज्यमव्ययं न सर्वकामान् वसुधां न मैथिलीम्। न चिन्तितं त्वामनृतेन योजयन् वृणीय सत्यं व्रतमस्तु ते तथा॥ ५८॥ फलानि मूलानि च भक्षयन् वने गिरींश्च पश्यन् सरितः सरांसि च। वनं प्रविश्यैव विचित्रपादपं सुखी भविष्यामि तवास्तु निर्वृतिः॥ ५९॥

  • हिंदी व्याख्या: "नगर, राष्ट्र और यह अकेली पृथ्वी—मेरे द्वारा छोड़ी गई यह सब भरत को दे दी जाए। मैं आपकी आज्ञा का पालन करते हुए दीर्घकाल तक सेवन करने के लिए वन जा रहा हूँ। मेरे द्वारा छोड़ी गई पर्वतों, नगरों और उपवनों सहित इस समस्त पृथ्वी का शासन भरत अपनी कल्याणकारी सीमाओं के भीतर करें; हे नृपते! आपने जो कहा है, वैसा ही हो। हे पार्थिव! बड़े-बड़े भोगों और अपने प्रिय सुखों में भी मेरा मन उतना नहीं लगता, जितना शिष्टों द्वारा सम्मत आपके आदेश के पालन में लगता है। हे अनघ! मेरे कारण आपके मन का यह दुख दूर हो जाए। इसलिए हे अनघ! आज मैं न तो अव्यय राज्य चाहता हूँ, न समस्त भोग, न पृथ्वी, न मैथिली, और न ही किसी अन्य चिंतन को; मैं केवल आपको असत्य से बचाने के लिए 'सत्य' का ही वरण करता हूँ, आपका व्रत सत्य हो। वन में कंद-मूल फल खाते हुए, पर्वतों, नदियों और सरोवरों को देखते हुए, भाँति-भाँति के वृक्षों से युक्त वन में प्रवेश करके मैं अत्यंत सुखी रहूँगा—आपको शांति (निर्वृति) प्राप्त हो।"
  • * English Translation: "Let the city, the nation, and this entire earth, relinquished by me, be given to Bharata. Obeying your command, I shall depart to dwell in the forest for a long time. Let Bharata rule this earth relinquished by me—replete with mountains, cities, and groves—within righteous bounds; whatever you have commanded, O king, let it be so. O ruler of the earth, my mind does not incline toward great pleasures or personal delights half as much as it does toward fulfilling your instruction approved by the wise. May your grief on my account vanish, O sinless One. Therefore today, O sinless One, I choose neither imperishable kingdom, nor all pleasures, nor the earth, nor Maithili, nor any selfish thought—preferring rather to keep you free from falsehood, choosing Truth alone so that your vow may remain unbroken. Feeding on roots and fruits in the forest, beholding mountains, rivers, and lakes, entering the forest adorned with wondrous trees, I shall be perfectly happy; may peace be yours."

श्लोक ६०-६१

एवं स राजा व्यसनाभिपन्न- स्तापेन दुःखेन च पीड्यमानः। आलिङ्ग्य पुत्रं सुविनष्टसंज्ञो भूमिं गतो नैव चिचेष्ट किंचित्॥ ६०॥ देव्यः समस्ता रुरुदुः समेता- स्तां वर्जयित्वा नरदेवपत्नीम्। रुद सुमन्त्रोऽपि जगाम मूर्च्छां हाहाकृतं तत्र बभूव सर्वम्॥ ६१॥

  • हिंदी व्याख्या: इस प्रकार व्यसन (विपत्ति) से आक्रान्त, संताप और दुख से बुरी तरह पीड़ित वे राजा दशरथ अपने पुत्र को आलिंगन करके, अपनी सुध-बुध खो बैठे (मूर्च्छित हो गए) और पृथ्वी पर गिर पड़े तथा कुछ भी चेष्टा नहीं कर सके। उस समय नरदेव की पत्नी कैकेयी को छोड़कर, वहाँ एकत्रित सभी देवियाँ (रानियाँ) रोने लगीं। सूत सुमन्त्र भी रोते-रोते मूर्च्छित हो गए, और उस समय वहाँ सर्वत्र 'हा! हा!'कार मच गया।
  • * English Translation: Thus stricken by calamity, tormented by anguish and sorrow, embracing His son, the king completely lost consciousness, fell to the ground, and stirred not at all. All the queens gathered there wept aloud, save for that wife of the ruler of men [Kaikeyi]. Sumantra the charioteer too wept until he swooned into unconsciousness; an uproar of lamentation—"Alas! Alas!"—prevailed everywhere in that place.

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे चतुस्त्रिंशः सर्गः ॥२-३४॥ (इस प्रकार महर्षि वाल्मीकि रचित आदिकाव्य श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के अयोध्याकाण्ड का चौंतीसवाँ सर्ग पूर्ण हुआ।)

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे चतुस्त्रिंशः सर्गः ॥२-३४॥