श्रीमद्वाल्मीकियरामायणे अयोध्याकाण्डे त्रयोदशः सर्गः ॥२-१३॥

रामायणम्/अयोध्याकाण्डे त्रयोदशः सर्गः ॥२-१३॥

श्रीरामायण पाठ — अयोध्याकाण्डे त्रयोदशः सर्गः ॥२-१३॥

 श्रीमद्वाल्मीकियरामायणे अयोध्याकाण्डे त्रयोदशः सर्गः ॥२-१३॥

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के अयोध्याकाण्ड के त्रयोदश सर्ग (२-१३) के सभी २६ श्लोकों का क्रमवार हिंदी एवं अंग्रेजी अनुवाद व व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:

श्लोक १-३

अतदर्हं महाराजं शयानमतथोचितम्। ययातिमिव पुण्यान्ते देवलोकात् परिच्युतम्॥ १॥ अनर्थरूपासिद्धार्था ह्यभीता भयदर्शिनी। पुनराकारयामास तमेव वरमङ्गना॥ २॥ त्वं कत्थसे महाराज सत्यवादी दृढव्रतः। मम चेदं वरं कस्माद् विधारयितुमिच्छसि॥ ३॥

  • हिंदी व्याख्या: ऐसे अपमान के योग्य न होने पर भी जो महाराज अस्वस्थ भाव से भूमि पर इस प्रकार सोए हुए थे, वे पुण्य क्षीण होने पर देवलोक से नीचे गिरे हुए राजा ययाति के समान प्रतीत हो रहे थे। उस अनर्थ रूपी वर से अपना स्वार्थ सिद्ध करने वाली, निर्भय और दूसरों को भय दिखाने वाली वह अङ्गना (कैकेयी) ने अड़े रहकर राजा से फिर वही वर माँगने के लिए कहा—"हे महाराज! आप अपनी सत्यवादिता और दृढ़व्रत होने की बड़ी-बड़ी डींगें हाँकते हैं, फिर मेरे इस वर को देने से आप क्यों कतरा रहे हैं (क्यों टालना चाहते हैं)?"
  • English Translation: The great king, though undeserving of such a plight, lay sprawling upon the ground, resembling King Yayati fallen from heaven after the exhaustion of his merits. That woman, fearless yet instilling fear, intent solely on securing her ruinous objective through those boons, once more importuned him: "O Maharaj, you boast endlessly of being truthful and steadfast in your vows; why then do you hesitate to grant and uphold this boon of mine?"

श्लोक ४-७

एवमुक्तस्तु कैकेय्या राजा दशरथस्तदा। प्रत्युवाच ततः क्रुद्धो मुहूर्तं विह्वलन्निव॥ ४॥ मृते मयि गते रामे वनं मनुजपुङ्गवे। हन्तानार्ये ममामित्रे सकामा सुखिनी भव॥ ५॥ स्वर्गेऽपि खलु रामस्य कुशलं दैवतैरहम्। प्रत्यादेशादभिहितं धारयिष्ये कथं बत॥ ६॥ कैकेय्याः प्रियकामेन रामः प्रव्राजितो वनम्। यदि सत्यं ब्रवीम्येतत् तदसत्यं भविष्यति॥ ७॥

  • हिंदी व्याख्या: कैकेयी द्वारा ऐसा कहे जाने पर राजा दशरथ ने क्रुद्ध होकर एक मुहूर्त तक विह्वल से होकर उसे उत्तर दिया—"हे अनार्ये! मेरे मरने पर और पुरुषों में श्रेष्ठ राम के वन चले जाने पर, तू मेरी इस अमित्र (शत्रु रूपिणी) पत्नी! अपनी इच्छा पूरी करके सुखी हो जा। स्वर्ग में जाने पर भी यदि देवता मुझसे राम का कुशल-क्षेम पूछेंगे, तो मैं उन्हें क्या उत्तर दूँगा और उस कलंक को कैसे सहन करूँगा? यदि मैं भविष्य में कभी यह कहूँ कि 'कैकेयी की प्रिय इच्छा पूरी करने के लिए राम को मैंने वन भेजा था', तो मेरा वह कथन भी असत्य ही सिद्ध होगा।"
  • English Translation: Thus addressed by Kaikeyi, King Dasharatha, angered and seemingly bewildered for a moment, replied: "O unrighteous one, with my death and the exile of Rama—the best of men—to the forest, do you fulfill your desires and be happy, O enemy in the guise of a wife! Even in heaven, if the gods inquire about Rama's welfare, how on earth shall I bear to give them a negative reply? If ever I were to say that 'Rama was exiled to the forest out of my desire to please Kaikeyi', even that statement would become a falsehood."

श्लोक ८-११

अपुत्रेण मया पुत्रः श्रमेण महता महान्। रामो लब्धो महातेजाः स कथं त्यज्यते मया॥ ८॥ शूरश्च कृतविद्यश्च जितक्रोधः क्षमापरः। कथं कमलपत्राक्षो मया रामो विवास्यते॥ ९॥ कथमिन्दीवरश्यामं दीर्घबाहुं महाबलम्। अभिराममहं रामं स्थापयिष्यामि दण्डकान्॥ १०॥ सुखानामुचितस्यैव दुःखैरनुचितस्य च। दुःखं नामानुपश्येयं कथं रामस्य धीमतः॥ ११॥

  • हिंदी व्याख्या: "मैंने अपुत्र रहते हुए बड़े भारी परिश्रम से महातेजस्वी पुत्र राम को प्राप्त किया था, भला उस पुत्र का मैं त्याग कैसे कर सकता हूँ? शूरवीर, शिक्षित, क्रोध को जीतने वाले, क्षमाशील और कमल जैसी बड़ी आँखों वाले उन राम को मैं वन में कैसे भेज सकता हूँ? नीले कमल के समान श्यामवर्ण, लंबी भुजाओं वाले, महाबली और सबके प्रिय राम को मैं दण्डकारण्य में कैसे बसा सकता हूँ? जो केवल सुखों के ही योग्य हैं और जिन्होंने कभी दुख देखा ही नहीं, उन बुद्धिमान राम को मैं कष्ट भोगते हुए कैसे देख पाऊँगा?"
  • English Translation: "Childless as I was, with immense toil I obtained that glorious son Rama; how can I ever abandon him? Valiant, accomplished, conqueror of anger, forgiving, and lotus-eyed—how can I banish such a Rama? How can I dispatch to the Dandaka forest that delightful Rama, dark like a blue lotus, long-armed, and mighty? How could I bear to witness suffering befalling the wise Rama, who is accustomed solely to happiness and entirely unacquainted with misery?"

श्लोक १२-१५

यदि दुःखमकृत्वा तु मम संक्रमणं भवेत्। अदुःखार्हस्य रामस्य ततः सुखमवाप्नुयाम्॥ १२॥ नृशंसे पापसंकल्पे रामं सत्यपराक्रमम्। किं विप्रियेण कैकेयि प्रियं योजयसे मम॥ १३॥ अकीर्तिरतुला लोके ध्रुवः परिभविष्यति। तथा विलपतस्तस्य परिभ्रमितचेतसः॥ १४॥ अस्तमभ्यागमत् सूर्यो रजनी चाभ्यवर्तत। सा त्रियामा तदार्तस्य चन्द्रमण्डलमण्डिता॥ १५॥

  • हिंदी व्याख्या: "यदि मेरे प्राण जाने से उस अदुःखी राम को कोई कष्ट न पहुँचे, तभी मुझे सुख मिल सकता है। हे नृशंसे (निर्दयी) और पाप-संकल्प वाली कैकेयी! सत्यपराक्रमी राम का अहित करके तू मुझे कौन सा प्रिय दिलाना चाहती है? संसार में मेरी अतुलनीय अकीर्ति और निश्चित रूप से मेरा अपमान होगा।" इस प्रकार विलाप करते हुए और भ्रमित चित्त वाले उन राजा के विलाप करते-करते सूर्य अस्त हो गए और रात्रि आ गई। चंद्रमा के मंडल से सुशोभित वह त्रिजामा (रात्रि) उस दुखी राजा के लिए व्यतीत होने लगी।
  • English Translation: "If my departure could take place without causing any sorrow to the undeserving Rama, then indeed I might attain peace. O cruel and sinful-minded Kaikeyi, by doing this unpleasing act to the truth-valorous Rama, what happiness are you trying to bestow upon me? Unmatched infamy and certain humiliation await me in this world." As the king thus lamented with a deranged and wandering mind, the sun set and night approached. Adorned with the orb of the moon, that night began to wear on for the distressed monarch.

श्लोक १६-१९

राज्ञो विलपमानस्य न व्यभासत शर्वरी। सदैवोष्णं विनिःश्वस्य वृद्धो दशरथो नृपः॥ १६॥ विललापार्तवद् दुःखं गगनासक्तलोचनः। न प्रभातं त्वयेच्छामि निशे नक्षत्रभूषिते॥ १७॥ क्रियतां मे दया भद्रे मयायं रचितोऽञ्जलिः। अथवा गम्यतां शीघ्रं नाहमिच्छामि निर्घृणाम्॥ १८॥ नृशंंसां केकयीं द्रष्टुं यत्कृते व्यसनं मम। एवमुक्त्वा ततो राजा कैकेयीं संयताञ्जलिः॥ १९॥

  • हिंदी व्याख्या: विलाप करते हुए राजा के लिए वह रात बीतती नहीं प्रतीत हो रही थी। वृद्ध राजा दशरथ बार-बार गर्म साँसें छोड़ते हुए आकाश की ओर टकटकी लगाकर किसी आर्त (पीड़ित) व्यक्ति की तरह दुखपूर्वक विलाप करने लगे—"हे नक्षत्रों से भूषित रात्रि! मैं नहीं चाहता कि तू प्रभात (सवेरा) बने। हे भद्रे! मुझ पर दया कर, मैं तेरे सामने हाथ जोड़ता हूँ! अथवा तू जल्दी से बीत जा, क्योंकि मैं अब इस निर्घृण और नृशंस कैकेयी का मुख देखना नहीं चाहता, जिसके कारण मुझ पर यह विपत्ति आई है।" ऐसा कहकर, हाथ जोड़े हुए राजा ने कैकेयी से फिर कहा—
  • English Translation: For the lamenting king, that night seemed endless. Sighing heavily again and again, the aged King Dasharatha gazed up at the sky and lamented piteously like one in agony: "O star-adorned night, I do not wish for you to dawn into morning! Have mercy upon me, O blessed one; I join my palms before you! Or rather, depart swiftly, for I no longer desire to look upon this pitiless and cruel Kaikeyi, on whose account this calamity has befallen me." Having spoken thus, with joined palms, the king addressed Kaikeyi once more:

श्लोक २०-२३

प्रसादयामास पुनः कैकेयीं राजधर्मवित्। साधुवृत्तस्य दीनस्य त्वद्‍गतस्य गतायुषः॥ २०॥ प्रसादः क्रियतां भद्रे देवि राज्ञो विशेषतः। शून्ये न खलु सुश्रोणि मयेदं समुदाहृतम्॥२१ ॥ कुरु साधुप्रसादं मे बाले सहृदया ह्यसि। प्रसीद देवि रामो मे त्वद्दत्तं राज्यमव्ययम्॥ २२॥ लभतामसितापाङ्गे यशः परमवाप्स्यसि। मम रामस्य लोकस्य गुरूणां भरतस्य च। प्रियमेतद् गुरुश्रोणि कुरु चारुमुखेक्षणे॥ २३॥

  • हिंदी व्याख्या: राजधर्म को जानने वाले उन राजा ने भली-भांति आचरण करने वाले, दीन और अपने प्राणों को गँवा चुके उस वृद्ध राजा की स्थिति में कैकेयी को फिर से मनाया—"हे भद्रे! हे देवि! राजा पर कृपा करो, विशेषकर मुझ जैसे दुखी पर। हे सुश्रोणि! मैं यह बात किसी निर्जन में या बिना सोचे-समझे नहीं कह रहा हूँ। मुझ पर भलाई और कृपा करो, हे बाले! तुम हृदय वाली हो। हे देवि! प्रसन्न हो जाओ, जिससे काले नेत्रों के कोनों वाली हे सुंदरी! मेरा राम तुम्हारे द्वारा दिया गया यह अक्षय राज्य प्राप्त करे और तुम परम यश प्राप्त करोगी। हे सुंदर मुख और नेत्रों वाली! मेरा, राम का, इस समस्त लोक का, गुरुजनों का और भरत का भी यह प्रिय कार्य करो।"
  • English Translation: The king, well-versed in statecraft, once more sought to appease Kaikeyi, speaking as one of virtuous conduct, helpless, and on the brink of losing his life: "O blessed lady, O Queen, show grace to a king, especially to one so distressed. O beautiful-hipped one, I do not speak these words in vain or thoughtlessly. Do grant me this grace; O gentle lady, you possess a heart. Be gracious, O Queen, so that my Rama may obtain this eternal kingdom bestowed by you, and you shall attain supreme renown. O large-eyed beauty with a lovely face and gaze, do this dear service for me, for Rama, for the world, for the preceptors, and for Bharata as well."

श्लोक २४-२५

विशुद्धभावस्य हि दुष्टभावा दीनस्य ताम्राश्रुकलस्य राज्ञः। श्रुत्वा विचित्रं करुणं विलापं भर्तुर्नृशंसा न चकार वाक्यम्॥ २४॥ ततः स राजा पुनरेव मूर्च्छितः प्रियामतुष्टां प्रतिकूलभाषिणीम्। समीक्ष्य पुत्रस्य विवासनं प्रति क्षितौ विसंज्ञो निपपात दुःखितः॥ २५॥

  • हिंदी व्याख्या: विशुद्ध हृदय वाले, दुष्ट भावों से रहित, दीन और रोते-रोते जिनकी आँखें लाल हो चुकी थीं, ऐसे उस राजा के उस विचित्र और करुण विलाप को सुनकर भी उस नृशंस (निर्दयी) कैकेयी ने पति के प्रति कोई अनुकूल वचन नहीं कहा (उसका दिल नहीं पसीजा)। तत्पश्चात, अपनी उस असंतुष्ट और प्रतिकूल बोलने वाली प्रियतमा पत्नी को देखकर तथा पुत्र के वनवास के विचार से वे राजा पुनः मूर्च्छित हो गए और अत्यंत दुखी होकर अचेत अवस्था में पृथ्वी पर गिर पड़े।
  • English Translation: Hearing that strange and piteous lament of the king—whose heart was pure, while hers was wicked, and whose eyes were reddened with tears of helplessness—that cruel Kaikeyi uttered not a single yielding word to her husband. Thereafter, beholding his displeased and contrarily speaking beloved wife, and agonizing over the exile of his son, the king once again lost consciousness and collapsed upon the ground, utterly overwhelmed with grief.

श्लोक २६

इतीव राज्ञो व्यथितस्य सा निशा जगाम घोरं श्वसतो मनस्विनः। विबोध्यमानः प्रतिबोधनं तदा निवारयामास स राजसत्तमः॥ २६॥

  • हिंदी व्याख्या: इस प्रकार अत्यधिक व्यथित होकर लंबी-लंबी साँसें लेते हुए उन मनस्वी राजा की वह घोर रात्रि बड़ी कठिनाई से कटी। उस समय प्रतिबोध (सांत्वना) दिए जाने पर भी उन श्रेष्ठ राजा ने किसी के भी द्वारा दी जा रही सांत्वना को स्वीकार नहीं किया (उसे रोक दिया)।
  • English Translation: Thus passed that dreadful night for the distressed and heavy-sighing, noble-minded king. Even when attempts were made to rouse or console him, that best of monarchs rejected all solace.

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे त्रयोदशः सर्गः ॥२-१३॥ (इस प्रकार महर्षि वाल्मीकि रचित आदिकाव्य श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के अयोध्याकाण्ड का तेरहवाँ सर्ग पूर्ण हुआ।)


इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे त्रयोदशः सर्गः ॥२-१३॥