श्रीरामायण पाठ — अयोध्याकाण्डे द्वादशः सर्गः ॥२-१२॥
श्रीमद्वाल्मीकियरामायणे अयोध्याकाण्डे द्वादशः सर्गः ॥२-१२॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के अयोध्याकाण्ड के द्वादश सर्ग (२-१२) के सभी ११२ श्लोकों का क्रमवार हिंदी एवं अंग्रेजी अनुवाद व व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:
श्लोक १-३
ततः श्रुत्वा महाराजः कैकेय्या दारुणं वचः। चिन्तामभिसमापेदे मुहूर्तं प्रतताप च॥ १॥ किं नु मेऽयं दिवास्वप्नश्चित्तमोहोऽपि वा मम। अनुभूतोपसर्गो वा मनसो वाप्युपद्रवः॥ २॥ इति संचिन्त्य तद् राजा नाध्यगच्छत् तदासुखम्। प्रतिलभ्य ततः संज्ञां कैकेयीवाक्यतापितः॥ ३॥
- हिंदी व्याख्या: कैकेयी के उन कठोर वचनों को सुनकर महाराज दशरथ गहरी चिंता में डूब गए और एक मुहूर्त तक (क्रोध और दुख से) संतप्त होते रहे। उन्होंने सोचा—"क्या यह मेरा कोई दिन का सपना है, अथवा मेरा चित्त भ्रमित हो गया है? या मैंने किसी भयंकर उपसर्ग (संकट) का अनुभव किया है अथवा यह मेरे मन का कोई उपद्रव है?" ऐसा सोचकर राजा को कहीं भी सुख (शांति) नहीं मिली। इसके बाद जब उन्हें अपनी सुध-बुध (संज्ञा) वापस मिली, तब कैकेयी के उन वचनों से संतप्त हुए राजा...
- English Translation: Hearing those harsh words of Kaikeyi, the great king fell into deep anxiety and remained scorched with anguish for a moment. He thought: "Is this a day-dream of mine, or a delusion of my mind? Or have I experienced some affliction or mental disturbance?" Pondering thus, the king found no comfort anywhere. Regaining his consciousness, tormented by Kaikeyi's words...
श्लोक ४-६
व्यथितो विक्लवश्चैव व्याघ्रीं दृष्ट्वा यथा मृगः। असंवृतायामासीनो जगत्यां दीर्घमुच्छ्वसन्॥ ४॥ मण्डले पन्नगो रुद्धो मन्त्रैरिव महाविषः। अहो धिगिति सामर्षो वाचमक्त्वा नराधिपः॥ ५॥ मोहम् आपेदिवान् भूयः शोकोपहतचेतनः। चिरेण तु नृपः संज्ञां प्रतिलभ्य सुदुःखितः॥ ६॥
- हिंदी व्याख्या: ...व्याघ्री को देखकर कोई मृग जैसे अत्यंत व्यथित और विह्वल हो जाता है, वैसे ही वे व्यथित हो गए। वे खुले फर्श (जगत्यां) पर ही बैठ गए और लंबी-लंबी साँसें छोड़ने लगे। जिस प्रकार कोई महाविषैला सर्प मंत्रों द्वारा मण्डल (घेरे) में रोक लिया जाता है, वैसे ही वे कैकेयी की बातों से बंध गए थे। "अहो! धिक्कार है!" ऐसा रोषयुक्त वचन बोलकर, शोक से जिनकी चेतना नष्ट हो चुकी थी, वे राजा पुनः मूर्च्छित (मोह को प्राप्त) हो गए। बहुत देर बाद राजा ने अपनी सुध-बुध पुनः प्राप्त की और अत्यंत दुखी होकर...
- English Translation: ...he became distressed and agitated, just like a deer beholding a tigress. Seated right upon the bare floor, he let out long, heavy sighs. Like a fiercely venomous snake trapped within a circle by chants, the ruler of men was cornered by her words. Uttering an indignant cry of "Alas, fie upon this!", his consciousness overwhelmed by sorrow, the king once again sank into a swoon. After a long while, regaining his consciousness, deeply grieved...
श्लोक ७-९
कैकेयीमब्रवीत् क्रुद्धो निर्दहन्निव तेजसा। नृशंसे दुष्टचारित्रे कुलस्यास्य विनाशिनि॥ ७॥ किं कृतं तव रामेण पापे पापं मयापि वा। सदा ते जननीतुल्यां वृत्तिं वहति राघवः॥ ८॥ तस्यैवं त्वमनर्थाय किंनिमित्तमिहोद्यता। त्वं मयाऽऽत्मविनाशाय भवनं स्वं निवेशिता॥ ९॥
- हिंदी व्याख्या: ...क्रुद्ध होकर अपनी तेजस्विता से कैकेयी को मानो भस्म करते हुए बोले—"हे नृशंस (निर्दयी), दुष्ट आचरण वाली और इस इक्ष्वाकु कुल का नाश करने वाली पापिन! मेरे राम ने या मैंने तेरा क्या पाप (बिगाड़) किया है? राघव हमेशा तुम्हारे प्रति माता के समान आदरपूर्ण व्यवहार करते हैं। ऐसे राम के अनर्थ के लिए तू किस कारण से यहाँ उद्यत हुई है? मैंने तो तुझे अपने आत्मनाश (विनाश) के लिए ही अपने इस भवन में लाकर बसाया था!"
- English Translation: ...speaking with fierce anger, as if consuming her with his radiance, he said to Kaikeyi: "O cruel one, of wicked conduct, destroyer of this lineage and sinner! What wrong has my Rama done to you, or even I? राघव (Raghava) always maintains toward you an attitude equal to that of a mother. Why then are you striving thus for the ruin of such a person? Indeed, I brought you into my own palace only for my own self-destruction!"
श्लोक १०-१२
अविज्ञानान्नृपसुता व्याला तीक्ष्णविषा यथा। जीवलोको यदा सर्वो रामस्याह गुणस्तवम्॥ १०॥ अपराधं कमुद्दिश्य त्यक्ष्यामीष्टमहं सुतम्। कौसल्यां च सुमित्रां च त्यजेयमपि वा श्रियम्॥ ११॥ जीवितं चात्मनो रामं न त्वेव पितृवत्सलम्। परा भवति मे प्रीतिर्दृष्ट्वा तनयमग्रजम्॥ १२॥
- हिंदी व्याख्या: "अज्ञानता के कारण राजा की पुत्री (तू) तीक्ष्ण विष वाली दुष्ट नागिन के समान निकली! जब यह सारा संसार राम के गुणों की प्रशंसा करता है, तो मैं किस अपराध को आधार बनाकर अपने उस प्रिय पुत्र का त्याग कर दूँ? मैं कौसल्या, सुमित्रा और यहाँ तक कि अपने ऐश्वर्य (लक्ष्मी) का भी त्याग कर सकता हूँ, अपने प्राणों का भी त्याग कर सकता हूँ, किंतु पिता से प्रेम करने वाले उस राम का त्याग कभी नहीं कर सकता! अपने इस ज्येष्ठ पुत्र को देखकर मुझे परम आनंद (प्रेम) प्राप्त होता है।"
- English Translation: "Out of ignorance, you, a king's daughter, turned out to be like a fiercely venomous female serpent! When the entire living world sings the praise of Rama's virtues, on account of what fault should I abandon my beloved son? I might abandon Kausalya, Sumitra, or even my royal sovereignty and my very life, but never shall I abandon Rama, who is so devoted to his father. Supreme joy fills my heart whenever I behold my eldest son."
श्लोक १३-१६
अपश्यतस्तु मे रामं नष्टं भवति चेतनम्। तिष्ठेल्लोको विना सूर्यं सस्यं वा सलिलं विना॥ १३॥ न तु रामं विना देहे तिष्ठेत्तु मम जीवितम्। तदलं त्यज्यतामेष निश्चयः पापनिश्चये॥ १४॥ अपि ते चरणौ मूर्ध्ना स्पृशाम्येष प्रसीद मे। किमर्थं चिन्तितं पापे त्वया परमदारुणम्॥ १५॥ अथ जिज्ञाससे मां त्वं भरतस्य प्रियाप्रिये। अस्तु यत्तत्त्वया पूर्वं व्याहृतं राघवं प्रति॥ १६॥
- हिंदी व्याख्या: "राम को न देखने पर तो मेरी चेतना ही नष्ट हो जाती है। संसार भले ही सूर्य के बिना या फसलें जल के बिना जीवित रह सकती हैं, किंतु राम के बिना इस शरीर में मेरा जीवन नहीं टिक सकता। इसलिए हे पापनिश्चये! अब इस जिद को छोड़ दे, तेरा यह निश्चय त्यागने योग्य है। मैं अपने मस्तक से तेरे चरणों का स्पर्श करता हूँ, मुझ पर प्रसन्न हो जा! हे पापे! तूने इस अत्यंत दारुण बात की चिंता क्यों की? अथवा यदि तू मुझसे भरत की प्रियाप्रिय (रुचि) की परीक्षा लेना चाहती थी, तो वही हो जो तूने पहले राम के विषय में कहा था (अर्थात् भरत ही राजा हों)..."
- English Translation: "Without beholding Rama, my consciousness is utterly destroyed. The world might endure without the sun, or crops without water, but my life cannot remain in this body without Rama. Therefore, enough! Let this resolve be abandoned, O wicked-minded one. I touch your feet with my head; do be gracious to me. Why have you conceived such a supreme cruelty, O sinner? Or if you were only testing me regarding Bharata's preferences, let it be just as you declared earlier regarding Raghava..."
श्लोक १७-२०
स मे ज्येष्ठसुतः श्रीमान् धर्मज्येष्ठ इतीव मे। तत् त्वया प्रियवादिन्या सेवार्थं कथितं भवेत्॥ १७॥ तच्छ्रुत्वा शोकसंतप्ता संतापयसि मां भृशम्। आविष्टासि गृहे शून्ये सा त्वं परवशं गता॥ ८१॥ (तथा १८) इक्ष्वाकूणां कुले देवि सम्प्राप्तः सुमहानयम्। अनयो नयसम्पन्ने यत्र ते विकृता मतिः॥ १९॥ नहि किंचिदयुक्तं वा विप्रियं वा पुरा मम। अकरोस्त्वं विशालाक्षि तेन न श्रद्दधामि ते॥ २०॥
- हिंदी व्याख्या: "...कि मेरा वह श्रीमान् ज्येष्ठ पुत्र धर्म में सबसे श्रेष्ठ है—वह बात तूने केवल प्रिय बोलने के लिए मेरी सेवा (प्रसन्नता) हेतु कही होगी। तू उस बात को सुनकर शोक से संतप्त हो उठी है और मुझे अत्यधिक संताप दे रही है। लगता है तू इस सूने घर में किसी बुरी शक्ति से आविष्ट (प्रभावित) हो गई है और परवश हो गई है। हे देवि! इक्ष्वाकुओं के इस कुल में यह कितना महान अनर्थ आ पड़ा है, जहाँ नीति-कुशल होने पर भी तेरी बुद्धि इतनी विकृत हो गई है! हे विशालाक्षि! तूने पहले कभी मेरा कोई अयुक्त या अप्रिय कार्य नहीं किया था, इसीलिए मैं तेरी इस बात पर विश्वास नहीं कर पा रहा हूँ।"
- English Translation: "...that my glorious eldest son is supreme in righteousness—perhaps you said that merely as a sweet pleasantry to please me. Hearing that, you have become consumed with grief and are torturing me intensely. It seems you have been possessed by some evil influence in this empty house and have fallen under another's sway. O Queen, what a mighty unrighteousness has befallen the Ikshvaku lineage, where you, ordinarily wise in polity, have had your mind so perverted! O large-eyed lady, never before have you done anything improper or unpleasing to me, and that is why I cannot bring myself to believe you."
श्लोक २१-२४
ननु ते राघवस्तुल्यो भरतेन महात्मना। बहुशो हि स्म बाले त्वं कथाः कथयसे मम॥ २१॥ तस्य धर्मात्मनो देवि वने वासं यशस्विनः। कथं रोचयसे भीरु नव वर्षाणि पञ्च च॥ २२॥ अत्यन्तसुकुमारस्य तस्य धर्मे कृतात्मनः। कथं रोचयसे वासमरण्ये भृशदारुणे॥ २३॥ रोचयस्यभिरामस्य रामस्य शुभलोचने। तव शुश्रूषमाणस्य किमर्थं विप्रवासनम्॥ २४॥
- हिंदी व्याख्या: "क्या राघव तेरे लिए महात्मा भरत के ही तुल्य नहीं हैं? हे बाले (भोली)! तूने स्वयं मुझसे अनेक बार ऐसी कथाएँ कही हैं। हे देवि! उस धर्मात्मा और यशस्वी राम का चौदह वर्ष (नव और पाँच वर्ष) तक वन में रहना तुझे कैसे रुचिकर लग रहा है? हे भीरु! अत्यंत सुकुमार और धर्म में स्थिर चित्त वाले उन राम का उस अत्यंत भयानक अरण्य (वन) में रहना तुझे कैसे अच्छा लग रहा है? हे सुंदर नेत्रों वाली! सबका अभिराम (प्रिय) करने वाले और तेरी सदा सेवा करने वाले उन राम का विप्रवासन (वनवास) तू किस प्रयोजन से चाहती है?"
- English Translation: "Is not Raghava equal to you as the noble Bharata? O innocent one, you yourself have often recounted such tales to me. O Queen, how can you desire the residence in the forest for fourteen years of that righteous and glorious Rama? O timid one, how can you wish for the dwelling in that extremely dreadful forest of one who is supremely tender and steadfast in righteousness? O beautiful-eyed lady, why do you desire the exile of that delightful Rama, who is ever devoted to serving you?"
श्लोक २५-२८
रामो हि भरताद् भूयस्तव शुश्रूषते सदा। विशेषं त्वयि तस्मात् तु भरतस्य न लक्षये॥ २५॥ शुश्रूषां गौरवं चैव प्रमाणं वचनक्रियाम्। कस्तु भूयस्तरं कुर्यादन्यत्र पुरुषर्षभात्॥ २६॥ बहूनां स्त्रीसहस्राणां बहूनां चोपजीविनाम्। परिवादोऽपवादो वा राघवे नोपपद्यते॥ २७॥ सान्त्वयन् सर्वभूतानि रामः शुद्धेन चेतसा। गृह्णाति मनुजव्याघ्रः प्रियैर्विषयवासिनः॥ २८॥
- हिंदी व्याख्या: "राम तो भरत से भी बढ़कर हमेशा तेरी सेवा करते हैं, इसीलिए मैं तुझमें और भरत में कोई विशेष अंतर नहीं देखता। सेवा, आदर, आज्ञापालन और वचनों का पालन—इन सबमें पुरुषों में श्रेष्ठ राम से बढ़कर और कौन अधिक कर सकता है? हज़ारों स्त्रियों और हज़ारों आश्रित सेवकों के बीच रहने पर भी राघव पर कभी कोई निंदा या कलंक का आरोप नहीं आया। समस्त प्राणियों को अपने शुद्ध चित्त से सांत्वना देते हुए मनुष्यों में बाघ के समान वे राम अपने प्रिय व्यवहार से इस देश के सभी वासियों के मन को जीत लेते हैं।"
- English Translation: "Rama indeed serves you always even more than Bharata; therefore I perceive no special distinction in your affection toward Bharata over Rama. In service, reverence, honoring commands, and fulfilling words, who could do more than that best of men? Amidst thousands of women and thousands of dependents, not a single whisper of reproach or scandal has ever attached to Raghava. Consoling all beings with a pure heart, that tiger among men wins over the inhabitants of the realm through his endearing ways."
श्लोक २९-३२
सत्येन लोकाञ् जयति द्विजान् दानेन राघवः। गुरूञ् छुश्रूषया वीरो धनुषा युधि शात्रवान्॥ २९॥ सत्यं दानं तपस्त्यागो मित्रता शौचमार्जवम्। विद्या च गुरुशुश्रूषा ध्रुवाण्येतानि राघवे॥ ३०॥ तस्मिन्नार्जवसम्पन्ने देवि देवोपमे कथम्। पापमाशंससे रामे महर्षिसमतेजसि॥ ३१॥ न स्मराम्यप्रियं वाक्यं लोकस्य प्रियवादिनः। स कथं त्वत्कृते रामं वक्ष्यामि प्रियमप्रियम्॥ ३२॥
- हिंदी व्याख्या: "राघव सत्य के द्वारा लोकों को जीतते हैं, दान के द्वारा ब्राह्मणों को जीतते हैं, गुरुओं की सेवा के द्वारा वीरों को जीतते हैं और युद्ध में अपने धनुष से शत्रुओं को जीतते हैं। सत्य, दान, तप, त्याग, मित्रता, शुचिता (पवित्रता), आर्जव (सरलता), विद्या और गुरु-सेवा—ये सभी गुण निश्चित रूप से राघव में निवास करते हैं। हे देवि! देवतुल्य, सरलता से संपन्न और महर्षियों के समान तेज वाले उन राम में तू ऐसा पापपूर्ण विचार कैसे ला रही है? संसार के प्रियवादी, जिन्होंने कभी किसी से कोई अप्रिय वचन नहीं कहा, ऐसे राम को मैं तेरे कहने पर कैसे कोई अप्रिय या कठोर बात कह सकता हूँ?"
- English Translation: "Raghava conquers the worlds through truth, Brahmins through generosity, elders through service, and foes in battle through his bow. Truth, charity, penance, renunciation, friendship, purity, uprightness, learning, and service to preceptors—all these abide firmly in Raghava. O Queen, who are godlike, how can you harbor such a sinful thought regarding Rama, who is endowed with uprightness and possesses radiance equal to a great sage? I do not remember a single unpleasing word spoken by him who speaks kindly to all. How then can I utter an unpleasing word to Rama for your sake?"
श्लोक ३३-३६
क्षमा यस्मिंस्तपस्त्यागः सत्यं धर्मः कृतज्ञता। अप्यहिंसा च भूतानां तमृते कागतिर्मम॥ ३३॥ मम वृद्धस्य कैकेयि गतान्तस्य तपस्विनः। दीनं लालप्यमानस्य कारुण्यं कर्तुमर्हसि॥ ३४॥ पृथिव्यां सागरान्तायां यत् किंचिदधिगम्यते। तत् सर्वं तव दास्यामि मा च त्वं मन्युमाविश॥ ३५॥ अञ्जलिं कुर्मि कैकेयि पादौ चापि स्पृशामि ते। शरणं भव रामस्य माधर्मो मामिह स्पृशेْت॥ ३६॥
- हिंदी व्याख्या: "जिसमें क्षमा, तप, त्याग, सत्य, धर्म, कृतज्ञता और सभी प्राणियों के प्रति अहिंसा निवास करती है, उस राम के बिना मेरी क्या गति होगी? हे कैकेयी! मुझ वृद्ध, अंतकाल के समीप पहुँचे हुए, तपस्वी और दीन होकर विलाप करने वाले पर तुझे करुणा करनी चाहिए। इस समुद्र-पर्यन्त संपूर्ण पृथ्वी पर जो कुछ भी संपदा प्राप्त होती है, वह सब मैं तुझे दे दूंगा, तू अपने मन में क्रोध मत ला। हे कैकेयी! मैं तेरे सामने हाथ जोड़ता हूँ और तुम्हारे चरणों का स्पर्श करता हूँ, तू राम की शरण बन जा (उनकी रक्षा कर), जिससे मुझे यह अधर्म न स्पृशे।"
- English Translation: "In whom reside forgiveness, penance, renunciation, truth, righteousness, gratitude, and harmlessness toward all beings—what is my destiny without him? O Kaikeyi, you ought to show compassion to me, an aged ascetic approaching the end of his life, who am lamenting so pathetically. Whatever wealth is attainable upon this earth bounded by oceans, I shall give it all to you; do not give in to anger. O Kaikeyi, I join my palms before you and touch your feet; be a protector to Rama so that this unrighteousness may not touch me."
श्लोक ३७-४०
इति दुःखाभिसंतप्तं विलपन्तमचेतनम्। घूर्णमानं महाराजं शोकेन समभिप्लुतम्॥ ३७॥ पारं शोकार्णवस्याशु प्रार्थयन्तं पुनः पुनः। प्रत्युवाचाथ कैकेयी रौद्रा रौद्रतरं वचः॥ ३८॥ यदि दत्त्वा वरौ राजन् पुनः प्रत्यनुतप्यसे। धार्मिकत्वं कथं वीर पृथिव्यां कथयिष्यसि॥ ३९॥ यदा समेता बहवस्त्वया राजर्षयः सह। कथयिष्यन्ति धर्मज्ञ तत्र किं प्रतिवक्ष्यसि॥ ४०॥
- हिंदी व्याख्या: इस प्रकार दुख से संतप्त, विलाप करते हुए, अचेत से हो रहे, शोक से घिरे हुए और चक्कर खाते हुए महाराज जब बार-बार शोक के उस समुद्र से पार पाने की प्रार्थना कर रहे थे, तब उस रौद्र स्वभाव वाली कैकेयी ने उन्हें और भी अधिक रौद्र (कठोर) वचन कहे—"हे राजन्! यदि दो वरदान देकर आप फिर पश्चाताप कर रहे हैं, तो हे वीर! आप इस पृथ्वी पर अपनी धार्मिकता का दावा कैसे करेंगे? हे धर्मज्ञ! जब बहुत से राजर्षि आपके साथ एकत्रित होकर इस विषय में चर्चा करेंगे, तब आप उन्हें क्या उत्तर देंगे?"
- English Translation: Thus while the great king, scorched by grief, lamenting, half-conscious, reeling, overwhelmed by sorrow, kept praying repeatedly to cross the ocean of grief, the cruel-natured Kaikeyi spoke words even more fierce to him: "O King, if having granted two boons you repent afterward, how, O hero, will you proclaim your righteousness upon this earth? O knower of dharma, when many royal sages gather with you and speak of this, what reply will you give them?"
श्लोक ४१-४४
यस्याः प्रसादे जीवामि या च मामभ्यपालयत्। तस्याः कृता मया मिथ्या कैकेय्या इति वक्ष्यसि॥ ४१॥ किल्बिषं त्वं नरेन्द्राणां करिष्यसि नराधिप। यो दत्त्वा वरमद्यैव पुनरन्यानि भाषसे॥ ४२॥ शैब्यः श्येनकपोतीये स्वमांसं पक्षिणे ददौ। अलर्कश्चक्षुषी दत्त्वा जगाम गतिमुत्तमाम्॥ ४३॥ सागरः समयं कृत्वा न वेलामतिवर्तते। समयं मानृतं कार्षीः पूर्ववृत्तमनुस्मरन्॥ ४४॥
- हिंदी व्याख्या: "आप यही कहेंगे कि 'जिसकी कृपा से मैं जीवित रहा और जिसने मेरी रक्षा की, उसी कैकेयी के साथ मैंने झूठा वादा किया।' हे नराधिप! राजाओं में आप यह कलंक लगा बैठेंगे कि वर देकर आज आप फिर दूसरी बातें कर रहे हैं। राजा शिबि ने कबूतर के लिए बाज को अपना मांस दे दिया था और राजा अलर्क ने अपनी आँखें निकालकर दान कर दी थीं तथा उत्तम गति को प्राप्त हुए थे। समुद्र भी मर्यादा का नियम करके कभी अपनी सीमा (वेला) का उल्लंघन नहीं करता। अतः आप अपने प्राचीन इतिहास का स्मरण करते हुए अपनी इस प्रतिज्ञा को असत्य मत कीजिए।"
- English Translation: "You will say: 'I broke my promise made to Kaikeyi, through whose grace I live and who protected me.' O ruler of men, you will incur the sin of kings by granting boons and then speaking contrarily on the very same day. King Shibhi gave his own flesh to a hawk for the sake of a pigeon, and Alarka gave away his eyes to attain the highest state. Even the ocean, bound by an agreement, never transgresses its shore. Remembering your noble past, do not falsify your word."
श्लोक ४५-४८
स त्वं धर्मं परित्यज्य रामं राज्येऽभिषिच्य च। सह कौसल्यया नित्यं रन्तुमिच्छसि दुर्मते॥ ४५॥ भवत्वधर्मो धर्मो वा सत्यं वा यदि वानृतम्। यत्त्वया संश्रुतं मह्यं तस्य नास्ति व्यतिक्रमः॥ ४६॥ अहं हि विषमद्यैव पीत्वा बहु तवाग्रतः। पश्यतस्ते मरिष्यामि रामो यद्यभिषिच्यते॥ ४७॥ एकाहमपि पश्येयं यद्यहं राममातरम्। अञ्जलिं प्रतिगृह्णन्तीं श्रेयो ननु मृतिर्मम॥ ४८॥
- हिंदी व्याख्या: "अरे दुर्मते! क्या तू धर्म को त्यागकर और राम का राज्य में अभिषेक करके हमेशा कौसल्या के साथ आनंद मनाना चाहता है? चाहे यह अधर्म हो या धर्म, सत्य हो या असत्य, जो कुछ भी आपने मुझे वचन दिया है, उसका उल्लंघन नहीं होना चाहिए। यदि राम का अभिषेक हुआ, तो मैं आपके देखते-देखते आज ही बहुत सा विष पीकर मर जाऊँगी! यदि मैं एक दिन भी राम की माता (कौसल्या) को मुझसे अंजलि (प्रणाम) ग्रहण करते हुए देख लूँ, तो इससे तो यही अच्छा है कि मैं मर जाऊँ!"
- English Translation: "O evil-minded one, abandoning righteousness and consecrating Rama to the kingdom, do you wish to make merry with Kausalya forever? Let it be unrighteousness or righteousness, truth or untruth—whatever you have solemnly promised me admits of no transgression. If Rama is consecrated, I shall drink plenty of poison right before your eyes and die today while you watch! If I were to behold Rama's mother accepting my salutations even for a single day, death would surely be better for me!"
श्लोक ४९-५२
भरतेनात्मना चाहं शपे ते मनुजाधिप। यथा नान्येन तुष्येयमृते रामविवासनात्॥ ४९॥ एतावदुक्त्वा वचनं कैकेयी विरराम ह। विलपन्तं च राजानं न प्रतिव्याजहार सा॥ ५०॥ श्रुत्वा तु राजा कैकेय्या वाक्यं परमशोभनम्। रामस्य च वने वासमैश्वर्यं भरतस्य च॥ ५१॥ नाभ्यभाषत कैकेयीं मुहूर्तं व्याकुलेन्द्रियः। प्रैक्षतानिमिषो देवीं प्रियामप्रियवादिनीम्॥ ५२॥
- हिंदी व्याख्या: "हे मनुजाधिप! मैं अपने और भरत की शपथ लेकर कहती हूँ कि राम के वनवास के सिवा और किसी भी बात से मुझे संतोष नहीं हो सकता।" इतनी बात कहकर कैकेयी चुप हो गई। विलाप करते हुए राजा को देखकर उसने फिर कोई उत्तर नहीं दिया। कैकेयी के उन अत्यंत कठोर वचनों को—जिन्हें वह अपने लिए उत्तम मान रही थी—राम के वनवास और भरत के ऐश्वर्य की बात को सुनकर, व्याकुल इंद्रियों वाले राजा दशरथ एक मुहूर्त तक कैकेयी से कुछ न बोल सके। वे पलक झपकाए बिना उस अप्रिय बात बोलने वाली प्रियतमा देवी को लगातार देखते रहे।
- English Translation: "O ruler of men, I swear by myself and by Bharata that I shall not be satisfied by anything other than Rama's exile." Having said this much, Kaikeyi fell silent. She made no further reply to the lamenting king. Hearing Kaikeyi's terribly harsh words—the exile of Rama and the sovereignty of Bharata—the king, with bewildered senses, remained silent for a moment, staring unflinchingly at the queen who uttered such unpalatable things.
श्लोक ५३-५५
तां हि वज्रसमां वाचमाकर्ण्य हृदयाप्रियाम्। दुःखशोकमयीं श्रुत्वा राजा न सुखितोऽभवत्॥ ५३॥ स देव्या व्यवसायं च घोरं च शपथं कृतम्। ध्यात्वा रामेति निःश्वस्य च्छिन्नस्तरुरिवापतत्॥ ५४॥ नष्टचित्तो यथोन्मत्तो विपरीतो यथातुरः। हृततेजा यथा सर्पो बभूव जगतीपतिः॥ ५५॥
- हिंदी व्याख्या: हृदय को चीर देने वाली वज्र के समान उस अप्रिय तथा दुख-शोक से भरी वाणी को सुनकर राजा को बिल्कुल भी सुख (शांति) नहीं मिली। रानी के उस घोर हठ और उसके द्वारा लिए गए शपथ को सोचकर, "हा राम!" कहकर एक लंबी साँस ली और वे कटे हुए वृक्ष की तरह पृथ्वी पर गिर पड़े। उस समय वे जगतीपति राजा ऐसे हो गए थे मानो उनकी चेतना नष्ट हो गई हो, वे पागलों की तरह, विचित्र आचरण करने वाले रोगी की तरह और तेजहीन हुए साँप की तरह हो गए थे।
- English Translation: Hearing those heart-piercing, thunderbolt-like words, fraught with grief and sorrow, the king found no peace whatsoever. Pondering the queen's dreadful resolve and her solemn oath, he sighed "Rama!" and fell down like a severed tree. The lord of the earth became like one bereft of reason, like a madman, like a deranged patient, or like a serpent stripped of its venomous luster.
श्लोक ५६-५९
दीनयाऽऽतुरया वाचा इति hoवाच कैकयीम्। अनर्थमिममर्थाभं केन त्वमुपदेशिता॥ ५६॥ भूतोपहतचित्तेव ब्रुवन्तॉ मां न लज्जसे। शीलव्यसनमेतत् ते नाभिजानाम्यहं पुरा॥ ५७॥ बालायास्तत् त्विदानीं ते लक्षये विपरीतवत्। कुतो वा ते भयं जातं या त्वं एवंविधं वरम्॥ ५८॥ राष्ट्रे भरतमासीनं वृणीषे राघवं वने। विरमैतेन भावेन त्वमेतेनानृतेन च॥ ५९॥
- हिंदी व्याख्या: दीन और आतुर वाणी में उन्होंने कैकेयी से कहा—"इस अनर्थ को जो तुझे अर्थ (कल्याण) के समान प्रतीत हो रहा है, तुझे किसने उपदेश दिया है? ऐसा लगता है जैसे तेरा चित्त किसी भूत से ग्रस्त हो गया है, तू ऐसी बातें बोलते हुए लज्जा नहीं महसूस कर रही है? तेरा ऐसा दुश्चरित्र (शील-व्यसन) मैंने पहले कभी नहीं देखा था। बचपने से लेकर अब तक मैं तुझे समझता था, किंतु आज तेरा यह रूप विपरीत दिखाई दे रहा है। तुझे किससे ऐसा भय उत्पन्न हो गया है, जिससे तू ऐसे वर माँग रही है कि देश में भरत राजा बने और राम वन में जाएँ? तू अपनी इस भावना से और इस झूठ से बाज आ जा!"
- English Translation: With a piteous and distressed voice, he spoke to Kaikeyi: "Who has counseled you into this ruin, which you mistake for welfare? Your mind seems afflicted by an evil spirit; do you feel no shame in uttering such words? I never knew you to possess such wicked traits before. Now I observe your nature to be quite the opposite. From where has this fear arisen in you that you demand such boons—placing Bharata on the throne of the realm and banishing Raghava to the forest? Desist from this attitude and from this falsehood!"
श्लोक ६०-६२
यदि भर्तुः प्रियं कार्यं लोकस्य भरतस्य च। नृशंसे पापसंकल्पे क्षुद्रे दुष्कृतकारिणि॥ ६०॥ किं नु दुःखमलीकं वा मयि रामे च पश्यसि। न कथंचिदृते रामाद् भरतो राज्यमावसेत्॥ ६१॥ रामादपि हि तं मन्ये धर्मतो बलवत्तरम्। कथं द्रक्ष्यामि रामस्य वनं गच्छेति भाषिते॥ ६२॥
- हिंदी व्याख्या: "यदि तुझे पति का, लोक का और भरत का भी प्रिय करना है, तो हे नृशंसे (निर्दयी), पाप-संकल्पे, क्षुद्र और दुष्कृतकारिणी! तू मुझमें और राम में ऐसा क्या दुख या दोष देखती है? राम के बिना किसी भी प्रकार भरत राज्य पर शासन नहीं कर सकता। और मैं तो यह मानता हूँ कि भरत भी धर्म के मामले में राम से बढ़कर बलवान (श्रेष्ठ) नहीं है। जब यह बात सामने आएगी कि 'राम वन जा रहे हैं', तब मैं ऐसा भयानक दृश्य कैसे देख पाऊँगा?"
- English Translation: "If you wish to do what is pleasing to your husband, the world, and Bharata—O cruel, sinful, petty, and wicked-acting one—what sorrow or fault do you find in me and in Rama? By no means could Bharata occupy the throne apart from Rama. And I consider even Bharata to be no more righteous or powerful than Rama. How shall I ever bear to witness it when it is said, 'Rama is going to the forest'?"
श्लोक ६३-६६
मुखवर्णं विवर्णं तु यथैवेन्दुमुपप्लुतम्। तां तु मे सुकृतां बुद्धिं सुहृद्भिः सह निश्चिताम्॥ ६३॥ कथं द्रक्ष्याम्यपावृत्तां परैरिव हतां चमूम्। किं मां वक्ष्यन्ति राजानो नानादिग्भ्यः समागताः॥ ६४॥ बालो बतायमैक्ष्वाकश्चिरं राज्यमकारयत्। यदा हि बहवो वृद्धा गुणवन्तो बहुश्रुताः॥ ६५॥ परिप्रक्ष्यन्ति काकुत्स्थं वक्ष्यामीह कथं तदा। कैकेय्या क्लिश्यमानेन पुत्रः प्रव्राजितो मया॥ ६६॥
- हिंदी व्याख्या: "ग्रहण लगे हुए चंद्रमा की तरह जिसका मुखवर्ण विवर्ण (फीका) पड़ चुका होगा, उस मेरी भली-भांति सोची-विचारी और मंत्रियों के साथ निश्चित की गई उस सुंदर बुद्धि को, मैं शत्रुओं द्वारा रौंदी और पराजित सेना की तरह कैसे उलटते हुए देखूँगा? विभिन्न दिशाओं से आए हुए राजा लोग मुझसे क्या कहेंगे? वे कहेंगे—'देखो, यह इक्ष्वाकु वंश का बालक राजा बहुत लंबे समय तक राज्य करता रहा।' जब बहुत से वृद्ध, गुणवान और बहुश्रुत (ज्ञाती) जन काकुत्स्थनंदन राम के विषय में पूछेंगे, तब मैं उन्हें क्या उत्तर दूँगा? क्या यह कहूँगा कि 'कैकेयी द्वारा प्रताड़ित किए जाने पर मैंने अपने ही पुत्र को वन में भेज दिया'?"
- English Translation: "Just like the moon's countenance turned pale during an eclipse, how shall I witness my well-considered resolve, finalized along with my ministers, overturned like an army routed and destroyed by foes? What will the kings assembled from various directions say to me? They will say: 'Alas, this Ikshvaku boy ruled for a long time.' When many elderly, virtuous, and learned men inquire about Kakutstha's son, what shall I say then? Shall I say: 'Tormented by Kaikeyi, I exiled my own son'?"
श्लोक ६७-७०
यदि सत्यं ब्रवीम्येतत् तदसत्यं भविष्यति। किं मां वक्ष्यति कौसल्या राघवे वनमास्थिते॥ ६७॥ किं चैनां प्रतिवक्ष्यामि कृत्वा विप्रियमीदृशम्। यदा यदा च कौसल्या दासीव च सखीव च॥ ६८॥ भार्यावद् भगिनीवच्च मातृवच्चोपतिष्ठति। सततं प्रियकामा मे प्रियपुत्रा प्रियंवदा॥ ६९॥ न मया सत्कृता देवी सत्कारार्हा कृते तव। इदानीं तत्तपति मां यन्मया सुकृतं त्वयि॥ ७०॥
- हिंदी व्याख्या: "यदि मैं यह सत्य बात कहूँगा, तो भी वह असत्य जैसी ही प्रतीत होगी। जब राघव वन चले जाएंगे, तब कौसल्या मुझसे क्या कहेगी? इस प्रकार का भयंकर अप्रिय कार्य करके मैं उसे क्या उत्तर दूँगा? जबकि कौसल्या हमेशा दासी की तरह, सखी की तरह, पत्नी की तरह, बहन की तरह और माता की तरह मेरी सेवा करती आई है। वह हमेशा मेरा प्रिय चाहने वाली, प्यारे पुत्र वाली और मीठा बोलने वाली है। सत्कार की योग्य उस देवी को मैंने तेरे कारण कभी उचित सत्कार नहीं दिया, और आज वही सुकृत (तेरी सेवा का मेरा पुराना भाव) मुझे जला रहा है जो मैंने तुझ पर किया था!"
- English Translation: "If I speak this truth, it will sound like an untruth. When Raghava has taken refuge in the forest, what will Kausalya say to me? What reply can I offer her after committing such a terrible wrong? Kausalya has ever attended upon me like a maidservant, like a companion, like a wife, like a sister, and like a mother. She is ever desirous of my happiness, blessed with a dear son, and sweet-spoken. That queen, worthy of all honor, I never honored adequately on your account; and today that very goodness I showed toward you burns me inside!"
श्लोक ७१-७५
अपथ्यव्यञ्जनोपेतं भुक्तमन्नमिवातुरम्। विप्रकारं च रामस्य सम्प्रयाणं च वनस्य च॥ ७१॥ सुमित्रा प्रेक्ष्य वै भीता कथं मे विश्वसिष्यति। कृपणं बत वैदेही श्रोष्यति द्वयमप्रियम्॥ ७२॥ मां च पञ्चत्वमापन्नं रामं च वनमाश्रितम्। वैदेही बत मे प्राणान् शोचन्ती क्षपयिष्यति॥ ७३॥ हीना हिमवतः पार्श्वे किंनरेणेव किंनरी। नहि राममहं दृष्ट्वा प्रवसन्तं महावने॥ ७४॥ चिरं जीवितुमाशंसे रुदन्तीं चापि मैथिलीम्। सा नूनं विधवा राज्यं सपुत्रा कारयिष्यसि॥ ७५॥
- हिंदी व्याख्या: "जैसे रोगी को अपथ्य और व्यंजनों से युक्त भोजन खाने पर रोग बढ़ जाता है, वैसे ही राम का यह अपमान और उनका वनप्रयाण मेरे लिए घातक सिद्ध होगा। सुमित्रा यह सब देखकर भयभीत हो जाएगी और मुझ पर कैसे विश्वास करेगी? बेचारी वैदेही (सीता) जब इन दोनों अप्रिय समाचारों को सुनेगी—कि मेरे प्राण पखेरू उड़ गए हैं और राम वन चले गए हैं—तो वह शोक करती हुई अपने प्राण त्याग देगी। जैसे हिमालय के पास से बिछड़ जाने पर कोई किन्नरी तड़पती है, वैसे ही मैथिली (सीता) तड़पेगी। राम को महावन में प्रवासी बने हुए देखकर और रुदन करती हुई मैथिली को देखकर मैं अधिक दिनों तक जीने की आशा कैसे कर सकता हूँ? और तू (कैकेयी) ही अपने पुत्र के साथ विधवा बनकर इस राज्य पर राज करेगी!"
- English Translation: "Just like a sick person consuming unwholesome food, this mistreatment and exile of Rama will prove fatal to me. Seeing all this, Sumitra will be terrified—how will she ever trust me? Alas, poor Vaidehi will hear these two unpalatable things: that I have attained death and that Rama has taken refuge in the forest. Grieving thus, Vaidehi will waste away her life. Like a female Kinnari separated from her mate near the Himalayas, Maithili will weep. Having beheld Rama dwelling in the great forest and Maithili weeping, how can I hope to live long? And you, widowed along with your son, will rule this kingdom!"
श्लोक ७६-८०
सतीं त्वामहमत्यन्तं व्यवस्याम्यसतीं सतीम्। रूपिणीं विषसंयुक्तां पीत्वेव मदिरां नरः॥ ७६॥ अनृतैर्बत मां सान्त्वैः सान्त्वयन्ती स्म भाषसे। गीतशब्देन संरुध्य लुब्धो मृगमिवावधीः॥ ७७॥ अनार्य इति मामार्याः पुत्रविक्रायकं ध्रुवम्। विकरिष्यन्ति रथ्यासु सुरापं ब्राह्मणं यथा॥ ७८॥ अहो दुःखमहो कृच्छ्रं यत्र वाचः क्षमे तव। दुःखमेवंविधं प्राप्तं पुरा कृतमिवाशुभम्॥ ७९॥ चिरं खलु मया पापे त्वं पापेनाभिरक्षिता। अज्ञानादुपसम्पन्ना रज्जुरुद्बन्धनी यथा॥ ८०॥
- हिंदी व्याख्या: "मैं तो तुझे पतिव्रता समझता था, किंतु तू तो रूपवती होकर भी अंदर से असती (कुटिल) निकली; जैसे कोई मनुष्य विष से मिली हुई मदिरा को पीकर मर जाता है, वैसे ही मैं तेरे प्रेम में ठगा गया। तू झूठी सांत्वनाओं से मुझे पुचकारती हुई बातें करती रही और जैसे बहेलिया गीत की आवाज से हिरण को रोककर मार डालता है, वैसे ही तूने मेरा वध कर दिया है। श्रेष्ठ जन मुझे 'पुत्र बेचने वाला' पापी और अनार्य कहकर सड़कों पर वैसे ही बदनाम करेंगे जैसे शराबी ब्राह्मण को किया जाता है। अहो! यह कितना बड़ा दुख और संकट है कि मैं तेरी इन बातों को सहन कर रहा हूँ, मानो मैंने अपने पूर्वजन्म के किसी अशुभ कर्म का फल पाया हो। हे पापे! मैंने अज्ञानतावश लंबे समय तक तेरी इस प्रकार रक्षा की, जैसे कोई अपने गले में फाँसी की रस्सी को पाल-पोषकर बड़ा करता है।"
- English Translation: "I considered you utterly devoted, but you have proved unfaithful beneath a fair exterior; just like a man drinking wine mixed with poison, I have been slain. You kept comforting me with false reassurances and deceitful words, slaying me just as a hunter lures and kills a deer with music. Noble men will brand me in the streets as an 'unrighteous seller of my own son', just as a degraded drunkard brahmin is scorned. Alas, what intense misery and agony that I tolerate these words of yours, as though reaping the fruit of some past evil deed. O sinful one, out of ignorance I protected you for so long, just like one unknowingly embracing a hangman's noose."
श्लोक ८१-८४
रममाणस्त्वया सार्धं मृत्युं त्वां नाभिलक्षये। बालो रहसि हस्तेन कृष्णसर्पमिवास्पृशम्॥ ८१॥ तं तु मां जीवलोकोऽयं नूनमाक्रोष्टुमर्हति। मया ह्यपितृकः पुत्रः स महात्मा दुरात्मना॥ ८२॥ बालिशो बत कामात्मा राजा दशरथो भृशम्। स्त्रीकृते यः प्रियं पुत्रं वनं प्रस्थापयिष्यति॥ ८३॥ वेदैश्च ब्रह्मचर्यैश्च गुरुभिश्चोपकर्शितः। भोगकाले महत्कृच्छ्रं पुनरेव प्रपत्स्यते॥ ८४॥
- हिंदी व्याख्या: "तेरे साथ आनंद मनाते हुए मैं यह नहीं समझ पाया कि तू मेरी मृत्यु है। मैंने किसी बालक की तरह एकांत में अपने हाथ से काले सर्प को छू लिया था! यह संपूर्ण जीवलोक अब निश्चित रूप से मेरी निंदा करेगा और मुझे कोसेगा, क्योंकि मुझ जैसे दुरात्मा ने उस महात्मा पुत्र को अनाथ (पिताहीन) सा बना दिया है। संसार कहेगा कि—'अरे! राजा दशरथ कितना बड़ा मूर्ख और कामुक है, जो एक स्त्री के कहने पर अपने प्रिय पुत्र को वन भेज रहा है!' जिसने वेदों के अध्ययन, ब्रह्मचर्य और गुरु-सेवा से अपने शरीर को कड़ा किया, वह राम अब अपने भोग (सुख) के समय में फिर से इस महान कष्ट को प्राप्त होगा।"
- English Translation: "Sporting with you, I failed to recognize that you were my very death. Like a foolish child, I touched a black serpent with my bare hands in private! This living world will assuredly curse and revile me, for a wicked-minded wretch like me has rendered that great-souled son virtually fatherless. The world will say: 'Alas, how foolish and lustful is King Dasharatha, who for the sake of a woman is exiling his beloved son to the forest!' He who disciplined his body through the Vedas, celibacy, and service to preceptors shall now, at the very time of enjoying life, encounter this immense suffering once again."
श्लोक ८५-८९
नालं द्वितीयं वचनं पुत्रो मां प्रतिभाषितुम्। स वनं प्रव्रजेत्युक्तो बाढमित्येव वक्ष्यति॥ ८५॥ यदि मे राघवः कुर्याद् वनं गच्छेति चोदितः। प्रतिकूलं प्रियं मे स्यान्न तु वत्सः करिष्यति॥ ८६॥ राघवे हि वनं प्राप्ते सर्वलोकस्य धिक्कृतम्। मृत्युरक्षमणीयं मां नयिष्यति यमक्षयम्॥ ८७॥ मृते मयि गते रामे वनं मनुजपुङ्गवे। इष्टे मम जने शेषे किं पापं प्रतिपत्स्यसे॥ ८८॥ कौसल्या मां च रामं च पुत्रौ च यदि हास्यति। दुःखान्यसहती देवी मामेवानुगमिष्यति॥ ८९॥
- हिंदी व्याख्या: "मेरा वह पुत्र मुझसे कभी दूसरी बात नहीं कहेगा; यदि मैं उससे कहूँगा कि 'तुम वन जाओ', तो वह तुरंत 'बहुत अच्छा' कहकर स्वीकार कर लेगा। और यदि मेरे द्वारा प्रेरित किए जाने पर भी राघव वन जाने के विरुद्ध कोई प्रतिकूल बात कहें, तो भी वह मुझे प्रिय लगेगी, किंतु मेरा वह वत्स (राम) कभी मेरी अवमानना नहीं करेगा। संपूर्ण संसार द्वारा धिक्कारे जाने योग्य राम के वन चले जाने पर, क्षमा न करने वाली मृत्यु मुझे यमराज के घर पहुँचा देगी। मेरे मर जाने पर और पुरुषों में श्रेष्ठ राम के वन चले जाने पर, मेरे पीछे बचे हुए इस प्रिय जनसमूह के साथ तू कौन सा पाप नहीं भोगेगी? कौसल्या यदि मुझको, राम को और अपने पुत्र को खो बैठेगी, तो वह देवी इस भारी दुख को सहन न करती हुई निश्चित रूप से मेरा ही अनुसरण करेगी (मृत्यु को प्राप्त हो जाएगी)।"
- * English Translation: "My son will never utter a second word in defiance; when told 'Go to the forest', he will simply say 'So be it.' And even if Raghava, urged by me, were to say something unfavorable to going, it would still be dear to me, but my darling boy will never disobey. When Raghava reaches the forest, amidst the condemnation of the whole world, relentless death will drag me to the abode of Yama. When I am dead and Rama, the best of men, has gone to the forest, what sin will you not bring upon the remaining dear ones? If Kausalya loses me, Rama, and her son, unable to bear the grief, that queen will surely follow me in death."
श्लोक ९०-९३
कौसल्यां च सुमित्रां च मां च पुत्रैस्त्रिभिः सह। प्रक्षिप्य नरके सा त्वं कैकेयि सुखिता भव॥ ९०॥ मया रामेण च त्यक्तं शाश्वतं सत्कृतं गुणैः। इक्ष्वाकुकुलमक्षोभ्यमाकुलं पालयिष्यसि॥ ९१॥ प्रियं चेद् भरतस्यैतद् रामप्रव्राजनं भवेत्। मा स्म मे भरतः कार्षीत् प्रेतकृत्यं गतायुषः॥ ९२॥ मृते मयि गते रामे वनं पुरुषपुङ्गवे। सेदानीं विधवा राज्यं सपुत्रा कारयिष्यसि॥ ९३॥
- हिंदी व्याख्या: "कौसल्या को, सुमित्रा को और मुझे अपने तीनों पुत्रों सहित नरक में धकेल कर हे कैकेयी! तू सुखी हो जाना। मेरे और राम द्वारा छोड़े गए, सदा सद्गुणों से सत्कृत इस अचंचल इक्ष्वाकु कुल को अब तू ही इस प्रकार आकुल करके पालेगी! यदि राम का वनवास भरत को ही प्रिय हो, तो मेरा वह पुत्र भरत मेरी (आयुहीन की) मृत्यु के बाद मेरा कोई अंतिम संस्कार (प्रेतकृत्य) न करे! मेरे मरने पर और पुरुषों में श्रेष्ठ राम के वन चले जाने पर, तू ही अपने पुत्र के साथ विधवा बनकर इस राज्य का उपभोग करना।"
- * English Translation: "Having plunged Kausalya, Sumitra, and myself along with all three sons into hell, do you be happy, O Kaikeyi! Abandoned by me and Rama, forever honored by virtues, you shall now rule this agitated and shaken Ikshvaku lineage! If this exile of Rama is pleasing to Bharata, then let not my son Bharata perform any funeral rites for me when my life has ebbed away! When I am dead and Rama, the best of men, has gone to the forest, you alone shall rule this kingdom as a widow along with your son."
श्लोक ९४-९७
त्वं राजपुत्रि दैवेन न्यवसो मम वेश्मनि। अकीर्तिश्चातुला लोके ध्रुवः परिभवश्च मे। सर्वभूतेषु चावज्ञा यथा पापकृतस्तथा॥ ९४॥ कथं रथैर्विभुर्यात्वा गजाश्वैश्च मुहुर्मुहुः। पद्भ्यां रामो महारण्ये वत्सो मे विचरिष्यति॥ ९५॥ यस्य चाहारसमये सूदाः कुण्डलधारिणः। अहं पूर्वं पचन्ति स्म प्रसन्नाः पानभोजनम्॥ ९६॥ स कथं नु कषायाणि तिक्तानि कटुकानि च। भक्षयन् वन्यमाहारं सुतो मे वर्तयिष्यति॥ ९७॥
- हिंदी व्याख्या: "हे राजपुत्री! दैवयोग से ही तू मेरे घर में आकर बसी थी। अब इस लोक में मेरी अतुल अकीर्ति होगी, मेरा निश्चित रूप से पराभव होगा और सभी प्राणियों में मेरी वैसी ही अवहेलना होगी जैसी किसी पापी की होती है। रथों, हाथियों और घोड़ों पर हमेशा घूमने वाला मेरा वह विभु (समर्थ) पुत्र राम, महारण्य में अपने दोनों पैरों से कैसे विचर पाएगा? जिसके भोजन के समय कुंडल पहने हुए बावर्ची (सूद) प्रसन्नतापूर्वक आगे बढ़कर तरह-तरह के उत्तम पान और भोजन तैयार करते थे, वह मेरा पुत्र कषाय, तीखे और कड़वे वन्य आहारों को खाते हुए कैसे अपना जीवन बिताएगा?"
- * English Translation: "O princess, by destiny indeed you came to dwell in my mansion. Now there shall be peerless infamy for me in the world, certain humiliation, and contempt among all beings, just like a sinner. How will my capable son Rama—who constantly rode in chariots, on elephants, and horses—wander on foot through the great forest? At whose mealtime cooks adorned with earrings eagerly prepared delightful drinks and delicacies—how will that son of mine subsist upon astringent, bitter, and pungent forest roots and fruits?"
श्लोक ९८-१०१
महार्हवस्त्रसम्बद्धो भूत्वा चिरसुखोचितः। काषायपरिधानस्तु कथं रामो भविष्यति॥ ९८॥ कस्येदं दारुणं वाक्यमएवंविधमपीरितम्। रामस्यारण्यगमनं भरतस्याभिषेचनम्॥ ९९॥ धिगस्तु योषितो नाम शठाः स्वार्थपरायणाः। न ब्रवीमि स्त्रियः सर्वा भरतस्यैव मातरम्॥ १००॥ अनर्थभावेऽर्थपरे नृशंसे ममानुतापाय निवेशितासि। किमप्रियं पश्यसि मन्निमित्तं हितानुकारिण्यथवापि रामे॥ १५०॥ (तथा १०१)
- हिंदी व्याख्या: "महान मूल्यवान वस्त्र पहनने वाला और सदा सुखों में पला हुआ मेरा राम काषाय (भगवा वल्कल) वस्त्र पहनने पर कैसा लगेगा? यह किसका इतना दारुण वाक्य है जो ऐसा कहा गया है—राम का अरण्यगमन और भरत का अभिषेक! धिक्कार है उन स्त्रियों को जो शठ और स्वार्थपरायण होती हैं! हालाँकि मैं सभी स्त्रियों के लिए ऐसा नहीं कह रहा हूँ, बल्कि सिर्फ भरत की माता (कैकेयी) के लिए कह रहा हूँ। हे अनर्थ को अर्थ (कल्याण) मानने वाली, स्वार्थी और नृशंस (निर्दयी)! तू मेरे संताप के लिए ही मेरे घर में लाई गई थी। तू मुझमें या राम में ऐसा क्या अप्रिय देखती है, जबकि राम तो हमेशा सबका हित करने वाले हैं?"
- * English Translation: "Accustomed to supreme comforts and arrayed in costly garments, how will Rama appear clad in bark robes? Whose cruel words are these that have been uttered—the forest exile of Rama and the coronation of Bharata? Fie upon women who are deceitful and self-absorbed! I do not speak of all women, but solely of Bharata's mother. O you who mistake ruin for welfare, selfish, and cruel! You were installed in my home solely to bring me endless anguish. What unpleasing thing do you find in me or in Rama, who is ever devoted to everyone's welfare?"
श्लोक १०२-१०५
परित्यजेयुः पितरोऽपि पुत्रान् भार्याः पतींश्चापि कृतानुरागाः। कृत्स्नं हि सर्वं कुपितं जगत् स्याद् दृष्ट्वाैव रामं व्यसने निमग्नम्॥ १०२॥ अहं पुनर्देवकुमाररूपमलंकृतं तं सुतमाव्रजन्तम्। नन्दामि पश्यन्निव दर्शनेन भवामि दृष्ट्वैव पुनर्युवेव॥ १०३॥ विना हि सूर्येण भवेत् प्रवृत्तिरवर्षता वज्रधरेण वापि। रामं तु गच्छन्तमितः समीक्ष्य जीवेन्न कश्चित्त्विति चेतना मे॥ १०४॥ विनाशकामामहिताममित्रामावासयं मृत्युमिवात्मनस्त्वाम्। चिरं बताङ्केन धृतासि सर्पी महाविषा तेन हतोऽस्मि मोहात्॥ १०५॥
- हिंदी व्याख्या: "पिता भी अपने पुत्रों का त्याग कर सकते हैं और प्रेम करने वाली पत्नियाँ भी अपने पतियों का त्याग कर सकती हैं, किंतु राम को संकट में डूबा देखकर यह संपूर्ण संसार ही क्रुद्ध हो उठेगा। और मैं तो उस देवकुमार के समान रूप वाले, सजे-धजे आते हुए पुत्र को देखकर ऐसे आनंदित होता था मानो उसके दर्शन मात्र से ही मैं फिर से युवा हो गया होऊँ! सूर्य के बिना अथवा वर्षा न करने वाले इंद्र के बिना भी संसार की गति चल सकती है, किंतु यहाँ से जाते हुए राम को देखकर कोई भी जीवित नहीं रहेगा—ऐसी मेरी निश्चित चेतना है। अरे! तू मेरा विनाश चाहने वाली, अहित करने वाली, शत्रु और मृत्यु के समान है; मैंने महाविषैली सर्पिणी को बहुत दिनों तक अपनी गोद में पालकर रखा था और मोहवश उसी के द्वारा मारा गया हूँ!"
- * English Translation: "Even fathers might abandon sons, and loving wives might abandon their husbands, but the entire universe would rage with anger if it beheld Rama plunged into adversity. As for me, beholding that son of mine—resembling a divine youth, duly adorned—approaching me, I rejoiced so deeply that upon merely seeing him I felt as if reborn in youth! The world might perhaps function without the sun, or even without Indra bringing rain, but beholding Rama departing from here, no one will survive—such is my firm conviction. Alas! Desiring my destruction, hostile, an enemy, and resembling death itself—like a venomous serpent held long in my lap, I have been slain by you out of sheer delusion!"
श्लोक १०६-१०९
मया च रामेण सलक्ष्मणेन प्रशास्तु हीनो भरतस्त्वया सह। पुरं च राष्ट्रं च निहत्य बान्धवान् ममाहितानां च भवाभिहर्षिणी॥ १०६॥ नृशंसवृत्ते व्यसनप्रहारिणि प्रसह्य वाक्यं यदिहाद्य भाषसे। न नाम ते तेन मुखात् पतन्त्यधो विशीर्यमाणा दशनाः सहस्रधा॥ १०७॥ न किंचिदाहाहितमप्रियं वचो न वेत्ति रामः परुषाणि भाषितुम्। कथं तु रामे ह्यभिरामवादिनि ब्रवीषि दोषान् गुणनित्यसम्मते॥ १०८॥ प्रताम्य वा प्रज्वल वा प्रणश्य वा सहस्रशो वा स्फुटितां महीं व्रज। न ते करिष्यामि वचः सुदारुणं ममाहितं केकयराजपांसने॥ १०९॥
- हिंदी व्याख्या: "मुझसे, राम से और लक्ष्मण से हीन होकर भरत तेरे साथ इस नगर और राष्ट्र का शासन करे और अपने सभी सगे-सम्बन्धियों को नष्ट करके तू मेरे शत्रुओं को हर्षित करने वाली बने! हे नृशंस आचरण वाली और विपत्ति के समय प्रहार करने वाली! तू आज यहाँ जबरदस्ती जो ऐसी बातें बोल रही है, इससे क्यों नहीं तेरे वे दाँत टूटकर हजारों टुकड़ों में नीचे गिर जाते? राम ने कभी किसी को कोई अहितकर या अप्रिय वचन नहीं कहा, वे कठोर बोलना जानते ही नहीं हैं। फिर उस सबका प्रिय बोलने वाले और गुणों के कारण हमेशा सम्मानित राम में तू दोष कैसे लगा सकती है? चाहे तू संताप कर, चाहे जल जा, चाहे नष्ट हो जा अथवा हजारों टुकड़ों में फटकर धरती में समा जा; किंतु हे केकयराज के कुल को कलंकित करने वाली! मैं तेरी इस अत्यंत दारुण और मेरे अहितकारी बात को कभी पूरा नहीं करूँगा।"
- * English Translation: "Bereft of me, Rama, and Lakshmana, let Bharata rule this city and nation along with you, destroying all kinsfolk and rejoicing my enemies! O cruel-natured one, striking when I am vulnerable, why do your teeth not shatter into a thousand pieces and fall from your mouth for speaking such words today? Rama never utters a harmful or unpleasing word; he knows not how to speak harshly. How then can you attribute faults to Rama, who speaks delightfully and is ever honored for his virtues? Suffer, burn, perish, or let the earth split into a thousand fragments—I shall never execute your exceedingly harsh and ruinous demand, O blot on the lineage of the king of Kekaya!"
श्लोक ११२ (तथा ११०-११२)
क्षुरोपमां नित्यमसत्प्रियंवदां प्रदुष्टभावां स्वकुलोपघातिनीम्। न जीवितुं त्वां विषहेऽमनोरमां दिधक्षमाणां हृदयं सबन्धनम्॥ ११०॥ न जीवितं मेऽस्ति कुतः पुनः सुखं विनात्मजेनात्मवतां कुतो रतिः। ममाहितं देवि न कर्तुमर्हसि स्पृशामि पादावपि ते प्रसीद मे॥ १११॥ स भूमिपालो विलपन्ननाथवत् स्त्री गृहीतो हृदयेऽतिमात्रया। पपात देव्याश्चरणौ प्रसारितावुभावसम्प्राप्य यथाऽऽतुरस्तथा॥ ११२॥
- हिंदी व्याख्या: "उस्तरे के समान तेज, हमेशा असत्य और प्रिय बोलने का ढोंग करने वाली, दुष्ट भावों वाली और अपने कुल का नाश करने वाली तुझे मैं जीवित देखना सहन नहीं कर सकता, क्योंकि तू मेरे बँधे हुए हृदय को जलाना चाहती है। बिना आत्मवान् पुत्र के मेरा कोई जीवन नहीं है, फिर सुखकहाँ से मिलेगा? हे देवि! तू मेरा ऐसा अहित मत कर, मैं तेरे चरणों का स्पर्श करता हूँ, मुझ पर प्रसन्न हो जा!" इस प्रकार वे भूमिपाल राजा अनाथ की तरह विलाप करते हुए, उस स्त्री (कैकेयी) द्वारा हृदय से अत्यधिक आहत होकर, उस देवी के फैले हुए दोनों चरणों तक बिना पहुँचे ही, किसी रोगी की भाँति मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े।
- * English Translation: "Sharp as a razor, ever speaking false pleasantries, of perverted disposition, and destroyer of your own lineage—I cannot endure to live with you, who wishes to burn my bound heart. I have no life left, let alone happiness; without a self-controlled son, where is any joy for me? O Queen, do not bring ruin upon me; I touch your feet, do be gracious to me." That lord of the earth, lamenting like an orphan, his heart severely gripped by the woman, fell down upon the ground like a stricken patient, collapsing before he could even reach both the outstretched feet of the queen.
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे द्वादशः सर्गः ॥२-१२॥ (इस प्रकार महर्षि वाल्मीकि रचित आदिकाव्य श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के अयोध्याकाण्ड का बारहवाँ सर्ग पूर्ण हुआ।)
