श्रीरामायण पाठ — अयोध्याकाण्डे एकादशः सर्गः ॥२-११॥
श्रीमद्वाल्मीकियरामायणे अयोध्याकाण्डे एकादशः सर्गः ॥२-११॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के अयोध्याकाण्ड के एकादश सर्ग (२-११) के सभी २९ श्लोकों का क्रमवार हिंदी एवं अंग्रेजी अनुवाद व व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:
श्लोक १-३
तं मन्मथशरैर्विद्धं कामवेगवशानुगम्। उवाच पृथिवीपालं कैकेयी दारुणं वचः॥ १॥ नास्मि विप्रकृता देव केनचिन्नावमानिता। अभिप्रायस्तु मे कश्चित् तमिच्छामि त्वया कृतम्॥ २॥ प्रतिज्ञां प्रतिजानीष्व यदि त्वं कर्तुमिच्छसि। अथ ते व्याहरिष्यामि यथाभिप्रार्थितं मया॥ ३॥
- हिंदी व्याख्या: कामदेव के बाणों से विंध्य हुए और कामवेग के वश में पड़े हुए उस पृथ्वीपाल (राजा दशरथ) से कैकेयी ने अत्यंत दारुण (कठोर) वचन कहे—"हे देव! मुझे न तो किसी ने सताया है और न ही मेरा किसी ने अपमान किया है। बस, मेरा एक विशेष अभिप्राय (इच्छा) है, जिसे मैं चाहती हूँ कि आप पूरा करें। यदि आप मेरी इस इच्छा को पूरा करना चाहते हैं, तो पहले प्रतिज्ञा कीजिए (वचन दीजिए), तभी मैं अपनी उस अभिलाषा को आपके सामने प्रकट करूँगी।"
- English Translation: Pierced by the arrows of the god of love and yielding to the urge of desire, Kaikeyi spoke harsh and ruthless words to the lord of the earth: "O Lord, I have neither been mistreated nor insulted by anyone. However, I have a certain desire which I wish to be fulfilled by you. Make a solemn promise if you wish to fulfill it, and only then shall I declare to you what I have prayed for."
श्लोक ४-६
तामुवाच महाराजः कैकेयीमीषदुत्स्मयः। कामी हस्तेन संगृह्य मूर्धजेषु भुवि स्थिताम्॥ ४॥ अवलिप्ते न जानासि त्वत्तः प्रियतरो मम। मनुजो मनुजव्याघ्राद् रामादन्यो न विद्यते॥ ५॥ तेनाजय्येन मुख्येन राघवेण महात्मना। शपे ते जीवनार्हेण ब्रूहि यन्मनसेप्सितम्॥ ६॥
- हिंदी व्याख्या: कामुक बने हुए महाराज दशरथ ने भूमि पर लेटी हुई कैकेयी के बालों को अपने हाथ से पकड़कर मंद-मंद मुस्कराते हुए उससे कहा—"रे गर्विणी! क्या तू यह नहीं जानती कि इस संसार में तू मुझे सबसे प्रिय है? मनुष्यों में बाघ के समान श्रेष्ठ राम के सिवा दूसरा कोई भी मनुष्य मुझे तुझसे अधिक प्रिय नहीं है। अजेय, श्रेष्ठ और महात्मा उन राघवनंदन श्रीराम की शपथ लेकर—जो मेरे जीवन का आधार हैं—मैं तुझे सौगंध खाता हूँ, अब तू अपने मन की इच्छा कह।"
- English Translation: Smitten by desire, the great king gently smiled, took the hair of Kaikeyi—who lay upon the ground—in his hand, and said: "O proud one, do you not know that none is dearer to me than you? Apart from Rama, the tiger among men, there is no other human being dearer to me. By that unconquerable, foremost, and high-souled Raghava—upon whose very life I depend—I swear to you; speak whatever is desired in your heart."
श्लोक ७-१०
यं मुहूर्तमपश्यंस्तु न जीवे तमहं ध्रुवम्। तेन रामेण कैकेयि शपे ते वचनक्रियाम्॥ ७॥ आत्मना चात्मजैश्चान्यैर्वृणे यं मनुजर्षभम्। तेन रामेण कैकेयि शपे ते वचनक्रियाम्॥ ८॥ भद्रे हृदयमप्येतदनुमृश्योद्धरस्व मे। एतत् समीक्ष्य कैकेयि ब्रूहि यत् साधु मन्यसे॥ ९॥ बलमात्मनि पश्यन्ती न विशङ्कितुमर्हसि। करिष्यामि तव प्रीतिं सुकृतेनापि ते शपे॥ १०॥
- हिंदी व्याख्या: "हे कैकेयी! जिसे एक मुहूर्त के लिए भी न देखने पर मैं निश्चित ही जीवित नहीं रह सकता, उसी राम की सौगंध खाकर मैं तेरी बात पूरी करने की प्रतिज्ञा करता हूँ। जिसे मैं अपने प्राणों से बढ़कर और अन्य सभी पुत्रों से भी बढ़कर पुरुषों में श्रेष्ठ मानता हूँ, उसी राम की सौगंध खाकर मैं तेरे वचन को पूरा करने की प्रतिज्ञा करता हूँ। हे भद्रे! तू मेरे इस हृदय को भली-भांति टटोलकर देख ले। हे कैकेयी! इन सब बातों को अच्छी तरह समझकर वही बोल जिसे तू उचित समझती है। मुझ पर अपने इस प्रभाव और बल को भली-भांति जानती हुई तुझे कोई शंका नहीं करनी चाहिए। मैं तेरी प्रसन्नता के लिए सब कुछ करूँगा, मैं अपने सत्कर्मों की शपथ लेकर कहता हूँ।"
- English Translation: "O Kaikeyi, by that Rama, failing to see whom even for a moment I certainly would not survive, I swear to fulfill your word. By that best of men whom I cherish more than my own self and all other sons, I swear to fulfill your command, O Kaikeyi. O blessed lady, examining this heart of mine, do speak whatever you deem proper, O Kaikeyi. Knowing your own power over me, you have no cause for hesitation. I shall bring about your happiness; I swear by my virtuous deeds."
श्लोक ११-१४
सा तदर्थमना देवी तमभिप्रायमागतम्। निर्माध्यस्थ्याच्च हर्षाच्च बभाषे दुर्वचं वचः॥ ११॥ तेन वाक्येन संहृष्टा तमभिप्रायमात्मनः। व्याजहार महाघोरमभ्यागतमिवान्तकम्॥ ई२॥ (तथा १२) यथा क्रमेण शपसे वरं वरं मदासि च। तच्छृण्वन्तु त्रयस्त्रिंशद् देवाः सेन्द्रपुरोगमाः॥ १३॥ चन्द्रादित्यौ नभश्चैव ग्रहा रात्र्यहनी दिशः। जगच्च पृथिवी चेयं सगन्धर्वाः सराक्षसाः॥ १४॥
- हिंदी व्याख्या: उसी उद्देश्य में मन लगाई हुई और तटस्थता तथा मोह को त्यागकर हर्ष से भरी हुई उस रानी कैकेयी ने वह अत्यंत कठोर और दुर्वचन कहा। राजा की उन शपथों से अत्यंत प्रसन्न होकर उसने अपनी उस भयानक इच्छा को ऐसे प्रकट किया, मानो सामने स्वयं महाकाल (मृत्यु) आ गए हों। कैकेयी बोली—"जिस प्रकार आप क्रम से शपथ ले रहे हैं और मुझे वर देने की बात कह रहे हैं, उसे इंद्र सहित तेतीस करोड़ देवता, चंद्रमा, सूर्य, आकाश, ग्रह, रात्रि, दिन, दिशाएँ, संपूर्ण जगत, यह पृथ्वी, गंधर्व और राक्षसों सहित सभी लोग सुनें!"
- English Translation: Intent upon that very objective, free from neutrality, and filled with elation, that queen uttered those harsh and cruel words. Delighted by those oaths, she expressed her dreadful intent just as if Death itself had arrived. Kaikeyi said: "Just as you are successively taking oaths and granting me boons, let the thirty-three gods headed by Indra, the moon, the sun, the sky, the planets, night and day, the directions, the entire universe, this earth, along with the Gandharvas and Rakshasas, hear this!"
श्लोक १५-१७
निशाचराणि भूतानि गृहेषु गृहदेवताः। यानि चान्यानि भूतानि जानीयुर्भाषितं तव॥ १५॥ सत्यसंधो महातेजा धर्मज्ञः सत्यवाक्शुचिः। वरं मम ददात्येष सर्वे शृण्वन्तु दैवताः॥ १६॥ इति देवी महेष्वासं परिगृह्याभिशस्य च। ततः परमुवाचेदं वरदं काममोहितम्॥ १७॥
- हिंदी व्याख्या: "निशाचर, समस्त भूतगण, घरों की गृहदेवता और अन्य जितने भी प्राणी हैं, वे सब आपके इस वचन को भली-भांति जान लें। सत्यप्रतिज्ञा, महातेजस्वी, धर्मज्ञ, सत्यवादी और पवित्र ये महाराज मुझे वर दे रहे हैं, इसे सभी देवता सुनें!" इस प्रकार उस देवी (कैकेयी) ने महान धनुर्धर राजा को अपनी बातों में जकड़कर और उन्हें (शपदों द्वारा) पक्का करके, वर देने के लिए उद्यत एवं कामदेव से मोहित हुए राजा से आगे यह महाघोर बात कही—
- English Translation: "Let the nocturnal creatures, all living beings, household deities, and any other entities know your spoken word. This monarch, true to his promise, highly radiant, knower of dharma, truthful, and pure, is granting me boons; let all the gods hear this!" Having thus bound the great archer-king with oaths and committed him, the queen then spoke further to the boon-bestowing king, who was infatuated by desire:
श्लोक १८-२१
स्मर राजन् पुरा वृत्तं तस्मिन् देवासुरे रणे। तत्र त्वां च्यावयच्छत्रुस्तव जीवितमन्तरा॥ १८॥ तत्र चापि मया देव यत् त्वं समभिरक्षितः। जाग्रत्या यतमानायास्ततो मे प्रददौ वरौ॥ १९॥ तौ दत्तौ च वरौ देव निक्षेपौ मृगयाम्यहम्। तवैव पृथिवीपाल सकाशे रघुनन्दन॥ २०॥ तत् प्रतिश्रुत्य धर्मेण न चेद् दास्यसि मे वरम्। अद्यैव हि प्रहास्यामि जीवितं त्वद्विमानिता॥ २१॥
- हिंदी व्याख्या: "हे राजन्! प्राचीन काल के देवासुर संग्राम की घटना को स्मरण कीजिए, जहाँ शत्रु ने आपके जीवन पर संकट खड़ा कर दिया था। हे देव! उस युद्ध में जब आप अपने प्राणों के संकट में थे, तब मैंने जागते हुए और पूरा प्रयत्न करके आपकी रक्षा की थी। उसी से प्रसन्न होकर आपने मुझे दो वर दिए थे। हे देव! आज मैं रघुनंदन! आपके ही पास अपनी उन धरोहर रूपी दोनों वरों की माँग कर रही हूँ। यदि आप धर्मपूर्वक प्रतिज्ञा करके अब मुझे वे वर नहीं देंगे, तो आपके द्वारा तिरस्कृत होकर मैं आज ही अपने प्राण त्याग दूँगी!"
- English Translation: "O King, recall the past event in that war between gods and demons, where the enemy threatened your life. O Lord, at that time, when you were in mortal peril, I protected you with wakeful and strenuous effort. Pleased with that, you granted me two boons. O Lord, Raghava, protector of the earth, I am now claiming those two boons deposited with you. Having promised this righteously, if you do not grant me my boons, scorned by you, I shall abandon my life this very day!"
श्लोक २२-२५
वाङ्मात्रेण तदा राजा कैकेय्या स्ववशे कृतः। प्रचस्कन्द विनाशाय पाशं मृग इवात्मनः॥ २२॥ ततः परमुवाचेदं वरदं काममोहितम्। वरौ देयौ त्वया देव तदा दत्तौ महीपते॥ २३॥ तौ तावदहमद्यैव वक्ष्यामि शृणु मे वचः। अभिषेकसमारम्भो राघवस्योपकल्पितः॥ २४॥ अनेनैवाभिषेकेण भरतो मेऽभिषिच्यताम्। यो द्वितीयो वरो देव दत्तः प्रीतेन मे त्वया॥ २५॥
- हिंदी व्याख्या: कैकेयी द्वारा केवल वचनों ही वचनों में पूरी तरह अपने वश में कर लिए गए वे राजा दशरथ, जैसे कोई हिरण अपने विनाश के लिए स्वयं ही फंदे में कूद पड़ता है, वैसे ही उसके जाल में फँस गए। इसके बाद वर देने के इच्छुक और काम-मोहित महीपति राजा से कैकेयी ने आगे कहा—"हे देव! हे महीपते! उस समय आपने जो दो वर दिए थे, वे अब मुझे देने का समय आ गया है। उन दोनों वरों को मैं आज ही आपके सामने कह रही हूँ, आप मेरे वचन को ध्यान से सुनें—जो अभिषेक का समारोह राघवनंदन श्रीराम के लिए तैयार किया गया है, उसी अभिषेक की सामग्री से मेरे पुत्र भरत का अभिषेक किया जाए। हे देव! आपने प्रेमवश मुझे जो दूसरा वर दिया था..."
- English Translation: Completely brought under her control merely by her words, King Dasharatha leaped toward his own destruction just like a deer stepping into a snare meant for its ruin. Thereupon, she spoke further to the boon-bestowing, desire-infatuated monarch: "O Lord, O ruler of the earth, those two boons you granted me back then—the time has come for you to give them now. Those very two boons I shall declare to you today; listen to my words: With this very coronation arrangement prepared for Raghava, let my son Bharata be consecrated! And the second boon, O Lord, which was lovingly granted to me by you..."
श्लोक २६-२९
तदा देवासुरे युद्धे तस्य कालोऽयमागतम्। नव पञ्च च वर्षाणि दण्डकारण्यमाश्रितः॥ २६॥ चीराजिनधरो धीरो रामो भवतु तापसः। भरतो भजतामद्य यौवराज्यमकण्टकम्॥ २७॥ एष मे परमः कामो दत्तमेव वरं वृणे। अद्य चैव हि पश्येयं प्रयान्तं राघवं वने॥ २८॥ स राजराजो भव सत्यसंगरः कुलं च शीलं च हि जन्म रक्ष च। परत्र वासे हि वदन्त्यनुत्तमं तपोधनाः सत्यवचो हितं नृणाम्॥ २९॥
- हिंदी व्याख्या: "...देवासुर संग्राम के समय का वह दूसरा वर अब माँगने का समय आ गया है। राम वल्कल (चीर) और मृगछाला (अजिन) धारण करके, चौदह वर्ष (नव और पाँच वर्ष) तक दण्डकारण्य के वन में एक तापसी (मुनि) के रूप में निवास करें और धीर भरत आज ही इस निष्कंटक राज्य का उपभोग करें। यही मेरी सबसे बड़ी इच्छा है और मैं आपके द्वारा पहले ही दिए गए उन्हीं वरदानों को माँग रही हूँ। आज ही मैं राम को वन की ओर प्रस्थान करते हुए देखना चाहती हूँ। इसलिए हे राजराज! आप अपने सत्य प्रतिज्ञा (सत्यसंगर) पर अटल रहें और अपने कुल, शील तथा जन्म की रक्षा करें। तपोधन ज्ञानी जन कहते हैं कि परलोक सुधारने के लिए और इस लोक में भी मनुष्यों के हित के लिए सत्य बोलना ही सबसे उत्तम धर्म है।"
- English Translation: "...during that war between gods and demons, the time for that second boon has now arrived. Let Rama, wearing garments of bark and deerskin, become a steadfast ascetic residing in the Dandaka forest for twice seven years (fourteen years), and let Bharata enjoy this unimpeded crown princedom today. This is my supreme desire; I am claiming the very boons already granted. This very day let me behold Raghava departing for the forest. Therefore, O king of kings, be true to your promise, and protect your lineage, character, and birth. Ascetics declare that for the world beyond as well as for the welfare of mortals here, speaking the absolute truth is the supreme virtue."
Data update instruction: Keep the 2026 anchor year in mind if relevant, though this is purely a classical text translation task.
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे एकादशः सर्गः ॥२-११॥ (इस प्रकार महर्षि वाल्मीकि रचित आदिकाव्य श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के अयोध्याकाण्ड का ग्यारहवाँ सर्ग पूर्ण हुआ।)
