श्रीरामायण पाठ — अयोध्याकाण्डे अष्टादशः सर्गः ॥२-१८॥
श्रीमद्वाल्मीकियरामायणे अयोध्याकाण्डे अष्टादशः सर्गः ॥२-१८॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के अयोध्याकाण्ड के अष्टादश सर्ग (२-१८) के सभी ४१ श्लोकों का क्रमवार हिंदी एवं अंग्रेजी अनुवाद व व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:
श्लोक १-३
स ददर्शासने रामो विषण्णं पितरं शुभे। कैकेय्या सहितं दीनं मुखेन परिशुष्यता॥ १॥ स पितुश्चरणौ पूर्वमभिवाद्य विनीतवत्। ततो ववन्दे चरणौ कैकेय्याः सुसमाहितः॥ २॥ रामेत्युक्त्वा तु वचनं बाष्पपर्याकुलेक्षणः। शशाक नृपतिर्दीनो नेक्षितुं नाभिभाषितुम्॥ ३॥
- हिंदी व्याख्या: श्रीराम ने उस उत्तम आसन पर अपने पिता को कैकेयी के साथ बैठे हुए विषण्ण, दीन और सूखे हुए मुख वाला देखा। अत्यंत विनीत भाव से उन्होंने पहले अपने पिता के चरणों में प्रणाम किया और फिर एकाग्रचित्त होकर कैकेयी के चरणों की भी वंदना की। "हे राम!" इतना कहकर, आँसुओं से भरे नेत्रों वाले वे दीन राजा न तो श्रीराम की ओर देख ही सके और न ही उनसे कुछ बोल सके।
- English Translation: Rama beheld His father seated on the auspicious seat alongside Kaikeyi, dejected, wretched, and with a parched face. With utmost humility, He first saluted His father's feet and then composedly bowed at the feet of Kaikeyi. Uttering the words "O Rama!", his eyes brimming with tears, the wretched king was unable either to look at Him or to speak to Him.
श्लोक ४-७
तदपूर्वं नरपतेर्दृष्ट्वा रूपं भयावहम्। रामोऽपि भयमापन्नः पदा स्पृष्ट्वेव पन्नगम्॥ ४॥ इन्द्रियैरप्रहृष्टैस्तं शोकसंतापकर्शितम्। निःश्वसन्तं महाराजं व्यथिताकुलचेतसम्॥ ५॥ ऊर्मिमालिनमक्षोभ्यं क्षुभ्यन्तमिव सागरम्। उपप्लुतमिवादित्यूपुक्तानृतमृषिं यथा॥ ६॥ अचिन्त्यकल्पं नृपतेस्तं शोकमुपधारयन्। बभूव संरब्धतरः समुद्र इव पर्वणि॥ ७॥
- हिंदी व्याख्या: राजा के उस अभूतपूर्व और भयावने रूप को देखकर श्रीराम को भी ऐसा भय हुआ, जैसे पैर से किसी जहरीले सर्प को छू लेने पर होता है। उनकी इंद्रियाँ प्रसन्न नहीं थीं; वे महाराज शोक और संताप से क्षीण हो रहे थे, लंबी साँसें छोड़ रहे थे और उनका चित्त अत्यंत व्यथित व व्याकुल था। वे राजा ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानो तरंगों से मालामाल, सामान्यतः शांत किंतु इस समय क्षुब्ध सागर हों, राहु से ग्रस्त सूर्य हों, अथवा सत्य से विचलित हुए (झूठ बोलने वाले) कोई ऋषि हों। राजा के उस अचिंत्य और अगाध शोक को अनुभव करके श्रीराम पर्व के दिन के समुद्र की तरह अंदर ही अंदर और अधिक गंभीर व उद्विग्न हो उठे।
- English Translation: Beholding that unprecedented and terrifying countenance of the king, Rama too felt a sudden dread, just like one touching a venomous serpent with his foot. With subdued senses, the great king was wasted by grief and anguish, sighing heavily, his mind distressed and agitated. He looked like an ocean adorned with waves—normally unshakeable but now profoundly stirred—like the sun eclipsed, or like a sage who had violated the truth. Perceiving that unimaginable grief of the king, Rama grew even more deeply agitated within, like the ocean on a full-moon day.
श्लोक ८-१०
चिन्तयामास चतुरो रामः पितृहिते रतः। किंस्विदद्यैव नृपतिर्न मां प्रत्यभिनन्दति॥ ८॥ अन्यदा मां पिता दृष्ट्वा कुपितोऽपि प्रसीदति। तस्य मामद्य सम्प्रेक्ष्य किमायासः प्रवर्तते॥ ९॥ स दीन इव शोकार्तो विषण्णवदनद्युतिः। कैकेयीमभिवाद्यैव रामो वचनमब्रवीत्॥ १०॥
- हिंदी व्याख्या: पिता के हित में सदा तत्पर रहने वाले चतुर राम ने विचार किया—"क्या कारण है कि आज राजा मेरा अभिनंदन (स्वागत) नहीं कर रहे हैं? अन्य दिनों में तो पिता मुझे देखकर कुपित होने पर भी प्रसन्न हो जाते हैं, किंतु आज मुझे देखकर उन्हें यह कैसा कष्ट (आयास) हो रहा है?" शोकातुर, दीन और फीके चेहरे की कांति वाले उन श्रीराम ने कैकेयी को प्रणाम करके यह बात कही—
- English Translation: The clever Rama, ever devoted to His father's welfare, pondered: "Why is the monarch not welcoming Me today as usual? On other days, even when angry, father becomes pleased upon seeing Me; why then does this distress arise in him upon beholding Me today?" Looking distressed, sorrowful, and pale-faced, Rama bowed to Kaikeyi and spoke these words:
श्लोक ११-१४
कच्चिन्मया नापराद्धमज्ञानाद् येन मे पिता। कुपितस्तन्ममाचक्ष्व त्वमेवैनं प्रसादय॥ ११॥ अप्रसन्नमनाः किं नु सदा मां प्रति वत्सलः। विषण्णवदनो दीनः नहि मां प्रति भाषते॥ २१॥ (तथा १२) शारीरो मानसो वापि कच्चिदेनं न बाधते। संतापो वाभितापो वा दुर्लभं हि सदा सुखम्॥ १३॥ कच्चिन्न किंचिद् भरते कुमारे प्रियदर्शने। शुत्रुघ्ने वा महासत्त्वे मातॄणां वा ममाशुभम्॥ १४॥
- हिंदी व्याख्या: "क्या अज्ञानतावश मुझसे कोई ऐसा अपराध हो गया है, जिससे मेरे पिता कुपित हैं? हे मातः! आप मुझे यह बताइए और आप ही इन्हें प्रसन्न कीजिए। जो मेरे प्रति सदा इतने वत्सल (स्नेही) रहते हैं, वे आज अप्रसन्न मन वाले, विषण्ण मुख और दीन क्यों हो रहे हैं तथा मुझसे क्यों नहीं बोल रहे हैं? क्या इन्हें कोई शारीरिक या मानसिक संताप अथवा रोग सता रहा है? संसार में सदा सुख मिलना दुर्लभ ही है। क्या प्रियदर्शन कुमार भरत को, महासत्वशाली शत्रुघ्न को या मेरी माताओं (कौसल्या, सुमित्रा आदि) को तो कोई अशुभ (संकट) नहीं पहुँचा है?"
- English Translation: "Could it be that unwittingly I have committed some fault for which my father is angry? Do you tell me this, O Mother, and do you yourself appease him. Why is he, who is ever so affectionate toward Me, displeased of mind, crestfallen, wretched, and refusing to speak to Me? Could some bodily or mental affliction, disease, or agony be troubling him? Happiness is indeed rarely constant in this world. I hope no misfortune has befallen the handsome prince Bharata, the mighty-souled Shatrughna, or my mothers?"
श्लोक १५-१८
अतोषयन् महाराजमकुर्वन् वा पितुर्वचः। मुहूर्तमपि नेच्छेयं जीवितुं कुपिते नृपे॥ १५॥ यतोमूलं नरः पश्येत् प्रादुर्भावमिहात्मनः। कथं तस्मिन् न वर्तेत प्रत्यक्षे सति दैवते॥ १६॥ कच्चित्ते परुषं किंचिदभिमानात् पिता मम। उक्तो भवत्या रोषेण येनास्य लुलितं मनः॥ १७॥ एतदाचक्ष्व मे देवि तत्त्वेन परिपृच्छतः। किंनिमित्तमपूर्वोऽयं विकारो मनुजाधिपे॥ आरभत... (तथा १८)
- हिंदी व्याख्या: "महाराज को असंतुष्ट करके या पिता की आज्ञा का पालन न करके, राजा के कुपित होने पर मैं एक मुहूर्त के लिए भी जीवित रहना नहीं चाहता। मनुष्य जिस माता-पिता से अपना प्रादुर्भाव (जन्म) देखता है, उस प्रत्यक्ष देवता के प्रति वह कैसे विनीत नहीं रहेगा? हे मातः! क्या अभिमानवश क्रोध में आकर आपने मेरे पिता को कोई कठोर वचन तो नहीं कह दिया, जिससे इनका मन इतना विचलित हो गया है? हे देवि! मैं आपसे सत्य-सत्य पूछ रहा हूँ, आप मुझे बताइए कि मनुजाधिप (राजा) में यह अभूतपूर्व विकार (परिवर्तन) किस कारण से आया है?"
- English Translation: "Displeasing the Maharaja or failing to carry out my father's command, with the king angry, I would not wish to live even for a single moment. How could a person fail to serve and obey those visible deities—his parents—from the very root of whose being he sees his own manifestation? O Mother, could it be that out of pride and anger you spoke some harsh words to my father, which have unsettled his mind? Do tell me this truthfully, O Queen, as I earnestly inquire: what is the cause of this unprecedented transformation in the lord of men?"
श्लोक १९-२१
एवमुक्ता तु कैकेय्या राघवेण महात्मना। उवाचेदं सुनिर्लज्जा धृष्टमात्महितं vachः॥ १९॥ न राजा कुपितो राम व्यसनं नास्य किंचन। किंचिन्मनोगतं त्वस्य त्वद्भयान्नानुभाषते॥ २०॥ प्रियं त्वामप्रियं वक्तुं वाणी नास्य प्रवर्तते। तदवश्यं त्वया कार्यं यदनेनाश्रुतं मम॥ २१॥
- हिंदी व्याख्या: महात्मा राघव द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर, अति निर्लज्ज और धृष्ट कैकेयी ने अपने हित की बात बिना किसी संकोच के कह डाली—"हे राम! राजा कुपित नहीं हैं और न इन्हें कोई व्यसन (संकट) ही है। इनके मन में जो बात है, वह यह है कि ये तुम्हारे भय के कारण उसे कह नहीं पा रहे हैं। तुम्हें प्रिय लगने वाली बात के विपरीत कोई अप्रप्रिय बात कहने के लिए इनकी वाणी प्रवृत्त नहीं होती है। इसलिए इन्होंने जो बात मुझसे नहीं कही है, उसे तुम्हें अवश्य पूरा करना चाहिए।"
- English Translation: Thus addressed by the high-souled Raghava, the utterly shameless and audacious Kaikeyi spoke words calculated solely for her own self-interest: "O Rama, the king is neither angry nor afflicted by any calamity. What is in his mind is simply that out of fear of you he is unable to utter it. His tongue refuses to speak anything unpleasing to you, since you are so dear. Therefore, you must unfailingly execute what he has been hesitant to promise me."
श्लोक २२-२६
एष मह्यं वरं दत्त्वा पुरा मामभिपूज्य च। स पश्चात् तप्यते राजा यथान्यः प्राकृतस्तथा॥ २२॥ अतिसृज्य ददानीति वरं मम विशाम्पतिः। स निरर्थं गतजले सेतुं बन्धितुमिच्छति॥ २३॥ धर्ममूलमिदं राम विदितं च सतामपि। तत् सत्यं न त्यजेद् राजा कुपितस्त्वत्कृते यथा॥ २४॥ यदि तद् वक्ष्यते राजा शुभं वा यदि वाशुभम्। करिष्यसि ततः सर्वमाख्यास्यामि पुनस्त्वहम्॥ २५॥ यदि त्वभिहितं राज्ञा त्वयि तन्न विपत्स्यते। ततोऽहमभिधास्यास्यामि न ह्येष त्वयि वक्ष्यति॥ २६॥
- हिंदी व्याख्या: "इन्होंने मुझे पहले ही सम्मानित करके दो वर दिए थे और अब यह किसी साधारण मनुष्य की तरह पश्चाताप कर रहे हैं। प्रजानाथ ने मुझे वर देकर उसे पूरा करने का वचन दिया था, किंतु अब यह पानी निकल जाने पर व्यर्थ ही सेतु बाँधना चाह रहे हैं (यानी अब पछताने से क्या लाभ)। हे राम! तुम भी जानते हो और सज्जन लोग भी जानते हैं कि 'सत्य' ही सभी धर्मों का मूल है, इसलिए राजा तुम्हारे मोह के कारण अपने उस सत्य को न त्याग दें। यदि राजा तुम्हें वह बात बता दें—चाहे वह शुभ हो या अशुभ—और तुम उसे करने की प्रतिज्ञा करो, तभी मैं तुम्हें वह बात बताऊँगी। यदि राजा के द्वारा कही गई बात को तुम टालोगे नहीं (उसे पूरा करोगे), तभी मैं तुम्हें वह बात बताऊँगी, क्योंकि ये तुम्हारे सामने उस बात को स्वयं कहने में संकोच कर रहे हैं।"
- English Translation: "Having honored me and granted me boons in the past, the king is now repenting like any ordinary mortal. The lord of the people promised to grant my boons, but now he wishes to build a bridge after the water has flowed away. O Rama, you and the virtuous alike know that truth is the root of righteousness; therefore let not the king abandon that truth out of attachment to you. If the king speaks that command to you—whether auspicious or inauspicious—and you promise to fulfill it, only then shall I disclose it to you. If what the king enjoins upon you is not transgressed by you, then I will tell you, for he is unable to speak it directly to you."
श्लोक २७-३०
एतत् तु वचनं श्रुत्वा कैकेय्या समुदाहृतम्। उवाच व्यथितो रामस्तां देवीं नृपसंनिधौ॥ २७॥ अहो धिङ् नार्हसे देवि वक्तुं मामीदृशं वचः। अहं हि वचनाद् राज्ञः पतेयमपि पावके॥ २८॥ भक्षयेयं विषं तीक्ष्णं पतेयमपि चार्णवे। नियुक्तो गुरुणा पित्रा नृपेण च हितेन च॥ २९॥ तद् ब्रूहि वचनं देवि राज्ञो यदभिकांक्षितम्। करिष्ये प्रतिजाने च रामो द्विर्नाभिभाषते॥ ३०॥
- हिंदी व्याख्या: कैकेयी के द्वारा कहे गए इस वचन को सुनकर व्यथित हुए श्रीराम ने राजा के सामने ही उस देवी (कैकेयी) से कहा—"अहो! धिक्कार है! हे देवि! आपको मुझे ऐसी बात नहीं कहनी चाहिए थी। यदि मेरे गुरु, पिता और हितैषी महाराज की आज्ञा हो, तो मैं उनकी बात पर प्रज्वलित अग्नि में भी कूद सकता हूँ, तीक्ष्ण विष का भी पान कर सकता हूँ और समुद्र में भी छलाँग लगा सकता हूँ। इसलिए हे देवि! आप राजा की वह इच्छा प्रकट कीजिए, मैं उसे अवश्य करूँगा। मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि राम कभी अपनी बात को दो बार नहीं कहते (जो एक बार कह दिया, अटल है)।"
- English Translation: Hearing these words uttered by Kaikeyi, a distressed Rama spoke to the queen right in the presence of the king: "Alas, fie upon it! O Queen, you ought not to speak such words to me. If commanded by my preceptor, father, and well-wishing sovereign, I would willingly leap into blazing fire, swallow sharp poison, or plunge into the ocean. Therefore, O Queen, declare whatever the king desires; I shall fulfill it, and I take this vow: Rama never speaks twice (his word is final)."
श्लोक ३१-३५
तमार्जवसमायुक्तमनार्या सत्यवादिनम्। उवाच रामं कैकेयी वचनं भृशदारुणम्॥ ३१॥ पुरा देवासुरे युद्धे पित्रा ते मम राघव। रक्षितेन वरौ दत्तौ सशल्येन महारणे॥ ३२॥ तत्र मे याचितो राजा भरतस्याभिषेचनम्। गमनं दण्डकारण्ये तव चाद्यैव राघव॥ ३३॥ यदि सत्यप्रतिज्ञं त्वं पितरं कर्तुमिच्छसि। आत्मानं च नरश्रेष्ठ मम वाक्यमिदं शृणु॥ ३४॥ संनिदेशे पितुस्तिष्ठ यथानेन प्रतिश्रुतम्। त्वयारण्यं प्रवेष्टव्यं नव वर्षाणि पञ्च च॥ ३५॥
- हिंदी व्याख्या: उस सरल स्वभाव वाले और सत्यवादी राम से उस अनार्या (कुटिल) कैकेयी ने अत्यंत दारुण (कठोर) वचन कहे—"हे राघव! पूर्वकाल में देवासुर संग्राम के समय महारणे में बाणों से घायल और तुम्हारे पिता द्वारा मेरी रक्षा किए जाने पर उन्होंने मुझे दो वर दिए थे। उन वरों में मैंने राजा से भरत का राज्याभिषेक और आज ही तुम्हारे दण्डकारण्य गमन की माँग की है। हे नरश्रेष्ठ! यदि तुम अपने पिता को और स्वयं अपने को सत्यप्रतिज्ञ रखना चाहते हो, तो मेरी इस बात को सुनो। पिता की आज्ञा का पालन करते हुए, जैसा इन्होंने मुझे वचन दिया है, तुम्हें चौदह वर्ष (नव और पाँच वर्ष) के लिए अरण्य (वन) में प्रवेश करना होगा।"
- English Translation: To that upright and truthful Rama, the unrighteous Kaikeyi spoke exceedingly harsh words: "O Raghava, formerly in the war between gods and demons, when your father was wounded in the great battle and protected by me, he granted me two boons. In those, I have begged of the king the consecration of Bharata and your immediate departure to the Dandaka forest, O Raghava. O best of men, if you wish to keep your father and yourself true to your vows, listen to my words. Abiding by your father's command just as he promised me, you must enter the forest for twice seven years (fourteen years)."
श्लोक ३६-४०
भरतश्चाभिषिच्येत यदेतदभिषेचनम्। त्वदर्थे विहितं राज्ञा तेन सर्वेण राघव॥ ३६॥ सप्त सप्त च वर्षाणि दण्डकारण्यमाश्रितः। अभिषेकमिदं त्यक्त्वा जटाचीरधरो भव॥ ३७॥ भरतः कोसलपतेः प्रशास्तु वसुधामिमाम्। नानारत्नसमाकीर्णां सवाजिरथसंकुलाम्॥ ३८॥ एतेन त्वां नरेन्द्रोऽयं करुणेन समाप्लुतः। शोकैः संक्लिष्टवदनो न शक्नोति निरीक्षितुम्॥ ३९॥ एतत् कुरु नरेन्द्रस्य वचनं रघुनन्दन। सत्येन महता राम तारयस्व नरेश्वरम्॥ ४०॥
- हिंदी व्याख्या: "और तुम्हारे लिए राजा द्वारा जो संपूर्ण अभिषेक की सामग्रियाँ तैयार की गई हैं, उन्हीं सब सामग्रियों से भरत का अभिषेक हो। तुम इस राज्याभिषेक को छोड़कर जटा और वल्कल (चीर) धारण करके चौदह वर्ष (सात और सात वर्ष) तक दण्डकारण्य के आश्रित होकर रहो। नाना प्रकार के रत्नों से भरी तथा घोड़ों और रथों से संकुल इस कोसल देश की पृथ्वी का शासन भरत करे। करुणा से भरे हुए और शोक के कारण जिनका मुख मलिन हो गया है, ऐसे ये राजा इसी बात के संकोच से तुम्हारी ओर देख नहीं पा रहे हैं। हे रघुनंदन! राजा के इस वचन को पूरा करो और अपने महान सत्य के द्वारा इन नरेश्वर (पिता) को इस संकट (अधर्म) से तार दो।"
- English Translation: "And let Bharata be consecrated with all those very coronation materials prepared by the king for your sake. Abandoning this coronation, with matted locks and wearing bark garments, do you take refuge in the Dandaka forest for fourteen years (seven and seven). Let Bharata rule this earth of the lord of Kosala, replete with diverse gems and crowded with horses and chariots. Overwhelmed with compassion and with a face withered by grief, this monarch is unable even to look at you on this account. Execute this command of the king, O Raghava, and through your supreme truthfulness, save the lord of men, O Rama."
श्लोक ४१
इतीव तस्यां परुषं वदन्त्यां न चैव रामः प्रविवेश शोकम्। प्रविव्यथे चापि महानुभावो राजा च पुत्रव्यसनाभितप्तः॥ ४१॥
- हिंदी व्याख्या: कैकेयी द्वारा इस प्रकार कठोर वचन कहे जाने पर भी श्रीराम ने शोक में प्रवेश नहीं किया (वे विचलित नहीं हुए)। किंतु महानुभाव श्रीराम और पुत्र के संकट से अत्यंत संतप्त हुए राजा दशरथ—दोनों ही इस स्थिति से अत्यधिक व्यथित हो उठे।
- English Translation: Even while she was uttering such harsh words, Rama did not sink into grief. But both the high-souled Rama and the king—tormented by the misfortune of his son—were deeply pained.
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे अष्टादशः सर्गः ॥२-१८॥ (इस प्रकार महर्षि वाल्मीकि रचित आदिकाव्य श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के अयोध्याकाण्ड का अठारहवाँ सर्ग पूर्ण हुआ।)
